Monday, August 9, 2010

तुम्हारी यादों का हैंगओवर

सुबह तुम्हारी यादों के साथ जागा था..
कमरे में नज़र घुमाई तो देखा,
टेबल की हर चीज़ बिखरी पड़ी थी
तुम्हारी दी हुई किताबें, पेन,
तुम्हारी तस्वीरें और
तुम्हारे कान का एक झुमका
जो तुमने एक शाम चलते हुए
मेरे पॉकेट में रख दिया था
टेबल पर बिखरी पड़ी थीं.
तुमने जो डायरी दी थी,
वो भी आधी खुली हुई सी,
टेबल से लटक रही थी..
एक पल सोचा टेबल समेट दूँ..
धुल जो पड़ी है टेबल पे, उसे साफ़ कर दूँ..
तुम्हारे दिए हुए तोहफों को भी
हिफाज़त से उस अनोखे से बक्से में रख दूँ
जिसे तुमने मुझे दिया था
पर कुछ भी समेटने का दिल नहीं कर रहा था
तुम्हारी यादों का हैंगओवर उतरा नहीं था.

वहीँ नीचे फर्श पे ,
गुलाबी रंग का वो खत गिरा हुआ था
जिसमें तुमनें जाने कितनी बातें लिखीं थी
तुम्हारे सभी पागलपन वाले किस्से,गाने,उल-जुलूल शायरी
और मेरे लिए लिखी हजारों नसीहतें..
वो खत उस लेटर-पैड का पहला पन्ना था,
जिसे मैंने तुम्हारे लिए अर्चिस से खरीदा था
खत देते वक़्त तुमनें मुझसे कहा था,
इस खत को हिफाज़त से रखना..
इसमें लिखी हुई बातों को हमेशा याद रखना..

उस खत को एक लिफाफे में लपेट कर रख लिया था मैंने..
दस साल हो गए,
खत अब भी मेरे पास है.. उसी लिफाफे में रखा पड़ा है  
हाँ, लिफाफा कुछ पुराना हो गया है
जगह जगह से फट भी गया है वो
लेकिन खत के ऊपर कभी धुल नहीं जमने दिया उस लिफाफे ने
वो खत आज भी उतना ही नया है जैसे दस साल पहले था,
आज भी जब वो खत पढ़ता हूँ,
तुम्हारी हर एक बात याद आती है,
तुम्हारे लम्स की गर्माहट को महसूस करता हूँ
तुम्हारा चेहरा दिखाई देता है खत में

सुबह से अब तक
दफ्तर में अकेला बैठा
जाने कितनी बार पढ़ चूका हूँ तुम्हारे उस ख़त को,
जितनी बार भी पढ़ रहा हूँ ख़त को
हर बार तुम्हारी यादों का नशा और चढ़ते जा रहा है
पन्द्रह कप कॉफ़ी भी पी चूका हूँ अब तक
सोचा कुछ तो हैंगओवर उतरेगा,
पर ये तुम्हारी यादों का हैंगओवर है..
कैसे उतरेगा इतनी जल्दी
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