Friday, December 31, 2010

यादों में एक दिन (३) : न्यू इयर

वे दिन उसके जिंदगी के सबसे बुरे दिन थे.वो बेहद उदास थी.दो महीने हो आये थे और मुझे दूर दूर तक उसके चेहरे पे वो मुस्कुराहट नहीं दिख रही थी जो की पहले हुआ करती थी.मुस्कुराती तो वो अब भी थी, लेकिन एक डुप्लिकेट मुस्कराहट की झलक साफ़ दिखती थी.वे दिन जितने उसके लिए खराब थे, उतने मेरे लिए भी खराब थे.तीन हफ्ते हो गए थे उससे मिले हुए और उससे ना मिल पाने से थोड़ा सा बेचैन तो मैं था ही.उसकी फ़िक्र भी लगी रहती थी.उसने अपना जन्मदिन भी नहीं मनाया था..मनाती भी कैसे? स्मिता दी को गए अभी कुछ ही दिन तो हुए थे.बहुत रिक्वेस्ट करने के बाद एक जनवरी को वो मिलने आने के लिए राजी हुई.

एक जनवरी को घर से निकलना थोड़ा तो मुश्किल रहता है, लेकिन ऐसा भी कुछ नहीं था की मैनेज नहीं हो पाता.अब उससे मिलने जा रहा हूँ,घरवालों को ये तो बता नहीं सकता था..कैसे रखता अपने रिश्ते की परिभाषा घर वालों के सामने..सिर्फ ये कह देता की वो मेरी अच्छी दोस्त है और मैं उसका ख्याल रखता हूँ(कुछ ज्यादा ही)?एक लड़का और लड़की के बीच इस तरह का सम्बन्ध..घरवाले जरा भी देर नहीं लगाते ये सोचने में की वो मेरी प्रेमिका है, जब की ऐसा कुछ तो उस वक्त नहीं था और जो था वो मैं किसी को समझा नहीं सकता था..इसलिए अपने दोस्त प्रभात के नाम का सहारा लिया घर से निकलने के लिए.

उसने तीन बजे मिलने को बुलाया था.मैं आधे घंटे पहले ही पहुँच गया था.घर में मुझसे रहा नहीं जा रहा था.जब से तीन बजे मिलने का समय फिक्स हुआ था, उस समय से मेरे अंदर एक अजीब उथल पुथल चल रही थी, अजीब बेचैनी सी थी..वो बेचैनी या उथल पुथल क्यों थी ये मैं न उस समय समझ पाया था और न अब समझ पाया हूँ.मैं एकटक से रास्ते पे नज़रें लगाए बैठा था..बीच में मेरी नज़रे थोड़ी इधर उधर होने लगी.कभी आर्चीस गैलरी की तरफ देखता, तो कभी सामने बैठे कुछ स्कूल के लड़के और लड़कियों को.अचानक मेरा कोल्ड ड्रिंक्स पीने का दिल करने लगा. फिर तुरंत ये ख्याल आया की पॉकेट में सिर्फ 20 रुपये ही हैं.ये 20 रुपये मैंने उसके लिए बचा के रखे थे, क्यूंकि मुझे पता था की उसे सैंडविच की पेस्ट्री और समोसे कितने पसंद हैं.वहीँ खड़े खड़े मैं पॉकेट को एक बार फिर से चेक करता हूँ ये कन्फर्म करने के लिए की वो रुपये मैंने लाये तो हैं न.मैं एकाएक उन रुपये के गुम हो जाने,गिर जाने या चोरी हो जाने के सोच से डर जाता हूँ और फिर उन रुपये को पैंट के पीछे वाले पॉकेट से निकाल सर्ट के पॉकेट में रख लेता हूँ.रोड की तरफ मेरी नज़रें फिर से लग जाती हैं.कभी कभी मैं पता नहीं किस ख्याल में गुम हो जाता हूँ.अक्सर मेरे साथ ये होता है की मैं किस ख्याल में गुम हो जाता हूँ ये मुझे कभी पता ही नहीं चलता, बहुत देर के बाद ये अहसास होता है की मैं किसी एक चीज़ को एकटक से देखे जा रहा हूँ बिना किसी उद्देश्य के या बिना किसी सोच के.उस दिन भी मैं आर्चीस गैलरी के पास ही खड़ा था और उस दूकान के दरवाज़े के तरफ देख रहा था.लोग तेजी से उस दरवाजे को धक्का दे के अंदर चले जाते और वो दरवाज़ा खुद ब खुद बंद हो जाता.लोग जितनी तेजी से उस दरवाज़े को धक्का देते, वो उतना धीरे से बंद होता.दूकान में एक बड़ा सा टेडी बीअर हमेशा दीखता था मुझे, लेकिन आज पता नहीं क्यों मुझे वो टेडी बड़ा ही क्यूट दिख रहा था और मुझे एकाएक मन करने लगा उसे खरीदने का.मैं उसी टेडी को देख रहा था की पीछे से वो आई और धीरे से उसने मुझे आवाज़ दिया.मैं एकदम चौंक सा जाता हूँ और फिर मुझे ख्याल आता है की इतने देर से तो मैं बस इसी के आने का तो इंतज़ार कर रहा था.

घर से आने से लेकर अभी तक मैंने सोच रखा था की मुझे क्या कहना है, और पुरे रास्ते उन बातों को मन ही मन दोहराता रहा की वहां पहुँच के कहीं कोई बात कहना भूल न जाऊं.लेकिन अक्सर ऐसा होता है की जब वो मेरे सामने होती है तो मेरे शब्द मुझे धोका दे जाते हैं.कुछ ऐसी बातें थीं जिन्हें मैं कभी कह नहीं पाया था.आज भी तय कर के आया था की उसे देखते ही क्या कहूँगा.लेकिन जब उसने मुझे पीछे से छुआ और अपने आने का अहसास दिलाया तब जवाब में मैं बस इतना ही कह पाया - आ गयी..कब आई?.

ऐसा लगने लगा की जैसे एकाएक हम अजनबी हो गए हैं.मेरे पास तो कभी कुछ कहने के लिए रहता ही नहीं था, लेकिन आज उसके पास भी कुछ कहने को नहीं था.हम वहां से निकले और कृष्णा अपार्टमेंट की तरफ जाने लगे..तभी मुझे ये ख्याल आया की आज पहली दफे ऐसा हुआ है की वो आर्चीस गैलरी के सामने खड़े रहने के बावजूद अंदर नहीं गयी.वरना पहले तो कुछ खरीदना नहीं भी होता था तब भी एक चक्कर लगा ही लेती थी वो आर्चीस गैलरी का.कृष्णा अपार्टमेंट तक आने में हमें कुछ दस पन्द्रह मिनट लगे होंगे और इतने देर तक हम चुप चाप चलते रहे..बिना कोई बात किये.उस समय मुझे ऐसा लगा की जैसे बहुत वर्षों से मैंने उससे बात नहीं की.कृष्णा अपार्टमेंट के सीढ़ियों के पास हम अक्सर बैठे रहते थे.उस दिन भी हम वहीँ बैठे.उसे आये आधा घंटा हो गया होगा लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हो पा रही थी की उससे नज़रें मिला सकूँ.मुझे मालुम था की वो उदास है और उदासी उसके चेहरे पे साफ़ झलक रही थी, और मुझमे इतनी हिम्मत नहीं थी की उसके उदास चेहरे को देखूं.

हमेशा की तरह इस बार भी बात उसने ही शुरू की ये पूछ के की "कैसा रहा न्यू इयर..क्या क्या बनाया आंटी ने?"..और मैं हमेशा की तरह छोटा सा जवाब देकर चुप हो गया - "ठीक था".हमेशा यही होता है की उसके सवाल जितने लंबे रहते हैं, मेरे जवाब उतने ही छोटे होते थे.मेरे समझ में बिलकुल भी नहीं आ रहा था की बात की शुरुआत कहाँ से करूँ? दिमाग में कई बातें चल रही थी लेकिन जुबान तक आते आते वो सब बातें मर सी जा रही थी.बहुत मुश्किल से मैंने पुछा "कैसे हैं घर में सब?"

वो कुछ पल शांत रही और फिर कहने लगी की "पता है ये पहला साल है की स्मिता दी नहीं हैं न्यू इयर के दिन.पता है आज मैं नौ बजे तक सोती रही और किसी ने मुझे नहीं उठाया.माँ तो अबतक चुप सी रहती हैं, और पापा, जो की मुझे सात बजे तक सोता देख चिल्लाने लगते थे, वो भी बाहर बैठे न्यूज़ सुन रहे थे.मुझे बहुत रोना आ गया.बगल वाले रूम में रश्मि तो उठ गयी थी लेकिन अब तक बिछावन से उतरी नहीं थी.रजाई में ही बैठी हुई थी.मैं आधे घंटे तक खूब रोयी.माँ ने शायद मुझे देख भी लिया था रोते हुए लेकिन वो कुछ नहीं बोल पा रही थी.शायद वो भी रो रही थी..पता है हर बार जब भी मुझे जब भी बाहर आना होता है कोचिंग के लिए या किसी के लिए तो माँ हज़ार सवाब पूछती है, लेकिन आज जब मैं आ रही थी न तब माँ ने एक बार भी कुछ नहीं पुछा..पापा भी बस इतना कह के रह गए की जल्दी आना.मुझे ऐसा लगा की जैसे पापा मेरे बाहर जाने से थोड़े खुश हुए, शायद सोचते होंगे की बाहर घूमने से मेरा मन थोड़ा बहले...लेकिन तुम ही बताओ बाहर या घर में कोई फर्क पड़ता है क्या..वो तो शुक्र है दीदी, बड़ी मम्मी और दोनों मौसी हैं यहाँ, नहीं तो घर में रहना मेरे लिए इम्पासीबल हो जाता".वो इतना कहने के बाद चुप हो गयी..मैं बस उसे देख रहा था.मुझे लगा की अब वो रो देगी, और मैंने बात चेंज करने के लिए कहा चलो सैंडविच चलते हैं..पेस्ट्री खाते हैं...लेकिन वो सैंडविच जाने के मूड में नहीं थी.कुछ देर बाद एकाएक उसने कहा की यहाँ(कृष्णा अपार्टमेंट) एक दूकान है वहां वहां पैटीज मिलता है..सोच रहे हैं रश्मि और दीदी के लिए ले जाते".मैंने उसे वहीँ रुकने के लिए कहा और अंदर पैटीज लाने के लिए अंदर चला गया.

पैटीज लेके जब मैं उसके पास आया तो देखा वो अपने बैग से खेल रही थी.एक पल के लिए लगा की वही पुरानी पागल सी लड़की को देख रहा हूँ, जो बिना बात के अपने बैग से लड़ती रहती थी और उससे बातें करती थी.उसे इस बात पे मैं कितना चिढ़ाता था.मुझे उसे टोकने का मन नहीं कर रहा था, उसे बैग से खेलते हुए देखना मुझे अच्छा लग रहा था.फिर वो खुद ही मुझे देख लेती है और पूछती है कितना लगा?..मैंने उसे कहा की जितना भी लगा, तुमको इससे क्या मतलब?..हमेशा वो मेरे इस बात से चिढ़ जाती थी और जबरदस्ती अपने हिस्से का पैसा मुझे थमा देती थी, ये कह के की अभी तुम कमाते थोड़े ही हो.लेकिन आज वो अलग ही मूड में थी और बस "थैंक्स अभि " बोल के रह गयी.वो पहली लड़की थी जिसने मुझे "अभि" कह के बुलाया था.

वो कहने लगी "यु नो अभि,मैं बस तुम्हारे कारण आज आई..नहीं तो मुझे आने का मूड नहीं था..सब मुझसे मजाक करते हैं ये सोच के की मैं हंसूंगी...लेकिन क्या ये पोसिबल है तुम ही बोलो? तुम कुछ भी नहीं बोलते बस मेरे साथ बैठे रहते हो..जितना पेशैन्टली तुम मेरा बात सुनते हो, उतना पेशैन्टली बस स्मिता दी ही सुनती थी.और कोई भी नहीं"

मैंने कहा उससे की जब तुम्हारा मन करे मुझे बोल देना, मैं मिलने चला आऊंगा..अगर तुम्हारे लिए यहाँ आना पोसिबल नहीं है तो कह देना मैं ही उधर चला आया करूँगा.गांधी मैदान तक तो ट्यूसन के लिए जाता ही हूँ न..मुझे वहां आने में कोई दिक्कत नहीं होगी..कुछ दिन ट्यूसन बंक भी करना पड़े तो भी कोई बात नहीं.मैं चाह के भी उससे स्मिता दी के बारे में न कुछ बात कर पाता और न ही उस सम्बन्ध में कुछ पूछ पाता..लेकिन कभी कभी कुछ सुनी सुनाई बात कह भी देता.उस दिन पहली बार मैंने कहा उससे "जानती हो तुमको इतना उदास देख के स्मिता दी भी उदास हो जायेंगी...कहीं तो होंगी न वो..और तुम्हे देख रही होंगी..तुम उदास मत हो जाया करो..अरे उनकी अच्छी अच्छी बातें याद करो न, अच्छा लगेगा".

"पता है अभिषेक तुमसे बात करना कितना अच्छा लगता है...देखो मैं कितना अजीब सा फील कर रही थी आते वक्त, लेकिन अब मन थोड़ा अच्छा लग रहा है..थैंक यु सो मच अभिषेक" - उसने मुस्कुराते हुए कहा, और बहुत देर के बाद मुझे लगा की वो अब थोड़ा ठीक है.फिर वो पूछने लगी - अच्छा सन्डे को आ सकते हो कल क्या तुम उधर?

हाँ हाँ आ जायेंगे.सन्डे को तो स्कूटर भी फ्री रहता है.....वैसे तुम आओगी क्या??

"हाँ आना तो है लेकिन तुम्हारा तो कोचिंग सन्डे को नहीं रहता है न, फिर कैसे आ जाओगे? जाओ रहने दो..बाद में कभी मिल लेंगे."

अरे तुम इसका टेंसन मत लो..हम मैनेज कर लेंगे..एनीटाईम एनीथिंग फॉर यु..इतना कहने के बाद मैंने उसके हाथ पे अपना हाथ रख दिया, और वो मुस्कुराने लगी.ये पहली और आखरी बार था जब मैंने उसे छुआ था, उसे महसूस किया था.
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Monday, December 27, 2010

सुना है - एक गज़ल अहमद फ़राज़ के आवाज़ में

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बरबाद करके देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र कर देखते हैं

सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर कर देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुग्नू ठहर के देखते हैं

सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं

सुना है उसकी सियाह चश्मगी क़यामत है
सो उसको सुरमाफ़रोश आह भर के देखते हैं

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते हैं

सुना है आईना तमसाल है जबीं उसकी
जो सादा दिल हैं उसे बन सँवर के देखते हैं

सुना है उसके बदन के तराश ऐसे हैं
के फूल अपनी क़बायेँ कतर के देखते हैं

सुना है उसके शबिस्तान से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीन उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं

सुना है जब से हमाइल हैं उसकी गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं

रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं

किसे नसीब के बे-पैरहन उसे देखे

कभी-कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं

सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उसकी कमर के देखते हैं

कहानियाँ हीं सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं

अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जायेँ
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

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Sunday, December 26, 2010

सपना

बहुत पहले कविता लिखने की कोशिश की थी, उस समय डाला भी था इस ब्लॉग पे...आज फिर से उसी कविता को पोस्ट कर रहा हूँ...






कल रात फिर एक सपना देखा मैंने,
चांदनी  रात में तुम चुपके से आयीं मेरे पास,
हम दोनों के बीच न ज़माने कि दूरी थी,
न कोई मजबूरी..
खुश थें हम अपने उस सपनों कि दुनिया में,
जहाँ हर तरफ खुशियों के चिराग जगमगा रहे थे...
एक दुसरे को बस हम देखे जा रहे थे,
अलफ़ाज़ हमारे आखों से बयां हो रहे थे..
समंदर से तो मैं वाकिफ हूँ,
लेकिन वो आँखें कुछ ज्यादा गहरी हैं,
जिनमे मैं डूब जाया करता हूँ..
कल सपने में न जाने कितनी बार,
उन आँखों में डूब के वापस आया था मैं...
पर,
खुली जो आँख तो न तुम थी,
न वो ज़माना ,
और न वो सपना...
दहकती आग थी, तन्हाई थी और मैं था..
उस हसीं सपने कि शायद,
सच होने कि कोई गुंजाइश नहीं.

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Thursday, December 23, 2010

मीना कुमारी की शायरी (४) - उनकी आवाज़ में

कोई चाहत है न जरुरत है
मौत क्या इतनी खूबसूरत है

मौत की गोद मिल रही हो अगर
जागे रहने की क्या जरुरत है

जिंदगी गढ़ के देख ली हमने
मिटटी गारे की एक मूरत है

सारे चेहरे जमा हैं माजी के
मौत क्या दुल्हिनों की सूरत है

--- x x x ---


यह न सोचो कल क्या हो
कौन कहे इस पल क्या हो

रोओ मत, न रोने दो
ऐसी भी जल-थल क्या हो

बहती नदी की बांधे बांध
चुल्लू में हलचल क्या हो

हर छन हो जब आस बना
हर छन फिर निर्बल क्या हो

रात ही गर चुपचाप मिले
सुबह फिर चंचल क्या हो

आज ही आज की कहें-सुने
क्यों सोचें कल, कल क्या हो.

मीना कुमारी की शायरी के पहले के पोस्ट आप यहाँ पढ़ चुके हैं, अगर नहीं तो क्लिक कर के पढ़ लें..
आज भी सुनिए मीना कुमारी जी की ये नज़्म उन्ही के आवाज़ में..

आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वह नाम नहीं होता

जब जुल्फ की कालिख में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता

हंस हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुने टुकड़े
हर शख्स की किस्मत में इनाम नहीं होता

बहते हुए आंसू ने आँखों से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता

दिन डूबे हैं या डूबी बरात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता

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Sunday, December 19, 2010

कुछ सपने कभी सच नहीं होते

ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूं  
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ
- उबैदुल्लाह 'अलीम

उस दिन भी ऐसा ही हुआ था.  मानो सब मेरे आसपास घट रहा हो और मैं वहीं केन्द्र में कहीं हूँ. कौन सी जगह थी, ये याद नहीं...शायद कोई बड़ा सा मकान था. किसका वो कमरा था ये भी याद नहीं. लेकिन आँख खुली तो मैं वहां सोया हुआ था, शायद मेरा ही कमरा था...कुछ अपनी चीज़ें दिख रहीं थी कमरे में. काफी देर तक शायद मैं सोया रहा हूँगा, पूरा बदन टूट रहा था.

शायद किसी की शादी थी.  कुछ ऐसा ही माहौल था. शायद घरवालों और रिश्तेदारों की फ़ौज अभी तक घर में थी,  सबकी आवाजें मुझे सुनाई दे रही थी. माँ की आवाज़, बहन की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी. कहीं कोई किसी बात पर बहस कर रहा है तो कहीं बहनें आपस में लड़ रही हैं. कहीं कोई कह रहा कि "जाकर सबके लिए चाय बना दो.." तो कहीं से बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही थी.

जिस कमरे में मैं हूँ उस कमरे में जबरदस्त सन्नाटा सा है. मैं चाहता हूँ कि कमरे से बाहर निकलूं, लेकिन पता नहीं क्यों मैं उठ नहीं पाता हूँ. कमरे के बाहर से आती हुई आवाजें को मैं सुनने की कोशिश करने लगता हूँ. माँ की आवाज़ है. वो मेरी बहन से कह रही है "जाकर अपने भैया को उठा दो, शादी हुए अभी एक दिन भी नहीं हुआ और वो इतने देर तक सोया हुआ है? भाभी को ही बोलो जाकर उठा दे"

शादी? भाभी

मेरा सर चकराने सा लगा. मैं समझ ही नहीं पा रहा था की बात क्या है? माँ ने मेरी शादी की बात क्यों की? मुझे क्या हो गया? मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा. कुछ भी याद नहीं आ रहा मुझे. क्यों?? मेरी शादी? किससे?  मुझे कुछ याद क्यों नहीं आ रहा? कब से मैं सोया हुआ हूँ? किसी ने मुझे कुछ खिला-पीला दिया है क्या? ये कैसा रहस्य है? मैं सोच ही रहा था कि दरवाज़ा खुलता है...

उठ गए?

सामने वो खड़ी थी. एक पल के लिए तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ.  फिर अगले पल लगा कि अगर मेरी शादी हुई हो तो इसके अलावा और किससे हो सकती है. वो बेहद खूबसूरत लग रही थी..

फिरोजी साड़ी पहनें वो खड़ी थी. बाल उसके अभी तक सूखे नहीं थे.  भींगे हुए से ही थे. वो मुस्कुराते हुए सामने से गुजर गयी और वार्डरोब में से कुछ निकालने लगी. कमरे की हर चीज़ को वो एक जगह से उठा दूसरे जगह रख रही थी...ऐसा लग रहा था कि जैसे पूरे कमरे पर उसी का अधिकार हो. अचानक मेरी नज़र गयी उसके माथे पर. लाल सिन्दूर उसके माथे पर दमक रहा था..

मैं सोचने लगा कि इस सिन्दूर ने उसकी सुंदरता कितनी बढ़ा दी है, मैं कहाँ हूँ, वो मेरे सामने कैसे खड़ी है? ये सारा रहस्य मैं भूल सा गया था, उसे बस देखते रहा था मैं. शायद सिन्दूर में ही ऐसी ताकत ही है जिससे किसी की भी सुंदरता दुगुनी हो जाती है. बिस्तर पर लेटे हुए मैं उसे देख सोच रहा था.

इतने में ही दरवाज़ा अचानक फिर से खुलता है..

कोई रिश्तेदार है. चाचा?मामा? पता नहीं...मैं सिर्फ आवाज़ सुन रहा हूँ, चेहरा धुंधला सा दिखाई दे रहा है. शायद मामा ही हैं.

"कहीं घूमने जाना है क्या आज? मंदिर जाओगी न? " उन्होंने पुछा.

“हाँ जाना तो है...आज ही...” उसनें जवाब दिया.

"ठीक है तो फिर गाड़ी से ही चले जाना और जल्दी वापस आना, कुछ काम भी है."  इतना कह के वो चले गए. मेरा सर एकदम भारी सा लगने लगा था. ये क्या हो रहा है? मेरी नज़र फिर से उस पर चली गयी. अब तक वो चीज़ों को समेट कर रख चुकी थी और मेरे पास आ कर बैठ गयी.

"चलिए नहा लीजिए. बहुत देर हो गयी...कितना देर आप सोते रहेंगे?"

चलिए??आप??

वो कब से मेरे लिए इतने सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करने लगी??  मैं उससे कुछ कहना चाह रहा हूँ लेकिन कह नहीं पा रहा. जैसे कोई अदृश्य शक्ति मुझे कुछ कहने से रोक दे रही हो. जैसे मैं बहुत कुछ एक बार में कहना चाह रहा हूँ और सारे शब्द मुहँ में ही अटक के रह जा रहे हों. मुझे ये सब कोई छलावा, कोई भ्रम सा लगने लगा है. लेकिन इतने लोग आसपास जमा हैं, वो मेरे बगल में बैठी है. उसके हाथों की मेहँदी साफ़ दिखाई दे रही है.. ये सब भ्रम कैसे हो सकता है? मैं उससे कुछ पूछना चाह रहा हूँ. बहुत मुश्किल से, पूरी शक्ति लगाने के बाद उससे बस ये पूछ पाता हूँ "क्या हमारी शादी हो गयी?"

इस सवाल से वो एक पल खामोश रही, फिर उसकी नज़रें नीची हो गयीं और अपने आप में ही जैसे वो सिमटने लगी..वो हद शर्माने लगी थी.  उसकी झुकी नज़रों ने मेरे सवाल का जवाब दे दिया था. वो कुछ और कहती कि इतने में ही दरवाज़ा फिर से खुलता है. इस बार मेरी छोटी बहन है. उसका चेहरा मैं अच्छे से देख पा रहा हूँ. कोई धुंधलाहट नहीं है..

"भैया कब उठोगे? नौ बज गए हैं. भाभी के आने के बाद हम सब बहन को तो तुम भूल ही गए न...देखो तो कैसे बात कर रहे हो भाभी से? और भाभी आपको कोई और नहीं मिला बतियाने के लिए, चलिए हम लोग के साथ बैठिये. आपसे कितनी बातें करनी है हम बहनों को. कब से हम इंतजार कर रहें थें कि आप इस घर में हमारी भाभी बन कर आईये. चलिए जल्दी...उठिए, चलिए मेरे साथ..."  छोटी बहन वहीं दरवाज़े पर खड़े होकर बोल रही थी.

"अच्छा आप चलिए मैं अभी आती हूँ. ज़रा इन्हें तो उठा दूँ.." उसनें मेरी बहन से कहा

"और हाँ भाभी...माँ ने कहा है कि लाल रंग की कोई साड़ी पहन कर मंदिर जाइयेगा. लाल रंग शुभ होता है, भाई को भी लाल लाल पहना दीजिये आज न. " इतना कह कर, मुझे मुंह चिढ़ा कर छोटी चली गयी.

कुछ शब्द मेरे कानों में अभी तक गूंज रहे थे जैसे "शादी... भाभी...चलिए... आप... इन्हें......” मुझे अब तक कुछ समझ में नहीं आ रहा था. मैंने उससे पूछा इस बार फिर... “ये सब सच नहीं है, ये सब एक सपना जैसा लग रहा है... किसी भ्रम सा... "

वो मेरे और करीब आ गयी. बड़े प्यार से अपने हाथों में मेरा हाथ लिया और कहा 

"क्यों लग रहा है ऐसा आपको? ये कोई भ्रम कोई छलावा नहीं है.  देखिये,  मैं हूँ न आपके साथ. हम यही तो चाहते थे कि हम दोनों साथ रहे. मैं आपके साथ रहूंगी हमेशा... जिंदगी भर.  बस आपके साथ...."

मैं उसे देख मुस्कुराने लगा था.
हाँ, ये सच है...मैंने खुद से कहा. ज़माने की सारी खुशियाँ जैसे उस एक पल में सिमट आई थी. उसका हाथ मेरे हाथ में था, और उसकी इन बातों ने मुझे यकीन दिला दिया था कि कहीं कुछ भी अजीब नहीं है.

“चलिए अब, वरना आपकी बहनें फिर से यहाँ आ जायेंगी...” वो मेरे पास से उठ कर जाने लगी. मैंने उसे रोकना चाहा "कहाँ जा रही हो? बैठो यहीं, तुम चली गयी तो मैं फिर से तन्हा हो जाऊँगा.."

उसने मुस्कुराते हुए कहा " अरे मैं कहाँ जाऊंगी, मैं तो यहीं हूँ. आप तैयार हो जाइए, मैं आपकी बहनों के पास जा रही हूँ. बहुत प्यार करते हैं न आप अपनी बहनों से. मैं भी उन्हें अपनी बहन से कम नहीं समझूंगी."

वो जाने लगी,  दरवाज़े पर खड़ी हो कर वो मेरी तरफ देखकर प्यार से मुस्कुराने लगती है. मुझे एकाएक डर लगने लगता है. बहुत ज्यादा डर. मुझे ऐसा लगता है कि जैसे वो दरवाज़े के उस तरफ चली गयी तो मैं उसे फिर कभी नहीं देख पाऊंगा.  कभी नहीं मिल पाऊंगा. मुझे ऐसा लगने लगता है कि जैसे जिंदगी मेरे सामने से जा रही है और मैं उसे रोक भी नहीं पा रहा. मैं चीखना चाहता हूँ. चिल्लाना चाहता हूँ. लेकिन आवाज़ धोखा दे दे रही है.

दरवाज़ा बंद हो जाता है.  वो चली जाती है. मैं फिर बिस्तर पर लेट जाता हूँ. आवाजें बाहर से अभी भी आ रही हैं. उसकी आवाज़ भी सुनाई दे रही है.

मुझे फिर नींद आने लगती है. शायद सो ही चूका हूँ कि मोबाइल की रिंग सुनाई देती है. मोबाइल मेरे तकिये के पास रखा हुआ है. मैं मोबाइल उठा नहीं पाता हूँ. कुछ देर बाद फिर से मोबाइल बजता है, इस बार शायद कोई एसएमएस आया है. मेसेज देखने के लिए मैं नींद में ही फोन उठाता हूँ.. 
5Missed Calls
1 New Message – Good Morning. Wake up. Your train is on right time, at 6 in the morning. We will be at platform. Come Soon.
मैं हड़बड़ा के उठता हूँ. धड़कन एकदम तेज चल रही होती है. आँखों के सामने सारा नज़ारा बदला हुआ सा दिखता है. सामने वही टेबल दिख रहा है, वही लैपटॉप..वही किताबें, वही मनहूस सा मेरा कमरा.
क्या वो कोई सपना था? मैं अपने आप से ही पूछने लगता हूँ.
हाँ वो एक सपना था...तुम सपना देख रहे थे... हताश होकर खुद से ही कहता हूँ मैं.
बहुत देर तक मैं उसी अवस्था में रहता हूँ,  फिर हताश सा बिस्तर पे लेट जाता हूँ. डायरी का एक पन्ना खुला हुआ है, जिसे पढ़ते हुए रात में जाने कब सो गया था. लिखा है उस पन्ने पर - "कुछ सपने कभी सच नहीं होते" 
मैं घड़ी देखता हूँ.,.सुबह के चार बजे हैं. सुबह के चार? सुबह का सपना...? सुबह के सपने सच होते हैं, लोगों से सुनते आया हूँ मैं. लेकिन इस पार, ये सपना...पता नहीं....
सोचता हूँ कि इस सपने को अपनी डायरी में लिख लूँ, लेकिन हिम्मत नहीं होती. कहीं पढ़ा कोई शेर याद आता है, बस उसी को लिख पाता हूँ डायरी के उस पन्ने पर..
"मेरे पास जमा भीड़ को देख बदगुमान न हो
मैं आज भी तन्हा हूँ, मैं हूँ और बस तेरी यादें हैं"


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Sunday, December 12, 2010

मीना कुमारी की शायरी - पार्ट ३

न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन,
बड़े करीब से उठकर चला गया कोई..



मीना कुमारी जी कि कुछ शायरी आप पहले के दो पोस्ट में पढ़ चुके हैं.आज देखिये मीना कुमारी जी कि दो और शायरी, और सुनिए उन्ही कि आवाज़ में.
Mp3 फ़ाइल के लिए नीरज जी को धन्यवाद, जिन्होंने मुझे ई-मेल किया था.


हमशाख 

मेरा माजी
मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ
यह कि साँसों कि तरह मेरे साथ चलता रहा
जो मेरी नब्ज़ की मानिंद मेरे साथ जिया
जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे
अपनी संगलाख उँगलियों से गहरा करते रहे, करते गए
किसी कि ओ़क पा लेने को लहू बहता रहा
किसी को हमनफस कहने कि जुस्तुजू में रहा
कोई तो हो जो बेसाख्ता इसको पहचाने
तड़प पे पलटे, अचानक से पुकार उठे
मेरे हमशाख..मेरे हमशाख
मेरी उदासियों के हिस्सेदार
मेरे अधूरेपन के दोस्त,
तमाम दर्द जो तेरे हैं
मेरे दर्द तमाम
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों से
तू एक मस्जिद-ए-वीरां है, मैं तेरी अजां
अजां जो
अपनी ही वीरानगी से टकरा कर
ढकी छुपी हुई बेवा ज़मीं के दामन पर
पढ़े नमाज खुदा जाने किसको सजदा करे

(संगलाख - लोहा , ओ़क - चुल्लू ,  हमनफस-साथी)

इसी नज़्म को सुनिए यहाँ -


मौत और मोहब्बत 

ये नूर कैसा है
राख का सा रंग पहने
वर्फ कि लाश है
लावे का सा कफ़न ओढ़े
गूंगी चाहत है
रुसवाई का कफ़न पहने
हर एक कतरा मुक़द्दस है मैले आंसू का
एक हुजूमे अपाहिज है आबे-कौसर पर
यह कैसा शोर है जो बेआवाज़ फैला है
रुपहली छांव में बदनामियों का डेरा है
यह कैसी जन्नत है जो चौंक चौंक जाती है
एक इन्तजारे-मुजस्सम का नाम -ख़ामोशी
और एहसासे-बेकराँ पे यह सरहद कैसी?
दर-ओ-दीवार कहाँ रूह कि आवारगी के
नूर कि वादी तलक लम्स का इक सफरे-तवील
हर एक मोड़ पे बस दो ही नाम मिलते हैं
मौत कह लो - जो मोहब्बत नहीं कहने पाओ.

इसे नज़्म को यहाँ सुने -



(मुक़द्दस -> पावन , हुजूमे अपाहिज->अपाहिजो का समूह, आबे-कौसर -> कौसर नाम कि एक नदी है जन्नत कि, इन्तजारे-मुजस्सम -> साकार प्रतीक्षा, एहसासे-बेकराँ ->अथाह अनुभूति, सफरे-तवील->लंबी यात्रा )

मुहब्बत 

मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे अपने जिस्म के रोएं रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है जिसके रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके आहिस्ता आहिस्ता दूर दूर
पुर सुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम ज़ंजीरों की तरफ लिये जा रहे हों
वह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह रहकर चमकते दिखाई देते हैं
हमारी गुफ़्तगू की ज़बान
वही है जो
दरख़्तों, फूलों, सितारों और आबशारों की है
यह घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आँसु छोड़ जाती है, महबूब
आह
मुहब्बत!


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