Tuesday, June 29, 2010

मीना कुमारी की शायरी - पार्ट २

सच
यह तुलसी* कैसी शांत है
और काश्मीर की झीलें 
किस किस तरह 
उथल पुथल हो जाती हैं
और अल्लाह !
मैं !


*तुलसी - मुंबई से कुछ दूर तुलसी नाम की एक झील है 

कुछ आजाद नगमें.... मीना कुमारी जी के कुछ दर्द ...मीना कुमारी जी के कुछ नगमे आपने इस पोस्ट में देखें होंगे, उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए ये पार्ट २ ला रहा हूँ मैं. थोड़ी देरी से आई ये पार्ट २ , लेकिन ये वादा है पार्ट ३ में कोई देरी नहीं होगी :) मीना कुमारी जी की शायरी हमें बहुत भाती है, उनकी दो किताबें भी अपने पास हैं :) उन्ही किताबों के कुछ पन्ने पेश कर रहा हूँ ..




लम्हे 

कई लम्हे 
बरसात की बूंदे हैं 
नाकाबिले-गिरफ्त*
सीने पे आकार लगते हैं 
और हाथ बढ़ा 
की इससे पहले 
फिसल कर टूट जाते हैं


*नाकाबिले-गिरफ्त-जो पकड़े न जा सकते हों.

                   एक  गज़ल

टुकड़े-टुकड़ेदिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली 
जितना जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली .


रिमझिम रिमझिम बूंदों में, जहर भी है और अमृत भी ..
आँखें हंस दी,दिल रोया, ये अच्छी बरसात मिली..


जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज़ सुनी..
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली..


मातें कैसी  घातें क्या , चलते रहना आठ पहर,
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली..


होठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे 
जलती-बुझती आँखों में,सादा-सी जो बात मिली..


चलते चलते दो लाइन और सुनाना चाहूँगा..

खुद में 
महसूस हो रहा है 
जो 
खुद से बाहर 
तलाश है उसकी..