Thursday, June 3, 2010

// // 10 comments

खामोश रात

ये रात कितनी खामोश है
ये रात कितनी तनहा..
इस  सर्द रात में,
कुछ लम्हे आते,जाते हैं आँखों में...
दिल की धड़कने भी,
इस रात के सन्नाटे में..
एक अजीब आवाज़ कर रही हो जैसे...
तुम्हारा नाम ले रही हो जैसे...
तुम्हे पुकार रही हो जैसे...

नींद तो रूठी हुई है आज..
आज वो नहीं आएगी...
मैं कभी इस करवट, कभी उस करवट
नींद को मानाने की नाकाम कोशिशें करता रहता हूँ..

आज की ये रात बड़ी बेरहम रात है...
इस रात के सीने में दिल ही नहीं...
आँखों में लगातार चुभ रहे हैं,
वो  अधूरे जज़्बात, वो अधूरी कहानी..
सारी बातें आज इस तनहा रात में,
क्यूँ याद आ रही हैं मुझे..
वो  यादें ऐसे चुभ रही हैं आज,
जैसे टूटे शीशे चुभे हों दिल में कहीं..धंस गए हो..
और बूँद बूँद लहू गिर रही हो ...

इस बेरहम सर्द,तनहा रात में..
दर्द बढ़ने लगा है,गम सुलगने लगा है...

10 comments:

  1. बहुत से गहरे एहसास लिए है आपकी रचना ...

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  2. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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  3. सारी बातें आज इस तनहा रात में,
    क्यूँ याद आ रही हैं मुझे..
    वो यादें ऐसे चुभ रही हैं आज,
    जैसे टूटे शीशे चुभे हों दिल में कहीं..धंस गए हो..
    और बूँद बूँद लहू गिर रही हो ...

    बेशक बहुत सुन्दर लिखा और सचित्र रचना ने उसको और खूबसूरत बना दिया है.

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  4. टीस भरी हुई कविता...बहुत सुन्दर :)

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  5. very nice, bahut accha laga :)

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  6. waah pyaar ka dard pighal pighal ke baha ...bahut khoob...

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  7. गहरे अहसास खूबसूरत रचना.

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  8. बहुते भोगने के बाद लिखा हुआ कविता है... अईसा लगता है कि ई कविता लिखने के लिए पूरा दर्द को दोबारा जीना पड़ा होगा... जिओ बबुआ!!

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  9. bahut khub



    फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

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