Friday, December 30, 2011

लव इन दिसम्बर (२)

दिसंबर-बारिश-सर्द हवा और चाय--है न एकदम तुम्हारे टाईप का डेडली कॉमबिनेसन...बस एक कोहरे की कमी थी, नहीं तो पूरा सेटिंग वैसा ही होता जैसा की तुम चाहती हो...यही हाल था आज बैंगलोर के मौसम का--कातिल...एक तो वैसे ही तुम्हारी यादों के हरकतों से मैं बड़ा परेसान रहता हूँ..जहाँ देखा नहीं की मैं अकेला हूँ वहाँ पीछे पीछे आ जाती हैं..और खास कर के ऐसे कातिल मौसमों में तो वो मेरे पीछे ही पड़ी रहती हैं....कैसे बताऊँ जब ऐसे कातिल मौसम और तुम्हारी यादों का कॉमबिनेसन साथ होता है तो मेरे लिए कितनी मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं...सच कहूँ तो मैं बहुत इरिटेट सा भी हो जाता हूँ...अरे इन्हें इतनी भी तमीज नहीं की कुछ देर मुझे अकेला छोड़ दे.. ..दोनों हमेशा गलत वक्त पे आ धमकते हैं..अरे हफ्ते भर का थका हुआ था..कल शाम ये सोच के खुश हो रहा था की आज कुछ काम नहीं है और दिन भर आराम करना है...फ़िल्में देखनी है..सोना है...लेकिन इनसे तो मेरी खुशी बर्दाश्त ही नहीं होती न...सुबह सुबह ही एकदम से मुहं उठाये आ गयीं परेसान करने...खैर अब तो कोसने के अलावा मैं और कुछ कर भी नहीं सकता..ना चाहते हुए भी दिन भर इनके साथ पूरा शहर घुमा और तुम्हारी कई बातों को फिर से याद किया....कुछ बातें तो वैसी भी थी, जो मैंने तुम्हे कभी बताई नहीं....याद है तुम्हे, तुमने एक लिस्ट बनाई थी -MY 100 DREAMS AND WISHES..वो लिस्ट कहीं खोयी नहीं थी, उसे मैंने ही तुम्हारे बैग से चुरा कर अपने पास रख लिया था...सोचा की आज तुम्हारी वो सारी ख्वाहिशें पब्लिक कर दूँ..अरे, घबराओ मत..उन सौ विशेज में से मैं 10 सेंसर्ड विशेज पब्लिक करूँगा..देख लो--
तुम्हारी डाई-हार्ड ख्वाहिशें -  
१)तुम्हारा एक डांस शो आयोजित हो और जिसका लाईव टेलीकास्ट पुरे विश्व में हो(जोक ऑफ द इअर)
२)तुम्हे विश्व सुंदरी के खिताब से नवाजा जाए(आई रिअली कान्ट स्टॉप लाफिंग)
३)सलमान के साथ बैठ कर 'मैंने प्यार किया' देखना.(प्योर पागलपन)
४)टाईम मशीन के जरिये पुराने दिनों में जाना..और सलमान खान से मिलना और अपने लैपटॉप पे उसे उसकी भविष्य में आने वाली सारी फ़िल्में दिखाना.(सो वीएर्ड)
५)प्रिजन ब्रेक के सारे सीरीज थीअटर में देखना(स्ट्रेंज विश).
६)मिस्टर इंडिया वाला डिवाइस हथियाना, जो तुम्हे इन्विज़बल बना दे.(व्हाट मोर कैन आई एक्सपेक्ट फ्रॉम यु)
७)'बर्फ घिरी हो वादी में' जैसी कोई जगह जाना और वहाँ रात भर अलाव जला कर आग तापना..गप्पे करना...और लिट्टियाँ सेंकना,पकौड़ियाँ बनाना(जो तुम्हे आता नहीं)
८)मेरे साथ स्विट्ज़रलैंड घूमना और वहाँ के बारिशों में भींगना(रोमांटिक)
९)मुझे स्टेज पे गाना गाते हुए और गिटार बजाते हुए सुनना(नेक्स्ट टू इमपॉसीबल)
१०)किसी बर्फीले पहाड़ी के सबसे ऊँची चोटी पर मेरे साथ बैठना जहाँ चाय का दौर चलता रहे और मैं तुम्हे अच्छी अच्छी कवितायें सुनाता रहूँ(ऑफ कोर्स मेरी सड़ी हुए कवितायें नहीं,बड़े बड़े कवियों की अच्छी कविताएं)
अच्छा सुनो,...तुम जानती हो कभी कभी तो तुम ऐसी बातें कह देती थी और वो भी इतना कॉन्फ़िडेंट होकर की मुझे हमेशा भ्रम होता था की तुम्हे सच में तो भविष्य देखना नहीं आता..याद है तुम्हे जब मैं दूसरे शहर जा रहा था,  नए कॉलेज में दाखिला लेने तो तुमने मुझे दो खत दिए थे..पहले वाले खत में लिखा था -'इसे अभी पढ़ना' और दूसरे वाले में लिखा था -'इसे अपने नए कॉलेज पहुँच कर पढ़ना'.मैंने तो पहले सोचा की वो चिट्ठी भी उसी वक्त पढ़ लूँ, फिर क्या ख्याल आया की उसे पढ़ा नहीं..वहाँ जाने के बाद ही पढ़ा उस चिट्ठी को..पहली लाईन देख कर तो मैं हैरान रह गया था..तुमने लिखा था -"देखो मैं इस चिट्ठी के साथ बहुत सी बारिश भी भेज रही हूँ..जो मेरी कमी तुम्हे महसूस नहीं होने देंगी..देखना तुम वहाँ पहुंचोगे तो ये बारिशें तुम्हारा स्वागत करेंगी, मैंने कहा है इनसे."...  उस दिन वहाँ सही में बारिश हो रही थी और मूसलाधार..तुम्हे पता है पुरे साल वहाँ जबरदस्त बारिश होते रही..यहाँ तक की सर्दियों में भी..वहाँ के लोगों ने भी कहा की यहाँ आजतक इतनी बारिश कभी नहीं हुई.पहली बार ऐसा हुआ है.मुझे तो लगा की तुम्हारी बातों में सच में कोई जादू था, या वो होता न, की जिनका दिल साफ़ और पवित्र होता है, भगवान उनकी कोई भी बात नहीं टालते..वही हुआ होगा..और फिर तुमसे ज्यादा साफ़ और पवित्र दिल की लड़की मेरे नज़र में दूसरी कोई नहीं है.

याद है तुम्हे, वो दिसंबर के ही दिन थे, एक दिन मैं बड़ा परेसान था, और कारण सिर्फ तुम जानती थी....सुबह सुबह ही तुमसे बात हुई थी और तुमने बड़े विश्वास के साथ कहा था की देखना शाम तक तुम्हारा मूड एकदम अच्छा और फ्रेश हो जाएगा.उस दिन शाम में मैं युहीं बहुत देर तक सड़कों पर भटकता रहा, और फिर जब घर आया तो पता नहीं किस ख्याल से अपने एक दोस्त का ब्लॉग पढ़ने लगा..वो उस समय मेरा एकमात्र दोस्त था जो हिंदी भाषा में ब्लॉग्गिंग करता था.उसके लिखे एक पोस्ट ने वहीँ उसी वक्त मुझे उसका इंस्टेंट फैन बना दिया..उसकी बहुत सी बातें बड़ी अपनी सी लगीं, उस लड़के से पहले से दोस्ती थी लेकिन बहुत ज्यादा अच्छी नहीं, और उसका ये रूप तो मेरे लिए एकदम अनजान सा था...याद है न तुम्हे मैंने फोन पर वो पोस्ट तुम्हे पढ़ के सुनाया भी था.उसने उस पोस्ट में लिखा था --"  कुछ दिन पहले उसी शहर में रहने वाला एक मित्र पूछ बैठा था तुम्हारे बारे में, "क्या उसे अब भी याद करते हो?" "  ना !!"  तुरत जबान से निकल पड़ा.. आधे मिनट की चुप्पी के बाद मैंने कहा, "  अब यादों में डूबे रहना जमाने को प्रैक्टिकल नहीं लगता है.. मगर अब भी उसे जब याद करता हूं, तो बहुत शिद्दत से याद करता हूं.."

उस दिन उसकी ये पोस्ट मुझे कितनी पस्संद आई थी, ये मैं आजतक उसे बता नहीं सका.उसकी इस पोस्ट के बाद तो जैसे मैं उसके ब्लॉग का पोस्ट-मार्टम करने लगा.एक के बाद एक कई पोस्ट पढ़ने लगा...उसके ब्लॉगर प्रोफाइल पर भी नज़र गयी तो सामने लिस्ट आई उन ब्लोग्स की जिसे वो उस समय फोलो कर रहा था.युहीं  रैंडमली एक ब्लॉग खोला पढ़ने के लिए.ब्लॉग का नाम बड़ा सुन्दर सा था लेकिन ब्लॉग-लेखिका का नाम तो और भी ज्यादा सुन्दर लगा.उनका और तुम्हारा नाम एक ही था..मुझे अच्छा खासा इंटरेस्ट आने लगा..पोस्ट पढ़ने से पहले मैंने सोचा की एक बार जरा प्रोफाइल खोल के देख लूँ..मैं हैरान रहा गया था..तुम्हारा और उनका नाम ही एक नहीं था, तुम दोनों के शहर भी एक ही थे..उनकी जिस पोस्ट पे सबसे पहले नज़र गयी वो थी एक कविता, एकदम बर्फ जैसी कोमल और अच्छी कविता..जो सर्दियों में एक गर्माहट सी देती हैं..याद है न मैंने तुम्हे ये भी पढ़ के सुनाया था..उनके उस कविता के कुछ लाईन ऐसे थे -
तेरा प्यार भी तो ऐसा ही है, 
बरसता है बर्फ के फाहों सा 
और फिर ...... 
बस जाता है दिल की सतह पर 
शांत श्वेत चादर सा
मुझे ये कविता बहुत पसंद आई थी और तुम्हे भी.मैंने उसी वक्त इस कविता को अपनी डायरी में लिख के रख लिया था.मुझे उस कविता पर बहुत कुछ लिखने को मन कर रहा था, लेकिन एक तो उनसे मैं बिलकुल अनजान था और वो मुझे बड़ी हॉट-शॉट इन्टर्नैशनल लेखिका लग रही थी, तो बिना कुछ कहे वापस चला आया....दोनों के ब्लॉग मैं रात में बड़ी देर तक पढते रहा और मुझे कितना सुकून मिला ये मैं बता नहीं सकता..याद है तुमने ये  कविता सुन कर क्या कहा था : "देखो, मेरे नाम का जादू है सब..मेरे नाम की सभी लड़कियां बड़ी टैलेंटेड टाइप होती हैं और बहुत बहुत ज्यादा फेमस भी बनती हैं"   .इसपर मैंने तुम्हे जवाब दिया था : "इसमें कोई शक नहीं, की तुम्हारे नाम वाली लड़कियां बहुत टैलेंटेड होती हैं, लेकिन इसके साथ साथ तुम्हारे नाम वाली सभी लड़कियां बहुत खूबसूरत भी होती हैं, जैसे की तुम".तुमने बात को दूसरी तरफ मोड़ दिया था और मेरे इस बात का तुमने कोई जवाब नहीं दिया.

जानती हो, वो जो ब्लॉग-लेखिका थीं न, उनसे बाद में बहुत ही अच्छा,खूबसूरत और गहरा रिश्ता बन गया और सबसे कमाल की बात देखो, पिछले दिसंबर के ही वो भी दिन थे की एक शाम वो पुरे मजाक के मूड में थीं और उनके निशाने पे था मैं...उस शाम बातों की शुरुआत तो उन्होंने बड़ी प्यारी प्यारी बातों से की...जैसे मुझसे कहने लगीं की -'मुझे पता दो उसका, मैं समोसे भेजवा दूंगी'...कभी कहती की 'उसे मेरा एड्रेस दे दो..हम दोनों मिलकर तुम्हारी बुराइयां करेंगे' तो कभी कहती की -'तुम भी चले आओ यहाँ, साथ में चाय वाय पियेंगे'..ये प्यारी प्यारी बातें तो बस उनके छोटे मोटे बाण थे, असली छेड़ने वाले बाण तो उन्होंने बाद में छोड़ने शुरू किये जिसका जवाब देना मेरे लिए बड़ा कठिन हो गया था और मैंने भी बातों को दूसरी तरफ मोड़ दिया(कह सकती हो शरमा कर), उनके वो सारे सवाल और बातें अधूरे ही रह गए.
                             .....


ना आमद की आहट और ना जाने की टोह मिलती है
कब आते हो...कब जाते हो ...

ईमली का ये पेड़ हवा में हिलता है तो
ईंटों की दीवार पे परछाईं का छींटा पड़ता है
और जज़्ब हो जाता है, जैसे..
सूखी मिट्टी पे कोई पानी के कतरे फेंक गया हो
धीरे धीरे आँगन में फिर धूप सिसकती रहती है
कब आते हो..कब जाते हो...

बंद कमरे में कभी कभी
जब दिए की लौ हिल जाती है तो..
एक बड़ा सा साया मुझको
घूँट घूँट पीने लगता है..
आँखें मुझसे दूर बैठ के मुझको देखती रहती हैं
कब आते हो...कब जाते हो
दिन में कितनी बार मुझे तुम याद आते हो ..


[गुलज़ार]
                             .....

आते हुए लहरों पे जाती हुई लड़की..



[ हू तू तू - फिल्म का नाम  | तू हू हू हू-हू हा हू - तुम्हारा  वर्जन ] 
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Saturday, December 24, 2011

लव इन दिसम्बर

"मैंने अगर कोई फिल्म बनाई कभी..तो फिल्म जैसी भी बने आई डोंट केअर...फिल्म का नाम अच्छा होना चाहिए...जैसे???? 
लेट मी थिंक..स्वीट दिसम्बर..या लव इन दिसम्बर...या फिर दिसम्बर रोमांस?..?
नहीं नहीं ..अगर कभी मैंने कोई फिल्म बनाया तो उसका नाम होगा 'लव इन दिसम्बर'.हाँ, बस ये नाम...फाईनल!! कितना क्यूट नाम है...देखो तो, नाम से ही प्यार टपक रहा है....एकदम दिसम्बर पे सूट करता है..क्यूंकि दिसम्बर भी तो प्यार का महीना है..".
         ये तुम कहा करती थी...तुम्हे दिसम्बर महीने से प्यार था...मौसमों या फिर किसी खास महीने से प्यार करना तुम्हारे लिए कोई नयी बात नहीं थी..मुझे हमेशा आश्चर्य होता था कि कोई आखिर किसी मौसम या फिर महीने से इस तरह कैसे प्यार कर सकता है? लेकिन तुम करती थी प्यार..बेइंतहा प्यार...दिसम्बर से प्यार करने की तुम्हारे पास वजह भी काफी थी..तुम्हारा जन्मदिन दिसम्बर में, तुम्हारी दादी का जन्मदिन भी दिसम्बर में ही..बड़े दिनों की छुट्टियों में ही तुम पहली बार पटना आई थी और दिसम्बर से ही जाड़े की शुरुआत होती है..गर्मियों को छोड़ बाकी सारे मौसमों और महीनों की तारीफ़ के लिए तुम्हारे पास अलग अलग किस्म के शब्द थे.जैसे दिसम्बर को तुम कहती थी - 'टेन्डर दिसम्बर'..तुम अक्सर कहा करती थी...दिसम्बर इज द मन्थ ऑफ टेन्डरनेस एंड रोमांस.

हमारी दोस्ती भी दिसम्बर के आसपास ही हुई थी और जाड़ों में ही हम पटना की सड़कों पर हद दर्जे की आवारागर्दी किया करते थे.तुम अक्सर कहती थी कि "अगर मैं तुमसे नहीं मिलती, अगर हमारी दोस्ती नहीं हुई होती तो पटना से भी मेरी दोस्ती नहीं हो पाती कभी..ये शहर मेरे लिए हमेशा अजनबी ही रहता". जानती हो, ऐसा तुम सोचती थी.लेकिन सच तो ये है कि पटना शहर से दोस्ती तुमने और मैंने साथ साथ की है.इनफैकट सच कहूँ तो तुम ना रहती साथ तो शायद पटना में रहते हुए भी पटना से मेरी दोस्ती नहीं हो पाती कभी...तुमसे मिलने से पहले तक पटना में रहते हुए भी मैं पटना से उतना ही अनजान था जितनी तुम.

उन दिनों अक्सर मुझे ये सोच कर बड़ा आश्चर्य होता था कि हमारी दोस्ती हुए कुछ ही दिन हुए थे और तुम मेरे साथ पटना घूमने लगी थी..लेकिन ये तुम्हारी पुरानी आदत थी..जो भी व्यक्ति तुम्हे पसंद आ जाता था उससे तुम तुरंत बातें करने लगती थी..और उसे अपना दोस्त बना लेती थी...मुझे कभी कभी तुम्हारी ये आदत थोड़ी अजीब तो लगती थी लेकिन जल्द ही मैं समझ गया था कि तुम लोगों से रिश्ते भी बहुत सोच समझ के बनाती हो..तुम्हारे साथ पटना घूमने के क्रम में कितने नए इक्स्पिरीअन्सेज मुझे हुए हैं..चाहे वो गांधी मैदान में 'ब्रेड रोल' खाना हो या फिर तुम्हारे मोहल्ले में समोसे और पकौडियां खाना...चाय पीने की आदत भी तो एक तरह से तुम्हारी लगाई हुई ही है न...याद है तुम्हे? मैंने एक कंप्यूटर इन्स्टिटूट में दाखिला लिया था तो तुमने भी उसमे एडमिसन ले लिया था, और वो भी बस इसलिए की क्लास हर वीकेंड सुबह सुबह होती थी और वो सर्दियों के दिन थे...तुम्हे सुबह के कोहरे में घर से बाहर निकलने का और रोड किनारे चाचा की दुकान पर चाय पीने का इससे बेहतर बहाना और क्या मिल सकता था?

लेकिन दिसम्बर हमेशा तुम्हारे लिए खुशियाँ लेकर नहीं आया.दिसम्बर के ही दिन थे जो तुम्हारे जिंदगी के सबसे बुरे दिनों में से थे.और शायद तुम्हारे इतने दूर जाने की बात भी दिसम्बर में ही शुरू हुई थी..और यही वो दिन थे जब मुझे पहली बार महसूस हुआ कि तुम अपने आसपास के लोगों को संभालना भी जानती हो...अगर सच पूछो तो दिसम्बर ही वो महीना था जब तुम्हे अपनी जिंदगी के सबसे कड़े इम्तिहान से गुज़ारना पड़ा था..और तुमने बहुत अच्छे से सबकुछ संभाला था..अक्सर होता ये है कि तुम्हारी जैसी लड़कियां जब ऐसे समय से गुज़रती हैं तो वो बड़ी तो हो जाती हैं लेकिन उनकी मासूमियत खो जाती है और वो अचानक एकदम गंभीर सी हो जाती हैं..लेकिन तुम्हारे अंदर की मासूमियत बरक़रार रही...अभी तक वैसी ही सही-सलामत है, या यों कहूँ की वक्त के साथ वो मासूमियत मुझे बढ़ते ही दिखाई देती है.

एक तुम्हारी छोटी सी मासूम आदत थी(या बचपना कह लो)...तुम अक्सर फिल्मों को उनके नाम से पसंद कर लिया करती थी.जिन फिल्मों के नाम तुम्हे अच्छे लगते उन्हें तुम हर कीमत पर देखती थी और जिनके नाम तुम्हे पसंद नहीं आते, वो फिल्म चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, तुम उन्हें नहीं देखती थी...पिछली बार तुम जब आई थी तो मेरे लिए तीन फिल्मों(मेसेज इन अ बोटल, समवेयर इन टाईम और इटर्नल सन्शाइन ऑफ स्पॉटलेस माईंड) की सी.डी लेते आई थी..और मुझसे कहा था.."देखो तो इन फिल्मों के नाम कितने क्यूट से हैं..इन्हें जरूर देखना". मुझे पहले तो बड़ी हंसी आई, लेकिन ताज्जुब तब हुआ जब तीनो फ़िल्में मुझे वाकई अच्छी लगीं.जिस लिफ़ाफ़े में तुमने मुझे ये तीन सी.डी दिया था, उसमे एक खत भी था, जो एक तरह से तुम्हारा आखिरी खत था..बड़ी अच्छी और प्यारी बातें तुमने उस खत में लिखी थी..उस खत में खास कर के एक फिल्म 'इटर्नल सन्शाइन ऑफ स्पॉटलेस माईंड' का तुमने बहुत जिक्र किया था और मेरे लिए उस खत में एक छोटा सा क्विज जैसा भी कुछ था.तुमने पूछा था कि 'इस फिल्म के एक सीन में बैकग्राऊंड में कौन से तीन पुराने हिंदी गाने चल रहे होते हैं?

तुमने लिखा था खत में की -
"पता है इस फिल्म का जो हीरो है उसका नाम 'जोल' और हीरोइन का नाम 'क्लेमेनटाईन' रहता है..दोनों एक बार 'नाईट पिकनिक' पर जाते हैं जहाँ सिर्फ बर्फ ही बर्फ होता है...वो दोनों एक दूसरे का हाथ थामे बर्फ पर ही लेट जाते हैं(सोचो कितना अच्छा लगता होगा!) और जोल कहता है क्लेमेनटाईन से 
'I could die right now..I m just happy...I've never felt that before...I m just exactly where I want to be...कितना रोमैंटिक है न..?सो स्वीट..!!काश हम दोनों भी किसी दिन ऐसे ही 'नाईट पिकनिक' पे जा सकते और पूरी रात बर्फ पर लेटे रहते...पता है इस फिल्म की कहानी क्या है? "जोल और क्लेमेनटाईन दो लवर्स हैं जो दो साल से साथ साथ रह रहे हैं, लेकिन एक बुरी लड़ाई के बाद दोनों अलग होने का फैसला करते हैं.क्लेमेनटाईन साइअन्टिफिक तरीके से जोल से सम्बंधित सभी यादों को हमेशा के लिए मिटा देती है..एक दिन जब जोल उससे मिलने जाता है और वो उसे पहचान नहीं पाती है तो वो बड़ा परेसान हो जाता है.उसे बाद में पता चलता है की उसने उससे जुडी सभी स्मृतियों को हमेशा के लिए मिटा दिया है तो वो भी निश्चय करता है कि वो भी 'क्लेमेनटाईन' से जुडी सभी स्मृतियों को अपने दिमाग से हमेशा के लिए इरेस कर देगा.वो ये साइअन्टिफिक प्रक्रिया शुरू भी कर देता है, लेकिन जैसे जैसे वो अपनी पुरानी स्मृतियों में जाने लगता है(उन्हें मिटाने के लिए) तो उसे अहसास होता है कि 'क्लेमेनटाईन' के साथ बीते हुए समय कितने खूबसूरत थे.वो इस साइअन्टिफिक प्रक्रिया से लड़ने और अपनी स्मृतियों को बचाने की पूरी कोशिश करता है लेकिन एक एक कर के क्लेमेनटाईन से जुडी सभी यादें उसके मस्तिष्क से हमेशा के लिए मिट जाती हैं..सिवाय एक अंतिम स्मृति के कि जब क्लेमेनटाईन जोल से कहती है 'Meet me in Montauk' और वो इसी अंतिम स्मृति को पकड़ के क्लेमेनटाईन को फिर से पाता है.."  वैसे तो कैसे वे दोनों फिर से अजनबी की तरह कैसे मिलते हैं एक दुसरे से वो तुम्हे बड़ा मजेदार लगेगा, बहुत स्वीट!...वो मैं अभी नहीं बताउंगी..तुम खुद देख लेना...
देखो, मेरे कहने का तो मतलब सिर्फ इतना है कि जोल तो पहले शुरू शुरू में बड़ा खुश हुआ था कि वो अपनी स्मृतियों में से क्लेमेनटाईन को हमेशा के लिए मिटा दे रहा है(क्यूंकि क्लेमेनटाईन ने उसे पहले इरेस किया था और उसे लगा ये रिवेन्ज है)...लेकिन प्यार में रिवेन्ज टाईप का कुछ थोड़े न होता है...तो इसलिए उसे धीरे धीरे अहसास हुआ कि वो उससे कितना प्यार करता है और पता है वो बेचारा बहुत कोशिश करता है कि अपनी यादों को बचाए लेकिन सो सैड वो बचा नहीं पाता..I felt very bad about him at that time..But I am happy that movie has a happy ending....
देखो, मैं सिर्फ ये कह रही हूँ तुमसे कि अगर कभी तुम्हे भी लगे कि तुम मुझे भुल रहे हो तो प्लीज हर कोशिश करना की मैं तुम्हारे दिमाग के किसी कोने में घुस के बैठी रहूँ..तुम्हारा तो बड़ा सा दिमाग है..साईड में ही कोई छोटी सी जगह दे देना..लेकिन कभी भी मेरी कोई भी याद को अगर इरेस किये तो देख लेना..मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.

And one more thing...तुम कहते हो न कि मैं इम्पल्सिव हूँ..पता है इस फिल्म में क्लेमेनटाईन भी जोल से यही कहती है कि "You know me..I am impulsive"तो जवाब में जोल कहता है "That's what I love about you"...कितना स्वीट सा डायलोग है न? [[सीखो कुछ..कुछ तो सीखो]]

तुमने जिस बड़े लिफ़ाफ़े में मुझे ये तीनो सी.डी,खत और ग्रीटिंग्स दिए थे...उसके फ्रंट पे इसी फिल्म का टैग-लाईन(शायद) तुमने लिखा था. - 

 "You Can Erase Someone from your mind.Getting them out of your heart is another story......................... .....................samjheyyyy"

और नीचे लिखा हुआ था,
 -  A gift to you by _____- The Vindictive Little Bitch:D 




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Monday, November 28, 2011

चिट्ठी

तुम्हे भूल पाना कब आसान रहा है.जब भी कोशिश करता हूँ नाकाम ही होता हूँ.कोई अपने जिंदगी के सबसे खूबसूरत इग्यारह साल कैसे भुला सकता है, चाह के भी मुमकिन नहीं है.इन इग्यारह सालों में जिंदगी के हर छोटे बड़े फैसलों पर जिस शख्स के सहमति से मुहर लगती थी, उसे भुला पाना  बड़ा ही मुश्किल काम है.कुछ मेरे बहुत ही अच्छे दोस्त हैं, जो मेरी सच में फ़िक्र करते हैं, वो कहते हैं की अब तुम्हे भूल जाना ही मेरे लिए अच्छा है.लेकिन तुम कोई खिलौना तो नहीं, की अगर मेरे से अलग हो गयी तो मैं दिल बहलाने के लिए एक नया खिलौना लेते आऊं और तुम्हे बिलकुल भूल जाऊं? लोग कहते हैं की तुम्हे याद करूँगा, तो मुझे तकलीफ ही होगी.उन्हें मैं कैसे समझाऊं की की तुम्हे याद करने से हमेशा मुझे खुशी ही मिली है.जिस दिन तुम्हारी शरारती और कन्फ्यूज़्ड बातें याद आती है तो चेहरा खुद ब खुद खिल जाता है...उस समय दुःख,दर्द या तकलीफ कहीं आसपास भी नहीं फटकते..वे सुख के पल होते हैं जब मैं खुद को बेहद खुश और हल्का महसूस करता हूँ.
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यहाँ सर्दियाँ शुरू हो गयी हैं..मौसम बड़ा ही खूबसूरत हो गया है, एकदम वैसा ही जैसा की तुम्हे पसंद है.पुरे दिन हलकी बारिश होते रहती है..याद है न तुम्हे, जब भी सर्दियों में बारिश होती थी तो तुम बहुत खुश हो जाया करती थी.तुम्हारी दो फेवरिट जैकेट थी.एक तो वो 'कुछ कुछ होता है' फिल्म से इंस्पायर्ड 'गैप' वाली जैकेट और दूसरी ब्लैक वाली जैकेट जो तुम्हे सबसे ज्यादा पसंद थी.तुम उस ब्लैक जैकेट को अक्सर पहनती थी और कहती थी.."देखो, इसमें मैं कितनी क्यूट लगती हूँ...जस्ट लाईक अ पेन्गुईन".मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था जब बहुत सालों बाद फेसबुक पर तुम्हारी एक फोटो में किसी ने कमेन्ट में लिखा था -'आप बिलकुल पेन्गुईन के जैसी दिख रही हो'.उस समय मैंने सोचा की हो सकता है तुमने उसे ये बात कभी बताई हो और वो बस युहीं तुम्हे छेड़ने के लिए ये कमेन्ट लिख गयी.लेकिन अगर तुमने उसे ये बात कभी नहीं बताई तो तुम्हे खुद उसके उस कमेन्ट पर बेहद आश्चर्य हुआ होगा. 
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हमने एक लिस्ट बनाई थी, बहुत साल पहले.उस लिस्ट में हमने उन सब जगहों के बारे में लिखा था जहाँ हम साथ जाना चाहते थे.उनमे से एक जगह थी "ज़ुरिक".हमने ये तय किया था इन जगहों पर अगर हम जायेंगे तो साथ जायेंगे वरना कभी नहीं जायेंगे..लेकिन एक दफे पटना आने के क्रम में तुम ये वादा तोड़ते हुए ज़ुरिक चली गयी, और वहाँ से तुमने मुझे फोन किया था -"तेरे से किया प्रोमिस तोड़ रही हूँ, बता क्या कर लेगा'..तुमने फोन पर उस समय इतना इरिटेट कर दिया था की मुझे बड़ा गुस्सा आ रहा था और गलती से अगर उस समय तुम सामने  आ जाती तो मेरे पाँचों उँगलियों के निसान तुम्हारे नर्म,गुलाबी, मुलायम गालों पर छप जाते.फिर तुमने मुझे फोन पर सान्तवना देते हुए कहा की इंडिया आते वक्त तुम मेरे लिए वहाँ के चोकलेट लेते आओगी.तुमने अपना वादा तो पूरा जरूर किया लेकिन मेरे लिए बस एक चोकलेट लायी, और उसे मुझे देने के बाद मेरे से छीन कर खुद खा गयी.
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याद है एक दिन सुबह तुमने मुझे बड़ा लंबा ई-मेल किया था और बताया था की तुम्हारे शहर में बहुत बर्फ गिरी थी और शाम में तुम अपनी छोटी बहनों के साथ घर के सामने वाली बेंच पर बैठ के सर्दियों में चोकलेट और आइसक्रीम के डेडफुल कॉम्बीनेसन के मजे ले रही थी.उस दिन मेरे शहर में सुबह से ही बारिश हो रही थी, और मैं बहुत देर तक तुम्हारे मेल के बारे में सोचता रहा.मैं सपने देखने लगा की काश कभी ऐसा हो की मैं तुम्हे बिना बताये, तुम्हारे शहर में आ जाऊं और तुम्हारे घर के बाहर लगी किसी बेंच पर बैठ के तुम्हारे बाहर निकलने का इंतज़ार करूँ.तुम घर से बाहर कदम निकालो और धुप की किरण तुम्हारे चेहरे को धीरे से आकार छुए.मैं दूर से बस तुम्हे देखता रहूँ और फिर तुम्हे खबर किये बिना तुम्हारे पीछे पीछे पूरा शहर घूमता रहूँ, जहाँ भी तुम जाओ.फिर जब शाम में तुम अपनी फेवरिट कॉफी-शॉप में बैठ कर 'मिल्स एंड बन्स' टाईप कोई नॉवेल पढ़ रही हो तो मैं चुपके से तुम्हारे पास आकार तुम्हारे कानों में "आई लव यू" बोल के हल्के से तुम्हारे गालों को चूम लूँ.तुम्हारा इक्स्प्रेशन उस समय बिलकुल तुम्हारे स्टाईल का अपने आप में यूनिक वाला होगा.मैं वो पल महसूस कर सकता हूँ जब तुम 'ओ माई गॉड' चिल्लाकर कुछ पल मेरे तरफ अविश्वास से देखोगी, की क्या ये मैं ही हूँ और फिर मेरे गले लग जाओगी.


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Friday, November 25, 2011

Saturday, October 15, 2011

आई विल कम बैक अगेन

छठ का त्यौहार था.मैं सुबह के अर्घ्य के बाद जल्दी ही घर से निकल गया..उसी कोम्प्लेक्स के सामने खड़ा था, जहाँ हमने मिलना तय किया था.उसने मिलने का वक्त बताया था लेकिन अपनी आदत से मजबूर वो लेट थी, अब तक नहीं आई थी. उसे पटना आये दो हफ्ते हो गये थे और हमारी मुलाकात बस तीन-चार बार ही हो पायी थी.मिलने की खुशी तो थी लेकिन साथ साथ मैं इस बात से उदास भी था की वो कल कोल्कता जायेगी, जहाँ उसे अपने कुछ बचपन के दोस्तों से मिलना था और फिर वहीँ से वो वापस चली जायेगी.हमने इस कोम्प्लेक्स में मिलना तय किया था,इसके पीछे भी एक नादान सी वजह थी.इस कोम्प्लेक्स से हमारा एक पुराना रिश्ता था..वो लगभग हर शाम यहाँ सात रुपये वाली कोल्ड-ड्रिंक जरूर पीती थी..उसे ये पटना का सबसे खूबसूरत दूकान लगता क्यूंकि इसका आकार कोको कोला के बोतल जैसा जो था. अपने याशिका वाले कैमरा से वो कितनी बार इस दूकान का फोटो भी ले चुकी थी.जब हम साथ पढते थे तो हमने ये फैसला किया था की अगर पढ़ाई के लिए हम अलग अलग शहर में चले गये और कभी पटना आना हुआ तो हम इसी जगह मिलेंगे.उस वक्त ये सोचा भी नहीं था की शहर तो क्या, देश भी अलग हो सकते हैं.

उसकी हरी मारुती 800 मुझे बहुत दूर से ही दिख गयी थी.जब गाड़ी थोड़ी पास आई तो मुझे देख बड़ी हैरानी हुई की वो अकेली आ रही है, खुद ड्राईव कर.वैसे उसके ड्राइविंग स्किल को लेकर मैं आश्वश्त था लेकिन फिर भी मुझे सड़क पर चल रहे लोगों के लिए चिंता हो गयी.उसके ड्राइविंग स्किल के प्रति जो मेरी आस्वश्ता थी उसे उसने और मजबूत कर दिया जब उसने गाड़ी पार्क करते वक्त दो साइकिलें गिरा दी थी.लेकिन उसे साइकिल गिरने से कोई फर्क नहीं पड़ा, उलटे उसने सारा इल्जाम साइकिल वालों पर थोप दीया.."लोगों को साइकिल पार्क करना आता नहीं तो चलाते ही क्यों हैं?"

उसे ब्लैक साड़ी में देख मुझे थोड़ा तो आश्चर्य हुआ की आज साड़ी में कैसे आई वो...लेकिन आश्चर्य से ज्यादा मुझे वो बहुत खूबसूरत दिख रही थी.हर बार से ज्यादा सुन्दर..इतनी खूबसूरत वो मुझे पहले कभी नहीं लगी थी.मेरी ये मजबूरी रहती की उसके सामने मैं उसकी तारीफ़ ठंग से नहीं कर पाता था.इन्टरनेट पर भी जब वो फोटो लगाती तो मैं अच्छी तारीफों के बजाय उलटे पुलते कमेन्ट लिखता "दांत काहे दिखा रही है रे","कितना फोटो खिंचवाती है","थप्पड़ मार के भाग जायेंगे".अगर जब कभी उसकी तारीफ़ कर देता तो बाकी के दोस्त मेरा क्लास लेने से भी बाज नहीं आते.वैसे दोस्तों की खिंचाई कमेन्ट न करने की वजह न थी..वो कुछ अलग बात थी, जिसे मैं कभी समझ नहीं पाया.

उस दिन भी उसकी तारीफ़ करने के बजाय मैंने उसपर कुछ व्यंग बाण चलाये थे "किसका साड़ी चुरा के भागी हो रे","करिया साड़ी पहिने हुई है,बच्चा सब देखेगा तो डर जाएगा".ये मेरी बातें कितनी इल-लॉजिकल थी वो मुझे कहने के बाद पता लगता, उसे इस साड़ी में देख कौन होगा ऐसा जो डरेगा..ये उसका फ़िदा होने वाला रूप था.मेरे ऐसे व्यंग बाण से वो हमेशा झल्ला जाती थी और काफी गुस्सा दिखाते हुए कहती 'इतना मेहनत लगता है साड़ी पहनने में, तुमको कुछ मालुम भी है?खाली खराब बात करते हो..ज्यादा बोलोगे तो यही फेंक के मारेंगे(उसने अपना बैग दिखाते हुए मुझे कहा).मुझे उससे मार नहीं खानी थी और उसे शांत भी करना था इसलिए ना चाहते हुए भी मुझे उसकी हलकी तारीफ़ करनी पड़ी..वैसे उसे अपनी तारीफ़ दुनिया में सबसे ज्यादा पसंद है तो अगर कभी आपके पास पैसे न हों और आपको समोसे,आइसक्रीम या मिठाइयाँ खानी हो तो आप उसकी दिल खोल के तारीफ़ करें, वो दिल खोल के खर्च करने से पीछे नहीं हटेगी..ये ट्राइड एंड टेस्टेड फोर्मुला है.

उसकी कुछ अच्छी आदतें हैं तो साथ ही बहुत सी बुरी आदतें भी हैं उसमे....उसकी बहुत सी खराब आदतों में एक ये है की कोई भी अगर उससे कुछ पूछता है तो सीधा सा जवाब देने के बजाय पूरा डिटेल में लेकर जाती है उसे.मैं अक्सर उसे कहता की 2मार्क्स वाले सवाल में तुम 20मार्क्स जितना लंबा जवाब क्यों देती हो.उससे उस दिन भी जब मैंने पूछा की आज साड़ी में कैसे आई?कोई खास बात? तो उसने बताया की उसकी कोल्कता वाली एक चाची ने उसे कल ये साड़ी गिफ्ट किया था.लेकिन उसने बात यहीं खत्म नहीं की..किस चाची ने साड़ी गिफ्ट किया ..क्यों गिफ्ट किया..और किसे किसे क्या गिफ्ट मिला..सुबह उसे मंदिर जाना पड़ा था..क्या वजह थी..साड़ी क्यों पहन कर मंदिर गयी..अभी साड़ी पहन क्यों आई..सभी बातें उसने पुरे विस्तार से समझाया.मेरे पास सुनने के अलावा कोई चारा नहीं था, उसे चुप कराने की बात सोच भी नहीं सकता था..मार नहीं खानी थी मुझे इसलिए मैं चुपचाप सुनता रहा.

हमारे तीन और मित्र मिलने आने वाले थे.लेकिन मैंने उन्हें दो घंटे लेट से बुलाया था.लेकिन एक घंटा लेट से आकार इसने मेरी सब प्लानिंग पर पहले ही पानी फेर दीया था.उन तीनो मित्रों में दो इसकी पक्की सहेली थी, और तीसरा हम लोगों का बहुत ही अच्छा दोस्त जो कभी भी उसका मजाक उड़ाने से चुकता नहीं था,लेकिन हमेशा साईड भी उसी की लेता था.हम एक रेस्टोरेन्ट में गये.वहां सबसे आखिरी वाले टेबल में हम बैठे थे.कॉफी आर्डर किया हमने.हमारे मित्र को एक काम से कुछ देर के लिए बाहर जाना पड़ा.जब वो वापस आया तो इसे डराने और चिढ़ाने लगा ये कह कर की "जानती हो जब हम आ रहे तो जो पहला टेबल पर लड़का सब बैठा हुआ है न उसका बात सुने..उ सब कह रहा है तुमको देखकर की ब्लैक-साड़ी वाली तो जबरदस्त दिख रही है..हॉट"...वो तो साधारण  सा मजाक में झल्ला जाती है और ऐसी बातों से वो तो चिढ़ भी गयी और चेहरे से ये भी लग रहा था की थोड़ा डर भी गयी थी(वो बहुत ज्यादा डरती है).जल्दी जल्दी उसने कॉफी खत्म किया और फिर चलने के लिए कहने लगी..बड़ी मुश्किल से उसे कुछ और देर बैठने के लिए राजी किया मैंने.जब हम बाहर जाने लगे तो वो उन लड़कों को देख शेखर के पीछे छिप के चलने लगी.उसने शेखर का सर्ट पकड़ रखा था और उसके पीठ के पीछे अपना चेहरा छुपा लिया था.बाहर निकलने पर हम सब बहुत हँसे और वो हम सब पर चिढ़ रही थी.जब ये पता चला की हमारे शेखर बाबू का ये मजाक था तो बीच सड़क पर वो बेचारे पिटा भी गये उसके हाथों.इसकी पक्की सहेली भी इसका क्लास लेने से नहीं चुकी "इतना बन संवर के चलेगी तो लड़का सब लाईन मारबे न करेगा".

थोड़ी देर बाद वो तीनो दोस्त वापस चले गये.हमारे पास वक्त अब भी था.मैं घर में कह कर आया था की अपने एक दोस्त के घर जा रहा हूँ, उसने भी यही बहाना बनाया था.पास वाले ही एक दूकान में हम गये, जहाँ की उसे चोकलेट आइसक्रीम काफी पसंद थी.जब वो पटना में थी तो अक्सर शाम को कोचिंग के बाद यहाँ आइसक्रीम खाने आया करती थी.तीनो दोस्त के जाने के बाद हमें कुछ और समय मिल गया था बातों का..लेकिन उन तीनो के जाने के बाद मजाक भी खत्म हो गया था.बातों का रुख थोडा गंभीर हो गया..धीरे धीरे गंभीर बातें भी खत्म हो गयीं..दोनों के बीच ख़ामोशी छा गयी थी..वो चुपचाप अपना आइसक्रीम खाने लगी....मैं भी चुप था..मेरी आइसक्रीम कब की खत्म हो चुकी थी..मेरे पास कोई ऑप्सन नहीं था, मैं कभी सड़क के तरफ देखता तो कभी उसकी तरफ.वो लेकिन पूरी तरह आइसक्रीम पर कंसंट्रेट किये हुई थी.वो दुनिया के उन लोगों में से है जो एक आइसक्रीम को खत्म करने में एक घंटा का वक्त लगाते हैं और अंत में ये होता है की आइसक्रीम सॉलिड से लिक्विड फॉर्म में बदल जाती है.

हम वापस वहां आ गये थे जहाँ हमने कार पार्क कर रखी थी.हम दोनों चुप थे.चुप्पी को उसने ही तोड़ा..."चलो एक काम करते हैं, यहाँ से रेस लगाते हैं हाई-कोर्ट तक का..देखते हैं कौन जीतता है?".  मैंने हैरत भरी नज़रों से उसे देखते हुए कहा की यार इतना खतरनाक आईडिया तुमको आता कैसे है?हम तुमसे कभी रेस जीत सकते हैं क्या..तुम ही जीतोगी, इतनी अच्छी ड्राईवर जो हो(वो सड़क पर कितनों को ठोकेगी ये सोच मुझे मजबूरी में उसे ये कहना पड़ा)..उसकी इस बेतुकी चैलेन्ज के वजह से दोनों के बीच की चुप्पी भी टूटी और माहौल भी बहुत हल्का हो गया.वो अपनी गाड़ी में बैठ गयी थी..जाने से पहले उसने मुझे कई हिदायतें दी और कहा की "अरे, आई विल कम बैक अगेन, वेरी सुन और फिर हम बहुत सारा मस्ती करेंगे".

मैं कुछ देर तक वहीँ रहा.फिर वापस घर आ गया.मन उदास था,लेकिन दिखावा जरूरी था की सब कुछ ठीक है, नहीं तो घर में सब बिना बात के परेसान होते.बहनों ने एक फिल्म लगा रखी थी डी.वी डी पर जो सुबह से रिपीट मोड में चल रही थी.मेरे पहुँचने पर उन्होंने फिल्म से ही सम्बंधित कुछ अपने तरीके का यूनिक मजाक किया(उस मजाक में अप्रत्यक्ष रूप से वो शामिल थी,कम से कम उस वक्त मेरा यही ख्याल था).उन लोगों का वो मजाक बहुत हद तक मुझे हल्का कर गया.थोड़ी राहत मिली और अच्छा लगा.ये मजाक उनका जरूरी था,बहुत जरूरी..वरना उदासी से बाहर निकलना उस वक्त तो मुश्किल था मेरे लिए.बहुत देर तक लेकिन आँखों के सामने उसकी वही कही हुई बात घुमती रही..'आई विल कम बैक अगेन".
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Saturday, August 6, 2011

तुम बिन

दो तीन दिनों से जबरदस्त मूड स्विंग हो रहा है.जब कभी लगता है की मन बहुत दुखी है, ठीक उसी समय कहीं से कोई एक सपोर्ट सिस्टम आ कर मन को वापस अच्छे मुड में लेते आता है.दो दिनों से ये सपोर्ट सिस्टम खत,फिल्म,गानों या फिर टेडी के फॉर्म में सामने आ रहे हैं.रह रह कर कुछ पुरानी बातें, कुछ पुरानी तारीखें याद आती हैं, जिससे ऑटोमैटिक्ली चेहरे पे एक मुस्कान आ जाती है.फिर जब ये लगने लगता है की मन बहुत खुश है, तब पता नहीं कहाँ से कुछ उदासी के बादल सामने आ जाते हैं.पूजा जी ने एक बार जो लिखा था वो भी याद आता है - "होता है न जब आप सबसे खुश होते हो...तभी आप सबसे ज्यादा उदास होने का स्कोप रखते हो".दो दिनों से मेरे साथ ऐसा ही हो रहा है, जब तुम्हारी कोई भी बात याद आ रही है तो मन खुश हो जा रहा है, लेकिन ठीक थोड़े समय में ही कुछ और जुड़ी बातें याद आने से गहरे उदासी में चला जा रहा हूँ..फिर धीरे से कोई एक सपोर्ट सिस्टम आकार मुझे उस उदासी से खिंच ला रही है..दो दिनों से ये सिलसिला चलते आ रहा है.

उस दिन की भी सभी बातें एक एक कर के याद आ रही हैं.ठीक उसी सिरीअल में जैसा की उस दिन हुआ  सैंडविच-अ टेंडर अफेअर,पुस्तकम,लक्ष्मी कोम्प्लेक्स,ऑटो,अपना बाजार और फिल्म."apprepound" शब्द भी अच्छे से याद है..ये भी की कितनी बार कब कब तुमने इस शब्द का इस्तेमाल कैसे किया था..और ये भी की लाख पूछने पे तुमने इसका अर्थ नहीं बताया था.या फिर ये हो सकता है की तुम्हे खुद ही मालुम न हो, ऐसा कोई शब्द का कोई अस्तित्व ही न हो, उन शब्दों में से एक शब्द को जिसका आविष्कार तुमने किया था. 

कैल्गरी, कनाडा का एक शहर..पता नहीं कब से ज़ेहन में बसा हुआ है..वो भी बस उस एक फिल्म के कारण जिसे जब भी देखता हूँ तो न जाने मैं यादों के किन गलियारों में चला जाता हूँ.हम प्लान बनाया करते थे की एक दिन उस शहर में जायेंगे और उस गिफ्ट स्टोर का नाम खोज वहां से मैं तुम्हारे लिए ठीक वैसा ही कुछ तोहफा खरीदूंगा और फिर क्रिसलर के उसी कन्वर्टबल मॉडल(जो फिल्म में था) से उस नदी किनारे जायेंगे.कल ही रात वो फिल्म फिर से देखा मैंने..रिपीट मोड में-  तुम बिन..

अर्थ भी कितना सही है फिल्म का..ये गाना अंदर तक मुझे झकझोर देती है.लेकिन फिर भी लगता है की इसे सुनता रहूँ, लगातार..



..और मौका तो देखो, कल फ्रेंडशिप डे भी है!!

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Sunday, July 3, 2011

काश

तुम खुश हो जाया करती थी
मेरी हर छोटी से छोटी बातों पर
मेरी बेतुकी कवितायों की भी तुम
तारीफें करती नहीं थकती थी
मेरी लिखी हर कविताओं में
छवि तुम्हारी होती थी
और तुम उन कविताओं को
सहेज कर अपने पिंक कलर के
डायरी में लिख लेती थी
काश, की उन कविताओं की तरह
मैं तुम्हे भी कहीं सहेज के रख पाता

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Friday, June 24, 2011

बारिश की बुँदे

बारिश की बुँदे
तुम्हारे चेहरे पे
बड़ी दिलकश लगती थी
बारिशों के मौसम में
सोंधी मिटटी की महक
और हलकी मद्धम बहती हवा
तुम्हे पागल बना देती थी
तुम अक्सर खो जाया करती
किन्ही ख्यालों में
दुनिया को भूल जाती थी
रूमानी हो जाती थी तुम
बारिशों में भींगना,
हथेलियों में बारिश की बूंदों को
कैद करने की नाकाम कोशिशें करना
घास पे गिर रहे बूंदों को
एकटक देखते रहना
और फिर नंगे पांव ही घास पे दौड जाना
तुम्हारे प्रिय शौक थे.
वाटरलोगिंग में घुटने तक पानी में
चल के जाना, नाव तैराना,
गर्म भुट्टे और 'चंदू के दूकान' की
पकौडियां खाना
तुम्हे बहुत पसंद था
बादलों को देख के तुम कहती -
ये बादल मेरे दोस्त हैं
मुझसे मिलने आते हैं
ये फुहार मुझे जिद कर के
पास बुलाते हैं
भीगने और नाचने के लिए
बारिशों में दिल खुश रहता है
ख्वाहिशें पूरी होती हैं
बारिशें बहुत खूबसूरत होती हैं.

तुम्हारी इन बातों को सुन
मैं भी मन ही मन कहता
हाँ, बारिशें बहुत खूबसूरत होती हैं,
बिलकुल तुम्हारी तरह.

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Monday, April 18, 2011

कुछ टुकड़े डायरी के पन्नों से

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सच, मैं अब तुम्हे याद करना नहीं चाहता..तुम्हे भूलने की हर कोशिश करता हूँ, लेकिन फिर भी तुम याद आती हो.तन्हाई में, जब अकेले होता हूँ(आजकल अकेले ही अधिकतर रहता हूँ) तो बस पांच लोगों का ख्याल आता है, जिसमे से एक तुम भी हो.मैं नहीं चाहता की तुम अब ख्यालों में भी आओ, लेकिन क्या मेरे ख्यालों पे मेरा बस है?तुम ही कहो..कैसे तुम्हारी हर बातों को एकाएक एकदम से भूल जाऊं.अब ना तो मैं किसी से तुम्हारा जिक्र करता हूँ और न कोई तुम्हारी बातें करते हैं.जो करीबी हैं वो अब तुम्हारा नाम तक नहीं लेते मेरे सामने, लेकिन अनजान लोग कभी पूछ ही देते हैं तुम्हारे बारे में.मैं उस समय बड़ा कशमकश में फंस जाता हूँ, की क्या कहूँ उनसे? सारी बातें, बेमतलब हैं किसी को भी बताना..बता भी दूँ तो होगा क्या??क्या बताने से तुम वापस आ जाओगी? मैं बस ऐसे लोगों के प्रश्नों को मजाक में टाल देता हूँ.क्यूंकि अगर एक प्रश्न का जवाब दिया तो सैकड़ों प्रश्न और खड़े हो जायेंगे और मुझे सब सवालों के जवाब देने पड़ेंगे.

**
कल युहीं तुम्हारे प्रोफाइल को बड़े गौर से देख रहा था.पहले कैसे तुम्हारा प्रोफाइल हमेशा चहका चहका सा दीखता था..तरह तरह के स्टेट्स, पागलपन वाले, बच्चों वाले,अजीब से बेवकूफियों वाले स्टेट्स और उन सब बेमतलब बेवकूफियों वाले स्टेट्स पे ढेरों कमेन्ट.लेकिन अब वही प्रोफाइल तुम्हारा एकदम बेरंग हो गया है.शायद जिन लोगों के वजह से तुम्हारे प्रोफाइल में वो रंगत थी, वो भी अब कशमकश में फंस जाते होंगे की क्या लिखें तुम्हारे प्रोफाइल पे, क्या कमेन्ट करें? ये वही लोग हैं जो तुमसे और मुझसे ऐसे जुड़े हुए हैं की मेरी और तुम्हारी कोई भी बात इनके जिंदगी पे असर डालती है.इनमे से एक से जब इस बार दिल्ली में मिला तो मैं समझ गया था की वो तुम्हारे बारे में कुछ पूछना चाह रही थी, उसकी आँखों में मैंने वो सवाल देखें थे,उसने इशारों में पूछा भी था..मैं उस मौके को गमगीन नहीं बनाना चाह रहा था इसलिए मैंने भी बस इशारों में उसे जवाब दे दिया.कल बहुत दिल किया की तुम्हे अपने फ्रेंडलिस्ट से अलग कर ही दूँ, लेकिन चाह के भी मैं "अनफ्रेंड" वाले ऑप्सन को क्लिक नहीं कर पाया, पता नहीं क्यों.

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आज शाम बहुत मस्त बारिश हुई, ठंडी हवा चल रही है, और ऐसे में तुम याद न आओ ये तो नामुमकिन है.बारिशों में तुम और भी याद आती हो.तुम्हे बारिश दीवानगी की हद तक प्यारी थी.उन दिनों तुम्हे बारिशों में भीगना, घुटने तक पानी से गुजरना और अपने कम्पाउंड में नाव चलाना बहुत पसंद था.तुम अक्सर बारिशों में रूमानी हो जाया करती थी और कभी कभी कुछ ऐसी बातें भी कर देती थी जो मुझे हद हैरान कर जाया करती थी.
आज सुबह से कुछ ऐसी बातें हो रही थी, जिससे अनजाने ही तुम्हारा ख्याल ज़हन में आ जा रहा था.शाम मौसम ने करवट ली और आकाश में बादल छा गए, ऐसे में मेरा घर में रहना तो मुमकिन नहीं था, अपना आईपोड उठाया और निकल गया सड़कों पे.कुछ ही देर में झमाझम बारिश होने लगी.मैं बगल वाले बस स्टैंड के तरफ बढ़ा, जहाँ मैं अक्सर शाम को बैठा करता हूँ.आईपोड पे गाने चल रहे थे और मैं बस बारिश देख रहा था.अभी बारिश रुकी भी नहीं थी की पता नहीं किस ख्याल में खोये हुए बारिश में ही चलने लगा.भींगते हुए घर पंहुचा.पूरी शाम तुम्हारी बहुत याद आई.
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Thursday, March 17, 2011

तुम्हारे खत



रात कुछ काम से एक पुराना फ़ाइल फोल्डर खोला, मकसद तो था एक गुम हुआ रसीद ढूँढना...लेकिन फोल्डर खोलते ही तुम्हारे खतों पे नज़र चली गयी, जिसे मैंने बड़ा ही संभाल के उसी ब्लू रंग के पोलिथिन में रख दिया था,जिसमे तुमने एक टेडी बीअर मुझे गिफ्ट किया था.कुछ तेईस खत होंगे तुम्हारे, जो किसी भी तरह से अभी तक पुराने नहीं हुए..न कहीं से फटे हैं..अब भी लगता है की जैसे कुछ देर पहले ही तुमने वो खत लिख मुझे थमाया था..तुम्हारे लम्स की गर्माहट अब तक उन खतों में है.

याद है तुम्हे..तुमने मुझे दो लेटर पैड खरीद के दिए थे और दोनों में से तुमने कुछ चार पांच पन्ने फाड़ लिए थे...ये कह कर की तुम उन पन्नों में मुझे खत लिखोगी.तुम्हारे दिए वो दो लेटर पैड अब तक मेरे पास सही सलामत रखे हुए हैं.मैंने एक भी पन्ना खर्च नहीं किया.वो जो गुलाबी रंग का एक लेटर पैड था न, उससे अभी कुछ दिन पहले ही एक बहुत ही शुभ काम हुआ है.मुझे ये सोचकर बेहद खुशी हुई की अब भी तुम किसी न किसी तरह से मेरी मदद कर ही दिया करती हो.

तुम्हे खत में गाने लिखने की बीमारी थी....तुमने मुझे पहला खत कब लिखा था ये याद है न तुम्हे? चार पन्नों का वो खत था, जिसमे से दो पन्ने गानों से भरे पड़े थे.पहले पन्ने पे बड़े ही प्यार से तुमने एक गाने के दो लाईन लिखे थे -

"आँखों में कुछ आँसू हैं कुछ सपने हैं..आँसू और सपने दोनों ही अपने हैं..
दिल दुख है लेकिन टुटा तो नहीं है...उम्मीद का दामन छुटा तो नहीं है"

और गाने के इन दो लाईनों के बाद तुमने तरह तरह की बातों से मुझे समझाने की कोशिश की थी की बुरे दिन हमेशा नहीं रहते..असफलताओं से हमें घबराना नहीं चाहिए, उनका सामना करना चाहिए..मुझे उस वक्त बड़ी हंसी आ गयी थी जब मैंने तुमसे पुछा था की ये सब बातें तुमने खुद से लिखीं हैं? और फिर तुमने बड़े ही मासूमियत से जवाब दिया था की "मेरे पास इतना दिमाग कहाँ..ये सब तो मैंने अपनी दीदी से लिखवाया है..पढाई के लिए जब मैं दुसरे शहर जा रहा था तब भी तुमने मुझे एक ख़त लिखा था , उस ख़त के आखिर में भी दो गानों के कुछ लाईन थे, जिसे तुमने थोड़ा सा मोडीफाई किया था..
"आओ न आओ न, मेरे पास आओ न दोस्ती के रास्ते, आकर महकाओ न..
तुम जैसा कोई नहीं है, ये तुम नहीं जानते तुम हो तो स्वर्ग यहीं है, ये तुम नहीं जानते..."
और गाने के इन लाईनों के ठीक बाद तुमने लिखा था -
"रहे चाहे दुश्मन ज़माना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा.."
ये दोनों गानों को मैंने कितनी ही बार सुना है, लेकिन तुम्हारे ख़त में इसे पढने के बाद पता नहीं क्यों उस वक्त मेरे आँखों में आँसू आ गए थे.

उन दिनों तुम्हे अंग्रेजी में खत लिखने का बुखार चढ़ा था..और तुम्हारी वो अंग्रेजी पढ़ अक्सर मैं हँसने लगता था.मैं तुम्हे कहता भी था की क्या जरूरत है अंग्रेजी में ख़त लिखने की..समझने में दो घंटे लगते हैं...तुम कहती इस बात पर की अच्छा ही है न, मेरी तरह तुम्हारी अंग्रेजी भी परफेक्ट हो जायेगी....स्ट्रोंग हो जायेगी(और उस समय तुम्हारी अंग्रेजी कितनी स्ट्रोंग थी ये मैं अच्छे से जानता था).अंग्रेजी के शब्दों के साथ इक्स्पेरिमेंट करना तुम्हे बहुत ज्यादा पसंद था. कोई भी नए शब्द तुम कहीं देख लेती तो उसे सीधा अपने खत में इस्तेमाल कर लेती थी..ये जाने बिना की उसका मतलब क्या होता है..तुम अक्सर अंग्रेजी के नए नए शब्दों का अविष्कार ही कर लिया करती थी...

"apprepound" शब्द याद है न तुम्हे? ये भी उन शब्दों में से एक था जिसे तुमने ईजाद किया था...लगभग हर ख़त में जगह जगह तुम इस शब्द को अलग अलग तरीकों से इस्तेमाल करती थी...मेरे लाख पूछने पर भी तुमने इसका अर्थ मुझे नहीं बताया था.एक बार मैंने तुमसे कहा था जब की apprepound नाम के किसी शब्द का अस्तित्व नहीं है तो तुम मुझसे लड़ बैठी थी.दो दिन तुम मुझसे रूठी रही थी...इस तरह की बेतुकी हरकत तुम अक्सर किया करती थी, इसलिए मैंने कभी दोबारा तुम्हारे द्वारा इजाद किये गए शब्दों का मतलब ही नहीं पूछा...तुम्हे नाराज़ करना मैं अफोर्ड नहीं कर सकता था न...लेकिन कभी कभी तुम अंग्रेजी में ही कुछ बेहद अच्छे कोटेसन भी लिख भेजती थी, और तब मैं ये सोचने पर मजबूर हो जाता था की तुम्हारे पास भी दिमाग है...तुमने एक ख़त में लिखा था


"Never frown, even if you are sad because, you never know who is falling in love with your smile"

कॉलेज में जो तुम्हारी पहली चिट्ठी मुझे मिली थी..उसमे भी बहुत अच्छी अच्छी बातें तुमने लिखी थी....एक कोटेसन जो की मुझे बेहद पसंद आया था और जिसे मैंने तुम्हारे ही गिफ्ट किये हुए नोटपैड में बड़े बड़े अक्षरों में लिखकर अपनी मेज के ठीक सामने वाली दिवार पर चिपका दिया था...वो कोटेसन था -


"There was something special in the air, may be it was magic and there was something in your voice when you use to call my name..there was moment in my life that i can still remember and there are places in my heart that I can't forget."
तुम्हारे ही खतों में एक बार मुझे एक कविता मिली थी, और मैं बहुत दिन इस भ्रम में रहा की वो कविता तुमने खुद से लिखी है...तुमने कविता के नीचे अपना नाम जो लिख दिया था..वैसे तो मुझे यकीन था की तुमसे कवितायें हो ही नहीं सकती, लेकिन फिर कभी कभी लगता तुम्हारा शहर लन्दन काफी मैजिकल सा शहर है, कुछ भी मुमकिन है...हो सकता है तुम कवितायेँ लिखना शुरू कर दी हो वहां जाकर...ये तो बाद में मालुम चला की तुम मुझे 'इम्प्रेस' करने के लिए कविता के नीचे अपना नाम लिख दी थी...वो कविता थी - 

"The angels won't gave wings to me. they will to you..they will set you free..
I might change my belief someday,and I will proove myself to you...
You'll see the truth deep into my eyes,you'll know then these words are true..
And someday soon I'll realise,My luck to have a friend like you".

तुम्हारी चिट्ठियों में मुझे अक्सर ये नज़र आता था की बचपना अभी तक तुममे कायम है..चिट्ठी में बहुत सी तुम ऐसी बातें लिख दिया करती थी जिसे पढ़ मैं बहुत हँसता था, और यकीन मानों मैं जब भी परेसान होता तो तुम्हारी उन चिठियों को पढने लगता जिसमे तुम बहुत सी 'इललॉजिकल' बातें लिखती...उन्हें पढ़कर मैं किसी भी मूड में रहूँ, हंसी खुद ब खुद चेहरे पर आ जाती थी...जैसे तुम्हारी इस झेलू शायरी पर हंसी आई थी मुझे....

"आपको मिस करना रोज की बात है...याद करना आदत की बात है..
आपसे दूर रहना किस्मत की बात है..मगर आपको झेलना हिम्मत की बात है "..

इस शायरी के बगल में तुमने एक गन्दा सा कार्टून चिपका दिया था,जो की पता नहीं किस एंगल से तुम्हे इतना क्यूट दीखता था...कार्टून के स्टिकर के नीचे तुमने cutieee लिख रखा था.एक कोई फ़ालतू सा बिना सर पैर वाला जोक भी तुमने लिखा था...जो मुझे बहुत देर के बाद समझ में आया था, और जिसपर मुझे हंसी भी नहीं आई थी....उन दिनों खत में जब तुम कभी बहुत ज्यादा सीरिअस बातें लिख देती तो मुझे हंसी आ जाती थी(सीरिअसली), और मैं तुमसे कहता भी था की तुमपे ये सीरिअस टाईप बातें सूट नहीं करती..बचपना करते अच्छी दिखती हो..समय के साथ तुम्हारी सोच बढ़ने लगी, लेकिन वो बचपना तो अब तक कायम ही है.थोड़ा कम हुआ है, लेकिन है तो अब भी.

वैसे तो मुझे पुराने दिनों में पहुचाने के काफी रास्ते हैं...लेकिन सबसे अच्छा,आसान  रास्ता तुम्हारे ये तेईस खत ही हैं, जिसे पढ़ते मुझे लगता है की मैं फिर से उन्ही दिनों में पहुँच गया हूँ जब मैं तुम्हारे साथ घूमता था..तुम्हारे करीब था..तुम्हारे पास था.उस समय मेरी क्या भावनाएं थी तुम्हारे प्रति ये तो नहीं पता लेकिन तुम्हारी मासूम सी हंसी दिल को अजीब सा सुकून देती थी..तुम हँसती थी, नौटंकियां करती थी,बचपना दिखाती थी तो मुझे अच्छा लगता था..तब मैं खुश रहता था.अब तुम नहीं हो मेरे साथ..मेरे पास..लेकिन तुम्हारे ये खत अब भी मेरे पास हैं,जिसे मैंने एक अमानत के जैसे संभाल के रखा है.

कुछ आज से पांच साल पहले तक तुम्हारे लिखे खत मुझे मिलते रहे..अब नहीं मिलते तुम्हारे खत मुझे..ये एक तरह से अच्छा भी है..क्यूंकि तुम्हारे खत पढ़ के मैं उन रास्तों पे चलने लगता हूँ जहाँ खुद को तुम्हारे और करीब पाता हूँ..जहाँ तुम और ज्यादा मेरे अंदर बस सी जाती हो..लेकिन शायद अब समय है की उन रास्तों पे आगे न बढूँ..तो ऐसे में ये अच्छा ही है की तुम्हारे खत नहीं मिलते हैं मुझे अब.

यादों में डूबे डूबे कब सुबह के चार बज गए पता ही नहीं चला...बाहर तो अभी अँधेरा है, लेकिन हवा तेज बह रही है....ये हवा वैसी ही है जैसे उन दिनों के वसंत में बहती थी..क्या तुम्हारे शहर में भी ऐसी ही हवा बह रही है?

ये गाना उस समय हम दोनों की पसंद थी न..इस मौसम में ये गाना कमाल करती है - 




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