Sunday, December 26, 2010

सपना

बहुत पहले कविता लिखने की कोशिश की थी, उस समय डाला भी था इस ब्लॉग पे...आज फिर से उसी कविता को पोस्ट कर रहा हूँ...






कल रात फिर एक सपना देखा मैंने,
चांदनी  रात में तुम चुपके से आयीं मेरे पास,
हम दोनों के बीच न ज़माने कि दूरी थी,
न कोई मजबूरी..
खुश थें हम अपने उस सपनों कि दुनिया में,
जहाँ हर तरफ खुशियों के चिराग जगमगा रहे थे...
एक दुसरे को बस हम देखे जा रहे थे,
अलफ़ाज़ हमारे आखों से बयां हो रहे थे..
समंदर से तो मैं वाकिफ हूँ,
लेकिन वो आँखें कुछ ज्यादा गहरी हैं,
जिनमे मैं डूब जाया करता हूँ..
कल सपने में न जाने कितनी बार,
उन आँखों में डूब के वापस आया था मैं...
पर,
खुली जो आँख तो न तुम थी,
न वो ज़माना ,
और न वो सपना...
दहकती आग थी, तन्हाई थी और मैं था..
उस हसीं सपने कि शायद,
सच होने कि कोई गुंजाइश नहीं.