Monday, June 14, 2010

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बारिश

आज की बरसात,
बिलकुल वैसी ही है, जैसा पहले हुआ करती थी..
एक ज़माने बाद बारिश में भीगने का मजा आया..
एक ज़माने बाद फिर से वही मौसम लौटा..
सब कुछ तो वैसा ही है, पर तुम नहीं हो..

ये बूंदे जो चेहरे को छु के जा रही हैं,
बार बार सवाल कर रही हैं मुझसे,
तुम्हारे बारे में पूछ रही हैं..
मैं बेबस खड़ा, उनके सवालों को बस सुन रहा हूँ..
कोई जवाब न मेरे पास है, न तुम्हारे पास..

तुम्हे तो बारिश में भीगना अच्छा लगता है,
अब भी भीगती होगी बारिश में..
आँखें  भी कभी भर आती होगी,
जब मेरी याद आती होगी..

तुमसे  ही मैंने जाना, बारिश होती क्या है..
बारिश  की बूंदों में क्या दिलकशी है,
बारिश  में भी अब,
दिल रूमानी नहीं होता, यादें तरपती रहती हैं..
आंखों को तो अब
बरसात से ज्यादा
हर वक्त की फुहार ही अच्छी लगती है..

9 comments:

  1. अच्छी है अभिषेक, लगता है किसी खास के लिए बड़े प्यार से लिखा है, अच्छी लगी :) थोड़ा दर्द भी है
    कभी आपसे आराम से बात करुँगी इस मामले पे, और बहुत सवाल भी पूछने है आपसे किसी के बारे में ;-)

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  2. भावों को अति सुन्दर अभिव्यक्ति दी है आपने अपनी रचना में...बधाई
    नीरज

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  3. बारिश के माध्यम से निजी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यक्ति.......सुन्दर व सशक्त रचना हेतु बधाई।

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  4. waah kiske liye likhi hai sir ji...mast sarabor kar dene wali rachna...

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  5. जब भी सावन कोई बरसा है तो महसूस हुआ..
    इश्क के दरिया में तू मुझको भिगोने आया!
    सुन्दर!!

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  6. तुम्हे तो बारिश में भीगना अच्छा लगता है,
    अब भी भीगती होगी बारिश में..
    आँखें भी कभी भर आती होगी,
    जब मेरी याद आती होगी..

    वो यादों की बारिश ....
    वो ख्वाबों की बारिश ...
    वो तन्हाइयां ...
    वो जुदाइयों की बारिश ....

    कोई राज़ है दर्दे दिल का .....

    बहुत खूब ....!!

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  7. बहुत सुन्दर!

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