Friday, December 31, 2010

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यादों में एक दिन (३) : न्यू इयर

वे दिन उसके जिंदगी के सबसे बुरे दिन थे.वो बेहद उदास थी.दो महीने हो आये थे और मुझे दूर दूर तक उसके चेहरे पे वो मुस्कुराहट नहीं दिख रही थी जो की पहले हुआ करती थी.मुस्कुराती तो वो अब भी थी, लेकिन एक डुप्लिकेट मुस्कराहट की झलक साफ़ दिखती थी.वे दिन जितने उसके लिए खराब थे, उतने मेरे लिए भी खराब थे.तीन हफ्ते हो गए थे उससे मिले हुए और उससे ना मिल पाने से थोड़ा सा बेचैन तो मैं था ही.उसकी फ़िक्र भी लगी रहती थी.उसने अपना जन्मदिन भी नहीं मनाया था..मनाती भी कैसे? स्मिता दी को गए अभी कुछ ही दिन तो हुए थे.बहुत रिक्वेस्ट करने के बाद एक जनवरी को वो मिलने आने के लिए राजी हुई.

एक जनवरी को घर से निकलना थोड़ा तो मुश्किल रहता है, लेकिन ऐसा भी कुछ नहीं था की मैनेज नहीं हो पाता.अब उससे मिलने जा रहा हूँ,घरवालों को ये तो बता नहीं सकता था..कैसे रखता अपने रिश्ते की परिभाषा घर वालों के सामने..सिर्फ ये कह देता की वो मेरी अच्छी दोस्त है और मैं उसका ख्याल रखता हूँ(कुछ ज्यादा ही)?एक लड़का और लड़की के बीच इस तरह का सम्बन्ध..घरवाले जरा भी देर नहीं लगाते ये सोचने में की वो मेरी प्रेमिका है, जब की ऐसा कुछ तो उस वक्त नहीं था और जो था वो मैं किसी को समझा नहीं सकता था..इसलिए अपने दोस्त प्रभात के नाम का सहारा लिया घर से निकलने के लिए.

उसने तीन बजे मिलने को बुलाया था.मैं आधे घंटे पहले ही पहुँच गया था.घर में मुझसे रहा नहीं जा रहा था.जब से तीन बजे मिलने का समय फिक्स हुआ था, उस समय से मेरे अंदर एक अजीब उथल पुथल चल रही थी, अजीब बेचैनी सी थी..वो बेचैनी या उथल पुथल क्यों थी ये मैं न उस समय समझ पाया था और न अब समझ पाया हूँ.मैं एकटक से रास्ते पे नज़रें लगाए बैठा था..बीच में मेरी नज़रे थोड़ी इधर उधर होने लगी.कभी आर्चीस गैलरी की तरफ देखता, तो कभी सामने बैठे कुछ स्कूल के लड़के और लड़कियों को.अचानक मेरा कोल्ड ड्रिंक्स पीने का दिल करने लगा. फिर तुरंत ये ख्याल आया की पॉकेट में सिर्फ 20 रुपये ही हैं.ये 20 रुपये मैंने उसके लिए बचा के रखे थे, क्यूंकि मुझे पता था की उसे सैंडविच की पेस्ट्री और समोसे कितने पसंद हैं.वहीँ खड़े खड़े मैं पॉकेट को एक बार फिर से चेक करता हूँ ये कन्फर्म करने के लिए की वो रुपये मैंने लाये तो हैं न.मैं एकाएक उन रुपये के गुम हो जाने,गिर जाने या चोरी हो जाने के सोच से डर जाता हूँ और फिर उन रुपये को पैंट के पीछे वाले पॉकेट से निकाल सर्ट के पॉकेट में रख लेता हूँ.रोड की तरफ मेरी नज़रें फिर से लग जाती हैं.कभी कभी मैं पता नहीं किस ख्याल में गुम हो जाता हूँ.अक्सर मेरे साथ ये होता है की मैं किस ख्याल में गुम हो जाता हूँ ये मुझे कभी पता ही नहीं चलता, बहुत देर के बाद ये अहसास होता है की मैं किसी एक चीज़ को एकटक से देखे जा रहा हूँ बिना किसी उद्देश्य के या बिना किसी सोच के.उस दिन भी मैं आर्चीस गैलरी के पास ही खड़ा था और उस दूकान के दरवाज़े के तरफ देख रहा था.लोग तेजी से उस दरवाजे को धक्का दे के अंदर चले जाते और वो दरवाज़ा खुद ब खुद बंद हो जाता.लोग जितनी तेजी से उस दरवाज़े को धक्का देते, वो उतना धीरे से बंद होता.दूकान में एक बड़ा सा टेडी बीअर हमेशा दीखता था मुझे, लेकिन आज पता नहीं क्यों मुझे वो टेडी बड़ा ही क्यूट दिख रहा था और मुझे एकाएक मन करने लगा उसे खरीदने का.मैं उसी टेडी को देख रहा था की पीछे से वो आई और धीरे से उसने मुझे आवाज़ दिया.मैं एकदम चौंक सा जाता हूँ और फिर मुझे ख्याल आता है की इतने देर से तो मैं बस इसी के आने का तो इंतज़ार कर रहा था.

घर से आने से लेकर अभी तक मैंने सोच रखा था की मुझे क्या कहना है, और पुरे रास्ते उन बातों को मन ही मन दोहराता रहा की वहां पहुँच के कहीं कोई बात कहना भूल न जाऊं.लेकिन अक्सर ऐसा होता है की जब वो मेरे सामने होती है तो मेरे शब्द मुझे धोका दे जाते हैं.कुछ ऐसी बातें थीं जिन्हें मैं कभी कह नहीं पाया था.आज भी तय कर के आया था की उसे देखते ही क्या कहूँगा.लेकिन जब उसने मुझे पीछे से छुआ और अपने आने का अहसास दिलाया तब जवाब में मैं बस इतना ही कह पाया - आ गयी..कब आई?.

ऐसा लगने लगा की जैसे एकाएक हम अजनबी हो गए हैं.मेरे पास तो कभी कुछ कहने के लिए रहता ही नहीं था, लेकिन आज उसके पास भी कुछ कहने को नहीं था.हम वहां से निकले और कृष्णा अपार्टमेंट की तरफ जाने लगे..तभी मुझे ये ख्याल आया की आज पहली दफे ऐसा हुआ है की वो आर्चीस गैलरी के सामने खड़े रहने के बावजूद अंदर नहीं गयी.वरना पहले तो कुछ खरीदना नहीं भी होता था तब भी एक चक्कर लगा ही लेती थी वो आर्चीस गैलरी का.कृष्णा अपार्टमेंट तक आने में हमें कुछ दस पन्द्रह मिनट लगे होंगे और इतने देर तक हम चुप चाप चलते रहे..बिना कोई बात किये.उस समय मुझे ऐसा लगा की जैसे बहुत वर्षों से मैंने उससे बात नहीं की.कृष्णा अपार्टमेंट के सीढ़ियों के पास हम अक्सर बैठे रहते थे.उस दिन भी हम वहीँ बैठे.उसे आये आधा घंटा हो गया होगा लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हो पा रही थी की उससे नज़रें मिला सकूँ.मुझे मालुम था की वो उदास है और उदासी उसके चेहरे पे साफ़ झलक रही थी, और मुझमे इतनी हिम्मत नहीं थी की उसके उदास चेहरे को देखूं.

हमेशा की तरह इस बार भी बात उसने ही शुरू की ये पूछ के की "कैसा रहा न्यू इयर..क्या क्या बनाया आंटी ने?"..और मैं हमेशा की तरह छोटा सा जवाब देकर चुप हो गया - "ठीक था".हमेशा यही होता है की उसके सवाल जितने लंबे रहते हैं, मेरे जवाब उतने ही छोटे होते थे.मेरे समझ में बिलकुल भी नहीं आ रहा था की बात की शुरुआत कहाँ से करूँ? दिमाग में कई बातें चल रही थी लेकिन जुबान तक आते आते वो सब बातें मर सी जा रही थी.बहुत मुश्किल से मैंने पुछा "कैसे हैं घर में सब?"

वो कुछ पल शांत रही और फिर कहने लगी की "पता है ये पहला साल है की स्मिता दी नहीं हैं न्यू इयर के दिन.पता है आज मैं नौ बजे तक सोती रही और किसी ने मुझे नहीं उठाया.माँ तो अबतक चुप सी रहती हैं, और पापा, जो की मुझे सात बजे तक सोता देख चिल्लाने लगते थे, वो भी बाहर बैठे न्यूज़ सुन रहे थे.मुझे बहुत रोना आ गया.बगल वाले रूम में रश्मि तो उठ गयी थी लेकिन अब तक बिछावन से उतरी नहीं थी.रजाई में ही बैठी हुई थी.मैं आधे घंटे तक खूब रोयी.माँ ने शायद मुझे देख भी लिया था रोते हुए लेकिन वो कुछ नहीं बोल पा रही थी.शायद वो भी रो रही थी..पता है हर बार जब भी मुझे जब भी बाहर आना होता है कोचिंग के लिए या किसी के लिए तो माँ हज़ार सवाब पूछती है, लेकिन आज जब मैं आ रही थी न तब माँ ने एक बार भी कुछ नहीं पुछा..पापा भी बस इतना कह के रह गए की जल्दी आना.मुझे ऐसा लगा की जैसे पापा मेरे बाहर जाने से थोड़े खुश हुए, शायद सोचते होंगे की बाहर घूमने से मेरा मन थोड़ा बहले...लेकिन तुम ही बताओ बाहर या घर में कोई फर्क पड़ता है क्या..वो तो शुक्र है दीदी, बड़ी मम्मी और दोनों मौसी हैं यहाँ, नहीं तो घर में रहना मेरे लिए इम्पासीबल हो जाता".वो इतना कहने के बाद चुप हो गयी..मैं बस उसे देख रहा था.मुझे लगा की अब वो रो देगी, और मैंने बात चेंज करने के लिए कहा चलो सैंडविच चलते हैं..पेस्ट्री खाते हैं...लेकिन वो सैंडविच जाने के मूड में नहीं थी.कुछ देर बाद एकाएक उसने कहा की यहाँ(कृष्णा अपार्टमेंट) एक दूकान है वहां वहां पैटीज मिलता है..सोच रहे हैं रश्मि और दीदी के लिए ले जाते".मैंने उसे वहीँ रुकने के लिए कहा और अंदर पैटीज लाने के लिए अंदर चला गया.

पैटीज लेके जब मैं उसके पास आया तो देखा वो अपने बैग से खेल रही थी.एक पल के लिए लगा की वही पुरानी पागल सी लड़की को देख रहा हूँ, जो बिना बात के अपने बैग से लड़ती रहती थी और उससे बातें करती थी.उसे इस बात पे मैं कितना चिढ़ाता था.मुझे उसे टोकने का मन नहीं कर रहा था, उसे बैग से खेलते हुए देखना मुझे अच्छा लग रहा था.फिर वो खुद ही मुझे देख लेती है और पूछती है कितना लगा?..मैंने उसे कहा की जितना भी लगा, तुमको इससे क्या मतलब?..हमेशा वो मेरे इस बात से चिढ़ जाती थी और जबरदस्ती अपने हिस्से का पैसा मुझे थमा देती थी, ये कह के की अभी तुम कमाते थोड़े ही हो.लेकिन आज वो अलग ही मूड में थी और बस "थैंक्स अभि " बोल के रह गयी.वो पहली लड़की थी जिसने मुझे "अभि" कह के बुलाया था.

वो कहने लगी "यु नो अभि,मैं बस तुम्हारे कारण आज आई..नहीं तो मुझे आने का मूड नहीं था..सब मुझसे मजाक करते हैं ये सोच के की मैं हंसूंगी...लेकिन क्या ये पोसिबल है तुम ही बोलो? तुम कुछ भी नहीं बोलते बस मेरे साथ बैठे रहते हो..जितना पेशैन्टली तुम मेरा बात सुनते हो, उतना पेशैन्टली बस स्मिता दी ही सुनती थी.और कोई भी नहीं"

मैंने कहा उससे की जब तुम्हारा मन करे मुझे बोल देना, मैं मिलने चला आऊंगा..अगर तुम्हारे लिए यहाँ आना पोसिबल नहीं है तो कह देना मैं ही उधर चला आया करूँगा.गांधी मैदान तक तो ट्यूसन के लिए जाता ही हूँ न..मुझे वहां आने में कोई दिक्कत नहीं होगी..कुछ दिन ट्यूसन बंक भी करना पड़े तो भी कोई बात नहीं.मैं चाह के भी उससे स्मिता दी के बारे में न कुछ बात कर पाता और न ही उस सम्बन्ध में कुछ पूछ पाता..लेकिन कभी कभी कुछ सुनी सुनाई बात कह भी देता.उस दिन पहली बार मैंने कहा उससे "जानती हो तुमको इतना उदास देख के स्मिता दी भी उदास हो जायेंगी...कहीं तो होंगी न वो..और तुम्हे देख रही होंगी..तुम उदास मत हो जाया करो..अरे उनकी अच्छी अच्छी बातें याद करो न, अच्छा लगेगा".

"पता है अभिषेक तुमसे बात करना कितना अच्छा लगता है...देखो मैं कितना अजीब सा फील कर रही थी आते वक्त, लेकिन अब मन थोड़ा अच्छा लग रहा है..थैंक यु सो मच अभिषेक" - उसने मुस्कुराते हुए कहा, और बहुत देर के बाद मुझे लगा की वो अब थोड़ा ठीक है.फिर वो पूछने लगी - अच्छा सन्डे को आ सकते हो कल क्या तुम उधर?

हाँ हाँ आ जायेंगे.सन्डे को तो स्कूटर भी फ्री रहता है.....वैसे तुम आओगी क्या??

"हाँ आना तो है लेकिन तुम्हारा तो कोचिंग सन्डे को नहीं रहता है न, फिर कैसे आ जाओगे? जाओ रहने दो..बाद में कभी मिल लेंगे."

अरे तुम इसका टेंसन मत लो..हम मैनेज कर लेंगे..एनीटाईम एनीथिंग फॉर यु..इतना कहने के बाद मैंने उसके हाथ पे अपना हाथ रख दिया, और वो मुस्कुराने लगी.ये पहली और आखरी बार था जब मैंने उसे छुआ था, उसे महसूस किया था.

26 comments:

  1. मेरे पास इस लेख के लिए शब्द नहीं है भाई!

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  2. abhi yaar u r so sweet
    No words yaar ki main ye padhne ke baad kyaa feel kiya ???!!!!

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  3. वो कभी बोरिंग रोड नहीं आती थी..
    .........................

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  4. अभि, मैं भी कहूँ कि ..... कोई शब्द नहीं है . लेकिन कहीं अन्दर कुछ चला गया . जो अच्छा सा लग रहा है . हाँ !!! नया साल मंगलमय हो .तुम्हारी यादों की हम भी सहभागी बनें .

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  5. wow!!!i was completely lost while reading this..

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  6. senti sa feel hone laga iske baad....

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  7. :) :) sweet ..itminan se padhne baad men aati hoon

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  8. बड़ा अच्छा लगता है....तुम्हारी इन यादो के साथ चलना....बहुत कम लोग होते हैं अभिषेक..जो इतनी अच्छी तरह जो भी महसूस किया... उसे, शब्दों में उतार पाते हैं. स्वीट सी पोस्ट है.

    पर एक बात PD के लिए कहूँगी...बड़ा प्यारा सा अहसास हो रहा था..तुम्हारी इस पोस्ट को पढ़ते हुए..{कई नाम ध्यान में आ रहे हैं...पर कोई नाम ,हम भी नहीं देंगे :)} कि अचानक प्रशांत का कमेन्ट पढ़ा...और हंसी आ गयी. इसके बिलकुल straight face से किए मजाक सचमुच हंसा देते हैं :)

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  9. नए साल की आपको सपरिवार ढेरो बधाईयाँ !!!!

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  10. वैसे यु नो अभि !:) जब भी तुम उस पागल लड़की के बारे में लिखते हो तुम्हारा लेखन स्तर पता नहीं कैसे अचानक बहुत ऊपर चला जाता है.एक फ्लो ,एक रिदम सा आ जाता है अब इस का क्रेडिट तुम्हें दूं या उस पागल लड़की को समझ नहीं पा रही हूँ :)

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  11. सो स्वीट ऑफ यु शिखा दी :)

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  12. बड़ा अच्छा लगता है....तुम्हारी इन यादो के साथ चलना....बहुत कम लोग होते हैं अभिषेक..जो इतनी अच्छी तरह जो भी महसूस किया... उसे, शब्दों में उतार पाते हैं. स्वीट सी पोस्ट है.


    i completly agreeeeeeeee! :)

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  13. Bahut sundar tareeke se aapne apni feelings ko share kiya hai Abhi ji.... Truely Marvellous

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  14. बहुत ही दिल को छू लेने वाला संस्मरण है। बधाई आपको।

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  15. kya kahun...itna kahana kafi hoga ki aapke shabdon ne chritro ko aisa jiwant kiya ki mai un sabko mahsus kar rahi hun...aisa laga aapke aur us ladki ke sath wahi main bhi baithi hun...aapko badhai...

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  16. kya bolu main ..log itne acchhe v kyun hote hai jo kisi ki chhoto chhotu yaado ko..unki khushiyon ko dil se lagayr sar aankhon pe uthaye gukte firte hai...bhut touching...bhut sundr...

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  17. Great yar. . Marvelous. . .

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  18. Abhi ji. . .U r great. . . .

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  19. बड़ी गहराई से आपने अपनी भावनाओं को रखा है . पुरानी यादें ताजा हो गई ..
    ..........शानदार

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  20. कैसे मैं आपको इस लेख के लिए सुक्रिया दूँ जितना तारीफ करू कम ही है अभिषेक ध्न्यब्वाद


    कंचन केशरी भरनो गुमला 9608463287

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  21. कैसे मैं आपको इस लेख के लिए सुक्रिया दूँ जितना तारीफ करू कम ही है अभिषेक ध्न्यब्वाद


    कंचन केशरी भरनो गुमला 9608463287

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया