Tuesday, June 15, 2010

उस दिन के बाद वैसी बारिश फिर नहीं हुई..


उस दिन तेज बारिश हो रही थी, आधी रात से ही..सुबह भी बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी..बरामदे में एक स्कूटर लगी रहती थी, उस पर बैठा मैं सोच रहा था..इतनी तेज बारिश हो रही है..वो आएगी क्या??उसने तो कहा था कल की वो आएगी...लेकिन  बारिश भी तो कमबख्त इतनी तेज हो रही है..इतनी तेज बारिश में आ पाना संभव है क्या??...
हाँ बिलकुल आएगी, वो जो बोलती है, उसे पूरा करती है..दिल के किसी कोने से आवाज़ आई
...तो वो आएगी तो मैं कैसे नहीं जाऊंगा..मुझे तो जाना ही है...चाहे कुछ भी हो जाये...लेकिन ये बारिश थोड़ी भी तो रुके, वरना घर वाले हरगिज जाने नहीं देंगे..


नानी से सुन रखा था, की अगर कुछ लकड़ियाँ या जलावन जलाया जाए तो बारिश रुक जाती है..मैं बैठे बैठे ये सोच रहा था की अगर ये बात सच है तो कोई जला क्यूँ नहीं रहा लकड़ियों को.क्या सब के सब बारिश का आनंद ले रहे हैं और मैं अकेला इस बारिश से परेसान हो रहा हूँ? ? घर के सामने जो दुकाने थी, सब के सब हमें पहचानते थे..दूकान से एक आदमी आया, शायद माँ ने कुछ सामान मंगवाया था दूकान से,.. उसने कहा "अरे भैया, निरंजन स्वीट्स तक पानी लगा हुआ है और वो भी घुटना तक..." मेरी परेशानियाँ और चिंता बढ़ने लगी...की आज नहीं जा पाउँगा तो क्या होगा...कल तो वो दिल्ली चली जायेगी, और फिर अगले महीने पटना से क्या, इस देश से बाहर चली जायेगी, लन्दन..और फिर शायद कभी उससे मिल नहीं पाउँगा..उसने कल कितनी मिन्नत की थी, कहा कुछ भी हो जाये, हम कल मिलेंगे...मैं कैसे उसके किसी बात को नकार सकता हूँ...मुझे तो आज जाना ही पड़ेगा..

एक अजीब सी सनसनी दौड़ गयी, कुर्सी पर रखे टी-शर्ट और जींस को उठा कर आयरन करने लगा...
माँ ने जब देखा की मैं कहीं जाने की तय्यारी में हूँ तो उन्होंने पुछा, "कहाँ जा रहे हो? बारिश हो रही है, देख नहीं रहे...."
"कुछ काम है माँ,एक दोस्त ने बुलाया है...बहुत ही जरूरी काम है, शायद कुछ फॉर्म भरने की बात हो,जाना पड़ेगा". मैं नज़रें दूसरी तरफ कर के माँ से बात करता हूँ...मुझे माँ के सामने बहाना बनाना पसंद नहीं आ रहा लेकिन इसके अलावा दूसरा और कोई रास्ता भी नहीं था.
अच्छा ठीक है, नाश्ता बन रहा है..रोटी,सब्जी बन जाए तो नास्ता कर के , कुछ खा के ..बारिश कम हो जाए  फिर चले जाना ..पर इस बारिश में साइकिल से कहाँ जाओगे?भींग जाओगे?स्कूटर से भी मत जाना..बारिश है, रास्ते पे फिसलन होगी..माँ ने कहा. "
"उतना वक़्त नहीं है माँ...अभी तुरंत निकलना है मुझे...मैं इंतजार नहीं कर सकता...तुम सिर्फ रोटी और दूध दे दो मुझे, वही खाकर चला जाऊँगा और साइकिल या स्कूटर से नहीं, छाता लेकर मैं ऑटोरिक्शे से ही चला जाऊँगा." मैंने माँ से कहा.

सुबह के १० बज रहे थे, और उसपर से सन्डे का दिन..फिर भी लग रहा था की हर चीज़ रुक सी गयी हो..सन्डे का तो नाम-ओ-निशान नहीं दिख रहा था..सड़कों पे सन्नाटा था, घरों की खिड़कियाँ बंद, पापा एक कोने पे अखबार पढ़ रहे थे और बहन टी.वी के सामने..माँ किचेन में, और बाहर बारिश की तेज आवाजें...पापा ने कहा बहुत तेज बारिश हो रही है, शायद रुकेगी नहीं अभी कुछ देर..मैंने पापा की बात को अनसुना कर दिया और चुप चाप अपने दूध-रोटी के तरफ ध्यान दिया और खाना शुरू कर दिया....

ये कमीने टी.वी चैनल वाले भी तो कभी कभी गाना अजीब बजाते हैं.. "लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है." किस चैनल पर दिखाया जा रहा था...ऐसे वक़्त पर ये गीत मेरी बेचैनी को और ज्यादा बढ़ा रही थी.

मैं जल्दी जल्दी नास्ता कर के घर से निकला, कंधे पे बैग लटकाए,और एक हाथ में छाता लिए मैं ऑटो स्टैंड पर ऑटो का इंतज़ार कर रहा था,..उस दिन जिस सड़कों पे ऑटो की भीड़ लगी रहती थी, ऐसा लग रहा था जैसे ऑटो सब एक साथ गायब हो गए हो..बड़ी मुश्किल से एक ऑटो मिला. ऑटो से जैसे ही उतरा, उसे पैसे दे रहा था और सोच ही रहा था...शायद कुछ इंतज़ार करना पड़े, उसे आने में लेट भी हो सकती है..राजेन्द्र नगर से बोरिंग रोड भी तो दूर है ऊपर से बारिश भी हो रही है...,उतने में पीछे से आवाज़ आई -

"हेल्लो ...ओ माई गौड...देअर यु आर...आ गए इतनी जल्दी....आई वाज़ थिंगकिंग यु विल नोट कम टुडे, मैं तो बस अब थोड़ी देर में वापस जाने वाली थी.." पीले समीज सलवार में वो आज बिलकुल अलग दिख रही थी..उसके चेहरे पे कुछ बारिश की बूँदें दिखी मुझे...उसमे एक अजीब सी दिलकशी थी...एक पल के लिए मानो सब थम गया हो, एक तो आज बारिश और उसपे उसका वो रूप.. उस लम्हे को कहीं कैद कर लेने का मन कर रहा था..उसके चेहरे से नज़र हट नहीं रही थी...मेरे मुह से बस इतना ही निकल सका - तुम्हारे काम तो हो गए न सारे?सारे फॉर्म फिल-अप हो गए न...?

"ओफ्फहो..इतनी अच्छी बारिश है, मौसम इतना अच्छा है,फॉर्म-वोर्म तो फिल होते रहते हैं यार..हद करते हो.. चलो कुछ खाते हैं पहले..मैं सुबह बस पावरोटी-जैम खा कर आई हूँ...भुख लग रही है...." 
उस दिन शायद मेरी आवाज़ को सही में कुछ हो गया था...उसकी इस बात पर मैं बस इतना ही कह पाया... - ओके..चलो..

हम अपने पसंदीदा दूकान "सैंडविच" में आ गए, और उसने दो पेस्ट्री और समोसे मंगवाए...वो पेस्ट्री खाते हुए कहती है मुझसे -
"पता  है तुम्हे,बारिश कितनी अच्छी होती है, सुहानी होती है...देखो तो बारिश में पेड़ों पे एक नयी बहार आ जाती है, एक नया रंग आ जाता है..हर कुछ कितना अच्छा दीखता है...कितना हसीन दीखता है..मिट्टी की सौंधी खुशबु कैसे मन को मोह लेती है.."

मैंने मुस्कुराते हुए उससे पुछा - पोएट बन रही हो तुम तो..ये शायरी में बाते कब से करने लगी तुम?

एक प्यारी मुस्कराहट के साथ उसने कहा "बारिश तो इंसान को प्यार करना सीखा देती है, ये तो फिर भी शायरी है..

मैं सोच रहा था, जिसे कभी शायरी भाती न थी, जो हमेशा गज़लों और कवितायों से दूर भागे रहती थी, जिसे कवितायेँ कभी समझ नहीं आई, वो आज शायरी कर रही है...ये बारिश सच में कुछ भी सीखा सकती है.. :)
उसकी बातें उसके जैसी ही बेहद प्यारी लग रही थी...अचानक फिर से कहती है वो -
"यु नो आई जस्ट लव दिस रेन..आई लव दिस बारिश..मुझे तो बस मन करता है की भीगते रहू और बारिश के पानी में बच्चों की तरह उछलते कूदते रहू..नाचू, गाऊं इस बारिश में...पता है जब मैं छोटी थी तब हमेशा सोचती थी की शायद आसमान में कोई टैंक या रेज़रव्वार है जिसने पानी एक जगह कैद रहता है, और उसे ऊपर बैठा वो हमें जुलाई और अगस्त के महीने में अपनी मर्ज़ी मुताबिक देता रहता है...बाद में जब समझ भी आई की बारिश कैसे होती है, तो भी अपने उस शुरुआती लॉजिक को मैं दिमाग से कभी नहीं निकाल पायी..और आज भी जैसे लगता है की कहीं आसमान में सच में एक रेज़रव्वार है.

उसकी इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था..मैंने बात को पलटना चाहा.."वो सब तो ठीक है, लेकिन अभी सोचो भी मत बारिश में नाचने की...तुम्हे वैसे ही सर्दी है...तुम्हारी तबियर भी बिगड़ सकती है...तबियत का तो ख्याल करो तुम..हमेशा लापरवाह.."

दूसरा पेस्ट्री हाथ में लेते हुए कहती है.."हू केअर्स...." 
वो कुछ देर पेस्ट्री खाने में व्यस्त रहती है फिर ...  "ओह आई लव दिस पेस्ट्री ओफ "सैंडविच"..पता नहीं वहां क्या क्या मिले खाने को..."सैंडविच" कि पेस्ट्री और समोसे कहाँ मिलेंगे मुझे लन्दन में....पता नहीं वहां समोसे खाने नसीब होंगे भी या नहीं."

एक पल के लिए वक्त जैसे ठहर गया, सब कुछ खामोश...बारिश भी एका-एक थम गयी हो जैसे...उसका चेहरा भी ये बात कहने के बाद अपसेट सा हो गया कुछ..वो मेरे तरफ ऐसे देख रही थी जैसे कोई बड़ी गलती कर दी हो उसने...उसे गिल्ट सी होने लगी, जिस बात से हम बचना चाह रहे थे, उसके बाहर जाने की बात से..उसने खुद ही उस बात को छेड़ दिया था...मेरी भी नज़रें इधर उधर जाने लगी..शायद आँखों की नमी छुपाने के लिए..

खुद को सँभालते हुए मैंने कहा...अरे वो लन्दन है..लन्दन...और ये पटना..जब यहाँ ये सब मिलता है..वहां सोच भी नहीं सकती क्या क्या मिलेगा..बस तुम बाहर के लोगों जैसा कीड़ा-मकोड़ा मत खाना शुरू कर देना...खासकर के जैसा खाना चाइनीज़ लोग खाते हैं...सांप,बिच्छू..और पता नहीं क्या क्या...तुम वो सब मत खाना नहीं तो तुम्हारी नानी और दादी तुम्हे घर में घुसने भी नहीं देंगी...


ये बात सुन कर हलकी सी मुस्कान फिर से उसके चेहरे पे वापस आई.. 


कुछ देर बाद बारिश थमी और वो वापस चली गयी...उसके जाने के बाद बहुत देर वहीँ बैठे बैठे कुछ सोचता रहा.मुझे घर वापस आने की कोई जल्दी नहीं थी और मैं सड़कों पर बहुत देर तक यूँही भींगते हुए इधर उधर भटकते रहा...उन सब जगहों पर घूमते रहा जहाँ उसके साथ मैं बारिश के दिनों में घूमता था...

उस दिन के बाद वैसी बारिश फिर कभी नहीं हुई..