Sunday, January 22, 2012

वो लड़की जो खुश रहना जानती थी

ऐसा तो नहीं था की उसने उससे खूबसूरत लड़की पहले नहीं देखी थी, लेकिन उसके चेहरे में जरूर कुछ ऐसा था जिससे उसकी नज़र उसके चेहरे से हटती ही नहीं थी.लड़की की मासूम भोली और अनोखी हंसी लड़के के दिल को एक अजीब सा सुकून देती थी.वो जब भी हँसती तो उसे वो दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की लगती.लड़की की हंसी से लड़के के आसपास की पूरी दुनिया खिल उठती थी.लड़का मन ही मन ये दुआ भी करता की लड़की बस ऐसे ही हँसती मुस्कुराती रहे, हमेशा.

लड़के और लड़की की प्रेम कहानी भी लड़की की हंसी की तरह ही एकदम अनोखी थी.दोनों अलग अलग देशों में रहते थे.अलग अलग देशों में रहते हुए भी दोनों के बीच एक अटूट रिश्ता था.कभी कभी तो दोनों को ऐसा लगता की दोनों में कुछ भी दूरियां नहीं हैं और दोनों हर पल साथ हैं.ऐसा नहीं की शुरू से ही दोनों में इतनी दूरियां थी.दोनों पहले एक ही शहर में रहते थे.लड़का का वो शहर अपना था, और लड़की कुछ समय के लिए उस अजनबी शहर में रहने आई थी.पता नहीं कैसे दोनों में दोस्ती हो गयी, और दोस्ती हुई भी तो ऐसी की आसपास के लोग लड़के-लड़की की दोस्ती से जल-भून जाते.जब तक लड़का और लड़की एक ही शहर में रहे, तब तक लड़के ने लड़की से कुछ नहीं कहा.लड़की हमेशा उसे अपना सबसे अच्छा दोस्त समझती रही और लड़का उससे दीवानों की तरह मोहब्बत करता रहा.अनचाहे कारणों से जब लड़की को विदेश जाना पड़ा तब भी लड़का उससे कुछ नहीं कह सका.फिर एक समय ऐसा आया की लड़के ने लड़की से अपने प्रेम का इजहार किया, इजहार भी लड़की की हंसी के जैसा ही अनोखा था.लड़की एक हाँ के सिवाय कुछ भी नहीं कह सकी.जब से दोनों के बीच इजहार-इकरार हुआ तब से दोनों कभी साथ नहीं रहे.जब कभी लड़की अपने वतन लौटती तब दोनों की मुलाकात हो पाती.लड़के ने जब से लड़की से अपनी दिल की बात कही तब से अब तक छः साल हो चुके हैं और इन छः सालों में दोनों की मुलाकात सिर्फ अड़तालीस दिन हो पायी.अड़तालीस दिनों में दोनों बस नब्बे घंटे ही एक दूसरे के साथ रहे.

लड़के को लड़की की बहुत सी बातें विचित्र सी जान पड़ती.सबसे पहले तो लड़की की हंसी.लड़के को लगता की लड़की के हंसी के पीछे कोई बहुत गहरा रहस्य छिपा है, जिसे कभी कोई जान नहीं सकता.खुद वो लड़की भी नहीं.लड़के को अक्सर ये भ्रम भी होता की लड़की तितलियों और चीटियों से बातें करना जानती है.लड़के ने कितनी ही बार लड़की को उनसे बातें करते देखा है.लड़की खुश रहती थी, बहुत खुश..इतना की लड़का भी ये सोचता की कोई भी इंसान इतना खुश आखिर कैसे रह सकता है.लड़की हमेशा कहती की "इतना खुश रहो की आसपास वाले तुम्हे देख के जल-भून जाए की आखिर कोई इतना खुश कैसे रह सकता है".लड़की की बातें भी लड़की के हंसी के जैसी ही अनोखी और जुदा थी.लड़की कहा करती थी की 'इंसान को कभी उदास नहीं रहना चाहिए.उदास रहने से चेहरा भी मुरझा जाता है और इंसान की खूबसूरती भी नहीं रहती.इंसान को हमेशा खुश रहना चाहिए, खुश रहने से चेहरा खिला खिला सा लगता है'.

लड़के के जब संघर्ष के दिन चल रहे थे और कुछ लोगों के बर्ताब ने उसे एकदम निराश और हताश कर दिया तब गिने चुने चार पांच लोग ही थे जो लड़के को हौसला देते रहे.उनमे से एक वो लड़की थी.लड़का दिन भर अपने घर में चुपचाप रहता, और शाम को बाहर निकलता.जिस शाम लड़के को काम नहीं भी रहता, उस शाम भी वो निकलता, सिर्फ उस लड़की से मिलने के लिए.रोज लड़की से एक घंटे की मुलाकात लड़के के दिल को तसल्ली देती की सब ठीक हो जाएगा.शाम के वो पल लड़के के सबसे खूबसूरत पल होते थे और उसे हर शाम लगता की ये पल यहीं ठहर जाए, बस वो लड़की की आँखों में, उसकी बातों में कहीं खो जाए.वो सारी दुनिया से बेखबर हो जाता, अपनी सारी तकलीफ और दर्द को पीछे छोड़ वो एक बहुत ही खूबसूरत सी दुनिया में चला जाता.

लड़की भी लड़के का बहुत ख्याल रखती.लड़के को लगता की लड़की बिलकुल उसकी माँ की तरह उसका ख्याल रखती है.लड़के के खर्चे से लेकर उसकी पढ़ाई तक का हर हिसाब लड़की रखती.लड़की जहाँ देखती की लड़का फ़ालतू के चीज़ों में अपनी पॉकेट मनी उड़ा रहा है तो वो नाराज़ हो जाती और लड़के को खूब डांटती.लड़के को हमेशा ये लगता की उसके दो गार्डीअन हैं.घर में उसकी माँ और बाहर वो लड़की.शायद इसी वजह से जब कुछ सालों बाद लड़का पढ़ाई के लिए दूसरे शहर गया तब वो एकाएक बहुत अकेला सा हो गया.ना तो उसकी माँ उसके साथ थी और नाही वो लड़की.

लड़के ने लड़की को हमेशा खुश ही देखा.दुःख के मौसमों में भी लड़की के चेहरे पे मुस्कान सदा बनी रही.लेकिन कुछ ऐसी परिस्थितियां भी आयीं की लड़की की हंसी एकदम गायब हो गयी.लड़का तब बड़ा चिंतित हो गया.उसने कभी लड़की को दुखी नहीं देखा और जब एक दिन लड़की को उसने उस हालत में देखा तो अंदर ही अंदर टूट सा गया.वो उस दिन खूब रोया भी.उसके मन में सिर्फ एक ही ख्याल आया की भगवान को अगर दुःख ही देना था तो मुझे देते, उस बेचारी लड़की को क्यों?लड़का उस दिन को कभी नहीं भूल सकता जब उसने पहली बार लड़की की उदास आँखें देखी थी जब पहली बार लड़की उसके कंधे पर सर रख कर रोई थी.

लड़के और लड़की अब भी एक दूसरे से बहुत दूर रहते हैं और अब तो दोनों एक दूसरे से बात भी नहीं कर पाते.ऐसे में अक्सर शामों में या फिर बारिशों में या फिर जाड़ों की गुनगुनी धुप में लड़के को लड़की की हंसी अचानक से याद आ जाती है और सड़कों पर चलते चलते वो अचानक मुस्कुराने लगता है, गुनगुनाने लगता है..बाकी लोगों से बेफिक्र, बेपरवाह..कभी किसी अजनबी लड़की की नीली जूतियों,पीले दुप्पट्टे या लंबे बालों पर लड़के की नज़र जाती है तो उसे वो लड़की बेतरह याद आ जाती है.लड़के को तो लड़की को याद करने के बस बहाने चाहिए होते हैं और वो उसे बड़े आसानी से मिल भी जाते हैं.आसपास के लोग अक्सर लड़के की हरकतों से उसे कोई दीवाना समझते हैं लेकिन लड़के को इस बात की ज़रा भी फ़िक्र नहीं है, वो तो बस यादों के मौसम में डूबे रहने के और उस लड़की को याद करने के बहाने खोजता फिरता है जो खुश रहना जानती थी.

   | जब तू मुस्कुराती है, बिजली भी शरमाती है
     पलकें जब उठाती है, दुनिया ठहर जाती है..

     
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Wednesday, January 11, 2012

उसकी नज़रों में कोई जादू था


जब उसकी तबियत खराब हो जाती थी तो वो बिलकुल चुप हो जाता था.किसी से भी कुछ बात नहीं करता.घर के बच्चों की वही शरारती बातें जिसे वो बहुत पसंद करता था, वे बातें भी उसका मन नहीं बहला पाती थीं... .तबियत बहुत ज्यादा खराब होने पर वो किसी से कुछ नहीं कहता.बुखार में जब उसका पूरा शरीर जल रहा होता तो भी वो अंतिम समय तक किसी से कुछ भी नहीं कहता था.वो किसी से तब तक कुछ नहीं कहता जब तक बुखार या फिर कोई भी तकलीफ असहनीय नहीं हो जाती.दर्द सहना उसके लिए कोई नयी बात नहीं थी.पहले भी वो दर्द सहता आया था जब उसकी बहुत सी गलतियों ने उसके जीवन पर एक गहरा प्रभाव डाला था और अब भी...जाने अनजाने में अपनों से ही मिला दर्द हो या अपनी ज़िन्दगी को अपने सामने बिखरते देखने का दर्द या फिर उस लड़की से बिछड़ने का दर्द जिसे वो दुनिया में सबसे ज्यादा चाहता था.

तबियत जब उसकी खराब होती थी, तब उसके आगे पुरे परिवार का जमावड़ा लग जाता था.सारे परिवार वाले उससे बहुत प्यार करते थे, और उसकी तबियत ख़राब होने की खबर सुनकर सब उससे मिलने आ जाते थे.नार्मल लड़कों की तरह उसकी तबियत कभी ख़राब नहीं होती थी, हल्का बुखार, खांसी, सर्दी तो वो बिना किसी से कुछ भी कहे झेल लेता था लेकिन उसके तबियत का ख़राब होने का मतलब होता था कुछ ज्यादा ही सिरिअस बात...वो तब बिस्तर पर अधलेटा सा पड़ा रहता था और अपने आसपास के लोगों को, उनकी बातों को, उनके हरकतों को देखते रहता था.उसके अन्दर इतनी हिम्मत नहीं होती थी की वो उठ कर चल फिर सके, उसे बिस्तर पर नॉर्मली लेटने की भी हिम्मत नहीं होती थी.उसे सांस की बीमारी थी, और बिस्तर पर सो जाने से, या लेट जाने से साँसे तेज़ चलने लगती..बहुत से तकियों के सहारे वो बिस्तर पर अधलेटा हुआ सा रहता था...तीस डिग्री के एंगल में....या दिवार के सहारे टिककर बैठा रहता और सब कुछ देखते रहता था. नानी-मामा-मामी-मौसी-माँ-पापा-बहन..सभी उसके इर्द गिर्द रहते और उसे वो पल बेहद अच्छा लगता.वो अक्सर अपने बिमारी के दिनों में सोचा करता की काश ऐसा हो की वो हमेशा बीमार रहे और परिवार के सभी सदस्य युहीं उसके नज़रों के सामने रहे..इतने लोगों के सामने भी वो किसी से कुछ बात नहीं करता था, चुपचाप बैठा रहता और सबकी बातें सुनता और खुश होते रहता...उसे अच्छा लगता था की उसकी बीमारी के बहाने ही सभी लोग एक ही कमरे में बैठ कर बातें कर रहे हैं, एक साथ हंसी-मजाक-गप्पे कर रहे हैं.अपनी बीमारी के दिनों में माँ और बहन के अलावा वो किसी से कुछ भी बात नहीं करता.

वो जब बिमार होता, तो उसके दोस्त भी आसानी से नहीं जान पाते की वो बिमार है..वो अपने दोस्तों को कुछ भी नहीं बताता था...जब बहुत दिन हो जाते और वो अपनी बिमारी की वजह से दोस्तों से मिलने नहीं जा पाता तो उसके दोस्त फोन कर के उसकी खैरियत मालुम करते, और वो हर बार दोस्तों के सवालों को ये कह कर टाल देता था की वो व्यस्त है, कुछ दिन बाद मिलेगा उनसे. लेकिन उसके सारे दोस्तों में सिर्फ वो लड़की एक थी, जिसके सामने वो कभी बहाने नहीं बनाता था, अपनी तबियत को लेकर कभी झूठ नहीं बोल पाता था..उस लड़की से वैसे कुछ छुपाने का फायदा भी नहीं था.वो उसकी बातें जान लिया करती थी.वो फोन करती और उसकी आवाज़ सुनते ही वो जान लेती थी की वो ठीक है या बिमार है.जब फोन के दूसरी तरफ लड़का कहता की वो बिमार है, उसकी तबियत ठीक नहीं तब लड़की तब घबरा सी जाती थी और फोन पर उसकी आवाज़ कांपने लगती थी...लड़के को लगता जैसे लड़की उसकी बीमारी की बात सुनकर रो रही है.

उन्ही दिनों लड़के के दिमाग में पता नहीं कैसे एक दफे ये बात घर कर गयी की अगर वो बुखार या फिर किसी भी बिमारी में उस लड़की को एक नज़र देख लेगा, तो वो बिलकुल ठीक हो जाएगा.एक शाम जब उसे ये महसूस हुआ की उसे हल्का बुखार है तो वो घर में किसी से ये बात कहने के बजाये साइकिल लेकर उस लड़की से मिलने चला गया.उसे पता था की बुखार में उसे साईकिल नहीं चलानी चाहिए,बहुत ज्यादा चांसेज रहते ऐसे कंडीसन में की उसकी सांस फिर से फूलने लगे...लेकिन उसे पक्के तौर पे ये यकीन था की अगर वो लड़की उसे एक नज़र उसे देख लेगी तो उसके नज़रों की गर्माहट से उसकी बीमारी गायब हो जायेगी.नवंबर की सर्द हवा चल रही थी और साइकिल चलाते वक्त उसका पूरा शरीर काँप रहा था.उसे एक पल ये भी महसूस हुआ की उसे चक्कर सा आ रहा है और वो रास्ते में ही कहीं गिर जाएगा, शायद उसका बुखार थोड़ा बढ़ गया था...और इस ख्याल से वो थोड़ा घबरा सा गया.उसे रास्ते में गिरने की ज्यादा परवाह नहीं थी, फ़िक्र उसे इस बात की थी की जब उसके घर वाले पूछेंगे की वो बुखार में कहाँ साईकिल चला कर जा रहा था तो वो क्या जवाब देगा....वो लड़की जब उससे सवाल करेगी तो वो क्या जवाब देगा उसकी बातों का?

उसने दूर से ही उस लड़की को देख लिया था और तब उसे देखते ही लड़के को लगा की अब उसे कुछ भी नहीं हो सकता.कम से कम जब तक वो लड़की उसके नज़रों के सामने है तब तक तो उसे कुछ भी नहीं हो सकता.उसे अब यकीन आ गया था की उसका बुखार भी उस लड़की के नखरों और इडीऑटिक बातों से परेसान होकर भाग जाएगा.वो लड़की अक्सर उसके चेहरे से अंदाज़ा लगा लेती थी की वो क्या महसूस कर रहा है.उस दिन भी उस लड़की ने सबसे पहले उससे यही सवाल किया था  "क्या हुआ, तबियत खराब है तुम्हारी?"

"नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं..तुम फ़ालतू सा वहम पालने लगी हो आजकल .." लड़के ने सवाल को टालना चाहा.

वो लड़की लेकिन इस सवाल से संतुष्ट नहीं हुई और एक डॉक्टर की तरह उसने लड़के की कलाई और फिर माथे को छू कर कहा..बुखार है तुम्हे.,.तुम क्यूँ फ़ालतू में घूमते रहते हो..बुखार है तो घर पे ही आराम करना चाहिए.

लड़का इस बात का कोई भी जवाब न दे सका.उसकी नज़रें इधर उधर जाने लगीं.उसने बहुत कोशिश की ,की बातों को दूसरी तरफ मोड़ सके लेकिन वो नाकाम रहा.लड़की अपने उस सवाल पर अड़ी रही की वो बुखार में साईकिल क्यों चला कर इतनी दूर उससे मिलने आया है.लड़की ने उसे फिर डांटते हुए कहा "मौसम बदलने का असर सबसे ज्यादा तुमपर होता है, और तुम हो की इतने लापरवाह..सर्दियाँ आ आ गयी हैं, और ऐसे में तुम्हे ख़ास ध्यान रखना चाहिए..."
लड़का उसकी इन बातों से अचानक बहुत इमोशनल हो गया, उसकी आँखों में एक दो बूंद मोती नज़र आने लगे थे....उस लड़के को ऐसी बातें सिर्फ उसकी माँ कहती थी, शायद इसलिए लड़के ने जब लड़की से ये बातें सुनी तो उसकी आँखों में अचानक आंसूं आ गए, जिसे उसने बड़ी चालाकी से लड़की से छुपा भी लिया था.
लड़के ने आखिर में ये कह कर लड़की के उस सवाल से पीछा छुड़ाया की घर से निकलते वक्त तो वो ठीक था,रास्ते में अचानक तबियत खराब सी लगने लगी.

लड़की उसके इस जवाब से संतुष्ट तो नहीं हुई लेकिन उसने लड़के से आगे कोई बहस भी नहीं की.
पास वाले मेडिकल स्टोर में वो लड़की गयी और उसके लिए कुछ दवाइयां लेते आई.., एक जेनरल स्टोर से एक बिस्कुट का पैकेट और एक पानी की बोतल भी वो खरीद लाई...और फिर लड़के को उसने अपने हाथों से दवाईयां खिलाते हुए हिदायत दी..."देखो, बाकी की दावा रात में सोने वक़्त खा लेना...और अगर ज्यादा तबियत ख़राब हो, तो घर में सबको बता देना....."
लड़की ने अपने पास लड़के को बहुत देर तक बिठाए रखा और एक डॉक्टर की तरह उसे हिदायतें दे रही थी... लड़के को लेकिन दवा की या किसी और डॉक्टर की अब कोई जरूरत नहीं थी, वो अब पहले से काफी बेहतर और अच्छा महसूस कर रहा था.उसे अब ये यकीन था की वो सही सलामत साइकिल चला कर घर जा सकता है, और उसे कुछ नहीं होगा..ना तो वो गिरेगा और नाही उसे कोई चोट लगेगी.
लड़की की आँखों में या उसकी छुअन में सच में कोई जादू है की जिसकी गर्माहट पाकर कोई भी ठीक हो सकता है, ये लड़का उस समय सोच रहा था.




आज की रात वो फिर से अच्छा महसूस नहीं कर रहा है.उसे अभी उस लड़की की और अपनी माँ की बहुत याद आ रही है.हालांकि वो अभी अपनी मौसी के घर पर है जिन्होंने बचपन में उसकी हर तरह से देखभाल की है....उसका इतना ख्याल रखा उसकी मौसी ने, जिसका की कोई हिसाब नहीं. कितनी ही रातें वो जागी हैं इस लड़के के कारण.वो लड़का अब बड़ा हो गया है और अपनी मौसी को नहीं बताना चाहता की उसकी तबियत खराब है..वो नहीं चाहता की वो उसकी वजह से और परेसान हो.वो नहीं चाहता की उसके वजह से कोई भी परेसान हो.उसे बस अपनी माँ की याद आ रही है और उस लड़की की, जिसके नज़रों में कोई जादू बसता था.वो अभी अपनी माँ और उस लड़की को बेतरह याद कर रहा है.फोन पर उसने दोनों ही से, अपनी माँ से और उस लड़की से बातें कर ली है....और अब उस लड़के को ये यकीन है की कल सुबह जब वो सो के उठेगा तो वो उस लड़की के जादू से (जो वो दूर रह कर भी कर सकती है) फिर से बेहतर और अच्छा महसूस करेगा.

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Friday, January 6, 2012

तुम्हारे नाम लिखी एक और चिट्ठी

(बड़ा अन्यूजवल सा पोस्ट है, शायद ऐब्नॉर्मल और बेतुका भी...तो अपने रिस्क पर ही पोस्ट पढ़ें)

बड़ी मुश्किल से कल रात मैने सुलाया खुद को 
इन आंखो को तेरे ख्वाब का लालच दे कर

याद है तुम्हे, मैंने एक बार तुमसे कहा था की जब भी मुझे रात को नींद नहीं आती तो आँखें बंद कर के उन चीज़ों के बारे में सोचने लगता हूँ जिनकी कभी मैंने तमन्ना या ख्वाहिश की थी.तुम्हे बताने की जरूरत नहीं है की जब भी मैं आँखें बंद करता हूँ तो सिर्फ तुम्हारा ही चेहरा आँखों के सामने आता है, और फिर तुम्हारे बारे में सोचते सोचते पता भी नहीं चलता की नींद कब मुझे अपने आगोश में समेट लेती है.

ये एक बड़ा बेतुका सा खेल है जो कभी कभी मुझे हैरत में डाल देता है.एक दिन युहीं ये खेल खेलते खेलते मुझे नींद आ गयी और मैं सपना देखने लगा की तुम्हारा विवाह मेरे साथ हो गया है.सुबह सुबह अचानक जब एक टेक्स्ट मेसेज से नींद खुली और सपना टूटा, तो महसूस हुआ की मैं सपना देख रहा था...मेरे सामने वही कमरा था, वही किताबें...सब कुछ वैसा ही था..मेरी साँसे तेज चल रही थी, ऐसा लग रहा था की मैं बहुत देर तक दौड़ता रहा था और अंत में ठोकर खा कर गिर गया..मैं कुछ देर एकदम हताश सा बैठा रहा.

मेरे लिए ऐसे सपने देखना कोई नयी बात नहीं है.कल रात वैसा ही कुछ सपना फिर से देखा मैंने..मैंने देखा की सुबह जब मेरी नींद खुली तो तुम मेरे बगल में बैठी हुई हो और मुझे बड़े प्यार से नींद से जगा रही हो.हम अपने घर में हैं और वो घर मुझे एक वुडेन हाउस जैसा लग रहा था.याद है न एक दफे तुमने कहा था की जैसा 'पटना जू' में एक वूडेन हाउस है, ठीक वैसा ही किसी बड़े से पेड़ पर बना हुआ वुडेन हाउस में तुम रहना चाहती हो..ये तुम्हारी बहुत सी ख्वाहिशों में से एक थी..फिर जब कुछ सालों बाद एक फिल्म आई थी 'द लेक हाउस' तो तुमने कहा था की तुम्हारी ख्वाहिश है की तुम भी उस तरह के घर में रहो जो सिर्फ शीशों से बना हुआ हो.उस रात जो मैंने सपने में देखा था की हम वैसे ही किसी घर में रह रहे हैं..

देखो न, तुम्हारी बातों जैसी ही तुम्हारे सपने भी कितने इल-लॉजिकल हैं.अगर मैं अपने एक सपने के बारे में बताऊंगा तो तुम यकीन बिलकुल नहीं करोगी...और मैं जानता हूँ की तुम उसे सुन खूब हंसोगी भी.लेकिन वो सपना मैंने सच में देखा था.

एक बार कहीं पढ़ा था, की अगर आप किसी रात बहुत अच्छा सा कोई ख्वाब देखते हैं, और चाहते हैं की वो ख्वाब हमेशा आपके पास सुरक्षित रहे तो नींद से जागने के ठीक बाद आप अपने उस ख्वाब को किसी डायरी या नोटबुक में सहेज कर रख लीजिए.हो सकता है की बाद में जब भी आप उस ख्वाब के बारे में पढ़ें, तो आपको हंसी आये, दुःख हो या अच्छे लगे..जो भी होगा, लेकिन वो ख्वाब आपसे हमेशा के लिए जुड़ा रहेगा.सिर्फ नींद से जागने के बाद का ही वो वक्त होता है जब आप उस ख्वाब की हर छोटी छोटी बातें भी अच्छे से याद रख सकते हैं.बाद में धीरे धीरे वो ख्वाब आप भूलते जाते हैं.पता नहीं ये लॉजिक कैसा है, लेकिन तुम यकीन नहीं करोगी, मैं ऐसा सही में करने लगा था और खास कर के तब जब मेरे ख्वाबों में तुम आती थी.

चलो, मैं तुम्हे उस सपने के बारे में बताता हूँ..

मैंने देखा की तुम मेरे शहर में आई हुई हो.मेरे ही मोहल्ले में.मुझे ऐसा लग रहा था की जैसे तुम बहुत दिनों से इस शहर में मेरे साथ रह रही थी.तुम मुझसे फरमाइश कर रही थी की तुम्हे कौन से दूकान की कौन सी चीज़ चाहिए.फिर जब हम दोनों साथ साथ घूमने निकले तो मैं देख के हैरान रह गया की मुझे सड़क के दूसरी तरफ पटना शहर दिखाई दे रहा था.मैंने सोचा की ऐसा कैसे हो सकता है..फिर ख्याल आया की मैं सपने में ये देख रहा हूँ.
मुझे लगा की शायद सपने सही में बहुत पावरफुल होते हैं..दो शहरों को भी मिला सकते हैं, आप सपने में कुछ भी देख सकते हैं...- फिर भी मैं बड़ा कन्फ्यूज सा खड़ा था.मैं तुमसे पूछना चाह रहा था की मुझे पटना शहर कैसे दिखाई दे रहा है, लेकिन इस कारण चुप रहा की पता नहीं तुम इस बात पे कैसे रीऐक्ट करोगी.
मैं सड़क के दूसरी तरफ देखने लगा..और मुझे वहाँ पटना की बड़ी जानी-पहचानी तस्वीर दिख रही थी, मुझे वहाँ से तुम्हारा मोहल्ला दिख रहा था, तुम्हारा घर और तुम्हारी गली के सामने वाला साइकिल-दूकान.मैं लगातर उधर ही देख रहा था की इधर से अचानक तुम गायब हो गयी.मैं परेसान हो गया की तुम गयी कहाँ?सड़क के उस तरफ या इस तरफ?
पीछे पलटा तो एक अपार्ट्मन्ट दिखाई दिया, जो मुझे बहुत जाना पहचाना सा लगा.लेकिन फिर तुरत ये ख्याल आया की ये अपार्ट्मन्ट इधर कैसे?इसे तो सड़क के दूसरी तरफ होना चाहिए..खैर, मैं उस अपार्ट्मन्ट की तरफ बढ़ा..सब कुछ बड़ा जाना पहचाना सा लगा...वही गेट, वही सीढियां...मैंने देखा की उस अपार्ट्मन्ट की पहली मंजिल पे चार फ़्लैट थे..और तीन में बड़े बड़े ताले लगे हुए थे.एक फ़्लैट खुला हुआ था, दरवाज़ा आधा खुला हुआ था और अंदर से बेसन के हलुए की सोंधी खुशबु आ रही थी.मैं जैसे ही दरवाज़े के पास पहुंचा तो मुझे कुछ आवाजें सुनाई देने लगी...आवाजें साफ़ नहीं थी, लेकिन मैं फिर भी आवाजों को पहचान पा रहा था.मैं दरवाज़े पे दो पल खड़ा रहा, सोच ही रहा था की दरवाज़ा खोल के अंदर जाऊं या न जाऊं, की उतने में तुमने आकार दरवाज़ा खोल दिया.
मैं एकदम हैरान तुम्हे देखने लगा.

मैं फिर तुमसे पूछना चाह रहा था की तुम एकाएक यहाँ कैसे आ गयी, लेकिन मैं तुमसे पूछ नहीं पा रहा था.मुझे ऐसा लगा की जैसे मैं चाह के भी कुछ कह नहीं पा रहा हूँ.एक पल के लिए मुझे भ्रम हुआ की मेरी आवाज़ हमेशा के लिए चली गयी है.
तुम मुझे वहीँ..उसी कन्फ्यूज अवस्था में खड़ा छोड़ फिर से रसोई में चली गयी और मैं कमरे को देखने लगा.वो कमरा बहुत जाना पहचाना सा दिख रहा था..वहाँ मेरी बहुत सी चीज़ें दिखाई दे रही थी और मैं इस बात पे भी हैरान था की वो सब चीज़ें यहाँ कैसे पहुंची और ये कमरा किसका है?मेरा दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा था और मैं वहाँ लगे सोफे पे बैठ गया(वो सोफा भी बिलकुल वैसा ही था जो मेरे घर में है).मुझे हलकी नींद आने लगी, मैं वहीँ सोफे पे सो गया.

कुछ देर के बाद एक आवाज़ से मेरी नींद खुली...

मैंने देखा सामने मेरा दोस्त मुराद खड़ा है, और वो मुझे उठा रहा है -"अबे उठ जा, चाय पिएगा?बनाते हैं".

मैं आँखें फाड़ फाड़ के उसे देख रहा था, वो मेरे इस बर्ताव को देख कहने लगा, भाई, मैं ही हूँ...कोई भूत नहीं हूँ, हुआ क्या तुझे?". मुझे एकाएक ख्याल आया की मैं हैदराबाद में मुराद के फ़्लैट पे हूँ, और मैं सपना देख रहा था...मैं तुम्हे सपने में देख रहा था..
मैं फिर हताश सा उठ के बैठ गया...यकीन जानो, जब मुराद की आवाज़ से मेरी नींद खुली तो मेरी साँसे सही में बहुत तेज चल रही थी और मुराद भी थोडा चिंतित सा हो गया था.


| मेरे इस शहर की एक शाम, जो तुम्हारे नाम थी |
ये तो रही सपनो की बात.कितनी बार तो ये भी किया है मैंने की रात को सोने के ठीक पहले उन बातों को सोचने लगता हूँ..उन जगहों के बारे में सोचने लगता हूँ जहाँ मैं तुम्हे कभी ले जाना चाहता था. मैं तुम्हे वो शहर घुमाना चाहता था, जहाँ से मैंने पढाई की..और चाहता था की हम दोनों शाम में देर तक उन पेड़ों के नीचे बैठे रहे, जहाँ मैं अपने दोस्तों के साथ अक्सर बैठा करता था.देर रात तक हम दोनों उसी दीवाल पे बैठ के गप्पें करें जिस दीवाल पे बैठ के अपने दोस्त को तुम्हारे किस्से सुनाता था.मैं तुम्हे उस साइबर कैफे में भी ले जाना चाहता था जो उस समय उस शहर का एकमात्र साइबर कैफे था, जहाँ से तुमसे हर वीकेंड चैट पे बात होती थी..मैं चाहता था की तुम्हे मैं उस रेस्टुरेंट में ले जाऊं, जहाँ मैंने अपने दोस्तों को तुम्हारे जन्मदिन की पहली पार्टी दी थी.मैं चाहता था तुम उस शहर से जुड़ी मेरी हर बात को देखो और जानो.

मेरी ये बेतुकी ख्वाहिश पता नहीं कैसे मेरे दिमाग में घुस के बैठ गयी..जब मेरी जिंदगी के सबसे बुरे दिन चल रहे थे तो मैं अक्सर सोचता था, की अगर कभी हम एक हो गए तो मैं तुम्हे उन सब जगहों पे घुमाने ले जाऊँगा.मैं तुम्हे अपना ये शहर भी दिखाना चाहता था जहाँ मैं अभी रह रहा हूँ(जहाँ से बस कुछ ही घंटों में मैं विदा भी हो जाऊँगा).मैं तुम्हे इस शहर में वो सब जगहें दिखाना चाहता था जो तुम्हे कभी कोई भी ट्रैवेल गाईड नहीं दिखा पायेगा.मैं तुम्हारा शहर भी घूमना चाहता था, तुम्हारे साथ.मैं चाहता था की तुम्हारे साथ मैं उन सब जगहों पे जाऊं जहाँ की बातें तुम अक्सर करती थी.तुम्हारे उस शहर में जाने के पहले वो मेरे लिए विदेश का एक अनजान, खूबसूरत सा शहर था.लेकिन जैसे जैसे तुम उस शहर से मेरी पहचान कराते गयी तो मुझे ऐसा लगने लगा की वो शहर मेरा भी उतना ही है जितना तुम्हारा और कभी अगर मैं उस शहर गया तो बिना किसी की मदद लिए मैं पूरा शाहर आराम से घूम सकता हूँ..

सच पूछो तो कभी कभी मुझे ऐसा लगता है की उस शहर का अस्तित्व सिर्फ तुमसे है.जब भी उस शहर का कोई जिक्र करता है या फिर कहीं उस शहर से जुड़ी कोई खबर पढता हूँ तो बस एक सिर्फ तुम्हारा ही ख्याल ज़हन में आता है.ये भी तय है की कुछ समय बात तुम वहाँ से हमेशा के लिए कहीं और चली जाओगी, लेकिन फिर भी मेरे लिए उस शहर से तुम्हारा नाम हमेशा जुड़ा रहेगा.

.....
मुझे दिल से उसने पूजा
उसे जाँ से मैने चाहा
इसी हमराही मेँ आखिर
कहीँ आ गया दोराहा

फिर इक ऐसी शाम आई
कि वो शाम आखिरी थी
कोई जलजला सा आया
कोई बर्क सी गिरी थी

अजब आँधियाँ चली फिर
कि बिखर गए दिलो-जाँ
न कहीँ गुले-वफा था
न चरागे-अहदो-पैमाँ

[अहमद फराज़]

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Sunday, January 1, 2012

यादों में एक दिन : गिफ्ट


वो खड़ी थी, सड़क के दूसरी तरफ.आज वो मेरे से पहले पहुँच गयी थी, जो मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था.हमेशा वो मुझे कम से कम आधा घंटा तो इंतज़ार करवाती ही थी.वो सर से पांव तक गर्म कपड़ों में थी.बस उसका चेहरा दिखाई दे रहा था.मैंने देखा की वो बड़े गौर से ज़मीन की तरफ नज़रें गड़ाए कुछ देख रही है, या फिर शायद ज़मीन पर का कुछ लिखा पढ़ने की कोशिश कर रही है.उसकी ये आदत थी, की ज़मीन या दीवाल पर कभी कुछ अच्छा लिखा दिख जाता तो वो उसे बड़े ध्यान से पढ़ने लगती.

मैं सड़क पार करके उसके करीब आया...पहले तो मैंने कोशिश की ये देखने और समझने की, आखिर वो ज़मीन पर देख क्या रही है.लेकिन मुझे कुछ भी समझ नहीं आया..ना तो आसपास कोई कागज़ का टुकड़ा था और नाही ज़मीन पर कुछ लिखा हुआ था...
मैंने पीछे से उसे छुआ तो वो एकदम डर सी गयी और मुझे डांटने लगी - "क्या करते हो....मैं तो डर ही गयी थी बिलकुल..."
"ये तुम नीचे क्या देख रही हो इतने गौर से?" मैं उससे पूछा.
उसने बड़े मासूमियत से कहा - "अरे देखो न ये 'चीटी' कितनी क्यूट लग रही है और इसकी चाल कितनी क्यूट सी है, बस उसी को देख रही थी..?".
मेरा सर चकरा गया था.मैंने उसे डांटते हुए, चिढ़ाते हुए कहा - "तुम पागल हो, इसका सर्टिफिकेट हमेशा देना जरूरी तो नहीं है न...अब चलो.."

मेरे इस बात से उसका चेहरा उतर गया..वो बड़े मासूमियत से कहती है - "हाँ तुमको तो हम पागल ही दीखते हैं न...सिर्फ बस एक तुम्ही होशियार हो...देखो तो ये बेचारी चीटी कितनी क्यूट सी है..कभी इधर कभी उधर जा रही है...कित्ती कन्फ्यूज सी लग रही है...शायद ये अपने घर का रास्ता भूल गयी है....और तुमको ये पागलपन लगता है...सच कहता है सब...लड़का सब का दिल तो पत्थर का होता है".

उसके ऐसे सार्कैस्टिक बातों पर मुझे हमेशा हंसी आ जाती है..मैं सोचने लगा की कैसे किसी को चीटी की चाल क्यूट लग सकती है?कैसे कोई एक चीटी की चाल को इवैल्यूऐट कर सकता है.मन में सिर्फ एक ही विचार आया की अब भी ये कितनी ज्यादा मासूम है.

मैंने उसे छेड़ने के लिए फिर कहा ""एक तो सड़क पर तुम चीटी को देख रही हो और उसपर से उसका चाल भी तुम्हे क्यूट लग रहा है....दुनिया का कोई भी समझदार आदमी इसे पागलपन वाली बात ही कहेगा..."

वो फिर गुस्सा हो गयी - "सच में, इंजीनियरिंग पढते पढते तुम्हारा दिल एकदम मशीन टाईप का हो गया है....बिलकुल पत्थर...अभी भी एक साल बाकी है न इंजीनियरिंग का, संभल जाओ नहीं तो पास होने के बाद तुमको सब मशीन ही समझेगा...समझे?"

मुझे बहुत हंसी आ रही थी, और मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी को रोके रखा था.उसकी ऐसी इल-लॉजिकल बातो पर अक्सर मुझे हंसी तो आती ही थी साथ साथ प्यार भी बहुत आता था.सच कहूँ तो उसकी यही इल-लॉजिकल और स्टुपिड बातों ने शायद मुझे उसकी तरफ आकर्षित किया था, नहीं तो उससे खूबसूरत तो हजारों लड़कियां थी, और मेरे जान पहचान में भी उससे ज्यादा खूबसूरत लड़कियों की अच्छी खासी लिस्ट थी(सॉरी, नो ऑफेन्स इन्टेन्डड).

उसने जब देखा की मैं हँसे जा रहा हूँ, तो वो बच्चों से शकल बनाकर कहने लगी..."काश मेरे पास कोई मैजिक वैंड होता तो मैं इस चींटी को बड़ा बना देती और फिर इसे अपने साथ रखती..तब तुम इसको कुछ भी उल्टा पुल्टा बोलते तो ये तुम्हे काट खाती".

मैंने उसे फिर छेड़ा : "अच्छा, तुम इसे रखना चाहती हो, अभी तो तुम्हारे पास मैजिक वैंड नहीं है तो एक काम करो, इसे ऐसे ही रख लो...बड़ी चीटी या छोटी क्या फर्क पड़ता है"

"तुम पागल हो...इत्ती छोटी है ये...ऊँगली से भी 'चिपा' गयी तो बेचारी मर जायेगी".

"हाँ, फिर अगर ये मर गयी तो तुम्हारे सर पर जीव-हत्या का पाप भी चढ़ेगा न..." उसे चिढ़ाने का ये मेरा रामबाण था लेकिन इसने उल्टा असर किया..वो मुझे मारने के लिए अपना बैग उठा ली, मैं वहाँ से भाग निकला.

वो थोड़ा रूठ तो गयी थी, लेकिन ज्यादा वक़्त नहीं लगा उसे मानाने में.

हम एक रेस्टुरेंट में आ गए जो उसका पसंदीदा रेस्टुरेंट था.उस रेस्टुरेंट से उसकी और मेरी यादें जुड़ी हुई थी. जब वो कोल्कता से पटना पहली बार आई थी तो सबसे पहले उसी रेस्टुरेंट में उसने लंच किया था.और अगर कभी हमें बात करनी होती थी तो हम अक्सर वहीँ बैठा करते थे.वहाँ की कोल्ड कॉफी विद आइसक्रीम उसे बहुत पसंद थी.वो एक छोटा सा मजाक अक्सर करती थी..मुझसे कहती थी - "तुम अगर मुझे कोई जुगाड़ लगा कर ये कोल्ड-कॉफी मेरे शहर तक पहुंचा सकोगे, तो मैं जिंदगी भर तुम्हारे इशारों पे नाचूंगी.." वो जब भी कुछ ऐसा कहती थी तो मेरे लिए कुछ भी कहना बड़ा मुश्किल हो जाता था.

उस रेस्टुरेंट में हमारी एक फेवरिट टेबल थी.उस दिन बैठने के क्रम में बगल वाले टेबल पर रखे दो ग्लास उसके बैग से टकरा कर नीचे गिर गए.होटल का मैनेजर वहीँ घूम रहा था.जैसे ही ग्लास टूटने की आवाज़ आई तो उसे लगा की शायद किसी को चोट लगी गयी, वो तुरंत हमारे टेबल के तरफ आने लगा.इधर मैडम जी को ये लगा की ग्लास टुटा है इसलिए वो मैनेजर कुछ कहने आ रहा है..इसने सोचा की इससे पहले वो कुछ कहे, यही उसे कुछ सुना दे..अंग्रेजी में उस मैनेजर को पता नहीं इसने क्या-क्या बुरा-भला कहा.मुझे तो ज्यादा अंग्रेजी समझ में आती नहीं..जो भी थोडा-बहुत मेरे पल्ले पड़ा, उससे मुझे लगा की वो उसे कह रही थी : "तमीज नहीं है आप लोगों को टेबल लगाने की, इतने पास पास टेबल लगा कर रखा हुआ है..और गिलास भी ऐसे किनारे रखा जाता है क्या?".

वो बेचारा मैनेजर गुस्सा होने के बजाय इसे सॉरी बोलकर, माफ़ी मांगकर चला गया.अब इधर मुझे उसे छेड़ने का एक और हॉट-टॉपिक मिल गया था, जिसे मैं किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहता था.

जब वो आराम से बैठ कर और अपने मेक-अप से फ्री हो गयी थी(बैंग में मेक-अप किट रखती थी, जिसे समय-समय पर इस्तेमाल भी कर लेती थी), तब मैंने अपना पहला बाण छोड़ा : "अरे तुम अंग्रेजी में क्या बतिया रही थी...इतना फर्राटा से बोल रही थी..हमको तो 'यु' 'मी' 'नो' 'यस' के अलावा कुछ बुझाया भी नहीं".

वो फिर से मेरे पे झल्ला गयी थी और सामने टेबल पे चम्मच रखा हुआ था, उसने उसी को फेंक के मुझे मारा.चम्मज़ मेरे चेहरे के पास आकर लगा था मुझे, अच्छा हुआ की उसने धीरे से चम्मज़ फेंका था, और ये और भी अच्छा हुआ था की उसकी नज़र छुरी या फोर्क पर नहीं पड़ी थी.

कुछ देर बाद वेटर हम लोगों का आर्डर ले आया.उसे देखते ही ये फिर से भड़क उठी - "देखो तो ये लोग को बिलकुल तमीज नहीं है..सब कुछ एक साथ लेते आते हैं, इतनी भी तमीज नहीं की आइसक्रीम बाद में लाना चाहिए".
मुझे फिर से बड़ी जोर की हंसी आ रही थी और कुछ कहने को दिल कुलबुला भी रहा था, लेकिन अब अगर कुछ भी कहता तो वो नाराज़ हो जाती और फिर नए साल के पहला दिन उसका मूड अपसेट करने का अपराध मेरे सर आता...मैं चुप ही रहा.

शायद कुछ सिक्स्थ सेन्स जैसा भी उसमे था.वो कुछ चीज़ें को पहले से भांप लेती थी...मेरे पास बैग को देख कर वो बार बार मुझसे सवाल कर रही थी, की उस बैग में क्या है? और मैं हर बार उसके उस सवाल को टाल दे रहा था.लेकिन उसका शक धीरे धीरे बढ़ता गया.मैंने उसे कुछ भी नहीं कहा लेकिन उसे ये शक हो गया था की उस बैग में कोई तोहफा है जो शायद उसके लिए है.वो मेरे से बैग झपटना चाह रही थी, हर बार वो कोशिश कर रही थी और हर बार वो असफल हो रही थी...अंत में वो कामयाब हुई, लेकिन उसकी वजह भी मेरी असावधानी थी..वो कहावत है न की 'सावधानी हटी, दुर्घटना घटी'..वैसा ही कुछ हुआ था.इधर मैं वाश-रूम गया और उधर वो मेरे बैग में ताक-झाँक करने लगी.

जैसे ही मैं वापस आया वैसे ही उसने पूछा : "लाल वाला साड़ी बड़ा महंगा लगता है...कित्ते में ख़रीदा???और किसके लिए है...बहन के लिए या फिर आंटी के लिए?" मैं बस मुस्कुरा के रह गया.
वो फिर पूछती है : "बहन के लिए है न?"
मैंने कहा : "नहीं, वो साड़ी पहनती नहीं..एक लड़की के लिए ख़रीदा है...न्यू इअर का प्रेजन्ट".

"अच्छा? कौन सी लड़की के लिए??गर्लफ्रेंड बना लिए तुम क्या?" : वो एकदम शॉकड होकर पूछती है.

"हाँ, एक लड़की है, मेरे साथ पढ़ती थी..उसी के लिए ख़रीदा है...गर्लफ्रेंड है या नहीं, ये तो नहीं पता...शायद कुछ चांस बन जाए ये साड़ी गिफ्ट करने के बाद", मैंने हँसते हुए कहा.

उसके चेहरे से हंसी गायब थी...वो सीरिअस होकर कहती है "ओहो..तो जनाब इंजीनियरिंग में जाकर गर्लफ्रेंड-वर्लफ्रेंड भी बना लिए हैं...बेट्टा...पढाई करने गए हो...इश्कबाजी करोगे न तो हम सीधा जाकर आंटी को या तुम्हारी बहन को कह देंगे..फिर जब पिटोगे तो हमको मत कहना".

कुछ रुककर वो फिर पूछती है "अच्छा नाम क्या है उसका?कहाँ की है??पटना की या साउथ की?

मैंने कहा : "नाम जानकार क्या करोगी...बस मेरे साथ पढ़ती थी, इतना समझ लो.....वो भी कलकत्ता और बिहार मिक्स्ड है, जैसे तुम..अब इससे ज्यादा तुमको जानना भी नहीं चाहिए".

ये कहकर मैं हँसने लगा, और उसकी शकल पे गुस्से और इरिटेशन का मिला जुला भाव था.वो जबरदस्त इरिटेट हो चुकी थी...और बेहद गुस्से में थी...कुछ देर वो खामोश रही, फिर एकदम बच्चों के तरह का एक्सप्रेसन बना के कहती है - "अच्छा, मैं इतनी दूर से आई हूँ....तुम मेरे लिए कुछ नया साल का प्रेजेंट नहीं लाये???एक ग्रीटिंग्स भी नहीं?"

उसका वो प्यारा सा चेहरा देख और इतना मासूमियत भरा सवाल सुन कर मुझे उसपर अचानक बड़ा प्यार आ गया और खुद पर हल्का गुस्सा भी, की उसे मैं बेवजह तंग किये जा रहा हूँ...मैंने प्यार जताते हुए उससे कहा "अरे पागल, तुमको भूल सकते हैं क्या कभी हम??देखो तुम्हारे लिए गिफ्ट भी है, कार्ड भी और एक चिट्ठी भी".

अचानक से उसके चेहरे पे रौनक लौट आई...जैसे ही मैंने उसे वो पैकेट थमाया वो झट से उसे खोलने लगी..लेकिन पैकेट खोलने के बाद उसका चेहरा फिर से एकदम मुरझा गया..कहने लगी "पता नहीं किसके लिए तो साड़ी लाये हो..और मेरे लिए बस ये एक सड़ा हुआ ब्लैंक सी.डी..पता नहीं क्या फ़ालतू का चीज़ 'राईट' कर के दिए होगे."
"रखो अपने पास ही अपना गिफ्ट..मुझे नहीं चाहिए". उसने उस पैकेट को मेरे तरफ फेंक दिया.

"अरे एक तो कितना मेहनत से रात भर जाग कर अपने सबसे पसंदीदा शायर के द्वारा लिखे गए फिल्मों के गानों का एक कलेक्सन बनाया और तुम उसको ऐसे फेंक रही हो...पता है न कितने बड़े शायर हैं वो.....और तुम ये प्राइस्लस सी.डी को ऐसे फेंक रही हो....बत्तमीज..दिमाग विदेश में छोड़ आई क्या?"

उसका इरिटेशन अब चरम पर था...कहने लगी : "ख़ाक अच्छा शायर...कुछ खास नहीं है उनमे..वो तो मेरे दिमाग में भी वो सब बात आता है जो वो लिखते हैं...और उनके लिखने से पहले आता है..बस अंतर इतना है की मेरा कोई जान पहचान नहीं है फिल्म-इंडस्ट्री में नहीं तो उससे बड़े शायर हम होते...समझे...वो तो चोर हैं ...जो बात मेरे दिमाग में पहले आता है उसे वो चोरी कर लेते हैं और तुम जैसा पागल लोग उनको द ग्रेट शायर समझता है..बेवकूफ...नालायक..स्टुपिड"

अब मेरी हंसी रोके नहीं रुक रही थी.
उसने गुस्से में कहा - "तुम बैठो रहो यहीं...मैं अब जा रही हूँ...कभी भी मुझे इरिटेट करने का तुम मौका नहीं छोड़ते...आज न्यू इअर के दिन तुमने मेरे अच्छे खासे मूड का सत्यानाश कर दिया...पाप चढ़ेगा तुम पर...पाप....बात मत करना हमसे अब..."

मैंने उसका हाँथ पकड़ कर उसे रोका...बैठने के लिए कहा...वो बैठ तो गयी थी लेकिन मेरे तरफ न देख कर दूसरी तरफ देख रही थी...मैंने कहा उससे..."अच्छा यार, सॉरी. यु नो..तुम्हारे लिए भी एक स्पेशल गिफ्ट है...लेकिन पहले तुम कार्ड के पीछे जो लिखा है उसे पढ़ो..फिर तुमको वो गिफ्ट देंगे...वो भी बैग में ही रखा है."

उसने गुस्से में उस पैकेट से वो कार्ड निकला और उसे पलटा...कार्ड के पीछे लिखा हुआ था "देखो साड़ी बहुत महंगी है...दो महीने जबरदस्त सेविंग किये हैं तब खरीद पाए हैं...पसंद नहीं भी आये तो रख लेना और
पहनना...तुम इसमें अच्छी लगोगी"

ये पढते ही वो उछल पड़ी थी...I knew....I knew..तुम वो साड़ी मेरे लिए ही लाये थे...I was just knowing that....बदमाश हो तुम...मैं सच में डर गयी थी...की पता नहीं किस चुड़ैल के लिए तो तुम साड़ी लाये हो...लाओ मुझे बैग दो अपना.."

उसने जबरदस्ती मेरे से बैग छीन लिया और साड़ी निकाल के देखने लगी....
"ओ माई गॉड, इट्स सो ब्यूटीफल.......आई लव ईट....थैंक यु सो मच!!!!!थैंक यू फॉर मेकिंग मी फील लाईक प्रिंसेस ...."
"यु नो...तुम्हारा ये साड़ी अच्छा...कार्ड बहुत अच्छा...सी.डी बहुत अच्छा...तुम्हारे शायर अच्छे और यु तो बहुत बहुत बहुत अच्छे...आई जस्ट लव यु...."

उसने मुझे एक दोस्त की हैसियत से फिर से 'आई लव यु' बोल दिया था..और मेरी धड़कने फिर से बढ़ गयी थी...मैंने ने अभी तक उसे 'आई  लव यु' नहीं कहा था.
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