Sunday, December 5, 2010

यादों में एक दिन (२) : जन्मदिन


दिसंबर का महीना था..जबरदस्त ठंड थी...सुबह पूरा शहर कोहरे से ढका रहता..सूरज देवता के दर्शन भी हर दिन बारह बजे के बाद ही होते थे..सुबह कोहरा इतना घना होता की एक हाथ दूर की चीज़ दिखाई न दे और उसपर से उसकी जिद की सुबह सुबह मिलना ही है..मैंने एक पल सोचा की आज घर पर ही आराम करता हूँ..इतनी ठंड में कोई कैसे बाहर निकल सकता है..माँ-पापा को तो काम पे जाने की मजबूरी है,इसलिए उन्हें जाना पड़ता है..और मुझे तो आज कोई जरूरी काम भी नहीं.माँ ने भी मुझसे कह रखा था की "अगर बहुत ज्यादा जरूरी काम न हो तो बाहर कहीं निकलना मत..ठण्ड बहुत है और शीतलहर भी चल रही है".

माँ पापा के जाने के बाद मैं ये सोच ही रहा था की आज बाहर निकलूँ या नहीं? उसका जन्मदिन तो कल है...तो कल ही उससे मिल लूँगा..आज क्यों जाऊं? हाँ उसने जिद तो की है, लेकिन वो मिलने की जिद कब नहीं करती..टी.वी के पास ही फोन स्टैंड था, वहाँ दो पल खड़ा रहा ये सोच रहा था की उसे फोन कर के बता ही देता हूँ की मैं आज नहीं आ आ पाऊंगा, की तभी फोन की घंटी बजने लगी...मैं समझ गया था की ये उसी का फोन होगा.

ठीक उसी समय शेखर का फोन आया...घर पे दोस्तों के फोन कम ही आते थे इसलिए जैसे ही मेरी बहन ने बताया की शेखर का फोन है तो मैंने एक अनुमान लगाया...वो आई होगी कोचिंग, मुझे नहीं देखकर शेखर को कहा होगा फोन करने..जैसा मैंने सोचा था ठीक वैसा ही हुआ.शेखर ने फोन किया और कहा जल्दी कोचिंग आने के लिए...कुछ जरूरी काम है.

अब इतना तो पक्का था की उसी के कहने पर शेखर ने फोन किया है और अब मैं फोन आने पर भी नहीं गया तो अगले दिन मेरी शामत आ जायेगी.
जितनी खूबसूरत वो है, उसका गुस्सा उससे भी भयानक...कुछ नामुराद दोस्तों को उसके गुस्से में भी एक क्यूटनेस दिखाई देता था..पता नहीं कैसे? मुझे तो उसका गुस्सा हमेशा खतरनाक ही लगा है और उस दिन भी उसके गुस्से के डर से मैं जल्दी जल्दी तैयार होने लगा...अपना फेवरिट ब्लैक कैप और जैकट पहन साइकिल लिया और निकल गया.

मुझे ये यकीन था की वो पुरे गुस्से में होगी...कल ही उसने ये तय कर लिया था की आज हम चार दोस्त मिल रहे हैं..उसके तय किये किसी भी चीज़ में किसी भी किस्म का दखल या बदलाव उसे पसंद नहीं.
दो तीन दिन से वो मेरे किसी न किसी बात से इरिटेट हो जा रही थी..और अब आज मेरे लेट से आने पे वो फिर से गुस्सा होने वाली थी..मैंने भी लेट से आने के अच्छे खासे बहाने पहले सोच रखे थे.

मैंने दूर से ही उसे देख लिया था..वो लक्ष्मी कोम्प्लेक्स के बाहर बड़े स्टाइल में खड़ी थी..उसे देखते ही मैंने सोचा..."इसे तो कोई मॉडल या ऐक्ट्रेस बनना चाहिए...जब देखो तब स्टाईल मारते रहती है.. और सबसे बड़ी बात की ऐसे फ़ालतू के स्टाईल दे दे कर वो थकती भी नहीं और अपने को कोई बड़ी मॉडल सोचती है, खुद की तुलना कभी कभी माधुरी दीक्षित से करने लगती है, और उसपर भी सबसे कमाल की बात की ये कहने से भी नहीं हिचकती कभी कभी की देखो, मैं तो माधुरी से भी सुन्दर हूँ..

लक्ष्मी कोम्प्लेक्स पहुँच कर जैसे ही स्टैंड में साइकिल खड़ा किया की वो पास आ कर खड़ा हो गयी..वो मुस्कुरा रही थी..मुझे शक हुआ..मुझे लगा की वो मुस्कुरा कैसे सकती है??नियम से तो उसे गुस्सा होना चाहिए.लेकिन वो मुस्कुरा रही थी.
वो अपने बैग से कुछ निकालने लगी..
"देखो ये स्वेटर, मुझे बड़ी मम्मी ने गिफ्ट किया मेरे बर्थडे पे...लन्दन का है...लन्दन का!"

"मतलब मुझे तुम बस ये स्वेअटर दिखाने के लिए बुलाई हो यहाँ ??पता है कितनी ठण्ड है आज?कम्बल से निकलने का मन नहीं कर रहा था..कैसे आयें हैं ये हम ही जानते हैं बस." मैंने थोड़ा गुस्सा दिखाने की नाकाम कोशिश की थी, उल्टा वो मेरे पर बरस गयी..

"हे भगवान...आई जस्ट कांट बिलीव इट....क्या करूँ मैं इस लड़के का?..देखो मैं लड़की होते हुए भी आ गयी आज कोचिंग और तुम घर में बैठे हुए थे...पता है लड़कियों को ज्यादे ठंड लगती है" - उसने एक अजीब सा लॉजिक दिया था..ये उसके पास जमा कई सारे अजीब लॉजिक में से एक लॉजिक था, और उन अजीब लॉजिकस का अर्थ कभी किसी के समझ में नहीं आता था लेकिन फिर भी हम उसके ऐसे लॉजिक को हंसी खुशी सह लेते थे...हम दोस्तों में से किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं थी की उसके इन लॉजिक्स को गलत ठहराने की जुर्रत कर सकें..अरे, मैडम के गुस्से का डर किसे नहीं था? :) और फिर दो तीन दिन तक बातचित भी बंद होना तय था...इसलिए मैं चुपचाप रहा उसके इललॉजिकल बातों पर...लेकिन शेखर बाबू चुप कहाँ रहने वाले थे..वो उलझ गए..

"अरे डफर..अपने लॉजिक को अपने पास ही रखो..भगवान मुहँ दिए हैं तो इसका मतलब क्या...कुछ भी बोल दोगी?"

"एक बात बताओ शेखर...तुमसे कौन बात कर रहा है जो बीच में टांग अड़ा रहे हो.....जाओ न, जाकर अपनी प्रिया के पास चिपके रहो...वैसे भी वो लाईन नहीं देती..उसी के पीछे घूमोगे तो कुछ फायदा भी होगा..फ़ालतू में सब के बातों में टांग अड़ाते रहते हो..."
"कभी कभी कुछ मैग्जीन या किताब भी पढ़ो...ये सब उसी में लिखा रहता है..हम पढ़ते हैं इसलिए हमको पता है" - उसने कहा और उसके बाद उसकी और शेखर में अच्छी खासी नोकझोंक हो गयी, मुझे डर हुआ की कहीं हाथापाई की नौबत न आ जाए, इसलिए मैंने ही बीच-बचाव किया.

"चलो अभिषेक गोविन्द भाई के दूकान चलते हैं..यहाँ ये दोनों जंगली है न...यहाँ ज्यादा देर रहोगे तो ये दोनों सर खा जायेंगे..."

मैंने भी हँसते हुए कहा, "ठीक है चलो..साइकिल यहीं लगे रहने देते हैं."

हम दोनों लक्ष्मी कोम्प्लेक्स से निकल ही रहे थे की पीछे से शेखर ने फिर से आवाज़ लगाई - "हाँ हाँ, ले जाओ...ले जाओ...वैसे भी ये कमज़ोर लड़की है...फुक भी मारेंगे तो उड़ के सीधा लन्दन में ही गिरेगी.."

उसका गुस्सा अब अपने चरम पे पहुँच चूका था..वो फिर से शेखर के पास आई और जैसे ही बैग उठाई उसे मारने के लिए शेखर ने अपने को बचाते हुए कहा..."अच्छा अच्छा माफ कर दो यार, लो लो एक रिश्वत ले लो...और उसने अपने बैग से एक पैकेट निकाल कर उसे दिया".

"ओ मई गॉड...गिफ्ट..."
ये उसका दूसरा बर्थडे गिफ्ट था..और गिफ्ट देख के तो वैसे ही उसकी आँखें चमक जाती है..चेहरे पे हज़ार वाट का बल्ब जल जाता है..

"क्या है इसमें? " उसने चहकते हुए शेखर से पूछा.

"खोल के देखो न.." शेखर ने कहा

"टेडी एंड अ परफ्यूम??" लड़कों के पास सच में दिमाग नहीं होता...टेडी इज सो क्यूट...बट गिफ्ट में परफ्यूम नहीं दिया जाता है...इससे रिश्ते टूट जाते हैं" - उसका एक और बिना सर पैर वाला लॉजिक.

"अच्छा ऐसा है क्या, तो फिर लाओ, या तो गिफ्ट वापस कर दो...या फिर अपना लॉजिक अपने पास ही रखो.." शेखर ने कहा.

"अरे नहीं यार.....आई विल कीप दिस..वैसे भी दिस इज माई बर्थडे गिफ्ट एंड मैं आज तेरे से नहीं लडूंगी....कम से कम आज तो नहीं ही..एंड थैंक्स डिअर सो मच...दिस इस सो क्यूट!!

उसकी की सबसे अच्छी बात ये थी की उसे छोटी से छोटी रिश्वत में खुश किया जा सकता है..कितने भी गुस्से में रहे वो, एक पांच रुपये के 'मंच' चोकलेट से उसका गुस्सा गायब हो जाता है, और शेखर ने तो उसे दो उसके फेवरिट चीज़ें दे दी..एक तो टेडी और दूसरा परफ्यूम.

हम गोविन्द भाई के दूकान के पास पहुंचे.गोविन्द भाई के दूकान पहुचंते ही उसने कहा, "अभिषेक कल दोपहर में देखो आ पायेंगे की नहीं...कुछ पक्का नहीं है...जो भी होगा, तुम्हे बता दूंगी...इसलिए तुम्हे आज बुलाया मैंने...तुम्हे बुरा तो नहीं लगा न?"

"अरे नहीं पागल...तुम्हारी बातों का कभी बुरा लगा है मुझे...और कल तुम घर पर ही रहो, अच्छा रहेगा, परिवार वालों के साथ जन्मदिन मानना चाहिए..." मैंने उसे आस्वश्त करने की कोशिश की..

उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी थी...

"हम्म...चलो सूप पीते हैं..मेरा बर्थडे है, मैं ट्रीट दूंगी...

मुझे दिल किया की कह दूँ एक बार.. मैं ट्रीट देता हूँ, फिर अपने जेब के तरफ ध्यान गया..पिछले महीने जो पैसे बचाया था वो तो इसके लिए गिफ्ट लेने में निकल गया..अब ट्रीट कैसे देता..खैर जब वो सूप पीने में व्यस्त हो गयी तो मैं धीरे से अपना बैग खोलने लगा...गिफ्ट निकालने के लिए..लेकिन पता नहीं कैसे वो मुझे बैग खोलते देख लेती है और बैग को झपट कर मेरे से छीन लेती है....उसे अपना गिफ्ट मिल गया था...एक हैंडमेड ग्रीटिंग्स कार्ड, जो मैंने उसके लिए बनाया था..एक छोटा शीशे का ताजमहल(जो एक बेस पे गोल गोल घूमते रहता था) और एक फिल्म के गानों का कैसेट.

उसका चेहरा खुशी से खिल उठा...जैसे की वो बस मेरे ही गिफ्ट का इंतज़ार कर रही थी...वो कुछ देर तक कार्ड को देखते रही और मुस्कुरा के कहती है..."वॉव!! वाट ए कार्ड...तुमने बनाया है अभिषेक..कसम से, यु आर एन आर्टिस्ट..आई जस्ट लव दिस वन..और ये ताजमहल भी कितना क्यूट है..थैंक्स फॉर द बेस्ट एवर गिफ्ट.."



..आज फिर से वही दिन है, 6 दिसम्बर. आज उसका का जन्मदिन है. "हैप्पी बर्थडे"

हमेशा वो मुझसे जबरदस्ती गिफ्ट लेती थी, कभी कुछ छीन भी लेती थी गिफ्ट के नाम पे..जैसे कभी मेरी वो सुपर फेवरिट ब्लैक कैप, कलम या फिर पॉकेट डायरी..अब वो यहाँ नहीं है, और कुछ छीन भी नहीं सकती, मैं उसे कोई गिफ्ट भी नहीं दे सकता.






जब तू मुस्कुराती है, बिजली भी शर्माती है..
पलकें जब उठाती है..दुनिया ठहर जाती है





और ये वो एक गाना है जो उसे बेहद पसंद है...