Sunday, December 12, 2010

मीना कुमारी की शायरी - पार्ट ३

न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन,
बड़े करीब से उठकर चला गया कोई..



मीना कुमारी जी कि कुछ शायरी आप पहले के दो पोस्ट में पढ़ चुके हैं.आज देखिये मीना कुमारी जी कि दो और शायरी, और सुनिए उन्ही कि आवाज़ में.
Mp3 फ़ाइल के लिए नीरज जी को धन्यवाद, जिन्होंने मुझे ई-मेल किया था.


हमशाख 

मेरा माजी
मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ
यह कि साँसों कि तरह मेरे साथ चलता रहा
जो मेरी नब्ज़ की मानिंद मेरे साथ जिया
जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे
अपनी संगलाख उँगलियों से गहरा करते रहे, करते गए
किसी कि ओ़क पा लेने को लहू बहता रहा
किसी को हमनफस कहने कि जुस्तुजू में रहा
कोई तो हो जो बेसाख्ता इसको पहचाने
तड़प पे पलटे, अचानक से पुकार उठे
मेरे हमशाख..मेरे हमशाख
मेरी उदासियों के हिस्सेदार
मेरे अधूरेपन के दोस्त,
तमाम दर्द जो तेरे हैं
मेरे दर्द तमाम
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों से
तू एक मस्जिद-ए-वीरां है, मैं तेरी अजां
अजां जो
अपनी ही वीरानगी से टकरा कर
ढकी छुपी हुई बेवा ज़मीं के दामन पर
पढ़े नमाज खुदा जाने किसको सजदा करे

(संगलाख - लोहा , ओ़क - चुल्लू ,  हमनफस-साथी)

इसी नज़्म को सुनिए यहाँ -


मौत और मोहब्बत 

ये नूर कैसा है
राख का सा रंग पहने
वर्फ कि लाश है
लावे का सा कफ़न ओढ़े
गूंगी चाहत है
रुसवाई का कफ़न पहने
हर एक कतरा मुक़द्दस है मैले आंसू का
एक हुजूमे अपाहिज है आबे-कौसर पर
यह कैसा शोर है जो बेआवाज़ फैला है
रुपहली छांव में बदनामियों का डेरा है
यह कैसी जन्नत है जो चौंक चौंक जाती है
एक इन्तजारे-मुजस्सम का नाम -ख़ामोशी
और एहसासे-बेकराँ पे यह सरहद कैसी?
दर-ओ-दीवार कहाँ रूह कि आवारगी के
नूर कि वादी तलक लम्स का इक सफरे-तवील
हर एक मोड़ पे बस दो ही नाम मिलते हैं
मौत कह लो - जो मोहब्बत नहीं कहने पाओ.

इसे नज़्म को यहाँ सुने -



(मुक़द्दस -> पावन , हुजूमे अपाहिज->अपाहिजो का समूह, आबे-कौसर -> कौसर नाम कि एक नदी है जन्नत कि, इन्तजारे-मुजस्सम -> साकार प्रतीक्षा, एहसासे-बेकराँ ->अथाह अनुभूति, सफरे-तवील->लंबी यात्रा )

मुहब्बत 

मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे अपने जिस्म के रोएं रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है जिसके रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके आहिस्ता आहिस्ता दूर दूर
पुर सुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम ज़ंजीरों की तरफ लिये जा रहे हों
वह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह रहकर चमकते दिखाई देते हैं
हमारी गुफ़्तगू की ज़बान
वही है जो
दरख़्तों, फूलों, सितारों और आबशारों की है
यह घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आँसु छोड़ जाती है, महबूब
आह
मुहब्बत!