Monday, June 14, 2010

बारिश

आज की बरसात,
बिलकुल वैसी ही है, जैसा पहले हुआ करती थी..
एक ज़माने बाद बारिश में भीगने का मजा आया..
एक ज़माने बाद फिर से वही मौसम लौटा..
सब कुछ तो वैसा ही है, पर तुम नहीं हो..

ये बूंदे जो चेहरे को छु के जा रही हैं,
बार बार सवाल कर रही हैं मुझसे,
तुम्हारे बारे में पूछ रही हैं..
मैं बेबस खड़ा, उनके सवालों को बस सुन रहा हूँ..
कोई जवाब न मेरे पास है, न तुम्हारे पास..

तुम्हे तो बारिश में भीगना अच्छा लगता है,
अब भी भीगती होगी बारिश में..
आँखें  भी कभी भर आती होगी,
जब मेरी याद आती होगी..

तुमसे  ही मैंने जाना, बारिश होती क्या है..
बारिश  की बूंदों में क्या दिलकशी है,
बारिश  में भी अब,
दिल रूमानी नहीं होता, यादें तरपती रहती हैं..
आंखों को तो अब
बरसात से ज्यादा
हर वक्त की फुहार ही अच्छी लगती है..