Thursday, November 1, 2012

टेरेस, कॉफ़ी और वो


हम उसे "रिफ्रेशमेंट की पुड़िया' कहते थे, क्यूंकि उसके आसपास कोइ भी उदास नहीं रह सकता था.उसकी बेवकूफियों को और शरारतों को सब इसलिए बर्दाश्त कर जाते थे क्यूंकि वो जहाँ भी जाती थी खुशियाँ बिखेरते चलती थी.हम सब उबाऊ इंसानों में वह एकमात्र ऐसी थी जो ज़िन्दगी को खुल के जीना जानती थी, जो हर बात पे हँसती थी और अपने आसपास के लोगों को हमेशा हँसाते रहती थी.दुःख के मौसमों में भी वो हँसने की वजह खोज लिया करती थी.कितने ऐसे उदास दिन थे हमारे जो उसकी हँसी से खिल से गए थे.शायद यही वजह थी की हम उसके अजीबोगरीब लॉजिक आसानी से बर्दाश्त भी कर लेते थे.लेकिन कभी कभी वो ऐसी बाते कर दिया करती थी जिसे बर्दाश्त कर पाना बेहद मुश्किल होता था..उसकी इल-लौजिकल बातों का वैसे तो कोई मौसम होता नहीं था, लेकिन सर्दियों में उसकी बेवकूफियां हद दर्जे तक बढ़ जाती थी.
एक दिन शाम जब सारे दोस्त बैठे थे वो युहीं कहने लगी "पता है आजकल मैं हर सुबह जॉगिंग पे जाती हूँ..जाड़ों के दिनों में सुबह पार्क में अगर टहलने जाओ तो स्पेशल किरण जैसा कुछ निकलता है एटमासफेअर से जो सीधे दिमाग को टच करता है, और जिससे दिमाग तेज और खूबसूरत हो जाता है..ऐसा मैं नहीं...डॉक्टर्स ने प्रूफ किया हैं".
मुझे उसके इस बेतुके बात पर ज़रा भी आश्चर्य नहीं हुआ, आश्चर्य तो तब हुआ जब उसने कहा की वो पिछले दस पंद्रह दिनों से लगातार जॉगिंग के लिए जा रही है.मैंने सोचा की जो लड़की गर्मियों में सुबह नौ बजे के पहले उठती नहीं वो सर्दियों में सात बजे कैसे उठ जायेगी.लेकिन ये मुमकिन भी था, वो खुद ये जानती थी उसकी बातों का कोई ओरछोर नहीं होता है, लेकिन फिर भी वो अक्सर अपनी इल-लॉजिकल बातों को सच मान बैठती थी.उस शाम उसकी ये बकवास बातें सुनते सुनते मुझे एक शरारत सूझी और अगले दिन सुबह सुबह मैंने उसके घर जाने का प्लान बनाया.

अगले दिन मैं उसके घर के पास सुबह साढ़े छः बजे ही पहुँच गया.उसके अपार्टमेन्ट के गेट से थोड़ा पहले ही मैंने अपना स्कूटर खड़ा कर दिया.उसके अपार्टमेन्ट में दो ब्लॉक थे, पहला ब्लॉक जिसके छत से आगे की सड़क दिखती थी, मैं उस ब्लॉक के छत पे चला गया.दुसरे ब्लॉक में वो रहती थी, जो की पीछे की तरफ था.ठीक सात बजे वो अपनी दीदी के साथ बाहर निकली.मैं उसे छत से देख रहा था.अपार्टमेन्ट के कम्पाउंड से बाहर निकलते ही उसकी नज़र मेरे स्कूटर पर पड़ी.मेरे स्कूटर को देखते ही वो ठिठक गयी.उसने इधर उधर देखा, अपनी दीदी से कुछ कहा और फिर कुछ देर वहीँ कन्फ्यूज्ड अवस्था में खड़ी रही.आसपास के दुकानों की तरफ उसने नज़र दौड़ाई, फिर कम्पाउंड के अन्दर आकर उसने एक चक्कर लगाया.वो मुझे खोज रही थी, और मैं छत से उसे देख देख मुस्कुरा रहा था.मुझे यकीन था की वो छत की तरफ देखेगी भी नहीं..दिमाग के स्टॉक की कमी हमेशा उसे रहती है और आलसी भी वो एक नंबर की, तो छत पे मुझे ढूँढने के लिए वो आएगी भी नहीं...ये  भी मैं जानता था.करीब दस पंद्रह मिनट परेसान होने के बाद वो अपनी दीदी के साथ पार्क में जॉगिंग करने चली गयी.करीब आधे घंटे के बाद वो वापस आई और मेरे स्कूटर को वहीँ लगा देख वो फिर से मुझे इधर उधर खोजने लगी.आगे बढ़ के आसपास की गलियों में भी उसने ताक-झाँक की, और फिर कुछ बुदबुदाते हुए थककर अपने फ़्लैट में चली गयी.उसके जाने के बाद, मैं भी बड़ी निश्चिन्तता के साथ छत से नीचे उतरा, और उसके अपार्टमेन्ट के सामने वाले चाय की दूकान पे चाय पी और वापस अपने घर आ गया.

शाम को जब उससे मिलने गया तो वो बेहद नाराज़ सी थी...."मेरे घर के आसपास चक्कर मत काटा करो, पुलिस कम्प्लेन कर दूंगी..." मिलते ही बड़े गुस्से में उसने मुझसे कहा.

"तुम्हारे घर के आसपास??मैं कब तुम्हारे घर के आसपास आया...फिर से कोई सपना देखी क्या...??", मैंने बिलकुल अनजान होकर पूछा उससे

"अच्छा, तो तुम नहीं आये थे...तो क्या अपने स्कूटर में कोई ऑटो-पायलट वाला सिस्टम भी लगाये हुए हो...जिससे तुम्हारा स्कूटर खुद-ब-खुद मेरे घर के पास चला आया और तुम्हे पता भी नहीं चला...." वो अभी तक गुस्से में ही थी.

"देखो, मैं तो सच कह रहा हूँ, मैं तो घर पे ही था, हाँ सुबह पापा किसी काम से जरूर निकले थे, हो सकता है तुम्हारे मोहल्ले में वो अपने किसी मित्र से मिलने गए हों." मैंने बड़े ही शान्ति उसके इस बात का जवाब दिया.

"अच्छा हाँ, अंकल भी हो तो हो सकते हैं..मैंने सोचा ही नहीं था....देखो कितनी बेवकूफ हूँ मैं...सॉरी सॉरी सॉरी". मुझे पता था की मेरा तीर सही निशाने पर लगेगा.मैंने एक बार पहले उसे बताया था की उसके मोहल्ले में मेरे पापा के कुछ दोस्त भी रहते हैं, और उस शाम उसने बड़ी जल्दी मेरे बहाने पर यकीन भी कर लिया.

मैंने लेकिन उस खेल को एक दिन तक ही सिमित नहीं रखा, तीन दिन लगातार मैं उसके घर हर सुबह जाता रहा और छत पर से उसे देखते रहता.उसने मेरे उस बहाने पर यकीन तो कर लिया था लेकिन फिर भी तीनों दिन सुबह जॉगिंग पर जाते और वापस आते वक़्त वो जब भी मेरे स्कूटर को वहां खड़ा देखती, तो बड़ा कन्फ्यूज्ड सा हो जाती थी..शाम में मिलती तो हमेशा पूछती मुझसे, की मैं उसके घर आया तो नहीं था...और मैं हमेशा इंकार कर देता.लेकिन तीसरे दिन शाम में उसके तेवर कुछ बदले से थे, मुझे समझ आ गया था की अब मेरा ये खेल ज्यदा लम्बा नहीं चल सकता.

चौथे दिन सुबह मैं अपने वक़्त के हिसाब से उसके अपार्टमेन्ट के छत पे पहुँच गया.उसके बाहर निकलने का समय हो गया था, लेकिन अब तक वो निकली नहीं थी.मैं लगातार सड़क की तरफ ही देख रहा था, की पीछे से किसी ने मेरी पीठ थपथपाई.मैं एकदम से हडबडा गया, और जैसे ही पीछे मुड़ के देखा तो वो खड़ी थी, अपने ऑल टाईम फेमस "ईवल वाली हंसी" के साथ.

"अरे..तुम...कैसे....जॉगिंग के लिए....तुम्हे कैसे पता.......छत पे.....मैं तो.....बस...." मैं कोई भी वाक्य पूरा नहीं कर पा रहा था और सच कहूँ तो यूँ उसे एकाएक सामने देख कर मैं थोड़ा डर भी गया था, की वो नाराज़ न हो जाए मुझे यूँ छत पे देखकर.

"क्या कर रहे हो यहाँ खड़े खड़े, पता है बिना परमिसन के किसी दुसरे के छत पे आना इलीगल है...चक्की पीसोगे पुलिस पकड़ के ले गयी तो". उसके चेहरे पे गुस्से और शरारत का मिक्स्ड सा भाव था..कुछ देर रुक कर उसने कहा "मैं पूछती थी तो पता नहीं क्या क्या बहाने बनाते थे साहब, और आज पकडे गएँ हैं तो मुहं से आवाज़ भी नहीं फुट रही"

मैं एम्बैरस्मन्ट में सिर्फ मुस्कुरा रहा था, और पता नहीं क्या क्या लॉजिक दिए वहां उसे लेकिन वो बेहद नाराज़ थी, की मैंने चार दिन बेमतलब ही उसे परेसान किया.मैं भी समझ गया था, की वो नाराज़ है, तो आज शाम तक मेरे हाथ में वो कोई एक लम्बा सा लिस्ट थमा देगी, जिसमे वो सब बातें लिखी होंगी जिसे पूरा करने से उसकी नाराजगी दूर हो जायेगी.लेकिन मैंने देखा की उसके एक हाथ में एक कागज़ भी था, यानी की वही लिस्ट.उसने पहले से तैयार कर रखी थी.मुझे लेकिन एक बात की हैरानी थी, की उसे कैसे पता चल गया की मैं छत पे हूँ.उसने इस बात का जवाब खुद ही दिया.-
"वो तो दीदी ने अचानक कल सुबह पार्क से लौटते वक़्त तुम्हे यहाँ देख लिया, वरना मुझे तो पता भी नहीं चलता की तुम कितने बड़े क्रिमनल हो...बिना इज़ाज़त दुसरे के छत पे आना किसी क्राईम से कम है क्या?"

"अरे लड़की, क्या क्या बकते जा रही हो...मैं बस युहीं आ गया था...खास तुम्हे परेसान करने नहीं...वो तो यहाँ मेरा एक और दोस्त रहता है...तुम्हे नहीं पता उसके बारे में..." मैं अपने बात पर कायम था लेकिन वो मेरे बातों से बहलने वाली नहीं थी, ये मुझे पता था.

"डोंट यु डेअर मिस्टर....काफी बहाने बना चुके, अब जल्दी से कान पकड़ के सॉरी बोलो,'मुसू मुसू हासी' गाओ,  ये लिस्ट पकड़ों...इसमें लिखी बातें मानो और फिर मुझे मनाओ...तब बात बनेगी, वरना से अपनी दोस्ती आज यहीं इसी वक़्त खत्म.वैसे तो तुम्हारा गुनाह देखते हुए ये सजा काफी कम है, लेकिन चलो फिर भी ठीक है.

एक जज की तरह उसने फैसला सुना दिया था.उसके फैसले के विरुद्ध जाने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी, तो मैंने भी हामी भर दी, उससे कान पकड़ के माफ़ी भी मांगी मैंने और उसने माफ़ भी तुरंत कर दिया, इस कंडीसन के साथ, की मैं लिस्ट में लिखी गयी सभी बातें पूरा करूँगा.उसने मुझे छत पे रुकने को कहा और खुद नीचे चली गयी.दस मिनट बाद वो छत पे आई, तो अपने साथ एक थर्मस और दो कप लेते आई थी.थर्मस में कॉफ़ी थी, जो उसने बनायीं थी.तब तक नौ बज चुके थे और नर्म सी धुप बिखरी हुई थी.हम दोनों वहां करीब और दो घंटे तक बैठे रहे, इस दौरान वो तरह तरह के "ज्ञान की बातों" से मुझे एन्लाइटन करती रही.

जब उसके अपार्टमेन्ट के गेट से बाहर मैं निकला तो मैंने उसका दिया वो लिस्ट पढ़ा..सबसे पहली सजा मेरी ये थी, की मुझे एक महीने तक रोज़ सुबह उसके छत पे आना पड़ेगा, और उसकी बनाई कॉफ़ी पीनी होगी, और उससे ज्ञान की बातें सीखनी पड़ेंगी.लेकिन एक महीने उसके घर जाना हो न सका, एक सप्ताह ही चला ये सिलसिला, लेकिन आज भी वो आठ दिन भुलाये नहीं भूलते जब सर्दियों की सुबह की शुरुआत उसकी मुस्कराहट और कॉफ़ी के कॉम्बिनेसन के साथ होती थी.


जवां दिल की राहों में, जैसे खिलती है कली,
तेरे होटों पे बसी, ऐसी हलकी सी हँसी..

continue reading टेरेस, कॉफ़ी और वो

Friday, October 19, 2012

लिखने की वजहें...


लड़का जब भी अपनी खुद की कहानियों से उबने लगता, जब उसे ये लगता की इन कहानियों को लिखकर कुछ भी हासिल नहीं होने वाला, ये बकवास बातें लिखना सिर्फ उसका पागलपन है और जब कभी वो फैसला करता की "अब ये बकवास बातें और नहीं लिखूंगा", ठीक उसी वक़्त ये बकवास बातें लिखने की उसे कोई न कोई वजह मिल ही जाती थी...

---

लोग मशगूल थे सब शादी में
रस्में मंडप में चल रही थीं उधर,
दूर उस लॉन की सरगोशी में
तन्हाँ बैठे हुए थे हम दोनों
और अचानक बजी गाने की धुन
तुम उठी, उठके नाचने भी लगी,
मुझको तो नाचना आता ही नहीं.
तुमने पीछा शुरू किया मेरा
मैं तो बस गोल-गोल भागा फिरा
ऐसे जैसे न पकड़ पाओ मुझे.
और फिर रुक गयीं अचानक तुम
हंसके बोली कि बड़े बुद्धू हो
मन्त्र पंडित जी पढ़ रहे थे वहाँ
और हम गोल-गोल घूमें यहाँ.
देख लो सात पे रुकी हूँ मैं
कोई वादा नहीं लिया मैंने
मैं बिना शर्त बस तुम्हारी हूँ
अपनी मम्मी से कहके घर रख लो!

---


एक पॉडकास्ट : तुम्हारे ख़त 


(पॉडकास्ट का टेक्स्ट पढने के लिए इस लिंक पर जाएँ
पॉडकास्ट क्रेडिट : अर्चना चाओजी
continue reading लिखने की वजहें...

Monday, October 15, 2012

मिस्टिरीअस अक्टूबर -२-


वे अक्टूबर के दिन थे जब वो छुट्टियाँ बिताने शहर आई हुई थी.उन्ही दिनों मेरे एक करीबी रिश्तेदार की शादी तय हुई.मेरी ईच्छा थी की उस शादी में वो भी शामिल हो.मुझे पता था की वो शुरू में नखरे दिखायेगी, लेकिन फिर भी मैं उसे मना लूँगा.मैंने तय किया की शादी का कार्ड देने मैं उसके घर जाऊँगा और उसके माता-पिता के हाथ में ही कार्ड दूंगा.कार्ड देने जब उसके घर जा रहा था, तो बेवजह ये सोच कर घबरा रहा था की उसके माता-पिता क्या सोचेंगे.उन्होंने बल्कि बहुत आराम से उसे शादी में शामिल होने की अनुमति दे दी.जब उसके घर से वापस आ रहा था, वो मुझे छोड़ने बाहर की गली तक साथ आई.उसने मुझे याद दिलाया की मैं उसके घर ठीक तीन साल बाद आ रहा हूँ.तीन साल पहले जब उसके घर आया था तो उसकी दीदी से मैंने वादा किया था की अपने परिवार के अगली शादी में उन्हें जरूर बुलाऊंगा.ये बात मुझे भी याद थी...लेकिन मैंने जान-बुझकर इस बात का जिक्र नहीं किया था..चलते वक़्त उसने मुझसे कहा "तुम अगर इस शादी में ना भी बुलाते मुझे, तो भी मैं जरूर आती".


मैंने उसे शादी के दिन शाम में आने को कहा था लेकिन वो सुबह ही पहुँच गयी थी..मैं छत पर कुछ तैयारियों में व्यस्त था की उसकी गाड़ी आते दिखाई दी...और मैं दौड़ते हुए उसे रिसीव करने नीचे गेट के पास पहुंचा.गेट के पास कुछ मेहमान और मेरे कुछ रिश्तेदार कुर्सियां डाल कर बैठे हुए थे.वहीँ पास में मेरी माँ और भाभी खड़ी थीं.मेरी भाभी से वो पहले भी एक बार मिल चुकी थी.गाड़ी से उतरते ही उसकी नज़र मेरी माँ पर गयी.उसने मेरे कानों में कहा "सुनो जनाब, आंटी वहां खड़ी हैं...अब बताओ अगर ऐसे में तुमको मैं अभी एक 'किस' कर लूँ, तो सोचो तुम्हारा क्या हाल होगा".ये कहने के बाद वो बिलकुल बेपरवाह तरीके से हंसने लगी..उसकी इस बेपरवाह हंसी से वहां बैठे कुछ रिश्तेदार हम दोनों को शक की नज़रों से देखने लगे..मेरी कुछ बहनें जो वहां खड़ी थी, उन्होंने कानाफूसी भी शुरू कर दी "लगता है ये भैया की गर्लफ्रेंड है".

माँ और भाभी हमारे पास आयीं तो मैंने उसका परिचय माँ से करवाया...मैंने कहा "ये मेरी सबसे अच्छी दोस्त है"....माँ ने जब पूछा "ये तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त तुम्हारे साथ कॉलेज में पढ़ती है या स्कुल की दोस्त है?" तो जबतक मैं माँ के इस प्रश्न का कुछ जवाब दे पाता, पीछे से भाभी ने एक जबरदस्त गुगली फेंक दिया "अरे ये झूठ बोल रहे हैं, इनकी दोस्त वोस्त नहीं है...ये आपकी होने वाली बहु है...प्यार करते हैं ये जनाब इनसे".  भाभी का ये गुगली इतना स्ट्रोंग था की उसके तो होश ही उड़ गए थे और मुझे भी चक्कर सा आ गया था...हम दोनों भाभी के इस गुगली से बिलकुल क्लीन बोल्ड हो गए थे.मैं भाभी के तरफ गुस्से से देखने लगा लेकिन फिर भी उनकी बातों का मैंने कोई विरोध नहीं किया...शुक्र इस बात का था की भाभी के इस गुगली को माँ ने सिरिअसली नहीं लिया और वो भी हंसने लगीं...

उसे देख जहाँ एक तरह कुछ लोग हैरान थे और उसे मेरी गर्लफ्रेंड मान लिए थे वहीँ दूसरी तरफ मेरी सभी बहनें उससे मिलकर बेहद खुश थीं..मेरी बहनों को खुश करने के लिए उसने कोई कसर भी नहीं छोड़ा था, सबके लिए वो कुछ न कुछ तोहफे लायी थी.उसकी चुलबुली हरकतों ने मेरी बहनों के साथ साथ मेरे परिवार में सबका दिल जीत लिया था..वो घर के कामों में मेरी बहनों का हाथ बटाने लगी.चाय भी उसने ही सबके लिए बनाई....और तब मुझे सही में यकीन हो गया की उसे चाय बनाने आती है.शो-ऑफ़ करना और खुद की तारीफ़ करना उसे सबसे ज्यादा पसंद है...मेरी बहनों और भाभियों को उसने ये बता दिया था की उसने हाथों में मेहँदी लगाने का कोई कोर्स किया हुआ है...फिर क्या था, घर की सभी लड़कियां उसे घेर के बैठ गयीं और उससे मेहँदी लगवाने लगीं....वो घर में इस कदर हिल मिल गयी थी की कुछ लोग तो उसे घर का ही कोई सदस्य समझने लगे थे...शाम में बारात निकलने के कुछ देर पहले जब उसे कुछ फुर्सत मिली तो मेरे पास आकर बैठ गयी...कहने लगी मुझसे "तुम्हारी फैमली कितनी प्यारी सी है, काश मैं हमेशा के लिए तुम्हारे इस परिवार का एक हिस्सा बन जाऊं".मैं कुछ भी नहीं कह सका, सिर्फ उसे देखता रहा..

बारात में वो शुरू में ही मुझसे खफा हो गयी...उसने कह रखा था की पुरे बारात के दौरान मैं उसके साथ ही रहूँ...लेकिन मैं अपने बड़े मामा के साथ सबसे पीछे चल रहा था..इसकी मुख्य वजह ये थी की बारात में मेरी बहनें परिवार के सभी सदस्यों को खींच ला रही थीं नाचने के लिए और मुझे और मामा को इससे बचना था, इसलिए हम दोनों बारातियों से थोड़ी दुरी बनाकर चल रहे थे.वो पुरे बेफिक्री में मेरी बहनों के साथ नाच रही थी और जब न तब मुझे देख कर गुस्से में अजीब अजीब सी शक्लें बना रही थी और लगातार इशारों से मुझे नाचने के लिए बुला भी रही थी...लेकिन मैं अपनी जगह से हिला भी नहीं..वैसे मुझे उसे नाचते हुए देखने का बड़ा मन था, लेकिन कोई नाचने के लिए खींच लेगा, इसका डर ज्यादा था...इसलिए मैंने अपने मन पर बड़ी मुस्किल से काबू किया.

मेरी सभी बहने उसके बारे में मेरे से इतना सुन चुकीं थी, की सबको उससे ढेर सारी बातें करनी थीं...हम लोगों ने प्लान बनाया की शादी की रस्में जब शुरू होंगी, तो हम सब लॉन के एक कोने में अपनी महफ़िल सजा लेंगे, और वो महफ़िल पूरी रात चलेगी.हम सबने वही किया भी...लॉन के एक कोने में हम जाकर बैठ गए और पूरी रात बातों और मजाकों का सिलसिला चलता रहा...उस महफ़िल में वैसे तो ज़्यादातर मेरी टांग-खींचाई ही होती रही, लेकिन उस रात हम सबने अपने ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत पल जिये थे.करीब तीन घंटे हम सब बातें करते रहे और उसके बाद मेरी बहनों को शादी के कुछ रस्मों के लिए जाना पड़ा.वो भी मेरी बहनों के साथ जा रही थी, लेकिन मैंने उसे रोक लिया...

कुछ देर हम दोनों खामोश से बैठ रहें..बैकग्राउंड से कुछ पुराने गानों की आवाज़ आ रही थी...

"ये सब गाने कितने बार सुनती रहती हूँ, लेकिन ऐसे शादी के पंडालों में जब ये गाने बजते हैं तो कुछ अलग सा लगता है न", उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"हाँ, मुझे याद है जब मेरी मौसी की शादी हुई थी बहुत साल पहले, तब मैं अक्सर 'डेक' वालों के पास चला जाता था इंस्ट्रकसन देने के लिए की कौन से गाने बजने चाहिए"..

"ह्म्म्म" उसने मेरी बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.वो कुछ सोचने लगी :

"अच्छा ये बताओ, तुम्हे याद है...उन दिनों जब जाड़ों की सुबह हम कंप्यूटर क्लासेज के बाद चचा की दुकान पे चाय पीते थे, तो चचा के 'डेक' में भी ऐसे गाने बजते थे...मुझे वैसा ही कुछ फील आ रहा है"...बैकग्राउंड में बज रहे गानों की तर्ज पे वो बैठे बैठे ही झुमने लगी थी...."आओ न, लेट्स डांस टू दिस सॉंग"..उसने मुझे खींचते हुए कहा...

"पागल मत बनो.." मैंने उसे थोड़ा डांट सा दिया..

"ओफ्हो...तुम सच में बोरिंग हो....अच्छा बताओ तुम नाचने से घबराते क्यों हो...आज बारात में नाचने क्यों नहीं आये, पता है मैं कित्ता गुस्सा हुई थी...देखो तो मेरे हाथ अभी तक लाल हैं गुस्से से"  उसने अपना हाथ आगे बढ़ा कर मुझे दिखाया.

"अच्छा, हाथ लाल हो गए, मैंने तो सुना था की चेहरा लाल होता है गुस्से से"

"सुनो मिस्टर, बात को मोड़ो मत...चेहरा क्या, हाथ पैर सब लाल हो जाते हैं गुस्से से.....अच्छा जल्दी बताओ तुम आज नाचे क्यों नहीं बाराती मे"

"अरे, मुझे नाचना अच्छा नहीं लगता...अनकम्फर्टेबल महसूस करता हूँ..बस इसलिए".. मैंने सफाई देने की कोशिश की लेकिन मेरे इस सफाई पर वो हंसने लगी...कहने लगी "हाँ, तुम्हारे चेहरे से तो वो पता ही चल रहा था..कितने डरे हुए से लग रहे थे तुम...और तुम्हारे मामा भी...मेरा तो दिल किया तुम दोनों को जबरदस्ती पकड़ के नचा दूँ...लेकिन...."

लेकिन क्या...तुम आ जाती...और हमें भी नाचने के लिए जबरदस्ती खींच ही लेती जैसे तुमने मेरी मौसी को खींचा था...कम से कम इसी बहाने परिवार के बाकी लोगों को मुझे और मामा को नाचते हुए देखने का मौका तो मिलता...

"हाँ वो तो ठीक है लेकिन मेरी उस संस्कारी लड़की के टैग का क्या होता जो तुम्हारे परिवार वालों ने आज दिया है मुझे...सब को लगता की लड़की तो बिगड़ी हुई है केवल सबको नचाते रहती है....पता है कितना बेशकीमती होता है ये संस्कारी और सुशिल लड़की का टैग.... "

नहीं, कम से कम तुम्हारे बारे में तो ऐसा कोई भी नहीं सोचता...ये मैं जानता हूँ... "मैंने पुरे विश्वास के साथ कहा.

"अच्छा...लेकिन तुम ये कैसे जानते हो ?" उसने पूछा..

"बस ऐसे ही....कुछ है कारण, किसी और दिन बताऊंगा"  (मैंने बात को टालने के लिए ये कह दिया था..लेकिन कारण मैं जानता था..उसकी इतनी बातें मैंने अपनी दोनों भाभी, मामी और मौसी को बताई थी की मेरे आधे घरवाले उससे बहुत अच्छी तरह से वाकिफ हो गए थे. )

"अच्छा, ये शादी बहुत ख़ास है न तुम्हारे परिवार के लिए..देखो, तुम्हारे घर के सभी लोग नाच रहे थे...

"हाँ, पता है ये एक जेनरेसन की आखिरी शादी है...तो खास तो होनी ही है...

"ओह अच्छा...हाँ...फिर तो बहुत ही स्पेशल शादी है, और शादी को ख़ास बनाने की एक और वजह है देखो....मैं...मैं आई हूँ न इस शादी में... " अपनी तारीफ़ करने का वो एक मौका भी नहीं छोडती थी..और उसकी इस बेवकूफी भरी बातों पर मुझे हमेशा बहुत प्यार आता..

"पता है तुम्हारी फैमली मुझे बिलकुल उस फिल्म की फैमली की तरह लगती है, जो तुम्हे और तुम्हारी बहनों को सबसे ज्यादा पसंद है".

अच्छा, ऐसा तुम्हे क्यों लगा?

"देखे नहीं सब कैसे एक दुसरे को जबरदस्ती खींच ला रहे थे नाचने के लिए...ख़ुशी झलक रही थी सबके चेहरे से...और फिर कैसे गोलगप्पे के स्टाल पर सब एक दुसरे को जबरदस्ती एक के बाद एक गोलगप्पे खिला रहे थे...मेरे भी मुहं में आठ दस गोलगप्पे ठूंस दिए गए थे...पता नहीं किन किन लोगों ने खिलाया मुझे...याद भी नहीं.."  वो कुछ सोचने लगी, शायद ये याद करने की कोशिश कर रही हो की किस किस ने उसे गोलगप्पे खिलाये थे.

"हाँ, थोड़ी पागल सी फैमली है मेरी...लेकिन कुछ साल पहले अगर मेरे परिवार के किसी फक्सन में शामिल होती शायद तुम्हे कुछ और पागलपन देखने को मिलते...कुछ रिश्तेदार थोड़े अलग से रहने लगे हैं आजकल..." मैंने कहा.

"तुम्हे याद है, जब तुम हमारे घर आये थे विडियो कैसेट लेकर...तुम्हारे जाने के बाद दीदी ने ऐसा कुछ गेस किया था..वो कहती थी की तुम्हारे घर के पुरानी शादियों में जो ख़ुशी दिखती थी, वो तुम्हारे परिवार के इधर के शादियों में देखने को नहीं मिलती....दीदी कहतीं थी...." वो कहते कहते रुक सी गयी...अचानक अपनी दीदी का जो उसने जिक्र छेड़ दिया था, उसके लिए मैं भी बिलकुल तैयार नहीं था, और एकाएक हम दोनों के बीच एक सन्नाटा सा छा गया...

उसकी आँखें अचानक से नम हो गयीं थी... उसने अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया...कहने लगी " माफ़ कर देना तुम मुझे...कम से कम आज के दिन मुझे ऐसे उदास होकर रोना नहीं चाहिए...अच्छा शगुन नहीं होता"

उसकी ये बेवजह का गिल्ट और मुझसे ऐसे माफ़ी माँगना मुझे अच्छा नहीं लगा...और मैंने उसके आंसू पोछते हुए उसे थोड़ा डांटते हुए कहा "कैसी बातें करती हो तुम...आज के दिन तो हम दोनों को उन्हें याद करना चाहिए..उनके बिना तो आज के दिन का कोई महत्त्व ही नहीं है"

"हाँ जानती हूँ मैं...जब मैं सुबह आ रही थी न यहाँ, तो पुरे रास्ते मुझे दीदी की बहुत याद आई.." वो कुछ और कहना चाह रही थी लेकिन कहते कहते बीच में ही वो रुक गयी...कुछ देर तक हम दोनों चुप ही बैठे रहे...बिलकुल खामोश

हम दोनों के बीच पसरी उस ख़ामोशी को तोड़ने के लिए और बातों का रुख मोड़ने के लिए मैंने कहा उससे...."पता है तुम्हे, इस हरी साड़ी में तुम कितनी खूबसूरत लग रही हो आज...मोहल्ले के सभी लड़के आज सिर्फ तुम्हे ही देख रहे थे....." वो इस बात पर मुस्कुराने लगी...अपनी तारीफ़ सुनने के बाद तो वो वैसे भी मुस्कुराने ही लगती है...फिर अपने ट्रेडमार्क अंदाज़ में उसने कहा "तुम मुझे क्या कह रहे हो...देखो तो लेदर जैकेट,जींस और इस कूल से कैप में तुम कितने मस्त दिख रहे हो..और वो पीली साड़ी वाली गन्दी सी लड़की तुमपर बहुत लाईन मार रही थी...मैं शुरू से उसे नोटिस कर रही थी" उसके चेहरे पर उसकी ट्रेडमार्क हंसी और उसके जलन वाले एक्स्प्रेसन वापस लौट आये थे...जिससे मुझे बड़ी राहत सी मिली..

मैंने जानबूझकर उसे चिढ़ाने के लिए कहा "पीली साड़ी वाली?? अच्छा, मैंने तो उसपर ध्यान ही नहीं दिया...रुको जाकर बात करता हूँ..."

"हहं,...ध्यान नहीं दिया??????......अरे जनाब, लड़के लोग तो लड़कियों पर खूब ध्यान देते हैं....तुम कोई प्लूटो से थोड़े ही आये हो...जो अलग होगे...चुपचाप बैठे रहो..."

हम दोनों कुछ देर तक एक दुसरे को देखकर मुस्कुराते रहे और अजीब अजीब से शक्लों में एक दुसरे को चिढाते रहे...ये अजीब शक्लें बनाकर एक दुसरे से सवाल जवाब करने का और एक दुसरे को चिढ़ाने का खेल भी मुझे इसी लड़की ने सिखाया था....तब तक सुबह भी हो गयी थी और शादी की रस्में भी खत्म हो गयीं थी.मेरी बहनें भी तब तक हम दोनों के पास आकर बैठ गयीं थी और सुबह की पहली चाय भी हमारे टेबल पर आ गयी थी....बैकग्राउंड में एक गाना बज रहा था, मैंने इशारों में उसे वो गाना सुनने के लिए कहा...उसने सुन कर अपनी आँखों से जवाब दिया था...."हमेशा याद रखूंगी..."

ये लम्हे ये पल हम बरसो याद करेंगे...



continue reading मिस्टिरीअस अक्टूबर -२-

Saturday, October 6, 2012

मिस्टिरीअस अक्टूबर -१-

बस कुछ ही दिनों में त्योहारों का मौसम शुरू होने वाला है..आज की सुबह फिज़ा में बिलकुल वही ताजगी महसूस हुई जो अमूमन अक्टूबर के महीने में महसूस होनी चाहिए.अक्टूबर महिना आते ही मौसम अचानक करवट लेने लगता है..गर्मी और धुप की चुभन कम होने लगती है, रात में ठंडी हवा चलने लगती है और धुप की खुशबु में ये एहसास होता है की बस कुछ ही और दिनों में सर्दियाँ शुरू हो जायेंगी.

जिस तरह से दिसंबर उसके लिए एक खूबसूरत महिना था ठीक उसी तरह अक्टूबर उसके लिए एक महत्वपूर्ण महिना रहा है.जहाँ एक तरफ उसकी कई अच्छी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं इस महीने से, तो दूसरी तरफ उसके ज़िन्दगी के सबसे बुरे वक़्त की शुरुआत भी इसी महीने से हुई थी.महीनों से प्यार करने की और उनके नाम रखने की तो उसकी आदत पुरानी है, जिस तरह से उसने दिसंबर को "टेन्डर दिसम्बर" कहा था, ठीक उसी तरह वो अक्टूबर को कहती "मिस्टिरीअस अक्टूबर".वो कहती थी, की इस महीने में जो कुछ भी होता है वो या तो हद दर्जे का अच्छा होता है या फिर बुरा...बड़ा अजीब महिना है ये...समझ में ही नहीं आता की इसे किस कैटेगरी में रखूं, अच्छे वाले में या बुरे वाले में...इसलिए इसे मिस्टिरीअस अक्टूबर मैं कहूँगी...है भी वही, बिलकुल किसी मिस्ट्री जैसा.


वो भी अक्टूबर का ही एक दिन था..दुर्गा पूजा के आसपास का ही कोई वक़्त, जब मैं पहली बार उसके फ़्लैट पर गया था.वो मुझे अपना नया फिश-टैंक दिखाना चाहती थी.फिश-टैंक दिखाने का तो बस एक बहाना था.मुझे अपने फ़्लैट पर बुलाने का उसका मकसद कुछ दूसरा था.दरअसल एक दिन युहीं बातों बातों में पारिवार में हुई शादियों के तरफ बातों का रुख मुड़ गया.उस दिन से जाने अनजाने में अपने परिवार में हुई शादियों के इतने चर्चे मैंने उससे कर दिए थे, की वो बेचैन थी मेरे परिवार में किसी भी शख्स की शादी का कोई विडियो देखने के लिए.वो मुझसे घंटों बैठकर मेरे परिवार में हुए शादियों के किस्से सुना करती.मैं उससे कहता की हमारे घर में जब शादियाँ होती हैं तो उसके कुछ दिन पहले से ही रिश्तेदार आना शुरू कर देते हैं..और फिर पुरे घर में एक दो हफ्ते धमाचौकड़ी मची रहती है..हफ्ते भर के लिए पूरा घर रौशन हो जाता है.वो मेरी इन बातों को सुनकर अक्सर उदास हो जाया करती थी.वो कहती "मेरे घर में तो शादी किसी की भी हो, वो मुझे किसी बर्थडे पार्टी सा ही लगता है..शाम को सब एक जगह मिलते हैं, पार्टी होती है,डांस-म्यूजिक-डिनर...और फिर सुबह वापस अपने अपने घरों में लोग चले जाते हैं..हमारे घर के लोग सो-कॉलड मॉर्डन, व्यस्त और बोरिंग से हो गए हैं..अच्छा है, तुम्हारे घर में अभी तक सबके चेहरे पर हंसी,ख़ुशी बरक़रार है, और भगवन करे उनका ये सुख हमेशा बना रहे".

वो हर रोज़ मिन्नतें करती की मैं उसे सारे विडियो कैसेट लाकर दे दूँ, वो कुछ दिन कैसेट देखेगी और वापस कर देगी.एक दिन उसके जिद से परेसान होकर मैंने युहीं कह दिया की तुम अकेले विडियो देखोगी, उससे क्या फायदा?मेरे परिवार में किसी को तुम जानती नहीं..कैसे पहचानोगी किसी को?".वो ये बात समझ भी गयी, लेकिन दुसरे ही दिन से एक नयी जिद लेकर बैठ गयी..."तुम किसी दिन मेरे घर आओ, और मैं तुम्हारे साथ बैठकर विडियो देखूंगी..कैसेट के माध्यम से ही सही, तुम अपने परिवार वाले से परिचय करवा देना".

एक दिन वक़्त निकालकर मैंने उसके फ़्लैट जाने का कार्यक्रम बना ही लिया.कुछ रिश्तेदारों की शादियों के विडियो कैसेट भी बैग में रख लिए.उस दिन उसके परिवार में सभी लोग किसी काम से दुसरे शहर गए हुए थे.घर में सिर्फ वो और उसकी बड़ी दीदी थी.मैं जब उसके घर पहुंचा तो दोनों बहनों ने कुछ इस तरह मुस्कुराते हुए दरवाज़ा खोला की मुझे लगा जैसे वे दोनों मेरे ही आने का इंतजार कर रही थीं.दोनों मुझे ड्राविंग रूम में बिठा कर घर के अन्दर चली गयीं.मैं थोड़ा हैरान-परेसान-क्लूलेस सा हो गया.वे दोनों बिना एक भी शब्द कहे सिर्फ मुझे ड्राविंग रूम में बिठा के जाने कहाँ गुम हो गयीं.ड्राविंग रूम भी इस कदर सजा हुआ था की मुझे भ्रम हुआ कहीं आज कोई ख़ास दिन तो नहीं है.रंगीन मोमबत्तियां, रंग-बिरंगे झालर और हर तरह के सजावट के सामन चारों दीवारों पे टंगे हुए थे.कमरे की सज-सज्जा देखकर मैं ये सोच समझ ही रहा था की माजरा क्या हो सकता है, की तभी मेरी नज़र कमरे की सबसे विचित्र चीज़ पे गयी, जिसे देख सहसा मैं हंसने लगा.कमरे के एक कोने पे नए सोनी टी.वी के ठीक ऊपर रखा हुआ था बाबा आदम के ज़माने का वी.सी.आर, जिसके कई चर्चे मैं उसके मुहं से सुन चूका था.वो बड़े गर्व से बताती थी  "मेरे वी.सी.आर की खासियत है की वो सिर्फ मेरी बात मानता है इसलिए कोई दूसरा चलाये उसे तो नखरे दिखाता है, लेकिन मैं चलाऊं तो बटर सा स्मूथ चलता है".

करीब पंद्रह बीस मिनट के लम्बे इंतजार के बाद दोनों बहन ड्राविंग रूम में आयीं.उन्हें देख मैं थोड़ा और हैरान सा हो गया.दोनों बिलकुल सज-संवर के आयीं थी.बाकायदा साड़ी और गहने पहने हुए..उन्हें देख एक पल लगा की वो दोनों किसी शादी में जाने के लिए तैयार हुई हैं.दीदी के हाथ में एक डब्बा था, और उन्होंने उसे टेबल पर रखते हुए कहा "देखो, आज सारा दिन तुम हमलोगों के साथ रहोगे तो इसलिए चोकलेट का ये कोटा मैंने पहले से लेकर रखा था".मैं सोच ही रहा था की उनसे कुछ पूछूं, आज कोई ख़ास दिन है क्या, या कहीं आप लोग जा रही हैं? की वो खुद ही कहने लगीं : "हम दोनों को देख तुम समझ रहे होगे की आज कोई पार्टी या शादी या वैसा ही कोई फंक्सन है जहाँ हम जा रहे हैं...लेकिन घबराओ मत..ऐसा कुछ नहीं है, असल में हम दोनों शैतान बहनों की ये पागल्पंती है...हम जब अपने डेली-रूटीन से उब जाते हैं तो युहीं पुरे घर को अच्छे से डेकोरेट कर देते हैं और खुद भी खूब सज-संवर जाते हैं और पुरे दिन खूब अच्छी अच्छी फ़िल्में देखते हैं,अच्छी अच्छी बातें करते हैं..आज तुम आये हो तो पुरे दिन तुम्हारे परिवार की फ़िल्में देखेंगे हम".इतना कह कर वे दोनों कुछ अजीब तरह से हंसने लगीं..कोई और होता तो उन्हें पागल समझ लेता लेकिन दोनों की हंसी और दीदी के इस जवाब से मुझे ज्यादा ताज्जुब नहीं हुआ...मैं जानता था की दोनों बहनों का स्क्रू थोड़ा ढीला है.

छः घंटे में उन दोनों ने मेरे परिवार की चार शादियाँ देखी..दोनों बहनें शादी के विडियो में पूरी तरह खो गयीं थीं..वे ठहाके लगाकर हँस भी रही थीं और बिना मेरी परवाह किये रो भी रही थीं.दीदी ने अंत में कहा "तुम बहुत ज्यादा 'लकी' हो की तुम्हारे परिवार वाले इतने अच्छे हैं..अगर कभी मौका मिला तो मैं तुम्हारे परिवार को करीब से जानना चाहूंगी..अगली शादी तुम्हारे परिवार में किसी की भी हो, मुझे इन्वाइट करना भूल कर भी नहीं भूलना..मैं चाहती हूँ की ऐसे शादी वाले माहौल में कुछ दिन रहूँ..लोग कहते हैं की शादी में थकावट होती है..लेकिन मैं ऐसा नहीं मानती, शादी अगर ऐसे हो जैसे तुम्हारे परिवार में तो शारीरिक थकावट हो सकती है लेकिन मानसिक थकावट शायद नहीं...दिलो-दिमाग बिलकुल तरोताज़ा हो जाते होंगे...अगर तुम्हारे घरवालों को कोई आपत्ति न हो तो मुझे अपने परिवार की अगली शादी में इनवाईट जरुर करना".

मैंने भी उस दिन दीदी से वादा कर तो दिया था की "आपको अपने परिवार की अगली शादी में जरूर इनवाईट करूँगा, और पुरे शादी के दौरान आप हमारे साथ हमारे घर पे ही रहेंगी".लेकिन मुझे तब कहाँ पता था की दीदी से वो मेरी आखिरी मुलाकात होगी और ठीक बीस दिनों बाद वो हम सब को हमेशा के लिए छोड़कर कहीं दूर चली जायेंगी.


जारी..
continue reading मिस्टिरीअस अक्टूबर -१-

Sunday, September 23, 2012

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं


कहानी नहीं, बस कन्फ्यूज्ड हूँ, साथ बैठकर कुछ लोगों से बातें करने का मन है....थोड़ा मूड स्विंग का भी शिकार हूँ...तो ऐसे में कुछ रैंडम, बेतुकी और कन्फ्यूज्ड बातें जो शायद सिर्फ उन्ही लोगों को समझ में आये जिनके लिए लिखी गयी है....बाकियों को अगर ये बकवास लगे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा...मुझे खुद भी ये बातें बकवास ही लगती हैं, लेकिन दिल है की बिना इन बकवास बातों को शेयर किये मानता नहीं...



उन दोनों ने दुनिया घुमने की अपनी जो लिस्ट बनाई थी, उसमे सबसे ज्यादा देश यूरोप के थे.हमेशा से दोनों को यूरोप सबसे ज्यादा फैसीनेट करता था.चेकोस्लोवाकिया, स्विटज़र्लंड, इटली,स्पेन, फ्रांस, ब्रिटेन, पोलैंड इत्यादी जगह वे दोनों साथ घूमना चाहते थे.लड़के को कभी अपने देश से बाहर जाने का और वहां घुमने का अवसर नहीं मिल पाया लेकिन लड़की एक समय बाद वहीँ जाकर बस गयी.वो जब कभी यूरोप से वापस आती तो लड़के को वहां की सारी छोटी बड़ी बातें तफसील से बताती.लड़की की बातों को सुनते हुए लड़के को लगता की वो बैठे बैठे ही दुनिया घूम रहा है.लड़की जब भी वापस आती तो वो लड़के के लिए कई सारे तोहफे लाती थी, लेकिन उनमे से कुछ तोहफे वैसे रहते थे जो वो बस लड़के को दिखा कर, वापस अपने पास रख लेती थी.लड़की जब भी ऐसा करती, वो हमेशा एक ही डायलोग लड़के के सामने रिपीट करती "तुम रखो ये गिफ्ट या मैं, बात तो एक ही है न...और तुमसे ज्यादा ऑर्गनाइज़्ड मैं हूँ ये तुम भी मानते हो, तो गिफ्ट मेरे पास ही रहने दो..तुमने देख लिया न की तोहफा कैसा है, और हाथ में लेकर उसे महसूस भी कर लिया...इतना काफी है".

लड़के का एक बहुत ही अच्छा मित्र जो लड़का और लड़की दोनों का वाकिफ़ था और दोनों के लिए ख़ास था कुछ महीने पहले फ्रांस गया.लड़के को जब मालुम चला की उसका वो मित्र फ्रांस जा रहा है, तब उसने सोचा की कम से कम वो वहां से उस लड़की की कुछ वैसी खबर ला सकेगा जो उस तक नहीं पहुँचती है.लड़की ब्रिटेन में रहती थी, लेकिन उसके मित्र के फ्रांस पहुँचते ही वो लड़की वहां से दूर किसी दुसरे देश में रहने चली गयी.लड़के का दोस्त जब वापस अपने देश आया तो फ्रांस से लड़के के लिए कई सारे तोहफे लेते आया था, जो एक 'पिंक कलर' के लिफ़ाफ़े में थे.एक तो 'पिंक कलर' का लिफाफा वैसे ही कुछेक कारणों से लड़के के लिए ख़ास रहा है, दूसरा की गिफ्ट में एक चॉकलेट का पैकेट भी था.लड़के ने जब देखा की उसका मित्र उसके लिए चॉकलेट लाया है, उसे सहसा वे दिन याद हो आये जब लड़की यूरोप से आते वक़्त उसके लिए चॉकलेट्स लेते आया करती थी.लड़के को गिफ्ट्स देने के अपने यूनिक अंदाज़ में वो लड़की उसे सिर्फ चॉकलेट दिखा कर, सारे चॉकलेट खुद ही खा जाया करती थी...लड़के को मुस्किल से एक दो टुकड़े चॉकलेट के नसीब हो पाते थे.शायद इसलिए जब लड़के ने देखा की उसके मित्र ने तोहफे में उसे चॉकलेट दिया है तो उसे सबसे पहला ख्याल यही आया, की कहीं उसका ये मित्र भी उस लड़की की तरह ही ये चॉकलेट उससे छीन कर खुद ही न खा जाए.लेकिन ऐसा नहीं हुआ.उसके दोस्त ने नाही तो उससे चॉकलेट छीना और नाही कोई डायलोग मारा.लड़का अपने इस बेतुके ख्याल पर मुस्कुराने लगा.उसका वो मित्र अपनी जगह पर बैठे लड़के की मुस्कराहट को थोड़े अचरच से देख रहा था, और शायद ये अनुमान लगाने की कोशिश कर रहा होगा की लड़का यूँ एकाएक क्यों मुस्कुराने लगा है.

लड़के का जो ये दोस्त है, वो वैसे लोगों में से है जिसपर लड़का पूरी तरह विश्वास करता है.लड़के का ये दोस्त उसकी ज़िन्दगी में ठीक उस वक़्त आया जब लड़का अपने जीवन से थोड़ा निराश और हताश था.लड़के की ज़िन्दगी का ये एक खूबसूरत संयोग है की उसके ज़िन्दगी में कुछ अच्छे लोग ठीक उस वक़्त पर आ धमकते हैं  जब वो अपने सबसे बुरे फेज से गुज़र रहा होता है..लड़के के इस दोस्त के तरह ही एक और शख्स लड़के की ज़िन्दगी में ठीक उसी वक़्त पर आ गए जब लड़का अपनी ज़िन्दगी से थोड़ा परेसान था, और कुछ रिश्तों के टूटने का दर्द सह रहा था.पता नहीं क्यों और कैसे लड़के ने इस शख्स को रिश्ते में बाँध लिया, उन्हें अपना बुजुर्ग मान लिया..आज लड़का जब भी तन्हाई में होता है तो ये जरूर सोचता है की अगर उस शख्स से उसकी मुलाकात नहीं होती तो शायद उसकी ज़िन्दगी सही मायने में पूरी भी नहीं होती...शायद कभी उसे कोई ऐसा नहीं मिलता जो उसे टोक कर उसकी गलतियों पर गौर करने को कहे, शायद उसकी कुछ बुरी कवितायेँ कभी अच्छी नहीं बन पाती.

--- 

एक ताज़ा हवा के झोंके की तरह दोनों ही उसकी ज़िन्दगी में अचानक चली आई थी.दोनों ही पागल, नटखट, मासूम, बेहद खूबसूरत और हद से ज्यादा बोलने और हंसने वाली...दोनों की आदतें भी लगभग एक सी ही थी..और दोनों के नाम भी एक ही थे.दोनों लड़के की ज़िन्दगी में तब आयीं थी जब लड़का अपने बुरे दिनों में था.पहली लड़की जिसकी वजह से लड़के ने ये जाना की प्यार किसे कहते हैं, उसकी ज़िन्दगी में तब आई थी जब लड़के को पहली बार बुरे वक़्त का अनुभव हुआ था और उसने पहली बार असफलता का स्वाद चखा था.दूसरी लड़की लड़के की ज़िन्दगी में उसकी बड़ी बहन बन कर आई थी, बिलकुल उस वक़्त जब लड़का अपने जिंदगी के सबसे बड़े दोराहे पर खड़ा था और अपने दोस्तों के रूखेपन से बुरी तरह परेसान था.

लड़के के ज़िन्दगी में दोनों लड़कियों का आना एक ऐसा संयोग है जिसे लड़का कभी भूल नहीं सकता..पहली लड़की जो लड़के की सबसे अच्छी दोस्त थी और जिससे लड़का प्रेम करता था, उसकी ज़िन्दगी में आने के कई साल बाद दूसरी लड़की उसकी ज़िन्दगी में आई(जिसे लड़के ने पहली ही मुलाकात में अपनी बड़ी बहन बना लिया था).वे बारिशों के दिन थे जब दोनों लड़कियों से पहली बार लड़के की मुलाकात हुई थी(अलग अलग शहरों में, अलग अलग सालों में).दोनों लड़कियों ने पहली ही मुलाकात में लड़के को तोहफे में चॉकलेट और सिल्वर कलर के पेन दिए थे..और दोनों ही लड़कियों ने गिफ्ट्स देते वक़्त अपने हाथों से लिखकर लड़के को कुछ दिया था..एक ने लड़के की हथेली पर अपने दस्तखत किये थे तो दूसरी ने एक किताब के पहले पन्ने पर..

दोनों लड़कियां लड़के का खूब ख्याल रखती.दोनों खुद ही बेहद इमोशनल हैं लेकिन मौके बेमौके दोनों लड़के पर एक सा ही कमेन्ट करतीं "हे भगवान, क्या होगा तुम जैसे इमोशनल लड़के का".लड़का जब भी दोनों में से किसी के मुहं से ये सुनता तो वो अन्दर ही अन्दर हंसने लगता..वो सोचता की ये दोनों तो वैसे ही दुनिया के सबसे इमोशनल लोगों में से हैं और ये मुझे ऐसा कह रही हैं..लड़का मन ही मन दुआ करता की इन दोनों पागल लड़कियों में इनका बचपना हमेशा कायम रहे और ये दोनों युहीं सदा मुस्कुराते रहें.

लड़का दोनों को अपना 'लकी चार्म' मानता है, एक सपोर्ट सिस्टम की जिसकी वजह से कुछ भी ठीक हो सकता है..जिनकी एक मुस्कान से लड़का कितने भी गहरे उदासी के कुँए से बाहर आ सकता है.कुछ समय पहले तक लड़का इस बात से बेहद परेसान सा था, की वो पागल लड़की जिसकी एक हंसी और इल्लौजिकल बातें उसे कितने भी गहरे उदासी से खींच बाहर ला सकती थी, वो उसके ज़िन्दगी से हमेशा के लिए चली जायेगी और उसकी जगह शायद फिर कभी कोई नहीं ले सकेगा..लड़का कभी कभी इस सोच से घबरा सा जाता था की उस लड़की का वो रिक्त स्थान वैसे ही खाली रह जाएगा..लेकिन शायद लड़के की रूठी हुई हाथों की लकीरों में कुछ ऐसी भी लकीरें थीं जिनके वजह से लड़के की मुलाकात दूसरी लड़की से हुई, जो उसकी ज़िन्दगी में उसकी बड़ी बहन बन कर आई..कम से कम लड़के को अब इस बात का संतोष है की उसके जैसी, बिलकुल उसकी ज़िराक्स कॉपी वाली लड़की उसकी ज़िन्दगी में उसकी बड़ी बहन बन कर हमेशा रहेगी..
continue reading रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

Tuesday, September 18, 2012

तुम बिन -२-



उसके पास दुनिया के कई खूबसूरत शहरों के बारे में कई ऐसी ऐसी जानकारियां थी की लड़का हमेशा उसके इस ज्ञान से आश्चर्यचकित हो जाता था.जितने शहरों के बारे में वो लड़के को बताती, उनमे से किसी भी शहर के बारे में लड़के के पास कोई जानकारी नहीं होती थी.उसने एक शाम लड़के को एक लिस्ट दिखाई थी जिसमे उन शहरों के नाम थे जहाँ वो जाना चाहती थी.उसने जब लड़के से पूछा की उस लिस्ट में उसका सबसे फेवरिट शहर कौन सा है, तो लड़का थोडा चौंक सा गया...उसे समझ में नहीं आया कि वो क्या जवाब दे...बहुत गहराई से सोचने के बाद लड़के ने "ज़ुरिक" कहा(वो भी सिर्फ इसलिए की यश चोपरा की फ़िल्में अधिकतर "स्विटज़र्लंड" में ही शूट होती थीं).लड़के के इस जवाब से लड़की बहुत खुश हो गयी.ज़ुरिक जाने की ईच्छा लड़की को भी बहुत थी.दोनों ने उस शाम एक पैक्ट बनाया की उस लिस्ट को वो दोनों हमेशा अपडेट करते रहेंगे और जितने भी शहरों के नाम उस लिस्ट में हैं, वहां वे दोनों जायेंगे.दोनों नादान और नासमझ थे.दोनों को ये यकीन था की ऐसा जरूर होगा और दोनों लिस्ट में शामिल हर शहर एकसाथ घूमेंगे.

उन्ही दिनों इन्टरनेट शहर में नया नया आया था और जगह जगह नए साइबर कैफे खुल गए थे.लड़के ने एक साइबर कैफे में जाकर इन्टरनेट इस्तेमाल करना सीखा था.वो हर शाम लड़की के साथ अपने मोहल्ले के एक साइबर कैफे में जाता.वहां दोनों बैठकर लड़की के लिस्ट में जितने शहर थे, उनके बारे में जानकारी इकठ्ठा करते.टुरिज़म वेबसाईट पर लड़की को किसी शहर की कोई तस्वीर अगर अच्छी लग जाती तो वो उस तस्वीर का प्रिंट निकलवा लेती थी.लड़की जब भी किसी तस्वीर का प्रिंट निकलवाती तो उस तस्वीर पर लड़के से दस्तखत ले लेती और खुद भी छोटा सा कोई 'कोट' लिखकर वहां दस्तखत कर देती थी.वो इन तस्वीरों को अपने डायरीनुमा एक फोल्डर में रख लेती थी.उन दोनों ने एक शाम एक दुसरे से प्रोमिस किया था की जितने जगहों की तस्वीरें उनके पास हैं, वहां वे दोनों साथ जायेंगे और उन जगहों पर जाकर दोनों वहां की तस्वीरों पर फिर से दस्तखत करेंगे.

उन दिनों एक बहुत ही प्यारी फिल्म आई थी -तुम बिन.दोनों ने ये फिल्म एक साथ देखि थी.उस फिल्म में कैनेडा का एक शहर कैलगरी की सुन्दरता देख दोनों मंत्रमुग्ध थे.दो घंटे की फिल्म के दौरान दोनों के ज़ेहन में  फिल्म की कहानी, किरदार, गाने और कैलगरी इस कदर बस गया था की दोनों हर शाम प्लानिंग करते की वे वहां जायेंगे और उन्ही सब जगहों पे घूमेंगे जहाँ शेखर और पिया घूमते थे.'बार्ले मिल' में जाकर कॉफ़ी पियेंगे और "डॉगीवुड" गिफ्ट स्टोर में जाकर दोनों एक दुसरे के लिए तोहफे खरीदेंगे.क्रिसलर के उसी कन्वर्टबल गाड़ी('98 Sebring) में बैठकर उस 'लेक' के किनारे जायेंगे, जहाँ पर फिल्म का एक बेहद खूबसूरत गाना फिल्माया गया था.उस लेक के किनारे बैठकर लेक की उस पर तस्वीर पर अपने दस्तखत करेंगे जिसका प्रिंटआउट लड़की ने इन्टरनेट से निकलवाया था.



बहुत सालों बाद जब लड़की अपना वादा तोड़ते हुए कैलगरी चली गयी, तो उसने वहां से लड़के को फोन किया.फोन करने का मकसद को लड़के को जलना था, लेकिन फोन पर बात करते करते वो खुद ही बेहद भावुक हो गयी, कहने लगी की वहां दोनों ने साथ जाने का सपना देखा था जो शायद अब कभी पूरा नहीं होगा..उसने लड़के से ये भी कहा की वो अपने साथ वो तस्वीर भी लेती आई थी जिसे वर्षों पहले उन दोनों ने अपने शहर के किसी साइबर कैफे से निकलवाया था.लड़की ने लड़के से कहा "इत्तेफाक तो देखो ज़रा, हम दोनों ने जिस दिन तस्वीर पर दस्तखत किये थे, ठीक उसके दस साल दस दिन बाद मैं यहाँ पर आई हूँ, लेकिन अकेले.लेक के किनारे बैठकर बहुत देर तक बहुत कुछ सोचती रही और उस तस्वीर को देखती रही, ये लेक ठीक वैसा ही दीखता है जैसा हमने दस साल पहले तस्वीरों में देखा था.मैंने अपने बैग से वो तस्वीर तो दस्तखत करने के लिए ही निकाले थे लेकिन पता नहीं दिल में क्या ख्याल आया की मैंने उस तस्वीर के टुकड़े टुकड़े कर उसे फाड़ कर वहीँ फेंक दिया..लड़की की आवाज़ में एक भींगा सा कम्पन आने लगा था...वो खामोश हो गयीं थी...फोन की दूसरी तरफ लड़का स्तब्ध सा उसकी ख़ामोशी और उसके आंसुओं को सुन रहा था.उस रात और उसके बाद कई रातें लगातार लड़का सो नहीं सका...

आज भी रातों को लड़के की नींद अचानक से टूट जाती है और उसके कानों में लड़की के वे शब्द गूंजते रहते हैं - "उस तस्वीर के टुकड़े टुकड़े कर उसे फाड़ कर वहीँ फेंक दिया"



तुम बिन 
continue reading तुम बिन -२-

Thursday, August 30, 2012

मुझे अपने कॉलर से झटक कर गिरा मत देना


एक बेहद सर्द रात में लिखी कुछ बकवास बातें..


तुम्हे इजाजत पसंद है न? याद है तुम्हे जब हम एक इम्तिहान देकर कलकत्ते से वापस आ रहे थे, तब मैंने पहली बार तुम्हे इस फिल्म के बारे में बताया था.हमारी ट्रेन किसी अनजान प्लेटफोर्म पर आकर रुक गयी थी और लगातार ये अनाउन्स्मन्ट की जा रही थी की आगे ट्रैक में खराबी आ जाने की वजह से ट्रेन यहाँ दो-तीन घंटे रुकेगी.बाहर बारिश हो रही थी, लेकिन तुम आदत से मजबूर, ट्रेन से उतर गयी और प्लेटफोर्म पर टहलने लगी..मैंने तुम्हे डांटा, लेकिन मेरी डांट का तुमपर कोई असर नहीं हुआ और उल्टा तुमने मुझे प्लेटफोर्म पर खींच लिया था.हम बहुत देर प्लेटफोर्म पर लगी एक बेंच पर बैठे रहे..शायद रात के नौ-दस बज रहे होंगे.

उस वक़्त वहां बैठे बैठे मुझे एकाएक इजाज़त फिल्म की याद आ गयी थी, जो मैंने कुछ दिन पहले ही देखी थी.प्लेटफोर्म के उस बेंच पर बैठे मैं ये सोच ही रहा था की वो ऐसी ही कोई बारिशों वाली रात रही होगी जब महिंदर सुधा से पांच साल बाद मिला होगा, किसी अनजान से प्लेटफोर्म पर....की तभी तुमने जोर से एक हाथ मेरे पीठ पर दे मारा था - "ऐसे क्या बैठे हो..देखो तो ये रेलवे का अनाउन्स्मन्ट कितना बोर कर रहा है... जाकर बंद कराओ इसे".
मुझे हँसी आ गयी थी तुम्हारी इस बात पर.मैंने तुमसे कहा.."अच्छा तो ये होगा की तुम रेलव अनाउन्स्मन्ट करना शुरू कर दो, और उस अनाउन्स्मन्ट में अपनी क्रीऐटिवटी और इमोशन डाल कर उसे थोड़ा इक्साइटिंग बना दो, जैसे एक बार  महिन्द्र ने न्यूज़ रीडिंग में अपने ईमोसन डाल कर उसे इक्साइटिंग बनाया था".
तुम मुझे एकटक से ऐसे देखने लगी थी की जैसे मैंने फ़ारसी में कुछ कह दिया हो..कुछ देर कुछ सोचने के बाद तुमने पूछा था मुझसे "ये  महिन्द्र कौन है?"

बिना बताये चले जाते हो!
जा के बताऊं कैसा लगता है?
जब तुम्हे पता चला की महिन्द्र कौन है तब तुमसे रहा नहीं गया और वहीँ प्लेटफोर्म के बेंच पर बैठे बैठे तुमने मुझसे फिल्म की पूरी कहानी सुन ली.वापस जब हम अपने शहर पहुंचे तो तुमने जो सबसे पहला काम किया था वो था इजाज़त फिल्म का विडियो कैसेट लाकर उसे देखना.

फिल्म देखने के बाद तो कई हफ़्तों तक तुमपर माया का किरदार इस कदर हावी रहा की तुम हर बात पर कहती थी...देखो तो ऐसे माया करती थी, ऐसे मैं भी करती हूँ...माया को बारिश अच्छी लगती थी, मुझे भी..". एक शाम जब हम दोनों बैठे थे किसी पार्क के बेंच पर तब तुमने कहा था मुझसे -
"जानते हो, मैं माया की तरह ही इम्पल्सिव हूँ और तुम महिन्द्र की तरह ही समझदार और डांटने वाले, लेकिन सुधा..सुधा कौन होगी??हो सकता है आगे जाकर पता चले की सुधा कौन होगी...वैसे...नहीं ही हो तो अच्छा है..देखे थे न जब महिन्द्र की जिंदगी में सुधा आई थी तो बेचारी माया कितनी अकेली हो गयी थी,इसमें सुधा की कोई गलती नहीं थी...वो तो बेचारी बहुत ही सीधी सी लड़की थी...लेकिन मैं माया के जैसे अकेली रहना नहीं चाहती.जानते हो तुम...माया की तरह ही मैं भी एक सूखे पत्ते की तरह उड़ के तुम्हारे कॉलर पर आकर अटक गईं हूँ...मुझे अपने कॉलर से झटक कर कभी गिरा मत देना..बहुत दर्द होता होगा न ऐसे गिरने में?"
मैं चाह रहा था की उस वक़्त तुमसे कहूँ की तुम्हे हमेशा संभाल कर अपने पास रखूँगा लेकिन मैं चुप रहा.अब सोचता हूँ की अच्छा ही था की मैंने उस वक़्त तुमसे ऐसा कोइ वादा नहीं किया था..

तुमने उस शाम मुझसे कहा था की मैं तुम्हे इस फिल्म के सारे गाने एक कागज़ पर लिख कर दूँ, तुम्हे गानों में कई शब्द समझ में नहीं आ रहे थे.मैंने तुम्हे गाने तो लिख कर दिए ही थे और साथ ही इस फिल्म का कैसेट भी तुम्हे खरीद कर दे दिया था.

अगले दिन जब तुम मिलने आई थी तब तुम्हारा मुझसे सबसे पहला सवाल यही था "ये बड़ा कन्फयूजिंग सा गाना है..इसका क्या मतलब हुआ -एक इजाज़त दे दो बस, जब इसको दफ़नाऊँगी..मैं भी वहीं सो जाऊंगी??माया ये लाईन कहते वक़्त कितनी दुखी हो गयी थी...मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा..तुम मुझे पूरा गाना समझाओ"  . 

मेरे जैसे कम बोलने वाले इंसान के सामने तुमने ऐसा ट्रिकी सवाल कर दिया था की मैं सोच में पड़ गया..तुम्हे ये गाना समझाऊं तो कैसे?इस तरह के गानों को समझा ही नहीं सकता कोई...बस महसूस कर सकता है और गाना सुनते वक़्त रो सकता है.

फिर भी मैंने कोशिश की और तुम्हे गाना समझाया.तुम बिलकुल उदास सी हो गयी थी..कहने लगी "बेचारी माया..कितनी अकेली हो गयी थी...पता है दो दिनों तक मैंने इस फिल्म का विडियो कैसेट अपने पास रखा था और लगातार दो दिन तक देखते रही ये फिल्म...दो दिन मैं कितना रोई हूँ ये फिल्म देख कर तुमको क्या मालुम..और वो हॉस्पिटल वाला सीन याद है तुम्हे जब माया कहती है 'गाल पे मत मारना...बहुत जोर से लगता है'...और तब महिन्द्र उसके गालों को चूम लेता है...मेरी तो जान ही निकाल दी थी उस सीन ने.

...और जब माया जा रही होती है सुधा के पास और रास्ते में उसके गले का स्कार्फ टायर में अटक जाता है तब मुझे ऐसा लगा था की जैसे माया नहीं मैं हूँ वहां पर..और मैं वो सीन देखते समय ऐक्चूअली उसे महसूस कर सकती थी...महिन्द्र को उस वक़्त वैसे रोते हुए देख लगा की कहीं से भी कोई चमत्कार हो जाए और माया फिर से जिन्दा हो जाए...पता है मैं रात भर सोचते रह गयी...इस तरह की फुल ऑफ़ लाईफ, बिंदास और खूबसूरत लड़की की ऐसी मौत..मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए थे.यु नो शायद ऐसा ही होता भी है....लड़की जब इस तरह की बेफिक्री से जिंदगी जिए तो उसका अंत शायद ऐसा ही होता होगा, मौत का भी कहाँ डर था उसे...याद है तुम्हे वो सीन जब माया महेंद्र के पास बाईक चलाते हुए आती है और कहती है महेंद्र से "तुम्हे तो बस मौत से डर लगता है"..वो जिस तरह से ये कहती है मुझे तो लगता था की मौत उसकी बेस्ट फ्रेंड है...इसलिए तो जब देखा की वो इतनी तन्हा हो गयी तो उसे अपने साथ लेते चली गयी.."

तुम मेरे तरफ देख कर मुस्कुराने लगी थी, लेकिन मैं तुम्हारे चेहरे पर एक दूसरा ही भाव देख रहा था, जिसमे माया का दर्द, उसके प्रति तुम्हारा लगाव मुझे साफ़ दिखाई दे रहा था...जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा या महसूस किया था..मन में सोचते रह गया की क्या कोई भी फिल्म किसी पर इस तरह का प्रभाव डाल सकती है?जिस लड़की को सारी दुनिया, घरवाले और उसके दोस्त पागल और बेवकूफ समझते हैं वो एक फिल्म को देखकर ऐसी बातें कर सकती है?
और तब मुझे शक भी हुआ था की तुम उस गाने को अच्छी तरह समझ भी गयी थी, मुझसे युहीं पूछने चली आई थी.तुम्हारे दिलो-दिमाग में माया इस कदर बस गयी थी की एक दिन जब तुमने मेरे नोटबुक के आखिरी पन्ने पर एक नज़्म देखी तो कहने लगी "ये कविता तो माया ने लिखी थी.."
मैंने तुम्हे डांटकर कहा "बुद्धू, ये कविता माया ने नहीं, बल्कि जिस फिल्म में माया थी उसके डायरेक्टर ने लिखी है"..
तुम मुझसे लड़ पड़ी थी इस बात पर..और कहने लगी..फिल्म के डायरेक्टर की नहीं ये माया की ही कविता है.मैंने तुमसे पूछा था "ये बताओ की माया तो फिल्म का एक किरदार है, वो असली तो है नहीं की कवितायेँ और शायरी करेगी".. तुम कहने लगी "  क्या पता हो भी कहीं ऐसी कोई लड़की जिसकी कहानी तुम्हारे इस डाईरेक्टर ने अपनी फिल्म में दिखाई है और जिसकी नज्मों और कविताओं को चुरा कर उन्होंने फिल्म में डाल दी हो..तुम्हे कुछ नहीं पता...ऐसी लड़कियां होती हैं, मुझे ही देख लो...मैं भी तो माया की तरह हूँ...बस कवितायेँ नहीं करती, हूँ तो कुछ कुछ उसकी तरह ही...यु डोंट नो एनिथिंग...दुनिया में माया जैसी लड़कियां कहीं भी मिल जायेंगी तुम्हे...

उस दिन के बाद मैंने कभी तुमसे इस टॉपिक पर बहस नहीं की,बहस का कोई फायदा भी नहीं था...तुम तो मानने लगी थी की माया सच में कोई लड़की थी और महेंद्र और सुधा आज भी कहीं दुनिया के किसी कोने में होंगे..शायद कभी कभी किस्मत से किसी रेलवे प्लेटफोर्म पर मिल भी जाते होंगे.

एक बार युहीं जब शाम में मैं उस कॉम्प्लेक्स की सीढ़ियों पर बैठा हुआ था जहाँ हम मिलते थे..मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था.तुमने आते ही कहा मुझसे "अपना पर्स दिखाओ तो मुझे".मैंने भी बिना कुछ सोचे तुम्हे पर्स थमा दिया.पर्स के उस जगह जहाँ तस्वीरें लगायी जाती हैं और जो वो जगह खाली था, वहां पर तुमने पेन से लिख दिया था "Dont Waste Money".पहले तो मुझे कुछ समझ में नहीं आया की तुमने ये क्या लिखा है, क्यूँ लिखा है..फिर जब तुमने मुझे याद दिलाया की महिन्द्र के पर्स में जहाँ माया की तस्वीर लगी हुई थी उसके ठीक ऊपर भी यही लिखा हुआ था.मैं तुम्हारे इस जवाब से अवाक् रह गया था.मेरे लिए ये विश्वास करना मुस्किल था की फिल्म की इतनी छोटी से छोटी बात भी तुम्हारे अन्दर घर कर गयी है.

न जाने कितनी ही ऐसी शामें थी जब तुम मुझसे माया के बारे में बातें करती...तुमने मुझसे युहीं एक दिन बातों बातों में कहा  "यु नो वाट?? अगर कभी मैं जाऊं कहीं..वैसे तो यहीं रहूंगी...कहीं नहीं जाउंगी...लेकिन सपोज अगर कभी जाना पड़ा मुझे, हमेशा के लिए तो मैं भी तुमसे इजाज़त लेकर जाउंगी..ऐसे नहीं चली जाउंगी..बट देन डोंट एक्स्पेक्ट ऑल दैट ट्रेडिशनल थिंग्स एंड मैनर्ज़ जो सुधा ने अंतिम बार जाते वक़्त किया था, मैं झुक कर तुम्हारे पैर नहीं छूने वाली...मैं बस हाथ मिला कर चली जाउंगी...यु नो...ऐक्चवली फाईनल गुडबाय इग्ज़िस्ट ही नहीं करता...वो तो फिल्म में दिखा देते होंगे...लेकिन इन रिअल लाईफ, ऐसा होता नहीं...इतनी बड़ी तो जिंदगी है और लोग कहीं न कहीं तो मिल ही जाते हैं, कितने भी फाईनल गुडबाय कह लो...हाँ बस अगर इस दुनिया से ही चले जाओ तो होगा वो फाईनल गुडबाय...है न?" तुम्हारी इस बात से मेरे चेहरे का रंग बिलकुल सफ़ेद हो गया था, कहीं अन्दर कुछ होने सा लगा था मुझे, मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया था, उस वक़्त तुम्हारी आँखों में देख पाने का मैं सहस नहीं जुटा पाया था.

जानती हो, जिस शाम तुमने मुझसे वो बातें कहीं थी, उसे बीते बहुत से साल गुज़र गए, लेकिन मैं उस बात को भूल नहीं पाया...भूलता भी कैसे...बातों को डायरी में कैद कर लेने की ख़राब बीमारी जो है मुझे...मुझे हमेशा लगता था की तुम उस बात को भूल चुकी हो, लेकिन जब तुम आखिरी बार मिली थी मुझे, एक अंडरग्राऊंड स्टेशन में, तब तुमने जाते वक़्त मुझसे हाथ मिलाया था और मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा था "चलती हूँ मैं अब, टेक केअर ऑफ़ यॉर्सेल्फ..तब मुझे लगा की शायद तुम्हे भी उस शाम की बातें याद हैं और तुम सच में मुझसे इजाज़त लेकर जा रही हो...एक पागलपन सा ख्याल ये भी आया मन में की शायद उस वक़्त तुमने नीचे झुकने की कोशिश की थी...सोचता हूँ की ये मेरा भ्रम ही हो तो अच्छा है, अगर तुम उस दिन सच में नीचे झुकती, तो मुझे पता नहीं उस वक्त मैं खुद को और तुम्हे कैसे संभाल पाता...लेकिन तुम सिर्फ हाथ मिलकर चली गयी थी....दिल में मेरे बस इस बात का अफ़सोस रहा की उस वक़्त तुम्हारे गालों को छु कर मैं इतना भी नहीं कह सका की खुश रहो!



29 Feb 2012
continue reading मुझे अपने कॉलर से झटक कर गिरा मत देना

Friday, August 10, 2012

तुम्हारे नाम लिखी आठवीं चिट्ठी


वो एक उदास और तन्हा शाम थी.सुबह एक बुरी खबर मिली थी और पूरा दिन मैं काफी बेचैन सा रहा.शाम तक मेरा मन काफी भारी सा हो गया और मैं अपना मूड अच्छा करने बाहर घुमने निकल गया.पास में ही एक खूबसूरत कॉफ़ी शॉप था, मैं वहां जाकर बैठ गया.जब भी मैं उदास होता था, तब मैं उस सुन्दर से कॉफ़ी शॉप में चला जाता था.वहां शाम में अक्सर कॉलेज के लड़के-लड़कियां आया करते थे...उनके चेहरे काफी खिले खिले से रहते थे, और सब काफी खुश दीखते थे.मुझे उन स्टुडेंट्स को देख कर अच्छा लगता था, अपने पुराने दोस्तों की, और उनके साथ बिताये पल याद आते थे.उस कॉफ़ी शॉप में एक तरफ शेल्फ पर कुछ मैगजीन और अख़बार रखे होते थे.मुझे उस शाम वापस घर लौटने की कोई जल्दी नहीं थी, इसलिए मैंने उस शेल्फ से कुछ मैगजीन पढने के लिए उठा लिए.मैं जैसे ही वापस अपने टेबल पर आया, देखा की सामने वाली टेबल पर एक बहुत ही खूबसूरत सी लड़की बैठी हुई है.वो शायद किसी का इंतजार कर रही थी.उसने हलके आसमानी रंग की साडी पहनी हुई थी, कानों में उसके बड़े से झुमके थे और हाथों में उसने ब्रेसलेट पहने हुए थे.उन बड़े से झुमकों को देख कर मुझे बहुत साल पहले की गर्मियों की एक शाम याद आ गयी.उस दिन मैं दिल्ली से वापस आया था, लेकिन मेरे वापस आने से पहले ही मेरी असफलता की खबर लोगों तक पहुँच चुकी थी.तुमने मुझे उस दिन सुबह ही फोन किया था, लेकिन तुमने इस बारे में मुझे कुछ भी नहीं बताया था, शायद तुम वो बुरी खबर मुझे देना नहीं चाहती थी.तुमने मुझे शाम में मिलने के लिए बुलाया था.तुमसे फोन पर बात करने के ठीक बाद ही मुझे वो खबर एक दोस्त के द्वारा मिली.मैंने उस वक़्त सोचा की तुमसे मिलने मैं नहीं जाऊं, कोई बहाना बना लूँ..लेकिन तुमसे मैं कोई बहाना कैसे कर सकता था, तुम मेरे हर झूठ को पहचान लेती थी.

मैं उस रेस्टुरेंट में वक़्त से पहले ही पहुँच गया था, लेकिन बाहर ही खड़ा रहा.मुझे लगा की तुम वक़्त से कैसे आ सकती हो..अपनी आदत से मजबूर देर से ही पहुँचोगी...लेकिन मैं इस बात से अनजान था की तुम वक़्त से पहले ही पहुँच चुकी हो.अगर मैं रेस्टुरेंट का चक्कर लगाने अन्दर नहीं गया होता तो मुझे मालुम भी नहीं चलता की तुम पहले से वहां बैठी हुई हो.तुम आसमानी रंग की साड़ी पहने हुई थी, हाथों में नए ब्रेसलेट थे जो तुमने मेरे साथ बाज़ार से खरीदा था और कानों में तुम्हारे दो बड़े बड़े चांदी के झुमके थे, जिसे तुम्हारी दीदी ने तुम्हे तोहफे में दिया था. उदास और वीरान सा दिखने वाला वो रेस्टुरेंट अचानक फुल ऑफ़ लाईफ सा दिखने लगा था.शायद ये तुम्हारे झुमके, नीले ब्रेसलेट, आसमानी साड़ी और तुम्हारा कंबाइंड इफेक्ट था.मुझे देखते ही तुम्हारा चेहरा खिल गया था, और जैसे ही मैं तुम्हारे पास आया तुमने मुझसे कहा "रिजल्ट से सम्बंधित या कोई और डीप्रेसिंग बात आज किये अगर तो इसी चाक़ू से तुम्हारा कतल कर दूंगी".तुमने टेबल पर रखे चाक़ू को एक बार फिर गौर से देखा और कहा मुझसे "देख रहे हो न कितना बड़ा सा चाक़ू है".मैं तुम्हारी उस मासूम सी धमकी से डरने की बजाये उसपर हंसने लगा.

मैं अपनी ब्लू वाली मेरी फेवरिट शर्ट और नीली जींस में था.स्टाईल मारने के लिए मैंने मोहब्बतें स्टाईल वाले सादे ग्लासेज पहन रखे थे, जो तुमने मुझे गिफ्ट में दिया था.तुमने बड़े गौर से मुझे देखा था और मुझे देखते ही तुमने कहा था "क्या लग रहे हो यार तुम, किसी भी लड़की को जाकर आज प्रपोज कर दो..वो मना कर ही नहीं पाएगी.."मैं बस तुम्हे देखते रह गया.तुमने कितनी आसानी से ये बात कह दी थी.मैंने सोचा एक पल की तुम्हारा ये आईडिया तुमपर ही आजमा लूँ, लेकिन हमेशा की तरह, मैं चुप रहा.


हमने उस शाम बहुत सी बातें की थी.तुमने मुझे अपने उस तोते के बारे में बताया था, जिसने तुम्हारा नाम कहना सीख लिया था, और हर सुबह जब भी वो तुम्हे देखता था, तो बड़े प्यार से तुम्हे पुकारता था.तुमने कहा था मुझसे की बाहर जाने के बाद तुम्हे अपने तोते की बहुत याद आएगी..बातों बातों में तुमने ये भी कहा था की इस ख्याल से तुम्हे डर लगता है की मैं वहां तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा, तुम अकेले रहोगी...अकेले ही तुम्हे सारे छोटे मोटे फैसले लेने होंगे.मैं उस दिन कहना चाह रहा था तुमसे की अगर तुम्हे मेरी इतनी याद आएगी, तो क्यों जा रही हो, मत जाओ..यहाँ लोगों का और उनकी बकवास का हम दोनों मिलकर सामना करेंगे.ऐसे ज़माने से भाग कर कहीं दूर चले जाना अच्छा नहीं.लेकिन तुमने जाने का फैसला कर लिया था, और उस फैसले पर कुछ महीने पहले मैंने मुहर लगा दी थी. 


मैं चाह रहा था उस दिन तुम्हे ये कहूँ की उतनी दूर जाने से अच्छा है तुम वापस अपने उस शहर चले जाओ..जहाँ से तुम यहाँ आई हो, लेकिन मैं जानता था की तुम वापस उस शहर जाना नहीं चाहती थी.वहां तुम्हारी दीदी की यादें तुम्हे और परेसान कर जायेंगी..मैं जानता था की तुम्हारा दूर चले जाना उस वक़्त तुम्हारे लिए ठीक रहेगा..इसलिए जब तुमने मुझसे पूछा था की तुम जाना चाहती हो, तो मैंने तुम्हे रोका नहीं बल्कि तुम्हारे फैसले को सपोर्ट किया.तुमने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख कर पूछा था मुझसे, की "मेरे जाने के बाद तुम ठीक रहोगे न?".मैं चुप रहा..मैं क्या कहता, उस समय सिर्फ तुम ही थी जिससे मैं दिन भर की सारी उलझनें बड़ी आसानी से कह देता था.

हम दोनों बहुत देर तक वहां बैठे रहे..और रह रह कर तुम अपनी ज्ञान की बातों से मुझे एन्लाइटन कर रही थी.तुमने खुद मुझे चेतावनी दी थी की मैं रिजल्ट से सम्बंधित कुछ भी बात नहीं करूँ, लेकिन तुम खुद उस शाम मुझे अपने तरीके से यही समझाते रही की रिजल्ट बुरा होने से दुनिया ख़त्म नहीं हो जाती.तुम जब भी अपने मासूम शब्दों में मुझसे ऐसी बातें कहती थी तो मुझे अच्छा लगता था.उस शाम जब तुमसे मिलने आया था उससे पहले ही मैंने अपने रिजल्ट को स्वीकार कर लिया था, मैंने खुद को समझा लिया था की मुझे इसी परिणाम के साथ जीना है...लेकिन फिर भी मैं बहुत निराश था.जब तुमने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा था "देखना एक दिन तुम अपने उन सब दोस्तों से कहीं आगे निकल जाओगे जो तुम्हारे पीछे तुम्हारा मजाक उड़ाते हैं", तब मुझे सच में तुम्हारी बातों पे यकीन हुआ था.

याद है तुम्हे वो बड़ा सा ग्रीटिंग्स कार्ड, जो तुमने बनाया था और मुझे उस शाम दिया था? तुमने कहा था मुझसे की इसे अपने रूम के दीवार पर लगा देना.लेकिन मैंने उस ग्रीटिंग्स को अपने दीवार में नहीं, बल्कि अपने फोल्डर में लगा लिया था..कुछ साल बाद जब एक शाम मैं उस ग्रीटिंग्स को देख रहा था तो मैंने गौर किया की कार्ड के पीछे जो तुमने बड़ा सा मिकी-माउस का स्टीकर चिपकाया था, वो अपनी जगह से उखड़ने लगा है.मैंने सोचा इसे एहतियात से उखाड़ लूँ और फिर से चिपका दूंगा.मैंने वो स्टीकर वहां से हटाया तो देखा की तुमने वहां कुछ लिखा था, जो ख़ास मेरे लिए था..और शायद लिखने के बाद तुम खुद से शर्माने लगी होगी और इस डर से की कहीं तुम्हारे लिखे शब्दों को मैं पढ़ न लूँ, तुमने अपने उन शब्दों पर स्टीकर चिपका दिया होगा.अगर वो स्टीकर अपने जगह से उखड़ता नहीं तो मैं कभी जान नहीं पाता की तुमने मेरे लिए उस कार्ड में क्या लिखा था. मेरे लिए ये यकीन कर पाना मुस्किल था की इतनी संजीदा बातें तुम लिख सकती हो..तुमने आखिरी लाईन में लिखा था "बुरी बातें सिर्फ तुम्हारे साथ ही क्यों होती है, मेरे अच्छे दोस्त? और फिर भी तुम हमेशा कितना मुस्कुराते रहते हो, इतना पोजिटिव एनर्जी कहाँ से लाते हो तुम?". यकीन करो, तुम्हारे लिखे इन शब्दों को पढ़ कर मेरी हालत क्या हुई थी, ये मैं बता भी नहीं सकता तुम्हे.

मुझे ये सब बातें उस शाम उस कैफे में बैठे बैठे याद आ रही थी...मेरे टेबल पर सभी मैगजीन वैसे ही पड़े हुए थे और मैं तुम्हारे साथ बिताये उस शाम की यादों की गलियों में टहल रहा था.मेरे पास एक डायरी थी,मैं चाह रहा था की डायरी में मैं उस शाम की हर छोटी से छोटी बातें तफसील से लिख दूँ...लेकिन मैंने डायरी खोला नहीं.वो वैसे ही टेबल पर पड़ी मुझे ताकते रह गयी.कितनी ही बार तुम्हारी बातों को डायरी में लिखते हुए,मेरे आँखें गीली हुई हैं, धड़कने बढ़ जाती हैं और मेरा मुझपर कुछ भी कंट्रोल नहीं रहता है..मैं अक्सर तुम्हारी बातें तन्हाई में लिखता हूँ, ताकि मेरे आखों से आसूं गिरे भी अगर, तो कोई उसे देख ना सके.मैं नहीं चाहता था की उस जाने पहचाने कैफे में लोग मेरी नम आँखें देखें, मैं वहां से वापस चला आया.पूरी रात मुझे नींद नहीं आई...तुम्हारे ख्यालों में लिपटा, अपने बिस्तर पर पडा रहा..
 _

  उजले उजले फूल खिले हैं 
  बिल्कुल जैसे तुम हँसते हो
  
  मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो 
  मेरी तरह तुम भी झूठे हो...

 


[ १० अगस्त २०११ ] 
continue reading तुम्हारे नाम लिखी आठवीं चिट्ठी

Friday, July 27, 2012

यादों में एक दिन : बिस्कुट केक


हर शनिवार की सुबह 'आई' और 'एफ' सेक्सन की कम्बाइंड क्लास चलती थी, और मैंने उसे पहली बार उसी कम्बाइंड क्लास में देखा था.वो मेरे ठीक आगे की बेंच पर बैठी हुई थी.वो मुझे पहली नज़र में ही अच्छी लगने लगी थी, लेकिन चाह कर भी मैं कभी उससे बात नहीं कर पाता था..हमारे कुछ कॉमन फ्रेंड थे, तो कभी कभी बस औपचारिक सी बातचीत हो जाया करती थी.एक दो बार मैंने उसके कुछ प्रोजेक्ट के कामों में मदद भी की, लेकिन फिर भी बातचीत हमेशा काफी औपचारिक सी ही रही, इसके पीछे मुख्य वजह मेरा कम घुलने मिलने वाला स्वाभाव ही था.मेरी आदत थी की हर दिन क्लासेज खत्म होने के बाद मैं बाहर सीढ़ियों पर बैठ जाता था, और अपनी डायरी में कुछ भी उल्टा सीधा लिखते रहता था.वे बारिशों के दिन थे और मुझे उन सीढ़ियों पर बैठ कर बारिश देखना अच्छा लगता था.

उस दिन भी हलकी बारिश हो रही थी और मैं सीढ़ियों पर बैठा था..सभी लड़के अपने अपने घर को वापस जा रहे थे, लेकिन मुझे उस दिन घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी..घरवाले किसी पारिवारिक समारोह में गए हुए थे और देर रात तक ही वापस आने वाले थे.मैंने सोचा की आज अच्छा मौका है, काफी देर तक यहाँ बैठा जा सकता है और बारिश के मजे लिए जा सकते हैं...मैं वहाँ बैठा ही था की मुझे लगा मेरे ठीक पीछे कोई खड़ा है.मैंने मुड के देखा तो वहाँ वो खड़ी थी.मैं उसे देख हडबड़ा सा गया और लगभग हकलाते हुए मैं उससे बस इतना ही पूछ पाया..तुम यहाँ...कैसे? वो हँसने लगी, उसने मेरे सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं समझा और वहीँ मेरे पास सीढ़ियों पर बैठ गयी..वो अपने बड़े से बैग में कुछ ढूँढने लगी और एक अमरुद निकाल कर मेरे सामने रख दिया और कहा : "थैंक गौड, तुम मिल गए..ये लो आपका गिफ्ट"..

"गिफ्ट???? कैसा गिफ्ट??" मैंने उससे पूछा. 

वो लगभग मुझे डांटते हुए कहने लगी..."ज्यादा बनने की जरूरत नहीं है, कल आपका बर्थडे है, वो मुझे पता चल गया...तो ये गिफ्ट लायी हूँ...इसे चुपचाप एक्सेप्ट कर लो". मैं मुस्कुराने लगा लेकिन अमरुद किस तरह का गिफ्ट है, मैं यही सोचने लगा...मैंने पूछा उससे "ये अमरुद कुछ डिफरेंट किस्म का गिफ्ट नहीं लगता तुम्हे ??".

वो हँसने लगी और अपने कमीज के कॉलर को पुरे टसन में ऊपर उठा कर कहने लगी " अरे हाँ हाँ...बहुत ही डिफरेंट गिफ्ट है...आखिर लाया कौन है इसे...मैं...देखो, जैसे मैं यूनिक अन्यूश़वल एंड प्राइस्लेस, वैसे ही ये अमरुद भी.."

मैं उसके इस मासूम से जवाब पर हँसने लगा.मुझे हँसता देख वो खफा हो गयी, गुस्सा दिखाते हुए कहने लगी.. "तुम्हे मजाक लग रहा है...पता है मैंने कितनी मेहनत से कल अमरुद तोड़ा था..आजतक पेड़ पर चढ़ने के नाम से डरती रही, सिर्फ डंडे से ही मारकर अमरुद तोड़ा करती थी, और अब जब पेड़ पर चढ़ कर अमरुद तोड़ने की हिमाकत कर डाली और सबसे पहला तोड़ा हुआ अमरुद मैंने तुम्हे गिफ्ट में दिया तो तुम्हे ये मजाक लग रहा है...यु नो...आई थिंक आई डिजर्व लिटल बिट ऑफ अप्रीशीएशन !"   वो इतना कह कर चुप हो गयी, वो गंभीर सा चेहरा लिए मुझे देखने लगी...मैं भी चुप हो गया...मुझे लगने लगा की मुझे हँसना नहीं चाहिए था..शायद वो सही में मेरे हँसने से नाराज़ हो गयी...मैं सोच ही रहा था की उससे माफ़ी मांग लूँ की लेकिन अचानक ही वो मुझे देख कर फिर से मुस्कुराने लगी, और मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहने लगी..."  चिल यार, मैं बस मजाक कर रही थी, मेरे पास और भी कुछ है तुम्हे देने के लिए, रुको अभी देती हूँ..."   इतना कह कर वो अपने बैग में फिर से कुछ ढूँढने लगी और मैं सोचने लगा की मेरे दोस्त इस लड़की के बारे में सही कहते थे...थोड़ी पागल सी लड़की है, कुछ अजीब सी.....बर्थडे गिफ्ट में अमरुद देती है...कभी गुस्सा हो जाती है और कभी बिना बात हँसने लगती है...बड़ी कन्फ्यूज सी लड़की मालुम पड़ती है.

उसने अपने बैग में से एक गिफ्ट पैक निकाल कर मुझे दिया और गिफ्ट खोल कर देखने के लिए कहा.गिफ्ट पैक को खोला तो उसमे दो बड़े खूबसूरत से सिल्वर कलर के पेन थे.मैंने उसे तोहफे के लिए जब शुक्रिया कहा तो कहने लगी "देखो, तुमने मेरे प्रोजेक्ट में इतनी हेल्प की, तो ये तोहफा तो मुझे देना ही चाहिए न...और इस तोहफे के जरिये हमारी दोस्ती आज से शुरू होती है...नेवर एन्डिंग फ्रेंडशिप..ये सिल्वर पेन विटनेस रहेगी हमारी दोस्ती की.."   ये कहने के बाद उसने एक सिल्वर पेन से मेरी हथेली पर बड़े खूबसूरत अक्षरों में लिख दिया "  विश यु अ वैरी हैप्पी बर्थडे...फ्रॉम योर न्यू स्वीट एंड क्यूट सी दोस्त".  


वो कुछ देर चुप रही, हम दोनों कुछ देर तक वहीँ बैठ कर बाहर हो रही हलकी बारिश को देखते रहे..उसने थोड़ी देर बाद कहा मुझसे "कल तो तुम आओगे नहीं, तो परसों मेरे लिए एक चोकलेट लेते आना..उसे मैं तुम्हारे बर्थडे का ट्रीट समझ कर रख लुंगी". मैंने उसकी इस बात का जवाब नहीं दिया.वो थोड़ी देर मुझे देखती रही और मेरे कुछ कहने का इंतज़ार करती रही.वो निराश हो गयी और फिर से बारिश देखने लगी..वो एकाएक सीढ़ियों से उठी और दौड़ कर सामने कैंटीन के अंदर चली गयी.वहाँ से वो कुछ चीज़ें खरीद लायी.पहले तो मैं समझ नहीं पाया की वो कैंटीन अचानक क्यों गयी.वो जब आई तो उसके हाथ में एक बड़ा पैकेट था जिसमे तीन बिस्कुट के पैकेट, गुलाबजामुन और दो डैरी मिल्क चोकलेट थी.मैंने जब पूछा ये किसके लिए खरीद लायी..उसने कुछ भी जवाब नहीं दिया..उसने अपने बैग में से एक बड़ा सा चार्ट पेपर निकाला..उसने उस चार्ट पेपर पर बिस्कुट को एक के ऊपर एक रख उसे एक केक का शक्ल दे दिया...चोकलेट को उसने छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ कर बिस्कुट पर छिड़क दिया और दो गुलाबजामुन को बिस्कुट के ठीक ऊपर रख दिया...जैसे केक के ऊपर चेरी रखा जाता है.करीब दस-पन्द्रह मिनट के मेहनत के बाद उसका ये बिस्कुट वाला केक तैयार हो गया था.वो उस केक को देख बहुत खुश हो रही थी, और मैं हैरान हो रहा था...की ये कैसे उसने अचानक से बिस्कुट और चोकलेट से केक बना दिया.


मेरे कम बोलने की बीमारी की हद इतनी थी की मैंने उस दिन उसे उस केक के लिए एक थैंक्स तक नहीं कहा, तारीफ़ करनी तो दूर की बात थी.उसने उस बिस्कुट केक का एक टुकड़ा मुझे खिलाया, और कहा की अब इसका एक टुकड़ा मैं उसे खिलाऊं.मैंने झिझकते हुए केक का एक टुकड़ा उसे खिला दिया.हम दोनों कुछ देर वहीँ बैठ कर बिस्कुट केक को खाते रहे.थोड़ी देर बाद जब बारिश पूरी तरह थम गयी, तब वो वापस घर चली गयी, लेकिन मैं वहीँ सीढ़ियों पर बैठा रहा.मुझे यकीन नहीं हो पा रहा था की जिस लड़की को मैं हर रोज देखता था, जिससे चाह कर भी कभी बात नहीं कर पाता था, उसके साथ मैंने इतना खूबसूरत वक्त बिताया, और उसने मेरे लिए एक यूनिक किस्म का बर्थडे केक भी बनाया.मैंने उस दिन उन्ही सीढ़ियों पर बैठ कर उस पुरे लम्हे को अपने डायरी में लिख लिया था, और आज भी जब डायरी का वो पन्ना आँखों के सामने से गुज़र जाता है तो याद आता है की कभी मैंने अपना जन्मदिन किसी बारिश के दिन, सीढ़ियों पर बैठकर एक पागल और मासूम लड़की के साथ सेलिब्रेट किया था.



continue reading यादों में एक दिन : बिस्कुट केक

Sunday, July 8, 2012

यादों में एक दिन : आधे अधूरे नोट्स



उसे डर था की मैं उदास रहने लगा हूँ और खुद से बेहद निराश हूँ..उसे डर था की एक दिन मैं अपनी असफलताओं और परेशानियों से घबराकर कहीं चला जाऊँगा, किसी ऐसी जगह जहाँ मुझे कोई भी खोज न सके.उसने सुन रखा था उन लोगों के बारे में जो जब जिंदगी से हार जाते हैं तो कहीं चले जाते हैं और उनके घरवालों को उनकी कोई खबर नहीं मिलती.मिलती है तो सिर्फ उनके मरने की खबर, और कुछ बदनसीबों को वो खबर भी नहीं नसीब होती.वो पागल थी जो ऐसा सोचती थी.घरवालों से और उससे दूर मैं जाने की बात भी नहीं सोच सकता था..एक दफे जब मजाक में ही उसने मुझसे ये प्रश्न किया की मैं कहीं चला तो नहीं जाऊँगा, तो मैं उसे ये बताना चाह रहा था की मैं कहीं नहीं जाऊँगा, घरवालों के और उसके बिना मेरी कोई जिंदगी ही नहीं..लेकिन मैं खामोश रह गया और उसने मेरी ख़ामोशी का अर्थ ये लगा लिया की मैं सच में एक दिन कहीं बहुत दूर निकल जाऊँगा जहाँ से वो चाह कर भी मुझे वापस नहीं ला सकेगी.

---

वे बारिशों के मौसम और मेरे उदासियों के दिन थे.लगातार मिल रही असफलताओं से मैं बेहद हताश और निराश था, खुद के ऊपर से मेरा विश्वास पुरे तरह से उठ चूका था.बाहर आना जाना मैंने काफी कम कर दिया था और घर में ही रहने लगा था.शाम अक्सर मेरे लिए बहुत बोझिल हो जाया करती थी..दिन में तो घर में मैं अकेला रहता था, लेकिन शाम होते ही सारे लोग घर आ जाते थे जो मुझपर तरह तरह के ताने कसने से भी नहीं चुकते थे..और मैं उनसे छुपते फिरता था...कभी अपने कमरे के कोने में तो कभी घर के पीछे बने छोटे से बगीचे में..मेरी शामें अक्सर उसी छोटे बगीचे में गुज़रती थी जहाँ मैं अपनी डायरी लेकर चला आया करता था और तब तक वहाँ बैठा रहता था जब तक रात के खाने के लिए माँ आवाज़ न दे.मैं डायरी में सब कुछ लिखने लगा था..जो भी दिल में आता उसे मैं डायरी में दर्ज कर लेता...लोगों की फटकार से लेकर माँ की प्यार भरी बातें...सभी उसमे दर्ज होती थी...अपने दिल की बात कागज़ पर लिख देने से मुझे बड़ा सुकून मिलता था, और ऐसा लगता की मेरे दर्द का कुछ हिस्सा कागज़ पर उतर आया है..लिखने के बाद मैं बहुत हल्का महसूस करता था.ऐसी ही एक उदास शाम मुझे खबर मिली की वो दो महीने के लिए अपने शहर जा रही है.उन दिनों वह एकमात्र ऐसी लड़की थी जिससे मैं अपनी दिल की हर बात, हर दर्द कह देता था..उससे लगभग हर शाम मुलाकात होती थी और शायद दिन भर में वही दो घंटे जब उससे मुलाकात होती थी, मेरे सुख के पल होते थे.ये सोच की दो महीने मैं उससे नहीं मिल पाऊंगा, मैं थोड़ा घबरा सा गया.उस रात मैं बहुत देर तक जागा रहा और जाने क्या क्या सोचता रहा, कागज़ पर न जाने क्या क्या लिखते रहा.मैं अभी याद करूँ तो मुझे कुछ भी याद नहीं की उस रात मैंने क्या लिखा था, हाँ बस इतना ही याद है की मैंने चार पन्नों में कविता सा कुछ लिखा था जिसे लिखने के बाद उसी रात उन कागज के टुकड़े-टुकड़े कर बाहर फेंक दिया था.

---

वो जब भी सोचने लगती तो उसका वो मासूम सा चेहरा काफी संजीदा हो जाता और वो अपने उम्र से काफी बड़ी दिखने लगती.जब भी मैं उसे कुछ सोचते हुए देखता तो मुझे लगता यह वो लड़की नहीं जिसे मैं जानता हूँ..यह कोई दूसरी लड़की है, जिसके बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता.जब कभी कुछ सोचते सोचते वो अपने हाथों में मेरा हाथ लेकर विश्वास भरी निगाहों से मुझे देखती तो मुझे लगता की सच में सब ठीक हो जाएगा.वो जब यह कहती की ये एक फेज है, और ये भी गुज़र जाएगा तो मुझे उसकी बातों पर ठीक वैसे ही विश्वास होता जैसे माँ की बातों पर होता था, जब वो सर पर हाथ फेर कर कहती थी "ये एक खराब समय है..जल्द ही सब ठीक हो जाएगा".
---

अगले दिन सुबह जैसे ही मेरी नींद खुली तो देखा बाहर बारिश हो रही है.मैं एकाएक बहुत खुश हो गया..पता नहीं क्यों लेकिन उन दिनों जब कभी सुबह तेज बारिश होती थी तो मैं हमेशा बहुत खुश हो जाया करता था, और अपनी किताबें, अपना टू-इन-वन लेकर मैं बारामदे में आकार बैठ जाता था.घर का एक वही कोना था जो मुझे बड़ा सुकून देता था, जहाँ मैं पुरे दिन बैठा रहता था.सुबह माँ जब चाय लेकर बारामदे में आई तो मुझे इस तरह खुश देख वो भी बहुत खुश हो गयी.वो वहीँ मेरे पास बैठ गयी.माँ ऐसा हमेशा करती थी.उसे मालुम था की मैं परेसान और उदास रहता हूँ और ऐसे में जब कभी वो मुझे इस तरह खुश देखती तो मेरे पास आकार बहुत देर तक बैठी रहती और दुनिया भर की बातें करती.मुझे वो पल बहुत अच्छे लगते थे.माँ की एक आदत और भी थी, जिस दिन उसे लगता की मैं बहुत खुश हूँ तो वो सुबह के नाश्ते में बहुत ही अच्छे अच्छे पकवान बनाती थी..पूरी, हलवा और न जाने क्या क्या...और जब मैं पूछता की "माँ, आज कोई खास दिन या त्यौहार है क्या?"  तो वो हमेशा कोई न कोई बात बना जाती, लेकिन सच्चाई मैं जानता था की माँ मुझे खुश देख कर खुश है और इसलिए उसने ये सब पकवान बनाये हैं.
---

वो बारिशों की एक शाम थी..ठंडी और तेज हवा चल रही थी.उसने अपने बाल खोल दिए थे और कभी कभी उसके बाल हवा में लहराते हुए मेरे चेहरे पर आकार टिक जाते थे, जिन्हें मैं हटाने की कोशिश भी नहीं करता. उसकी ये आदत थी की पार्क में आते ही वो अपने लंबे काले बालों को खोल देती और उसके बाल हवा में उड़ने लगते.उसे ये काफी अच्छा लगता.वो कहती की "बालों को भी आज़ाद छोड़ देना चाहिए, जैसे मैं पार्क में एन्जॉय करती हूँ, वैसे बालों को भी पार्क में लहरा कर एन्जॉय करने की पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए".

---

पहली बार जब उसने कहा था की "मैं अब जाउंगी", तो मेरी धड़कन एकदम से तेज हो गयी थी.मुझे लगा की अब उसके जाने का वक्त आ गया है और अब उससे मिलने के लिए मुझे फिर से छः महीने का लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा.लेकिन वो जाने के बजाये फिर से अपनी जगह बैठ गयी.ये खेल वो पिछले एक घंटे में दसवीं बार खेल चुकी थी.वो एकाएक उठ खड़ी होती और कहती की "मैं अब जाउंगी".लेकिन जाने के बजाय वो बेंच के पास खड़ी होकर सामने पेड़ों के जंगल की तरफ देखकर कुछ सोचने लगती और अचानक से उसे कोई पुरानी बात याद आ जाती.वो फिर से बेंच पर बैठ कर मुझे वे बातें बताने लगती.बातें जैसे ही खत्म होती वो फिर खड़ी हो जाती और झाडियों की तरफ फिर से अपलक देखने लगती.मुझे उसकी ये हरकत देख कभी कभीं संदेह होता की उन झाडियों के पीछे कोई छुप कर बैठा हुआ है जो सिर्फ उसे ही दिखाई दे सकता है और जो इशारों के जरिये उसे पुरानी बातें याद दिला रहा है..मैं उसके इस खेल का इतना अभ्यस्त हो चूका था की जब भी वो खड़ी होती तो मुझे लगता की वो जाने के लिए नहीं बल्कि कुछ सोचने के लिए खड़ी हुई है.वो झाडियों की तरफ देखेगी और उसे कुछ याद आ जाएगा और वो बैठ जायेगी.उसके इस खेल पर मेरा यकीन इतना पक्का हो गया था की जब अंतिम बार वो खड़ी हुई और झाडियों की तरफ देखने के बजाय उसने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा "अपना ध्यान रखना, मैं अब चलूंगी" तो मैं एकदम स्तब्ध सा उसे देखने लगा.वो बिना मेरे जवाब का प्रतीक्षा किये वहाँ से जाने लगी..और मैं सुन्न नज़रों से उसे जाते हुए तब तक देखता रह गया जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गयी.मैं बहुत देर तक उसी बेंच पर बैठे हुए पार्क के उसी गेट की तरफ देखता रह गया जिधर से वो गयी थी.मुझे अब भी लग रहा था की वो उसी गेट से फिर से वापस आएगी और इसी बेंच पर मेरे पास बैठकर मुझे फिर से कोई पुरानी बात सुनाने लगेगी.लेकिन जब बहुत देर तक वो वापस नहीं आई तो मेरा भ्रम टुटा और मुझे होश आया, की वो सचमुच जा चुकी है और उससे अब मुलाकात अगले साल ही होगी.

.
.
हाँ तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
. . . जिनमें वह फँसने नहीं आतीं
जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं...



यादों में एक दिन ]
continue reading यादों में एक दिन : आधे अधूरे नोट्स

Sunday, June 17, 2012

ये खेल आखिर किसलिए?

मैं रोज़गार के सिलसिले में
कभी कभी उसके शहर जाता हूँ तो
गुज़रता हूँ उस गली से
वो नीम तरीक सी गली
और उसी ने नुक्कड़ पे ऊँघता सा वो पुराना खम्बा
उसी के नीचे तमाम शब इंतज़ार करके
मैं छोड़ आया था शहर उसका
बहुत ही खस्ता सी रौशनी की छड़ी को टेके
वो खम्बा अब भी वहीँ खड़ा है
फुतूर है ये मगर
मैं खम्बे के पास जा कर
नज़र बचा के मोहल्ले वालों की
पूछ लेता हूँ आज भी ये
वो मेरे जाने के बाद भी यहाँ आई तो नहीं थी
वो आई थी क्या?






ये खेल आखिर किसलिए?
मन नहीं उबता?
कई-कई बार तो खेल चुके हैं ये खेल हम अपनी जिंदगी में?
खेल खेला है, खेलते रहे हैं..
नतीजा फिर वही, एक जैसा
क्या बाकी रहता है, हासिल क्या होता है?
जिंदगी भर एक दूसरे के अँधेरे में गोते खाना ही इश्क है न?
आखिर किसलिए?

एक कहानी है...सुनाऊं?

कहानी दो प्रेमियों की है...दोनों जवान,खूबसूरत, अकलमंद
एक का दूसरे से बेपनाह प्यार
कसमों में बंधे हुए की जन्म-जन्मांतर में एक दूसरे का साथ निभाएंगे
मगर फिर अलग हो गए.
नौजवान फ़ौज में चला गया, गया तो लौट के नहीं आया..लापता हो गया..
लोगों ने कहा मर गया
मगर महबूबा अटल थी.
बोली- वो लौटेगा जरूर...लौटेगा
पुरे चालीस सालों तक साधना में रही, वफादारी से इंतज़ार किया
आखिर एक रोज महबूब का  संदेशा मिला -मैं आ गया हूँ, सिवान वाले मंदिर में मिलो
कहने लगी -देखा, मैंने कहा था न..
दौड़ कर गयी, मंदिर पहुंची पर प्रेमी नहीं दिखाई दिया..
एक आदमी बैठा था...एकदम बुढा, पोपला मुहँ, टाट गंजी, आँखों में मैल..
बोली- यहाँ तो कोई नहीं, जरूर किसी ने शरारत की है..मायूस होकर घर लौटी
वहाँ मंदिर में इंतज़ार करते करते वो भी थक गया
कोई नहीं आया, चिड़िया का बच्चा तक नहीं..
हाँ..एक बुढिया आई थी, कमर से झुकी हुई, बाल उलझे हुए..आँख में मोतियाबंद
मंदिर में झाँक कर देखा..कुछ बुड्बडाई और अपने ही साथ बात करते हुए दूर चली गयी...
निराश हो गया बेचारा.. बोला - उसने इंतज़ार नहीं किया
गृहस्थी रचा कर मुझे भूल गयी... संदेशा भेजा था, फिर भी मिलने तक नहीं आई..

किसलिए..आखिर किसलिए ये खेल?मन नहीं उबता??



.

[गुलज़ार]
continue reading ये खेल आखिर किसलिए?

Friday, June 15, 2012

ये चांद सा रोशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा...


वो बहुत खुश थी..लड़का उससे पूरे एक हफ्ते बाद आज शाम मिलने वाला था...लड़का सात दिनों के लिए कलकत्ता चला गया था और इन सात दिनों में लड़की ने उसे बेतरह मिस किया था...जिस दिन लड़का कलकत्ता जा रहा था उस दिन लड़की उससे काफी नाराज़ हो गयी थी.लड़के ने उसे अपने कलकत्ता जाने की बात उसी दिन सुबह बताई थी, और लड़की इस वजह से नाराज़ थी की उसे उसने ये बात पहले क्यों नहीं बताई.उन दिनों लड़की का एकमात्र सहारा वो लड़का ही था, जिससे वो हर शाम मिला करती थी..और उससे एक हफ्ते नहीं मिल पाना उसके लिए बहुत उदास कर देने वाली बात थी.उस दिन लड़की फोन पर खूब रोई थी.लड़के से उसने विनती की थी की वो उसे भी अपने साथ कलकत्ता ले जाए.लड़के ने बहुत समझाया उसे, बहुत बहलाया तब जाकर वो शांत हो पायी थी.

जब से लड़का गया था, तब से वो बस दिन ही गिन रही थी, की कब पंद्रह तारीख आये और लड़के से वो मिल पाए. .जिस दिन लड़का आने वाला था उस दिन वो सुबह से वो फोन के पास बैठी हुई थी, और जैसे ही लड़के ने कॉल किया उसने झट से फोन का रिसीवर उठा लिया.लड़का उधर से कुछ कहता इससे पहले लड़की ने ही उससे कह दिया..."सेम प्लेस, गार्डन रेस्टुरेंट, सेम टाईम, सी यु इन द इवनिंग". फोन के दूसरी तरफ लड़का हंसने लगा तो लड़की ने उसे डांट दिया..."इतने दिन बाद तुमसे मिलूंगी, और तुम इस बात पर हंस रहे हो...आज शाम में मिलो तब मनाना मुझे, बहुत नाराज़ हूँ तुमसे".लड़की ज्यादा देर उससे फोन पर बात नहीं कर सकी...और शाम में मिलने के लिए कह कर उसने फोन रख दिया,



लड़की हमेशा उसे खूब इंतजार करवाती थी लेकिन उस शाम वो वक़्त से बहुत पहले ही तय जगह पर पहुँच गयी थी.हमेशा की तरह वो अपने खूबसूरत ख्यालों में उलझी हुई, बाकी लोगों से बेपरवाह, लड़के के आने का इंतजार कर रही थी.लड़के ने उसे दूर से ही देख लिया था.वो सफ़ेद साड़ी में बिलकुल एक परी जैसे दिख रही थी.लड़का इस कशमकश में था की लड़की का मूड जाने कैसा होगा..सुबह फोन पर तो वो नाराज़ थी और लड़के से कह रखा था उसने, की आज मैं इतनी आसानी से नहीं मानने वाली हूँ.लेकिन वो ये भी जानता था की लड़की का वो गुस्सा सिर्फ उपरी दिखावा था, लड़की ने कभी गुस्से में उससे कुछ कहा हो ये उसे याद नहीं.वैसे भी लड़की को मानना लड़के के लिए कभी कोई मुश्किल काम नहीं रहा है.वो जहाँ एक तरफ ये सोच कर घबरा रहा था की कहीं लड़की सच में तो नाराज़ नहीं, वहीँ उसे ये भी विश्वास था की वो उसे झट से मना लेगा.लड़की के नज़दीक पहुँचते ही उसकी निर्मल हंसी और चुलबुलेपन से वो समझ गया की सब कुछ ठीक है और लड़की का मूड अच्छा है.वो खुश दिख रही थी.

लड़की उस गार्डन रेस्टुरेंट के गेट के पास खड़ी थी और हाथ में एक ईंट के टुकड़े से रेस्टुरेंट के दिवार पर जाने क्या लिख रही थी.उसने लड़के को आते हुए देखा नहीं, और जब लड़के ने पीछे से उसे आवाज़ लगाईं, लड़की ने वो ईंट के टुकड़े को जल्दी से अपने हाथ से फेंक दिया और जो भी वो दिवार पर लिख रही थी, हडबडाहट में उसे ऐसे मिटाने लगी जैसे वो कोई राज़ की बात हो जिसे वो लड़के को दिखाना नहीं चाहती..
वो एक पेंगुइन की अपने उचक कर अपने दो पैरों पर खड़ी हो गयी, और अपने फेमस शरारती अंदाज़ में उससे कहा...“तो साहब  कलकत्ता से वापस आ गए आप...चलिए अब समोसे और गोल्डस्पॉट से मेरी कुछ खातिरदारी कीजिये..ऐसे चले जाते हो कहीं भी, मुझे अपने साथ भी नहीं ले जाते तो हर्जाना भरना पड़ेगा न...देखिये तो, आप नहीं थे तो आपकी चिंता में हमारी सेहत कितनी बिगड़ गयी है..देखिये तो ज़रा हमें..” वो अपने दोनों पैरों पर ऐसे खड़ी थी जैसे सच में वो लड़के को दिखा रही हो, की देखो मैं इन सात दिनों में कितनी कमज़ोर हो गयी हूँ..वो बड़े निरीहता से लड़के को देख रही थी.
लड़के को अचानक उसपर बहुत प्यार आने लगा...उसने प्यार से उसका हाथ थामा और कहा “अच्छा चलो अब माफ कर दो मुझे, सब कुछ बहुत जल्दबाजी में हुआ था इसलिए तुम्हे पहले बता नहीं सका मैं....लेकिन आज तुम जो कहोगी वही होगा".. लड़की ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया...बस एक प्यारी मुस्कान उसके चेहरे पर सिमट आई थी.

दोनों रेस्टुरेंट के अन्दर गए और अपने फेवरिट सीट पर जाकर बैठ गए...

लड़की कुछ कहने जा ही रही थी की लड़के ने उसके हाथ में एक डब्बा थमा दिया और कहा – 
“ये लो..तुम्हारा तोहफा..खास कलकत्ता से तुम्हारे लिए लेकर आया हूँ"....
लड़की कुछ देर बड़ी हैरानी से उस डब्बे को देखते रही और डब्बा खोलते ही उसकी आँखें चमक उठी, वो खुशी से उछल पड़ी.डब्बे में मिठाईयां थी, कलकत्ता के उसी दूकान की मिठाईयां जो उसे सबसे ज्यादा पसंद थी.ये एक ऐसा सरप्राईज था, जिसके लिए लड़की बिलकुल तैयार नहीं थी.लड़का जानता था की अपनी फेवरिट दूकान की मिठाईयों को देखकर वो इसी तरह खुश होगी, इसी वजह से जिस दिन उसकी ट्रेन थी, वो उस दूकान में जाकर उसके लिए मिठाईयां खरीद लाया था.

लड़की ने उस डब्बे को अपने दोनों हाथों से कुछ ऐसे पकड़ रखा था की जैसे वो कोई खजाना हो जिसे कोई भी दूसरा उससे छीन कर ले जा सकता हा.उसने बड़े एहतियात से इधर उधर देखा और फिर चुपके से उस डब्बे को अपने बैग में रखते हुए लड़के से कहती है “ये जो तुमने मुझे प्राईसलेस गिफ्ट दिया है न, मैं आज घर जाकर  दीदी को दिखाउंगी और उन्हें ही सबसे पहले खिलाउंगी...तुम्हे एक भी मिठाई नहीं दूंगी मैं...यही तुम्हारी सजा है...हाँ, लेकिन तुम्हारे लिए मेरे पास कुछ है..रुको, अभी दिखाती हूँ...” 
इतना कह कर वो अपने बैग में कुछ ढूँढने लगी.लड़की जब भी इस तरह अपने बैग में कुछ ढूँढती तो लड़के को वो हमेशा चकित कर जाती.लड़के को लड़की का बैग अलादीन का चिराग से कम जादुई नहीं लगता था.वो जब भी अपने बैग को टटोलती तो उसमे से अजीबोगरीब चीज़ बाहर निकलते...किसी बहुत पुराने फिल्म का कैसेट, कैडबरी चोकलेट के पुराने रैपर्स,फटे पुराने नोट, पुराने पेन जो की बिलकुल खराब हो चुके होते थे और जाने क्या क्या...और वो लड़के को हर बार ऐसे ही अजीबोगरीब चीज़ थमा दिया करती थी, और कहती की देखो, इसे मैंने दिया है तो थोडा संभाल के रखना अपने पास.इस बार लेकिन लड़की ने कोई अजीबोगरीब चीज़ बैग से नहीं निकाला बल्कि एक कैसेट बैग से निकाल लड़के को थमा दिया.

लड़के ने कैसेट को यूँ उलट पलट कर देखा की जैसे वो कैसेट न होकर सच में अलादीन के चिराग से निकला कोई जादुई चीज़ हो..कैसेट का कवर सादे कागज़ का था और खुद से बनाया हुआ..कैसेट का वो खूबसूरत कवर देखकर लड़के को हाथ से बने हुए नये साल के ग्रीटिंग्स कार्ड की याद आ गयी...जिसमे ठीक वैसे ही फूलों वाले बॉर्डर्स बने होते थे.लड़के को ये समझने में देर नहीं लगी की एक ब्लैंक कैसेट में लड़की ने अपने पसंद के गानों को रिकॉर्ड करवाया है और उसका कवर लड़की ने खुद बनाया है.कैसेट के कवर में लिखा कैसेट का टाईटल जरूर लड़के को अजीब लग रहा था -"तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हे चंपा को बनाया".
कुछ देर तक उसकी नज़र कैसेट के टाईटल पर ही अटकी रह गयी..टाईटल के ठीक नीचे छोटे अक्षरों में कुछ गानों के कोटेशन लिखे हुए थे.लड़के ने कैसेट को पलटा तो दूसरी तरफ पर्पल स्केच पेन से लिखा था 
"इशारों इशारों में दिल लेने वाले, बता ये हुनर तुने सीखा कहाँ से??????????"

लड़के की नज़र जाने क्यों गाने के इस लाईन पर टंगी रह गयी.वो जाने क्या सोचने लगा.....कुछ देर तक वो कैसेट को वैसे ही उलट पलट कर कभी आगे लिखी लाईन को पढता, कभी पीछे लिखे गाने के इस लाईन को पढता, जो उसे जाने क्यों गाना कम और लड़की का सवाल ज्यादा लग रहा था...

वो फिर लड़की को देखने लगता है - “ये चंपा कौन है?”

"तुम्हे चंपा नहीं मालुम??” लड़की ने आश्चर्य से पूछा

नहीं, कौन है ये चंपा??'

अरे, चंपा तो काश्मीर की कली है, तुम्हे नहीं पता??' लड़की ने शरारत भरे अंदाज़ में कहा.

लड़के को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था और वो जवाब देने के बजाये हैरान सा चेहरा लिए उसे देखता रहा..और लड़की उसका कन्फ्यूज्ड चेहरा देख खुश हो रही थी.लड़की की शरारती हंसी से जब वो इरिटेट सा होने लगा तो लड़की अपनी हंसी को रोकते कहती है "अच्छा मैं बताती हूँ ये चंपा कौन है, लेकिन पहले तुम बताओ की तुमने काश्मीर की कली फिल्म देखी है?"

"हाँ देखी है, लेकिन क्यों?"

"अरे बेवकूफ उस फिल्म में ही तो शर्मीला आंटी का नाम चंपा था...भूल गए?"

"शर्मीला आंटी"????तुम्हारा मतलब शर्मीला टैगोर  न???

"हाँ...हाँ..वही...मेरी शर्मीला आंटी" लड़की ने बेपरवाही से हँसते हुए कहा

लड़के के समझ में अब पूरी बात आ गयी थी और वो उसे छेड़ते हुए कहता है "अच्छा..तो वो तुम्हारी आंटी कब से बन गयी?"

"पिछले वीक से..." लड़की बस तीन शब्दों का ये छोटा सा जवाब लड़के को थमा कर अपने बैग से खेलने लगी.

वो जब भी अपनी बात खत्म कर के बैग से खेलना शुरू कर देती तो ये इस बात के तरफ इशारा होता था की उसे उस टॉपिक पर अब आगे बहस नहीं करनी है.लड़का भी बस मुस्कुरा कर रह गया.
ये लड़की का एक बड़ा ही अनयुज्वल सा और प्योर पागलपन वाला खेल था.वो फिल्मी कलाकारों को अपना रिश्तेदार बना लेती थी और फिर उन्हें रिश्ते वाले नाम से ही बुलाती.जैसे की "कामिनी दादी,साधना मौसी,स्मिता आंटी,मीना मौसी, दीप्ति दीदी,जुही दीदी वैगरह"...लड़की के दोस्तों को ना चाहते हुए भी लड़की के इन रिश्तेदारों का पूरा मान सम्मान रखना पड़ता, और लड़की के सामने कोई उसके इन रिश्तेदारों की बुराई नहीं कर सकता था.ये लड़की का नियम था, जिससे उसके सभी दोस्त डरते थे...लड़की को अपने इस खेल में जाने क्यों बड़ा मजा आता था.

थोड़ी देर अपने बैग से खेलने के बाद जब लड़की आश्वस्त हो गयी, की अब लड़का इस सम्बन्ध में कोई मजाक नहीं करेगा तो वो कहती है - 
"पता है..तुम तो थे नहीं यहाँ और मेरे पास करने को कुछ काम भी नहीं था..शाम को भी घर से निकलना नहीं होता था...तो मैं कुछ दिनों के लिए अपने चाचा के पास चली गयी थी...वहाँ शर्मीला आंटी के बहुत से हिट गानों के कैसेट थे और मुझे सारे गाने बहुत पसंद आए.मैं पूरी शाम गार्डन में टहलते रहती और वाकमैन में गाने सुनते रहती.कुछ गाने तो मुझे इस कदर पसंद आ गए की मैंने सोचा जब तुम आओगे तो मैं तुम्हे वे सब गाने रिकॉर्ड कर के गिफ्ट करुँगी..तभी ये कैसेट बनाया मैंने....."
बड़ी मासूमियत से लड़की ने ये बात लड़के से कही थी और तब लड़का एक और बात समझ गया था, की कैसेट में जितने गाने हैं उसे लड़की ने अपनी ही आवाज़ में रिकॉर्ड कर के उसे दिए हैं..लड़के ने बड़े प्यार से लड़की का हाथ अपने हाथों में लिया और धीमे से उसे चूम कर कहा "कैसेट बहुत खूबसूरत है, थैंक्स फॉर दिस".

लड़की को अपने आप पर गुमान होने लगा और वो फिर बच्चों की तरह हँसने लगी.

कुछ देर दोनों खामोश रहे.बस एक दूसरे का हाथ पकड़े दूर आकाश में तैरते बादलों के टुकड़ों को देखते रहे..शाम में हुई बारिश से मौसम में थोड़ी ठंडक आ गयी थी.शाम भी गहराने लगी थी.सड़कों के किनारे और दुकानों के आगे बत्तियाँ जलने लगी थी.कुछ देर बाद जब दोनों वहाँ से जाने के लिए उठे तो लड़की को एकाएक कुछ याद आया.वो एकदम से लड़के के सामने खड़ी हो गयी और कहने लगी 
"हमें मंदिर जाना चाहिए...आज ही...मैंने सोचा था, जब तुम आओगे तो हम दोनों एकसाथ शिव मंदिर जायेंगे"
लड़का इस बात पर अपनी सहमति या असहमति जता पाता, इससे पहले ही लड़की उसका हाथ थाम कर उसे अपने साथ ऑटोरिक्शे के स्टैंड तक लेते आई.जब तक लड़का कुछ संभल पाता, दोनों ऑटोरिक्शे पर बैठ चुके थे और मंदिर की ओर जाने लगे थे...

ऑटोरिक्शे पर अभी वो बैठे ही थे की ऑटो-रिक्शे वाले ने रेडियो चालु कर दिया..रेडियो पर भी लड़की की शर्मीला आंटी का गाना आ रहा था....

"ये चाँद सा रौशन चेहरा, जुल्फों का रंग सुनहरा,
ये झील सी नीली आँखें, कोई राज़ है इनमे गहरा..
तारीफ़ करूँ क्या उसकी, जिसने तुम्हे बनाया"

गाने के बोल सुनते ही दोनों चौंक पड़े, दोनों ने एक दूसरे को देखा...पहले तो एकसाथ ही दोनों हँसने लगे, फिर लड़की ने अपने आप को संभाला और अपनी नज़रों को दूसरी तरफ मोड़ दिया..लड़के ने जब देखा की लड़की एकाएक शरमाने लगी है तो उसने उसका चेहरा अपने हाथों में लेते हुए शरारत भरे लहजे में कहा "सच में, तारीफ़ करूँ क्या उसकी...जिसने तुम्हे बनाया".लड़की की नज़रें अब नीचे झुक गयी, और ऑटो के सीट पर वो अपनी उँगलियों से आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने लगी..लड़के ने फिर उसे छेड़ते हुए कहा "पता है..गाने में तुम्हारी शर्मीला आंटी की नहीं, तुम्हारी तारीफ़ की गयी है...देखो तो ज़रा..चाँद सा तुम्हारा चेहरा, झील सी तुम्हारी आँखें और जो तुम मुखड़े से अपने हटा दो ये आँचल, तो सच में हो सवेरा हो जाएगा...

लड़की इसका कुछ भी जवाब नहीं दे सकी, बस "तुम भी ना" कह कर लड़के के कन्धों पर अपना सर टिका दिया और अपनी आँखें मुंद ली.फिल्म का गाना आगे बढ़ रहा था और लड़का उस गाने को अब सच में लड़की के साथ रिलेट कर के देख रहा था, और शायद धीरे धीरे लड़के को भी ये विश्वास होते जा रहा था की ये गाना चंपा के लिए नहीं, उसी लड़की के लिए लिखा गया है, जो इस वक्त उसके पास उसके कन्धों पर सर रख कर सोयी हुई है...


continue reading ये चांद सा रोशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा...