Friday, June 4, 2010

एक ट्रेन का सफर..कुछ खास यादें...शिखा और दिव्या...


आज  से ठीक दस साल पहले..

नहीं मैं नहीं आ सकता..घर में क्या बताऊंगा, क्या बोलूँगा? परीक्षा तो बस एक दिन का ही होता है, ऊपर से वहां मेरी दीदी भी हैं..इम्पासबल


प्लीज..ट्राई करो न..तुम नहीं आओगे तो सुना सुना लगेगा..बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा..


तुम सब चले जाओ यार..मेरे नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए..


फिर मैं भी नहीं जाउंगी...तुम्हारे बिना अजीब लगेगा..वैसे भी तुम पहले भी जा चुके हो लखनऊ.हमें मदद मिलेगी..और फिर मैं बोर भी तो होउंगी..किससे बातें करुँगी? प्लीज प्लीज प्लीज प्लीज प्लीज प्लीज...आई डोंट नो एनिथिंग.....प्लीज प्लीज प्लीज प्लीज प्लीज....मेरे लिए चलो...प्लीज...


ओफ्फो यार...घर में अब सबके सामने एक नयी बात कहनी पड़ेगी...फिर से प्लान चेंज...क्या बोलेंगे हम?


अरे एक बार ट्राई तो करो..कोई बहाना बना लो?


नहीं यार...इत्ता आसान नहीं है न...नॉट दिस टाईम..तुम लोग जाओ न..

(इतने में ही उसकी आँखें नम हो गयी, लगा की बस अब रो देगी..वैसे भी नाज़ुक सी है, आंसूं भी उसके निकलने में वक्त नहीं लगाते..ये सब सोच कर मैंने कहा -)


अच्छा ठीक है , मैं कोशिश करूँगा, वैसे भी अभी 15 दिन हैं जाने में..लेकिन हम आने जाने की रेज़र्वेशन अलग अलग करवाएंगे!! बाद में ट्रेन पे एडजस्ट कर लेंगे..अब साथ साथ टिकट नहीं होगा तो मेरे से लड़ना मत..

वाउ...वन्डर्फल....दिस काल्स फॉर ए पार्टी यार...ट्रीट मेरे तरफ से आज..लेट्स गो टू गोविन्द भाई दूकान!!

गोविन्द  भाई के दूकान पे , नूडल्स खाते हुए और कुछ गुनगुनाते हुए पूछती है 

अच्छा एक बात बता...मैं बोली इसलिए आ रहे हो न...यू केयर फॉर मी सो मच.
प्यारा सा चेहरा बना के, कुछ बड़े अजीब से इक्स्प्रेशन के साथ वो कहती है...थैंक यू फॉर मेकिंग मी फील लाईक प्रिंसेस".
ये उसका पेट डाइअलॉग था 


हाँ रे...ई भी कोई कहने की बात है, तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त जो हो..!  

"थैंक  यू...थैंक यु...थैंक यु...." उसने एक ही सांस में जाने कितनी बार थैंक यु कहा होगा. फिर अपने पे ही इतराते हुआ और पास में बैठी दिव्या को ये जताते हुए की ही "वो तुमसे अच्छा मेरा दोस्त है", उसे लगातार छेड़ने लगी और दोनों की फेमस लड़ाई फिर से शुरू हो गयी, वहीँ दूकान पर ही...


इसके बाद हम वहां से वापस घर आ गए...फिर थोड़े दिन बाद लखनऊ भी गए...जब लखनऊ से वापस घर आ रहे थे  सब काम खत्म कर(मेरा परीक्षा,उसका डांस इवेंट, उसे लखनऊ घुमाना जिसके अलग से किस्से हैं)तो एक अजीब वाकया हुआ...हम जिस दिन वापस आने वाले थे..हमारी ट्रेन थी रात में ९ बजे,श्रमजीवी एक्सप्रेस...मेरी बात शिखा और दिव्या से ज्यादा नहीं हो पायी थी...सुबह बस थोड़ी देर दिव्या से बात हुई थी, जहाँ वोप ठहरी थी वहां मैंने फोन किया था और बस इतना पता चला था की शिखा को थोड़ा बुखार है..मैंने जब पूछा की आज जा पाओगी या टिकट कैंसल करवानी है, उसने कहा की आज जाना है!
शाम रेलवे स्टेशन पहुँचते हुए मुझे थोड़ी देर हो गयी...

  
दिव्या :  यार कहाँ रह गए थे इतनी देर, ट्रेन बस खुलने वाली है अभी कुछ देर में...क्या यार?थोड़ा पहले आते.. ऊपर से शिखा की तबियत भी ठीक नहीं.शायद फीवर है...क्या करें?.


अरे यार दीदी जिद करने लगी की वो भी स्टेशन तक आएँगी..इसी चक्कर में मैं लेट हो गया, और ऊपर से इतनी ट्रैफिक थी...वैसे क्या हुआ शिखा को?अभी तक फीवर उतरा नहीं है?

दिव्या- नहीं यार....वैसे लता मैडम ने कुछ दवाइयां दी थी.लेकिन कुछ असर नहीं हो रहा है.लता मैडम के डांस स्कूल में थोड़ा काम है नहीं तो आज हम लोग रुक जाते.

अरे क्या काम यार? हद है...वो बीमार है...रिस्पान्सबिलिटी तो उन्ही की है न, तो फिर? एक दिन रुक ही जाने में कोई पहाड़ तो नहीं टूट पड़ता, ऐसा कौन सा जरूरी काम होता है??सब बहाने है..हद नौटंकी है.
थोड़ी दूर पर शिखा बैठी थी और हम दोनों की बातचीत सुन रही थी...मैंने पूछा उससे "क्या हुआ रे?दावा खायी या नहीं?कैसी तबियत है अब?

अरे यार तुम इतना टेंसन मत लो..ठीक हूँ मैं!

चेहरा मुरझाया हुआ लग रहा था और बोल रही थी वो की मैं ठीक हूँ,  उसकी वो हालत देख मुझे लगातार लता मैडम पर गुस्सा आ रहा था...मन तो कर रहा था की जाकर अच्छे से कुछ सुना आऊं उन्हें..अगर वो रुक जाती तो क्या हो जाता?मैं भी रुक जाता उस दिन...घर से निकलने वक़्त तक जीजा जी ने और दीदी ने कितना कहा था की एक दिन और रुक जाओ..कल का रिजर्वेसन करवा देते हैं...खैर,

दिव्या, तुम रुको थोड़ा एक दो और दवाई लेकर आता हूँ मैं और कुछ स्नैक्स भी लेते आऊंगा...बाहर दुकान से, रात भर का ट्रेन है...जरूरत पड़ सकती है.

अरे यार ट्रेन खुल जायेगी...कहाँ जा रहे हो...दवा तो है ही...

अरे नहीं खुलेगी..अभी आते वक्त देख के आया हूँ ट्रेन एक घंटे लेट है..मैं बस अभी आया...बस 5 मिनट में..

तेजी से दौड़ते हुए स्टेशन के बाहर भागा....पता नहीं क्या बात थी, रात ज्यादा हो गयी थी या सन्डे का दिन होने की वजह से दुकाने बंद थी.एक दवा की दुकान खुली मिली, वहां से दवा लेकर जल्दी जल्दी वापस आया...

शिखा तुमने कुछ खाया है या नहीं? 

नहीं यार....मुहं का टेस्ट अजीब सा हो गया है? खराब सा...कुछ खाने का मन नहीं कर रहा..तुम खाना खा के आये हो..????


हाँ...लेकिन दीदी ने कुछ बना कर पैक भी कर दिया है...वो तुम खा लेना...चलो अब समान रख देते हैं सीट पे...ट्रेन खुलेगी पन्द्रह बीस मिनट में.

अच्छा एक बात बताओ तुम ज़रा..तुम्हारी सीट कौन सी बोगी में है?कम्पार्ट्मन्ट कौन सा है?सीट एक्सचेंज होगा क्या?वैसे नहीं भी हुआ एक्सचेंज तो फर्क नहीं पड़ेगा...सुबह तो पहुच ही जायेंगे.

हाँ हाँ...सीट क्यों नहीं एक्सचेंज होगा..उसकी तबियत नहीं देख रही क्या तुम? एक्सचेंज कर लेंगे..घबराओ मत तुम..

हा हा हा...हम कहाँ घबरा रहे हैं...बेवजह टेंसन तो तुम ले रहे हो.बिना किसी बात की..क्यूँ इतना परेसान हो रहे हो?बस फीवर ही तो है, ऊपर से तुम एक्स्ट्रा दवा भी तो ले आये.डोन्ट वरी, शी विल बी फाईन! 

हम्म...रुको मैं सीट का बन्दोबस्त कर के आता हूँ.

ट्रेन में उतनी भीड़ नहीं थी और ट्रेन लगभग खाली जा रही थी..तो हमें सीट एक्सचेंज करने की जरूरत नहीं हुई..वो सब जहाँ थे, वहीँ एक मिडल सीट खाली थी..मैंने जाकर टी.टी को कह दिया की उस सीट पे मैं रहूँगा, अगर कोई आये तो उसे मेरा सीट दे दे वो..टी.टी ने कोई आपत्ति नहीं दिखाई.साइड अपर सीट था शिखा का और साइड लोवर था दिव्या का.
सीट पे सारा सामान अरेंज कर के हम बैठ गए...दिव्या को रिक्वेस्ट किया की तुम मिडल सीट पे चली जाओ और मैं यहाँ रहूँगा..वो भी आराम से मान गयी..दिव्या और शिखा के अलावा इन लोगों के साथ 4 और लड़कियां थीं जो दुसरे कम्पार्टमेंट में थीं.

लो खा लो कुछ, दीदी पुरी-सब्जी बना कर दी हैं..खा लो फिर दवा खा लेना.

प्लीज यार...खाने का बिलकुल मन नहीं है.बस वो खिड़की बंद कर दो...ठंड लग रही है..


अच्छा रुको, खिड़की बंद कर देते हैं...ठीक है खाना नहीं खाना है तो ये बिस्कुट और केक खा लो.

यार, प्लीज लिव इट..आई डोन्ट फील लाइक ईटिंग..प्लीज..!


चुप चाप खाओ तुम, दवा तुम्हे एक और खानी है अभी.चलो जल्दी खाओ(गुस्से में मैंने कहा)


ठीक है बाबा......खाती हूँ... इतना गरम काहे हो जाते हो तुम(वो तो है ही नाज़ुक सी ..थोड़ी डांट में ही डर भी जाती है )


वो बिस्कुट बड़े ही स्टाइल से कुतर कुतर के खा रही थी और टैबलेट हाथ में लेकर पता नहीं क्या बकवास किये जा रही थी.मैं उस समय सोच रहा था की देखो, बीमार है लेकिन स्टाइल अभी तक गया नहीं...बिस्कुट खाने का अब अलग स्टाइल..दवा पे पता नहीं क्या रिसर्च कर रही है.हद ही हो गयी ;)

तुम्हे नींद आ रही है क्या? तुम सो जाओ..

नहीं तो 


हम्म...तो इधर हीं बैठो न अभी, मेरे पास....मेरा सोने का मन नहीं है...

शिखा तुम सो जाओ...आराम करो...अभी तक बुखार उतरा नहीं है.....नहीं तो तबियत और बिगड़ जायेगी.और मैं तो यहीं पर हूँ....लता मैडम भी बगल वाले कम्पार्टमेंट में हैं.दिव्या भी तो यहीं पे है..सो जाओ आराम से.

हाँ  हाँ मिस्टर चौकीदार साहब हैं ही...सो जाओ शिखा..
दिव्या ने मुझे देखते हुए हँसते हुए कहा

ओए  दिवू तू क्या क्या बोलते रहती है....एक तो होता नहीं की पास मैं बैठे और गप्पें करें..नोवेल में घुस जा तू जाकर बस..नॉवेल में ही घर क्यों नहीं बना लेती.....बत्तमीज लड़की..

मैडम जी अब तू ड्रामे बंद कर अपनी...अपने डायलोग अपने पास ही रख...तबियत खराब है तो सो जा...फ़ालतू के गोसिप मुझसे नहीं होते...समझी!!

अरे यार तुम लोग क्यों लड़ रही हो....तुम सो जाओ शिखा...

नहीं मुझे नींद नहीं आ रही है..ये दिव्या तो नखरे करते रहती है हमेशा...मेरे पास बैठ भी नहीं रही....तुम ही बैठो न कुछ देर.. बात करेंगे..वैसे तुम जो खाना लाये हो खा क्यों नहीं लेते...?
   
एक तो उसकी तबियत खराब थी और वो बातें कर रही थी..गुस्सा तो आ  रहा था लेकिन फिर भी उसकी बात रखते हुए उसके बगल वाली सीट पे बैठ गया..
कितना खायेंगे यार हम?...वैसे भी खाना खा कर आ रहे हैं...


ओह....अच्छा हाँ, तुमने बताया था..बुखार में मैं सब भूल जाती हूँ.पता है आज शाम न लता मैडम भी परेसान हो गयी थी बहुत...मुझे लगा की आज जाना कैंसल हुआ.

मैंने बहुत धीरे से कहा "हम्म...तुम फ़ालतू में हमेशा कहती रहती हो की लता मैडम बहुत ख्याल रखती हैं ...देखो तो वो आराम से सो भी गयीं....तुम्हारी तबियत भी ठीक नहीं!

अरे नहीं वो आज बहुत ज्यादा थक भी गयीं थीं रे....इसलिए सो गयीं होंगी...पाता है आज उन्होंने कितना काम किया...दिन भर भाग-दौड़..नॉन स्टॉप..

हम्म...

एक लंबे पॉज़ के बाद..दिव्या कहती है...


तुम लोग अभी तक सोये नहीं ?? क्या यार सो जाओ...शिखा नाटक मत कर तू..तबियत खराब है तेरी...सो जा चुप कर के...

मैं तो कब से कह रहा हूँ इसे सोने के लिए...ये माने तब न..


तुम सुनो इसकी फ़ालतू के गोसिप..मैं सो रही हूँ अब...नींद आ रही है...


ठीक है ठीक है सो जाओ...गुड नाईट..


गुड नाइट दिवू...तू बस अपने "मिल्स एन बून्स" पढ़ती रह...और सोती रह...कोई और काम तो तुझसे होता नहीं..

तबियत खराब है तेरी...चुप कर के बैठ ये तो होता नहीं, हम दोनों को परेसान कर रखा है सुबह से..मुझे सोने दे..दिव्या ने कहा, और वो सोने चली गयी...


यार तुम हद कर रही हो...बहुत जिद्दी होते जा रही हो तुम...आराम से सो जाएँ ये तो होता नहीं और फ़ालतू में बहसबाजी कर रही हो दिव्या से...जब तबियत ठीक हो जाएगा तो जितना मन करेगा उतना लड़ना.

"अरे ये पागल मुझे इरिटेट कर देती है तो क्या करूँ...खैर जाने दो." उसके चेहरे का भाव फिर से अजीब सा हो आया था.

फिर कुछ देर हम दोनों दोनों चुप रहे और वो एकाएक मेरे को देख कर कहने लगी..
"अरे... तुम जानते हो.....इस बार के स्टारडस्ट में सलमान खान का एक बहुत बहुत अच्छा आर्टिकल आया है...तुम पढ़े की नहीं...जरूर पढ़ना..मेरे पास है...कोचिंग में ले लेना..और ऋचा(मेरी बहन) को भी पढाना...हम दोनों सेम सेम हैं...सलमान खान फैन्स यु सी..उसे पसंद आएगा वो आर्टिकल, और तुम्हारी ग़लतफ़हमी दूर होगी"

":o :o :o" बिलकुल यही एक्सप्रेसन था मेरे चेहरे का..
अब तुम्हे फीवर में सलमान खान याद आ रहा है...चुप चाप सो जाएँ ये तो होता नहीं...

फिर से एक अजीब सा एक्सप्रेसन बनाते हुए, क्यूट सा एक्सप्रेसन बनाते हुए देखती है मुझे..और गुस्सा हो जाने का नाटक करती है, मैं उसे देख मुस्कुरा देता हूँ..

ठीक है ठीक है..बोलो क्या कह रही थी...ऐसे जोकर टाईप चेहरा अब मत बनाओ...

फिर से अपने पे इतराते हुए, पूरी कहानी, पूरा वो आर्टिकल सुना रही थी मुझे...मैंने हंस के पूछ दिया :
जितना ये आर्टिकल याद है तुम्हे, उतना कभी पढाई भी की हो तुम?एक आर्टिकल सलमान खान का याद है और काम की बातें कितनी याद रहती हैं तुम्हे?जितना तुम सलमान खान के बारे में पढ़ती है उतना ही अगर केमिस्ट्री फिजिक्स पढ़ती न तो पिछले साल ही आई.आई.टी क्रैक कर लेती तुम..


थोड़ी देर बाद उसे नींद आने लगी थी..मैं भी अपर बर्थ पे चला गया...मुझे तो नींद आ नहीं रही थी,पता नहीं क्यों....कुछ अच्छा अच्छा सा नहीं लग रहा था...हो सकता है शाम में सब कुछ इतनी जल्दबाजी में हुआ उसकी वजह से या फिर मैं एक दो दिन और रुकना चाहता था वो वजह थी या फिर इसके तबियत का ख़राब होना. जो भी हो वजह मैं सो नहीं पाया...मैं बार बार नीचे देख रहा था, की कहीं वो जाग तो नहीं गयी..फिर कुछ देर बाद ही उसकी नींद खुल गयी...मैंने ऊपर से पुछा..
 
क्या हुआ रे???नींद नहीं आ रही क्या? 

अरे  तुम जागे हुए हो???? ":o :o :o" ये वाला एक्सप्रेसन इस बार उसके चेहरे पर था.


हाँ बस ऐसे ही


ओह...मुझे पता नहीं क्यों नींद नहीं आ रही यार...

हम्म...रुको आते हैं नीचे...


एक तो उसे फीवर था, फीवर तो अब दवा खाने के बाद बहुत कम हो गया था लेकिन सर्दी अभी भी थी उसे...उसे थोड़ी नींद सी आने लगी...उसने मेरे कंधे पर अपना सर रख दिया और वो सो गयी..कुछ देर बाद मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा तो पूरा चेहरा लाल पड़ गया था.अजीब सा चेहरा हो गया था उसका..मुरझाया सा...मैं सोचने लगा जिसका चेहरा हमेशा इतना खिला रहता है उसके चेहरे की ऐसी हालत? भगवान इसके जैसी इतनी प्यारी और नाज़ुक लड़कियों की तबियत आखिर खराब करते ही क्यों हैं...इन्हें तो हमेशा खुश रहना चाहिए, बहुत ज्यादा खुश.मैं उसके चेहरे के तरफ पता ज्यादा देर देख नहीं सका, मेरा मन अजीब सा हो गया था, मुझे कुछ समझ नहीं आया की मैं क्या करूँ..कुछ देर तक मैं वहीँ बैठा रहा, उसकी जब नींद खुली तो उसे अहसास हुआ की वो मेरे कंधे पर अपना सर रख सो गयी थी.उसे फिर बर्थ पर सोने कह कर मैं अपने बर्थ पर वापस चला गया.सुबह के ३ बज रहे थे उस वक्त और पटना पहुचने में अब भी ४ घंटे बाकी थे.

सुबह ५ बजे दिव्या की नींद खुली..वो शिखा के पास आकर बैठ गयी.

मैंने ऊपर बर्थ से कहा,सो रही है दिव्या वो, अभी दो-तीन बजे सुबह तो वो सोयी है...

दिव्या मेरी तरफ देख कर हँसते हुए,मुझे चिढ़ाते हुए कहती है

मिस्टर चौकीदार..तुम सोये नहीं थे क्या रात भर..हम्म..??

नहीं यार मैं भी सोया था अभी उठा हूँ...


चुप रहो...आराम से पता चल रहा है की तुम सोये नहीं थे...हा हा हा फिर हँसने लगी वो 


अरे  मैं सोया था लेकिन अचानक शिखा उठ गयी तो मेरी भी नींद खुल गयी...वैसे तुम और मैडम तो सो ही रहे थे...इतना भी नहीं हुआ की शिखा की तबियत खराब है तो पास बैठे थोड़ी देर...


हा  हा हा...मुझे पता था न की तुम हो इसलिए हम आराम से सो गए थे....और देखो तो, मैडम तो अभी भी सो रही हैं ...रुको मैं अभी उठाती हूँ मैडम को...

फिर दिव्या ने मैडम को उठाया...फिर कुछ देर में शिखा की भी नींद खुली, वो मेरे तरफ देखी ऊपर, फिर पूछती है 
कब उठे अभिषेक?


अरे  वो सोया ही कब था की उठेगा....दिव्या ने मजाकिया रूप में और मुझे चिढाने के लिए कहा शिखा से..


तुम  सोये नहीं थे???? :o :o  क्यूँ? अरे मैं ठीक थी यार...फीवर भी तो नहीं था, बस सर्दी थी...थोड़ी सी खांसी और क्या...

लता  मैडम अखबार पढ़ने में थोड़ी बीजी थी और मैं शिखा के इस सवाल का जवाब देने में कम्फर्टबल महसूस करने लगा, जाने क्यों.उस वक्त इसलिए कुछ कहा नहीं, बस ऐसे ही मुस्कुरा कर रह गया...
थोड़ी देर बाद हम पटना पहुँच गए थे...और वहां लेने शिखा के पापा आये थे..वो तो चली गयी अपने घर,
मैं  भी वापस अपने घर आ गया...

दिन  भर यही सोचता रहा की पता नहीं वो कैसी होगी...शाम को भी उससे बात नहीं हुई थी..हम दोस्त जहाँ अक्सर मिलते थे..वहां भी उस दिन वो नहीं आई थी..गाना और डांस उसका शौक रहा है..वो कोअचिंग क्लास हर रोज जाए या न जाए लेकिन डांस और सिंगिंग क्लास कभी मिस नहीं करती थी..उस दिन तो वो सिंगिंग डांस क्लास भी नहीं आई और नाही दूसरे दिन वो आई...उस वक्त तो मोबाइल भी नहीं था की हाल चाल आसानी से ले लिया जाए...दिव्या को बोला दूसरे दिन की पता करने क्या हुआ?तबियत तो ठीक है..फिर जब दिव्या ने बताया की वो ठीक है, कल से आने वाली है को़चिंग क्लास और कल हमसे भी मिलने वाली है..तब जाकर मुझे कुछ राहत मिली.

फिर जब हम मिले तो कुछ ऐसा नज़ारा था...

दिव्या- बाप रे..एक तो ये महाशय, सोये नहीं रात भर ट्रेन में, और ऊपर से ये मिस इंडिया...नखरे तो देखो इनके खाना खाने में नखरे...फीवर में सलमान खान याद आता है...पक्का भारी वाली ड्रामा क्वीन है ये लड़की ...और नहीं तो क्या 

तू  चुप रह..बड़ा दोस्त दोस्त कहती फिरती है...तू तो सो ही गयी थी...एक बार भी उठा नहीं गया तुझसे...रहने दे तू बस..फ़ालतू के एक्स्प्लनेशन मत दे...

हाँ  जी....हम तो कोई है ही नहीं...जो भी किया है आज तक हेल्प तुझे, बस एक इसने ही तो किया है...हमने तो कुछ किया ही नहीं न...

तू  न दिव्या पागल है पागल...क्या क्या बोलते रहती है तू...देख ही इज माई सच ए गुड फ्रेंड..ही केयर फॉर मी सो मच...लर्न समथिंग.. 


हाँ  हाँ सीखने को अब ये महाशय रह गए है न....और लोग तो लगता है अब है ही नहीं दुनिया में ..ही ही ही..


देख  अब तू मार खा जायेगी...सुधर जा...वरना सोच लेना तू... 

(उन दोनों की बहस ऐसे ही चलती रही उस दिन और मैं बस दोनों के झगड़ों के मजे ले रहा था...)