Thursday, June 17, 2010

रात के अंधरे में एक सन्नाटा है..

इस रात के अँधेरे में,
एक सन्नाटा है
हवा एक सरगोशी सी कर रही है
पूछ रही है
ये हवा आज,
इस गहरे सन्नाटे में
तू आज चुप क्यों है..
कोई गीत क्यूँ नहीं सुनाता
कोई नज़्म क्यूँ नहीं पेश करता


कौन  सी पुरानी बातों को मुट्ठी में बंद करूँ,
कौन सा गीत सुनाऊं?
मैं भी तो इसी कशमकश में हूँ..
हर नज़्म आज रूठी है
हर गीत आज भूल गया हूँ
यादों  के तो कई लम्हे कैद हैं आँखों में,
मगर आज वो यादें
क्यों गीत बनने से इन्कार कर रही हैं?

ये मद्धम शीतल हवा आज
तुम्हारे लम्स सी गर्माहट लिए हुए है
कायनात के हर कोने से जैसे
तुम्हारी आवाज़ सुनाई देने लगी है..
इस सफेदपोश रात में
धीरे धीरे मैं खोते ही जा रहा हूँ कहीं..
चलने लग गया हूँ माजी की उन पगडंडियों पर
और अचानक चलते चलते
एक तूफ़ान उठा,
और
उन माजी की हसीन गलियों से ला पटक.
फेंक दिया मुझे फिर इस तनहा रात में..
जहाँ बस बेपनाह अँधेरा है
सन्नाटा है
और मैं हूँ !