Saturday, October 15, 2011

आई विल कम बैक अगेन

छठ का त्यौहार था.मैं सुबह के अर्घ्य के बाद जल्दी ही घर से निकल गया..उसी कोम्प्लेक्स के सामने खड़ा था, जहाँ हमने मिलना तय किया था.उसने मिलने का वक्त बताया था लेकिन अपनी आदत से मजबूर वो लेट थी, अब तक नहीं आई थी. उसे पटना आये दो हफ्ते हो गये थे और हमारी मुलाकात बस तीन-चार बार ही हो पायी थी.मिलने की खुशी तो थी लेकिन साथ साथ मैं इस बात से उदास भी था की वो कल कोल्कता जायेगी, जहाँ उसे अपने कुछ बचपन के दोस्तों से मिलना था और फिर वहीँ से वो वापस चली जायेगी.हमने इस कोम्प्लेक्स में मिलना तय किया था,इसके पीछे भी एक नादान सी वजह थी.इस कोम्प्लेक्स से हमारा एक पुराना रिश्ता था..वो लगभग हर शाम यहाँ सात रुपये वाली कोल्ड-ड्रिंक जरूर पीती थी..उसे ये पटना का सबसे खूबसूरत दूकान लगता क्यूंकि इसका आकार कोको कोला के बोतल जैसा जो था. अपने याशिका वाले कैमरा से वो कितनी बार इस दूकान का फोटो भी ले चुकी थी.जब हम साथ पढते थे तो हमने ये फैसला किया था की अगर पढ़ाई के लिए हम अलग अलग शहर में चले गये और कभी पटना आना हुआ तो हम इसी जगह मिलेंगे.उस वक्त ये सोचा भी नहीं था की शहर तो क्या, देश भी अलग हो सकते हैं.

उसकी हरी मारुती 800 मुझे बहुत दूर से ही दिख गयी थी.जब गाड़ी थोड़ी पास आई तो मुझे देख बड़ी हैरानी हुई की वो अकेली आ रही है, खुद ड्राईव कर.वैसे उसके ड्राइविंग स्किल को लेकर मैं आश्वश्त था लेकिन फिर भी मुझे सड़क पर चल रहे लोगों के लिए चिंता हो गयी.उसके ड्राइविंग स्किल के प्रति जो मेरी आस्वश्ता थी उसे उसने और मजबूत कर दिया जब उसने गाड़ी पार्क करते वक्त दो साइकिलें गिरा दी थी.लेकिन उसे साइकिल गिरने से कोई फर्क नहीं पड़ा, उलटे उसने सारा इल्जाम साइकिल वालों पर थोप दीया.."लोगों को साइकिल पार्क करना आता नहीं तो चलाते ही क्यों हैं?"

उसे ब्लैक साड़ी में देख मुझे थोड़ा तो आश्चर्य हुआ की आज साड़ी में कैसे आई वो...लेकिन आश्चर्य से ज्यादा मुझे वो बहुत खूबसूरत दिख रही थी.हर बार से ज्यादा सुन्दर..इतनी खूबसूरत वो मुझे पहले कभी नहीं लगी थी.मेरी ये मजबूरी रहती की उसके सामने मैं उसकी तारीफ़ ठंग से नहीं कर पाता था.इन्टरनेट पर भी जब वो फोटो लगाती तो मैं अच्छी तारीफों के बजाय उलटे पुलते कमेन्ट लिखता "दांत काहे दिखा रही है रे","कितना फोटो खिंचवाती है","थप्पड़ मार के भाग जायेंगे".अगर जब कभी उसकी तारीफ़ कर देता तो बाकी के दोस्त मेरा क्लास लेने से भी बाज नहीं आते.वैसे दोस्तों की खिंचाई कमेन्ट न करने की वजह न थी..वो कुछ अलग बात थी, जिसे मैं कभी समझ नहीं पाया.

उस दिन भी उसकी तारीफ़ करने के बजाय मैंने उसपर कुछ व्यंग बाण चलाये थे "किसका साड़ी चुरा के भागी हो रे","करिया साड़ी पहिने हुई है,बच्चा सब देखेगा तो डर जाएगा".ये मेरी बातें कितनी इल-लॉजिकल थी वो मुझे कहने के बाद पता लगता, उसे इस साड़ी में देख कौन होगा ऐसा जो डरेगा..ये उसका फ़िदा होने वाला रूप था.मेरे ऐसे व्यंग बाण से वो हमेशा झल्ला जाती थी और काफी गुस्सा दिखाते हुए कहती 'इतना मेहनत लगता है साड़ी पहनने में, तुमको कुछ मालुम भी है?खाली खराब बात करते हो..ज्यादा बोलोगे तो यही फेंक के मारेंगे(उसने अपना बैग दिखाते हुए मुझे कहा).मुझे उससे मार नहीं खानी थी और उसे शांत भी करना था इसलिए ना चाहते हुए भी मुझे उसकी हलकी तारीफ़ करनी पड़ी..वैसे उसे अपनी तारीफ़ दुनिया में सबसे ज्यादा पसंद है तो अगर कभी आपके पास पैसे न हों और आपको समोसे,आइसक्रीम या मिठाइयाँ खानी हो तो आप उसकी दिल खोल के तारीफ़ करें, वो दिल खोल के खर्च करने से पीछे नहीं हटेगी..ये ट्राइड एंड टेस्टेड फोर्मुला है.

उसकी कुछ अच्छी आदतें हैं तो साथ ही बहुत सी बुरी आदतें भी हैं उसमे....उसकी बहुत सी खराब आदतों में एक ये है की कोई भी अगर उससे कुछ पूछता है तो सीधा सा जवाब देने के बजाय पूरा डिटेल में लेकर जाती है उसे.मैं अक्सर उसे कहता की 2मार्क्स वाले सवाल में तुम 20मार्क्स जितना लंबा जवाब क्यों देती हो.उससे उस दिन भी जब मैंने पूछा की आज साड़ी में कैसे आई?कोई खास बात? तो उसने बताया की उसकी कोल्कता वाली एक चाची ने उसे कल ये साड़ी गिफ्ट किया था.लेकिन उसने बात यहीं खत्म नहीं की..किस चाची ने साड़ी गिफ्ट किया ..क्यों गिफ्ट किया..और किसे किसे क्या गिफ्ट मिला..सुबह उसे मंदिर जाना पड़ा था..क्या वजह थी..साड़ी क्यों पहन कर मंदिर गयी..अभी साड़ी पहन क्यों आई..सभी बातें उसने पुरे विस्तार से समझाया.मेरे पास सुनने के अलावा कोई चारा नहीं था, उसे चुप कराने की बात सोच भी नहीं सकता था..मार नहीं खानी थी मुझे इसलिए मैं चुपचाप सुनता रहा.

हमारे तीन और मित्र मिलने आने वाले थे.लेकिन मैंने उन्हें दो घंटे लेट से बुलाया था.लेकिन एक घंटा लेट से आकार इसने मेरी सब प्लानिंग पर पहले ही पानी फेर दीया था.उन तीनो मित्रों में दो इसकी पक्की सहेली थी, और तीसरा हम लोगों का बहुत ही अच्छा दोस्त जो कभी भी उसका मजाक उड़ाने से चुकता नहीं था,लेकिन हमेशा साईड भी उसी की लेता था.हम एक रेस्टोरेन्ट में गये.वहां सबसे आखिरी वाले टेबल में हम बैठे थे.कॉफी आर्डर किया हमने.हमारे मित्र को एक काम से कुछ देर के लिए बाहर जाना पड़ा.जब वो वापस आया तो इसे डराने और चिढ़ाने लगा ये कह कर की "जानती हो जब हम आ रहे तो जो पहला टेबल पर लड़का सब बैठा हुआ है न उसका बात सुने..उ सब कह रहा है तुमको देखकर की ब्लैक-साड़ी वाली तो जबरदस्त दिख रही है..हॉट"...वो तो साधारण  सा मजाक में झल्ला जाती है और ऐसी बातों से वो तो चिढ़ भी गयी और चेहरे से ये भी लग रहा था की थोड़ा डर भी गयी थी(वो बहुत ज्यादा डरती है).जल्दी जल्दी उसने कॉफी खत्म किया और फिर चलने के लिए कहने लगी..बड़ी मुश्किल से उसे कुछ और देर बैठने के लिए राजी किया मैंने.जब हम बाहर जाने लगे तो वो उन लड़कों को देख शेखर के पीछे छिप के चलने लगी.उसने शेखर का सर्ट पकड़ रखा था और उसके पीठ के पीछे अपना चेहरा छुपा लिया था.बाहर निकलने पर हम सब बहुत हँसे और वो हम सब पर चिढ़ रही थी.जब ये पता चला की हमारे शेखर बाबू का ये मजाक था तो बीच सड़क पर वो बेचारे पिटा भी गये उसके हाथों.इसकी पक्की सहेली भी इसका क्लास लेने से नहीं चुकी "इतना बन संवर के चलेगी तो लड़का सब लाईन मारबे न करेगा".

थोड़ी देर बाद वो तीनो दोस्त वापस चले गये.हमारे पास वक्त अब भी था.मैं घर में कह कर आया था की अपने एक दोस्त के घर जा रहा हूँ, उसने भी यही बहाना बनाया था.पास वाले ही एक दूकान में हम गये, जहाँ की उसे चोकलेट आइसक्रीम काफी पसंद थी.जब वो पटना में थी तो अक्सर शाम को कोचिंग के बाद यहाँ आइसक्रीम खाने आया करती थी.तीनो दोस्त के जाने के बाद हमें कुछ और समय मिल गया था बातों का..लेकिन उन तीनो के जाने के बाद मजाक भी खत्म हो गया था.बातों का रुख थोडा गंभीर हो गया..धीरे धीरे गंभीर बातें भी खत्म हो गयीं..दोनों के बीच ख़ामोशी छा गयी थी..वो चुपचाप अपना आइसक्रीम खाने लगी....मैं भी चुप था..मेरी आइसक्रीम कब की खत्म हो चुकी थी..मेरे पास कोई ऑप्सन नहीं था, मैं कभी सड़क के तरफ देखता तो कभी उसकी तरफ.वो लेकिन पूरी तरह आइसक्रीम पर कंसंट्रेट किये हुई थी.वो दुनिया के उन लोगों में से है जो एक आइसक्रीम को खत्म करने में एक घंटा का वक्त लगाते हैं और अंत में ये होता है की आइसक्रीम सॉलिड से लिक्विड फॉर्म में बदल जाती है.

हम वापस वहां आ गये थे जहाँ हमने कार पार्क कर रखी थी.हम दोनों चुप थे.चुप्पी को उसने ही तोड़ा..."चलो एक काम करते हैं, यहाँ से रेस लगाते हैं हाई-कोर्ट तक का..देखते हैं कौन जीतता है?".  मैंने हैरत भरी नज़रों से उसे देखते हुए कहा की यार इतना खतरनाक आईडिया तुमको आता कैसे है?हम तुमसे कभी रेस जीत सकते हैं क्या..तुम ही जीतोगी, इतनी अच्छी ड्राईवर जो हो(वो सड़क पर कितनों को ठोकेगी ये सोच मुझे मजबूरी में उसे ये कहना पड़ा)..उसकी इस बेतुकी चैलेन्ज के वजह से दोनों के बीच की चुप्पी भी टूटी और माहौल भी बहुत हल्का हो गया.वो अपनी गाड़ी में बैठ गयी थी..जाने से पहले उसने मुझे कई हिदायतें दी और कहा की "अरे, आई विल कम बैक अगेन, वेरी सुन और फिर हम बहुत सारा मस्ती करेंगे".

मैं कुछ देर तक वहीँ रहा.फिर वापस घर आ गया.मन उदास था,लेकिन दिखावा जरूरी था की सब कुछ ठीक है, नहीं तो घर में सब बिना बात के परेसान होते.बहनों ने एक फिल्म लगा रखी थी डी.वी डी पर जो सुबह से रिपीट मोड में चल रही थी.मेरे पहुँचने पर उन्होंने फिल्म से ही सम्बंधित कुछ अपने तरीके का यूनिक मजाक किया(उस मजाक में अप्रत्यक्ष रूप से वो शामिल थी,कम से कम उस वक्त मेरा यही ख्याल था).उन लोगों का वो मजाक बहुत हद तक मुझे हल्का कर गया.थोड़ी राहत मिली और अच्छा लगा.ये मजाक उनका जरूरी था,बहुत जरूरी..वरना उदासी से बाहर निकलना उस वक्त तो मुश्किल था मेरे लिए.बहुत देर तक लेकिन आँखों के सामने उसकी वही कही हुई बात घुमती रही..'आई विल कम बैक अगेन".
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