Tuesday, June 29, 2010

मीना कुमारी की शायरी - पार्ट २

सच
यह तुलसी* कैसी शांत है
और काश्मीर की झीलें 
किस किस तरह 
उथल पुथल हो जाती हैं
और अल्लाह !
मैं !


*तुलसी - मुंबई से कुछ दूर तुलसी नाम की एक झील है 

कुछ आजाद नगमें.... मीना कुमारी जी के कुछ दर्द ...मीना कुमारी जी के कुछ नगमे आपने इस पोस्ट में देखें होंगे, उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए ये पार्ट २ ला रहा हूँ मैं. थोड़ी देरी से आई ये पार्ट २ , लेकिन ये वादा है पार्ट ३ में कोई देरी नहीं होगी :) मीना कुमारी जी की शायरी हमें बहुत भाती है, उनकी दो किताबें भी अपने पास हैं :) उन्ही किताबों के कुछ पन्ने पेश कर रहा हूँ ..




लम्हे 

कई लम्हे 
बरसात की बूंदे हैं 
नाकाबिले-गिरफ्त*
सीने पे आकार लगते हैं 
और हाथ बढ़ा 
की इससे पहले 
फिसल कर टूट जाते हैं


*नाकाबिले-गिरफ्त-जो पकड़े न जा सकते हों.

                   एक  गज़ल

टुकड़े-टुकड़ेदिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली 
जितना जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली .


रिमझिम रिमझिम बूंदों में, जहर भी है और अमृत भी ..
आँखें हंस दी,दिल रोया, ये अच्छी बरसात मिली..


जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज़ सुनी..
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली..


मातें कैसी  घातें क्या , चलते रहना आठ पहर,
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली..


होठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे 
जलती-बुझती आँखों में,सादा-सी जो बात मिली..


चलते चलते दो लाइन और सुनाना चाहूँगा..

खुद में 
महसूस हो रहा है 
जो 
खुद से बाहर 
तलाश है उसकी..
continue reading मीना कुमारी की शायरी - पार्ट २

Monday, June 28, 2010

आस अभी बाकी है

चाहे कितने भी सितम कर ले ये दुनिया,
दिल में एक आस अब भी बाकी है...
आने के किसी शख्स का,
इंतज़ार अब भी बाकी है..

ये माना दर्द झेले हैं हमने बहुत
पर शायद दर्द की कुछ और किश्तें अभी बाकी हैं..

खुशियाँ आएँगी हमारे पास फिर किसी बहाने से..
दिल  के किसी कोने में ये एक आस अब तक बाकी है...
continue reading आस अभी बाकी है

Sunday, June 27, 2010

अश्क पी जाता हूँ..

ऐसे ही बैठे बैठे दो लाइनें लिखा..

तुम्हारे चेहरे की हंसी देख,
अपने अश्क पी जाता हूँ मैं..
लब सी लेता हूँ..
वरना अभी तो,
ग़मों की बहुत दास्तान बाकी है !
continue reading अश्क पी जाता हूँ..

Monday, June 21, 2010

खोया खोया चाँद !!!!!

क्या आप लोग अभिषेक के बकवास शायरी से बोर हो चुके हैं? क्या आप लोग भी मेरी तरह कुछ चेंज चाहते हैं? क्या आप लोग भी ये सिकायत कर रहे हैं की मैंने अब तक इतने कम पोस्ट किये हैं इस ब्लॉग पे?

वैसे आप लोग मुझे जानते हैं क्या? पता नहीं

मैं बता देती हूँ, मैं हूँ दिव्या.. अभिषेक की बहुत अच्छी दोस्त और उससे लड़ झगड पे मैंने इस ब्लॉग पे अपना नाम लिखवा है एज ए author/blog writer

अब ब्लॉग तो अभिषेक का ही है. तो उसके पसंद का ही एक गाना सुन लेते हैं. ये गीत तो मुझे भी उतना ही पसंद है.अभिषेकवा तो ये गाना शायद हर दिन सुनता है :P :P जहाँ तक मेरी Knowledge है

चलिए.................वक्त बिताने के लिए करना है कुछ काम...............शुरू करो ये गाना ले के हरी का नाम :D :D

public demand pe pesh hai :P




(ऊपर किये गए मेरे मजाक आपको अगर बुरे लगे हों तो माफ कर दीजियेगा...ब्लॉग पे ये serious/creative टाइप भाषा/वर्ड मुझे लिखने नहीं आता...इसलिए क्षमा चाहती हूँ...और अभिषेक जितना अच्छा इंसान है, उतना ही अच्छा लिखता भी है............ये गीत खास मेरे दोस्त अभिषेक और सुदीप के लिए )
continue reading खोया खोया चाँद !!!!!

Thursday, June 17, 2010

रात के अंधरे में एक सन्नाटा है..

इस रात के अँधेरे में,
एक सन्नाटा है
हवा एक सरगोशी सी कर रही है
पूछ रही है
ये हवा आज,
इस गहरे सन्नाटे में
तू आज चुप क्यों है..
कोई गीत क्यूँ नहीं सुनाता
कोई नज़्म क्यूँ नहीं पेश करता


कौन  सी पुरानी बातों को मुट्ठी में बंद करूँ,
कौन सा गीत सुनाऊं?
मैं भी तो इसी कशमकश में हूँ..
हर नज़्म आज रूठी है
हर गीत आज भूल गया हूँ
यादों  के तो कई लम्हे कैद हैं आँखों में,
मगर आज वो यादें
क्यों गीत बनने से इन्कार कर रही हैं?

ये मद्धम शीतल हवा आज
तुम्हारे लम्स सी गर्माहट लिए हुए है
कायनात के हर कोने से जैसे
तुम्हारी आवाज़ सुनाई देने लगी है..
इस सफेदपोश रात में
धीरे धीरे मैं खोते ही जा रहा हूँ कहीं..
चलने लग गया हूँ माजी की उन पगडंडियों पर
और अचानक चलते चलते
एक तूफ़ान उठा,
और
उन माजी की हसीन गलियों से ला पटक.
फेंक दिया मुझे फिर इस तनहा रात में..
जहाँ बस बेपनाह अँधेरा है
सन्नाटा है
और मैं हूँ !
continue reading रात के अंधरे में एक सन्नाटा है..

Tuesday, June 15, 2010

उस दिन के बाद वैसी बारिश फिर नहीं हुई..


उस दिन तेज बारिश हो रही थी, आधी रात से ही..सुबह भी बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी..बरामदे में एक स्कूटर लगी रहती थी, उस पर बैठा मैं सोच रहा था..इतनी तेज बारिश हो रही है..वो आएगी क्या??उसने तो कहा था कल की वो आएगी...लेकिन  बारिश भी तो कमबख्त इतनी तेज हो रही है..इतनी तेज बारिश में आ पाना संभव है क्या??...
हाँ बिलकुल आएगी, वो जो बोलती है, उसे पूरा करती है..दिल के किसी कोने से आवाज़ आई
...तो वो आएगी तो मैं कैसे नहीं जाऊंगा..मुझे तो जाना ही है...चाहे कुछ भी हो जाये...लेकिन ये बारिश थोड़ी भी तो रुके, वरना घर वाले हरगिज जाने नहीं देंगे..


नानी से सुन रखा था, की अगर कुछ लकड़ियाँ या जलावन जलाया जाए तो बारिश रुक जाती है..मैं बैठे बैठे ये सोच रहा था की अगर ये बात सच है तो कोई जला क्यूँ नहीं रहा लकड़ियों को.क्या सब के सब बारिश का आनंद ले रहे हैं और मैं अकेला इस बारिश से परेसान हो रहा हूँ? ? घर के सामने जो दुकाने थी, सब के सब हमें पहचानते थे..दूकान से एक आदमी आया, शायद माँ ने कुछ सामान मंगवाया था दूकान से,.. उसने कहा "अरे भैया, निरंजन स्वीट्स तक पानी लगा हुआ है और वो भी घुटना तक..." मेरी परेशानियाँ और चिंता बढ़ने लगी...की आज नहीं जा पाउँगा तो क्या होगा...कल तो वो दिल्ली चली जायेगी, और फिर अगले महीने पटना से क्या, इस देश से बाहर चली जायेगी, लन्दन..और फिर शायद कभी उससे मिल नहीं पाउँगा..उसने कल कितनी मिन्नत की थी, कहा कुछ भी हो जाये, हम कल मिलेंगे...मैं कैसे उसके किसी बात को नकार सकता हूँ...मुझे तो आज जाना ही पड़ेगा..

एक अजीब सी सनसनी दौड़ गयी, कुर्सी पर रखे टी-शर्ट और जींस को उठा कर आयरन करने लगा...
माँ ने जब देखा की मैं कहीं जाने की तय्यारी में हूँ तो उन्होंने पुछा, "कहाँ जा रहे हो? बारिश हो रही है, देख नहीं रहे...."
"कुछ काम है माँ,एक दोस्त ने बुलाया है...बहुत ही जरूरी काम है, शायद कुछ फॉर्म भरने की बात हो,जाना पड़ेगा". मैं नज़रें दूसरी तरफ कर के माँ से बात करता हूँ...मुझे माँ के सामने बहाना बनाना पसंद नहीं आ रहा लेकिन इसके अलावा दूसरा और कोई रास्ता भी नहीं था.
अच्छा ठीक है, नाश्ता बन रहा है..रोटी,सब्जी बन जाए तो नास्ता कर के , कुछ खा के ..बारिश कम हो जाए  फिर चले जाना ..पर इस बारिश में साइकिल से कहाँ जाओगे?भींग जाओगे?स्कूटर से भी मत जाना..बारिश है, रास्ते पे फिसलन होगी..माँ ने कहा. "
"उतना वक़्त नहीं है माँ...अभी तुरंत निकलना है मुझे...मैं इंतजार नहीं कर सकता...तुम सिर्फ रोटी और दूध दे दो मुझे, वही खाकर चला जाऊँगा और साइकिल या स्कूटर से नहीं, छाता लेकर मैं ऑटोरिक्शे से ही चला जाऊँगा." मैंने माँ से कहा.

सुबह के १० बज रहे थे, और उसपर से सन्डे का दिन..फिर भी लग रहा था की हर चीज़ रुक सी गयी हो..सन्डे का तो नाम-ओ-निशान नहीं दिख रहा था..सड़कों पे सन्नाटा था, घरों की खिड़कियाँ बंद, पापा एक कोने पे अखबार पढ़ रहे थे और बहन टी.वी के सामने..माँ किचेन में, और बाहर बारिश की तेज आवाजें...पापा ने कहा बहुत तेज बारिश हो रही है, शायद रुकेगी नहीं अभी कुछ देर..मैंने पापा की बात को अनसुना कर दिया और चुप चाप अपने दूध-रोटी के तरफ ध्यान दिया और खाना शुरू कर दिया....

ये कमीने टी.वी चैनल वाले भी तो कभी कभी गाना अजीब बजाते हैं.. "लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है." किस चैनल पर दिखाया जा रहा था...ऐसे वक़्त पर ये गीत मेरी बेचैनी को और ज्यादा बढ़ा रही थी.

मैं जल्दी जल्दी नास्ता कर के घर से निकला, कंधे पे बैग लटकाए,और एक हाथ में छाता लिए मैं ऑटो स्टैंड पर ऑटो का इंतज़ार कर रहा था,..उस दिन जिस सड़कों पे ऑटो की भीड़ लगी रहती थी, ऐसा लग रहा था जैसे ऑटो सब एक साथ गायब हो गए हो..बड़ी मुश्किल से एक ऑटो मिला. ऑटो से जैसे ही उतरा, उसे पैसे दे रहा था और सोच ही रहा था...शायद कुछ इंतज़ार करना पड़े, उसे आने में लेट भी हो सकती है..राजेन्द्र नगर से बोरिंग रोड भी तो दूर है ऊपर से बारिश भी हो रही है...,उतने में पीछे से आवाज़ आई -

"हेल्लो ...ओ माई गौड...देअर यु आर...आ गए इतनी जल्दी....आई वाज़ थिंगकिंग यु विल नोट कम टुडे, मैं तो बस अब थोड़ी देर में वापस जाने वाली थी.." पीले समीज सलवार में वो आज बिलकुल अलग दिख रही थी..उसके चेहरे पे कुछ बारिश की बूँदें दिखी मुझे...उसमे एक अजीब सी दिलकशी थी...एक पल के लिए मानो सब थम गया हो, एक तो आज बारिश और उसपे उसका वो रूप.. उस लम्हे को कहीं कैद कर लेने का मन कर रहा था..उसके चेहरे से नज़र हट नहीं रही थी...मेरे मुह से बस इतना ही निकल सका - तुम्हारे काम तो हो गए न सारे?सारे फॉर्म फिल-अप हो गए न...?

"ओफ्फहो..इतनी अच्छी बारिश है, मौसम इतना अच्छा है,फॉर्म-वोर्म तो फिल होते रहते हैं यार..हद करते हो.. चलो कुछ खाते हैं पहले..मैं सुबह बस पावरोटी-जैम खा कर आई हूँ...भुख लग रही है...." 
उस दिन शायद मेरी आवाज़ को सही में कुछ हो गया था...उसकी इस बात पर मैं बस इतना ही कह पाया... - ओके..चलो..

हम अपने पसंदीदा दूकान "सैंडविच" में आ गए, और उसने दो पेस्ट्री और समोसे मंगवाए...वो पेस्ट्री खाते हुए कहती है मुझसे -
"पता  है तुम्हे,बारिश कितनी अच्छी होती है, सुहानी होती है...देखो तो बारिश में पेड़ों पे एक नयी बहार आ जाती है, एक नया रंग आ जाता है..हर कुछ कितना अच्छा दीखता है...कितना हसीन दीखता है..मिट्टी की सौंधी खुशबु कैसे मन को मोह लेती है.."

मैंने मुस्कुराते हुए उससे पुछा - पोएट बन रही हो तुम तो..ये शायरी में बाते कब से करने लगी तुम?

एक प्यारी मुस्कराहट के साथ उसने कहा "बारिश तो इंसान को प्यार करना सीखा देती है, ये तो फिर भी शायरी है..

मैं सोच रहा था, जिसे कभी शायरी भाती न थी, जो हमेशा गज़लों और कवितायों से दूर भागे रहती थी, जिसे कवितायेँ कभी समझ नहीं आई, वो आज शायरी कर रही है...ये बारिश सच में कुछ भी सीखा सकती है.. :)
उसकी बातें उसके जैसी ही बेहद प्यारी लग रही थी...अचानक फिर से कहती है वो -
"यु नो आई जस्ट लव दिस रेन..आई लव दिस बारिश..मुझे तो बस मन करता है की भीगते रहू और बारिश के पानी में बच्चों की तरह उछलते कूदते रहू..नाचू, गाऊं इस बारिश में...पता है जब मैं छोटी थी तब हमेशा सोचती थी की शायद आसमान में कोई टैंक या रेज़रव्वार है जिसने पानी एक जगह कैद रहता है, और उसे ऊपर बैठा वो हमें जुलाई और अगस्त के महीने में अपनी मर्ज़ी मुताबिक देता रहता है...बाद में जब समझ भी आई की बारिश कैसे होती है, तो भी अपने उस शुरुआती लॉजिक को मैं दिमाग से कभी नहीं निकाल पायी..और आज भी जैसे लगता है की कहीं आसमान में सच में एक रेज़रव्वार है.

उसकी इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था..मैंने बात को पलटना चाहा.."वो सब तो ठीक है, लेकिन अभी सोचो भी मत बारिश में नाचने की...तुम्हे वैसे ही सर्दी है...तुम्हारी तबियर भी बिगड़ सकती है...तबियत का तो ख्याल करो तुम..हमेशा लापरवाह.."

दूसरा पेस्ट्री हाथ में लेते हुए कहती है.."हू केअर्स...." 
वो कुछ देर पेस्ट्री खाने में व्यस्त रहती है फिर ...  "ओह आई लव दिस पेस्ट्री ओफ "सैंडविच"..पता नहीं वहां क्या क्या मिले खाने को..."सैंडविच" कि पेस्ट्री और समोसे कहाँ मिलेंगे मुझे लन्दन में....पता नहीं वहां समोसे खाने नसीब होंगे भी या नहीं."

एक पल के लिए वक्त जैसे ठहर गया, सब कुछ खामोश...बारिश भी एका-एक थम गयी हो जैसे...उसका चेहरा भी ये बात कहने के बाद अपसेट सा हो गया कुछ..वो मेरे तरफ ऐसे देख रही थी जैसे कोई बड़ी गलती कर दी हो उसने...उसे गिल्ट सी होने लगी, जिस बात से हम बचना चाह रहे थे, उसके बाहर जाने की बात से..उसने खुद ही उस बात को छेड़ दिया था...मेरी भी नज़रें इधर उधर जाने लगी..शायद आँखों की नमी छुपाने के लिए..

खुद को सँभालते हुए मैंने कहा...अरे वो लन्दन है..लन्दन...और ये पटना..जब यहाँ ये सब मिलता है..वहां सोच भी नहीं सकती क्या क्या मिलेगा..बस तुम बाहर के लोगों जैसा कीड़ा-मकोड़ा मत खाना शुरू कर देना...खासकर के जैसा खाना चाइनीज़ लोग खाते हैं...सांप,बिच्छू..और पता नहीं क्या क्या...तुम वो सब मत खाना नहीं तो तुम्हारी नानी और दादी तुम्हे घर में घुसने भी नहीं देंगी...


ये बात सुन कर हलकी सी मुस्कान फिर से उसके चेहरे पे वापस आई.. 


कुछ देर बाद बारिश थमी और वो वापस चली गयी...उसके जाने के बाद बहुत देर वहीँ बैठे बैठे कुछ सोचता रहा.मुझे घर वापस आने की कोई जल्दी नहीं थी और मैं सड़कों पर बहुत देर तक यूँही भींगते हुए इधर उधर भटकते रहा...उन सब जगहों पर घूमते रहा जहाँ उसके साथ मैं बारिश के दिनों में घूमता था...

उस दिन के बाद वैसी बारिश फिर कभी नहीं हुई..
continue reading उस दिन के बाद वैसी बारिश फिर नहीं हुई..

Monday, June 14, 2010

बारिश

आज की बरसात,
बिलकुल वैसी ही है, जैसा पहले हुआ करती थी..
एक ज़माने बाद बारिश में भीगने का मजा आया..
एक ज़माने बाद फिर से वही मौसम लौटा..
सब कुछ तो वैसा ही है, पर तुम नहीं हो..

ये बूंदे जो चेहरे को छु के जा रही हैं,
बार बार सवाल कर रही हैं मुझसे,
तुम्हारे बारे में पूछ रही हैं..
मैं बेबस खड़ा, उनके सवालों को बस सुन रहा हूँ..
कोई जवाब न मेरे पास है, न तुम्हारे पास..

तुम्हे तो बारिश में भीगना अच्छा लगता है,
अब भी भीगती होगी बारिश में..
आँखें  भी कभी भर आती होगी,
जब मेरी याद आती होगी..

तुमसे  ही मैंने जाना, बारिश होती क्या है..
बारिश  की बूंदों में क्या दिलकशी है,
बारिश  में भी अब,
दिल रूमानी नहीं होता, यादें तरपती रहती हैं..
आंखों को तो अब
बरसात से ज्यादा
हर वक्त की फुहार ही अच्छी लगती है..
continue reading बारिश

Sunday, June 13, 2010

उस दिन..

कुछ  बात हुई थी उस दिन, कुछ ऐसे पल थे...वो पल वो दिन, अब फिर नहीं आयेंगे....ये कुछ लाइन मैंने उन्ही दिनों लिखी थी...जो मेरे साथ रहे उस पल वो जरूर समझ जायेंगे पूरी बात इन पंक्तियों को पढकर.. :)


उसके चेहरे की उस वक्त हालत कुछ यूँ थी,
होठों पे दबी सी हंसी, माथे पे थोड़ी सिकन
नज़रें भी इशारों से कुछ बोल रही थी.,
खामोश  बैठी थी वो, 
पर सैकरों सवाल पूछ रही थी...


 -- (कुछ खास लोगों को समर्पित ये कुछ पंक्तियाँ) :)
continue reading उस दिन..

Sunday, June 6, 2010

एक नयी दुनिया बसाएं..


हम भी काश इन परिंदों की तरह,
आकाश में कहीं दूर चल चलें..
एक नया आसमान तलाशने..
एक नयी दुनिया बसाने..
जहाँ हर तरफ खुशी हो..
एक ऐसा जहाँ बनाये जहाँ,
नफरत  की कोई जगह न हो..
और प्यार कभी कम न हो..
continue reading एक नयी दुनिया बसाएं..

Friday, June 4, 2010

एक ट्रेन का सफर..कुछ खास यादें...शिखा और दिव्या...


आज  से ठीक दस साल पहले..

नहीं मैं नहीं आ सकता..घर में क्या बताऊंगा, क्या बोलूँगा? परीक्षा तो बस एक दिन का ही होता है, ऊपर से वहां मेरी दीदी भी हैं..इम्पासबल


प्लीज..ट्राई करो न..तुम नहीं आओगे तो सुना सुना लगेगा..बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा..


तुम सब चले जाओ यार..मेरे नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए..


फिर मैं भी नहीं जाउंगी...तुम्हारे बिना अजीब लगेगा..वैसे भी तुम पहले भी जा चुके हो लखनऊ.हमें मदद मिलेगी..और फिर मैं बोर भी तो होउंगी..किससे बातें करुँगी? प्लीज प्लीज प्लीज प्लीज प्लीज प्लीज...आई डोंट नो एनिथिंग.....प्लीज प्लीज प्लीज प्लीज प्लीज....मेरे लिए चलो...प्लीज...


ओफ्फो यार...घर में अब सबके सामने एक नयी बात कहनी पड़ेगी...फिर से प्लान चेंज...क्या बोलेंगे हम?


अरे एक बार ट्राई तो करो..कोई बहाना बना लो?


नहीं यार...इत्ता आसान नहीं है न...नॉट दिस टाईम..तुम लोग जाओ न..

(इतने में ही उसकी आँखें नम हो गयी, लगा की बस अब रो देगी..वैसे भी नाज़ुक सी है, आंसूं भी उसके निकलने में वक्त नहीं लगाते..ये सब सोच कर मैंने कहा -)


अच्छा ठीक है , मैं कोशिश करूँगा, वैसे भी अभी 15 दिन हैं जाने में..लेकिन हम आने जाने की रेज़र्वेशन अलग अलग करवाएंगे!! बाद में ट्रेन पे एडजस्ट कर लेंगे..अब साथ साथ टिकट नहीं होगा तो मेरे से लड़ना मत..

वाउ...वन्डर्फल....दिस काल्स फॉर ए पार्टी यार...ट्रीट मेरे तरफ से आज..लेट्स गो टू गोविन्द भाई दूकान!!

गोविन्द  भाई के दूकान पे , नूडल्स खाते हुए और कुछ गुनगुनाते हुए पूछती है 

अच्छा एक बात बता...मैं बोली इसलिए आ रहे हो न...यू केयर फॉर मी सो मच.
प्यारा सा चेहरा बना के, कुछ बड़े अजीब से इक्स्प्रेशन के साथ वो कहती है...थैंक यू फॉर मेकिंग मी फील लाईक प्रिंसेस".
ये उसका पेट डाइअलॉग था 


हाँ रे...ई भी कोई कहने की बात है, तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त जो हो..!  

"थैंक  यू...थैंक यु...थैंक यु...." उसने एक ही सांस में जाने कितनी बार थैंक यु कहा होगा. फिर अपने पे ही इतराते हुआ और पास में बैठी दिव्या को ये जताते हुए की ही "वो तुमसे अच्छा मेरा दोस्त है", उसे लगातार छेड़ने लगी और दोनों की फेमस लड़ाई फिर से शुरू हो गयी, वहीँ दूकान पर ही...


इसके बाद हम वहां से वापस घर आ गए...फिर थोड़े दिन बाद लखनऊ भी गए...जब लखनऊ से वापस घर आ रहे थे  सब काम खत्म कर(मेरा परीक्षा,उसका डांस इवेंट, उसे लखनऊ घुमाना जिसके अलग से किस्से हैं)तो एक अजीब वाकया हुआ...हम जिस दिन वापस आने वाले थे..हमारी ट्रेन थी रात में ९ बजे,श्रमजीवी एक्सप्रेस...मेरी बात शिखा और दिव्या से ज्यादा नहीं हो पायी थी...सुबह बस थोड़ी देर दिव्या से बात हुई थी, जहाँ वोप ठहरी थी वहां मैंने फोन किया था और बस इतना पता चला था की शिखा को थोड़ा बुखार है..मैंने जब पूछा की आज जा पाओगी या टिकट कैंसल करवानी है, उसने कहा की आज जाना है!
शाम रेलवे स्टेशन पहुँचते हुए मुझे थोड़ी देर हो गयी...

  
दिव्या :  यार कहाँ रह गए थे इतनी देर, ट्रेन बस खुलने वाली है अभी कुछ देर में...क्या यार?थोड़ा पहले आते.. ऊपर से शिखा की तबियत भी ठीक नहीं.शायद फीवर है...क्या करें?.


अरे यार दीदी जिद करने लगी की वो भी स्टेशन तक आएँगी..इसी चक्कर में मैं लेट हो गया, और ऊपर से इतनी ट्रैफिक थी...वैसे क्या हुआ शिखा को?अभी तक फीवर उतरा नहीं है?

दिव्या- नहीं यार....वैसे लता मैडम ने कुछ दवाइयां दी थी.लेकिन कुछ असर नहीं हो रहा है.लता मैडम के डांस स्कूल में थोड़ा काम है नहीं तो आज हम लोग रुक जाते.

अरे क्या काम यार? हद है...वो बीमार है...रिस्पान्सबिलिटी तो उन्ही की है न, तो फिर? एक दिन रुक ही जाने में कोई पहाड़ तो नहीं टूट पड़ता, ऐसा कौन सा जरूरी काम होता है??सब बहाने है..हद नौटंकी है.
थोड़ी दूर पर शिखा बैठी थी और हम दोनों की बातचीत सुन रही थी...मैंने पूछा उससे "क्या हुआ रे?दावा खायी या नहीं?कैसी तबियत है अब?

अरे यार तुम इतना टेंसन मत लो..ठीक हूँ मैं!

चेहरा मुरझाया हुआ लग रहा था और बोल रही थी वो की मैं ठीक हूँ,  उसकी वो हालत देख मुझे लगातार लता मैडम पर गुस्सा आ रहा था...मन तो कर रहा था की जाकर अच्छे से कुछ सुना आऊं उन्हें..अगर वो रुक जाती तो क्या हो जाता?मैं भी रुक जाता उस दिन...घर से निकलने वक़्त तक जीजा जी ने और दीदी ने कितना कहा था की एक दिन और रुक जाओ..कल का रिजर्वेसन करवा देते हैं...खैर,

दिव्या, तुम रुको थोड़ा एक दो और दवाई लेकर आता हूँ मैं और कुछ स्नैक्स भी लेते आऊंगा...बाहर दुकान से, रात भर का ट्रेन है...जरूरत पड़ सकती है.

अरे यार ट्रेन खुल जायेगी...कहाँ जा रहे हो...दवा तो है ही...

अरे नहीं खुलेगी..अभी आते वक्त देख के आया हूँ ट्रेन एक घंटे लेट है..मैं बस अभी आया...बस 5 मिनट में..

तेजी से दौड़ते हुए स्टेशन के बाहर भागा....पता नहीं क्या बात थी, रात ज्यादा हो गयी थी या सन्डे का दिन होने की वजह से दुकाने बंद थी.एक दवा की दुकान खुली मिली, वहां से दवा लेकर जल्दी जल्दी वापस आया...

शिखा तुमने कुछ खाया है या नहीं? 

नहीं यार....मुहं का टेस्ट अजीब सा हो गया है? खराब सा...कुछ खाने का मन नहीं कर रहा..तुम खाना खा के आये हो..????


हाँ...लेकिन दीदी ने कुछ बना कर पैक भी कर दिया है...वो तुम खा लेना...चलो अब समान रख देते हैं सीट पे...ट्रेन खुलेगी पन्द्रह बीस मिनट में.

अच्छा एक बात बताओ तुम ज़रा..तुम्हारी सीट कौन सी बोगी में है?कम्पार्ट्मन्ट कौन सा है?सीट एक्सचेंज होगा क्या?वैसे नहीं भी हुआ एक्सचेंज तो फर्क नहीं पड़ेगा...सुबह तो पहुच ही जायेंगे.

हाँ हाँ...सीट क्यों नहीं एक्सचेंज होगा..उसकी तबियत नहीं देख रही क्या तुम? एक्सचेंज कर लेंगे..घबराओ मत तुम..

हा हा हा...हम कहाँ घबरा रहे हैं...बेवजह टेंसन तो तुम ले रहे हो.बिना किसी बात की..क्यूँ इतना परेसान हो रहे हो?बस फीवर ही तो है, ऊपर से तुम एक्स्ट्रा दवा भी तो ले आये.डोन्ट वरी, शी विल बी फाईन! 

हम्म...रुको मैं सीट का बन्दोबस्त कर के आता हूँ.

ट्रेन में उतनी भीड़ नहीं थी और ट्रेन लगभग खाली जा रही थी..तो हमें सीट एक्सचेंज करने की जरूरत नहीं हुई..वो सब जहाँ थे, वहीँ एक मिडल सीट खाली थी..मैंने जाकर टी.टी को कह दिया की उस सीट पे मैं रहूँगा, अगर कोई आये तो उसे मेरा सीट दे दे वो..टी.टी ने कोई आपत्ति नहीं दिखाई.साइड अपर सीट था शिखा का और साइड लोवर था दिव्या का.
सीट पे सारा सामान अरेंज कर के हम बैठ गए...दिव्या को रिक्वेस्ट किया की तुम मिडल सीट पे चली जाओ और मैं यहाँ रहूँगा..वो भी आराम से मान गयी..दिव्या और शिखा के अलावा इन लोगों के साथ 4 और लड़कियां थीं जो दुसरे कम्पार्टमेंट में थीं.

लो खा लो कुछ, दीदी पुरी-सब्जी बना कर दी हैं..खा लो फिर दवा खा लेना.

प्लीज यार...खाने का बिलकुल मन नहीं है.बस वो खिड़की बंद कर दो...ठंड लग रही है..


अच्छा रुको, खिड़की बंद कर देते हैं...ठीक है खाना नहीं खाना है तो ये बिस्कुट और केक खा लो.

यार, प्लीज लिव इट..आई डोन्ट फील लाइक ईटिंग..प्लीज..!


चुप चाप खाओ तुम, दवा तुम्हे एक और खानी है अभी.चलो जल्दी खाओ(गुस्से में मैंने कहा)


ठीक है बाबा......खाती हूँ... इतना गरम काहे हो जाते हो तुम(वो तो है ही नाज़ुक सी ..थोड़ी डांट में ही डर भी जाती है )


वो बिस्कुट बड़े ही स्टाइल से कुतर कुतर के खा रही थी और टैबलेट हाथ में लेकर पता नहीं क्या बकवास किये जा रही थी.मैं उस समय सोच रहा था की देखो, बीमार है लेकिन स्टाइल अभी तक गया नहीं...बिस्कुट खाने का अब अलग स्टाइल..दवा पे पता नहीं क्या रिसर्च कर रही है.हद ही हो गयी ;)

तुम्हे नींद आ रही है क्या? तुम सो जाओ..

नहीं तो 


हम्म...तो इधर हीं बैठो न अभी, मेरे पास....मेरा सोने का मन नहीं है...

शिखा तुम सो जाओ...आराम करो...अभी तक बुखार उतरा नहीं है.....नहीं तो तबियत और बिगड़ जायेगी.और मैं तो यहीं पर हूँ....लता मैडम भी बगल वाले कम्पार्टमेंट में हैं.दिव्या भी तो यहीं पे है..सो जाओ आराम से.

हाँ  हाँ मिस्टर चौकीदार साहब हैं ही...सो जाओ शिखा..
दिव्या ने मुझे देखते हुए हँसते हुए कहा

ओए  दिवू तू क्या क्या बोलते रहती है....एक तो होता नहीं की पास मैं बैठे और गप्पें करें..नोवेल में घुस जा तू जाकर बस..नॉवेल में ही घर क्यों नहीं बना लेती.....बत्तमीज लड़की..

मैडम जी अब तू ड्रामे बंद कर अपनी...अपने डायलोग अपने पास ही रख...तबियत खराब है तो सो जा...फ़ालतू के गोसिप मुझसे नहीं होते...समझी!!

अरे यार तुम लोग क्यों लड़ रही हो....तुम सो जाओ शिखा...

नहीं मुझे नींद नहीं आ रही है..ये दिव्या तो नखरे करते रहती है हमेशा...मेरे पास बैठ भी नहीं रही....तुम ही बैठो न कुछ देर.. बात करेंगे..वैसे तुम जो खाना लाये हो खा क्यों नहीं लेते...?
   
एक तो उसकी तबियत खराब थी और वो बातें कर रही थी..गुस्सा तो आ  रहा था लेकिन फिर भी उसकी बात रखते हुए उसके बगल वाली सीट पे बैठ गया..
कितना खायेंगे यार हम?...वैसे भी खाना खा कर आ रहे हैं...


ओह....अच्छा हाँ, तुमने बताया था..बुखार में मैं सब भूल जाती हूँ.पता है आज शाम न लता मैडम भी परेसान हो गयी थी बहुत...मुझे लगा की आज जाना कैंसल हुआ.

मैंने बहुत धीरे से कहा "हम्म...तुम फ़ालतू में हमेशा कहती रहती हो की लता मैडम बहुत ख्याल रखती हैं ...देखो तो वो आराम से सो भी गयीं....तुम्हारी तबियत भी ठीक नहीं!

अरे नहीं वो आज बहुत ज्यादा थक भी गयीं थीं रे....इसलिए सो गयीं होंगी...पाता है आज उन्होंने कितना काम किया...दिन भर भाग-दौड़..नॉन स्टॉप..

हम्म...

एक लंबे पॉज़ के बाद..दिव्या कहती है...


तुम लोग अभी तक सोये नहीं ?? क्या यार सो जाओ...शिखा नाटक मत कर तू..तबियत खराब है तेरी...सो जा चुप कर के...

मैं तो कब से कह रहा हूँ इसे सोने के लिए...ये माने तब न..


तुम सुनो इसकी फ़ालतू के गोसिप..मैं सो रही हूँ अब...नींद आ रही है...


ठीक है ठीक है सो जाओ...गुड नाईट..


गुड नाइट दिवू...तू बस अपने "मिल्स एन बून्स" पढ़ती रह...और सोती रह...कोई और काम तो तुझसे होता नहीं..

तबियत खराब है तेरी...चुप कर के बैठ ये तो होता नहीं, हम दोनों को परेसान कर रखा है सुबह से..मुझे सोने दे..दिव्या ने कहा, और वो सोने चली गयी...


यार तुम हद कर रही हो...बहुत जिद्दी होते जा रही हो तुम...आराम से सो जाएँ ये तो होता नहीं और फ़ालतू में बहसबाजी कर रही हो दिव्या से...जब तबियत ठीक हो जाएगा तो जितना मन करेगा उतना लड़ना.

"अरे ये पागल मुझे इरिटेट कर देती है तो क्या करूँ...खैर जाने दो." उसके चेहरे का भाव फिर से अजीब सा हो आया था.

फिर कुछ देर हम दोनों दोनों चुप रहे और वो एकाएक मेरे को देख कर कहने लगी..
"अरे... तुम जानते हो.....इस बार के स्टारडस्ट में सलमान खान का एक बहुत बहुत अच्छा आर्टिकल आया है...तुम पढ़े की नहीं...जरूर पढ़ना..मेरे पास है...कोचिंग में ले लेना..और ऋचा(मेरी बहन) को भी पढाना...हम दोनों सेम सेम हैं...सलमान खान फैन्स यु सी..उसे पसंद आएगा वो आर्टिकल, और तुम्हारी ग़लतफ़हमी दूर होगी"

":o :o :o" बिलकुल यही एक्सप्रेसन था मेरे चेहरे का..
अब तुम्हे फीवर में सलमान खान याद आ रहा है...चुप चाप सो जाएँ ये तो होता नहीं...

फिर से एक अजीब सा एक्सप्रेसन बनाते हुए, क्यूट सा एक्सप्रेसन बनाते हुए देखती है मुझे..और गुस्सा हो जाने का नाटक करती है, मैं उसे देख मुस्कुरा देता हूँ..

ठीक है ठीक है..बोलो क्या कह रही थी...ऐसे जोकर टाईप चेहरा अब मत बनाओ...

फिर से अपने पे इतराते हुए, पूरी कहानी, पूरा वो आर्टिकल सुना रही थी मुझे...मैंने हंस के पूछ दिया :
जितना ये आर्टिकल याद है तुम्हे, उतना कभी पढाई भी की हो तुम?एक आर्टिकल सलमान खान का याद है और काम की बातें कितनी याद रहती हैं तुम्हे?जितना तुम सलमान खान के बारे में पढ़ती है उतना ही अगर केमिस्ट्री फिजिक्स पढ़ती न तो पिछले साल ही आई.आई.टी क्रैक कर लेती तुम..


थोड़ी देर बाद उसे नींद आने लगी थी..मैं भी अपर बर्थ पे चला गया...मुझे तो नींद आ नहीं रही थी,पता नहीं क्यों....कुछ अच्छा अच्छा सा नहीं लग रहा था...हो सकता है शाम में सब कुछ इतनी जल्दबाजी में हुआ उसकी वजह से या फिर मैं एक दो दिन और रुकना चाहता था वो वजह थी या फिर इसके तबियत का ख़राब होना. जो भी हो वजह मैं सो नहीं पाया...मैं बार बार नीचे देख रहा था, की कहीं वो जाग तो नहीं गयी..फिर कुछ देर बाद ही उसकी नींद खुल गयी...मैंने ऊपर से पुछा..
 
क्या हुआ रे???नींद नहीं आ रही क्या? 

अरे  तुम जागे हुए हो???? ":o :o :o" ये वाला एक्सप्रेसन इस बार उसके चेहरे पर था.


हाँ बस ऐसे ही


ओह...मुझे पता नहीं क्यों नींद नहीं आ रही यार...

हम्म...रुको आते हैं नीचे...


एक तो उसे फीवर था, फीवर तो अब दवा खाने के बाद बहुत कम हो गया था लेकिन सर्दी अभी भी थी उसे...उसे थोड़ी नींद सी आने लगी...उसने मेरे कंधे पर अपना सर रख दिया और वो सो गयी..कुछ देर बाद मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा तो पूरा चेहरा लाल पड़ गया था.अजीब सा चेहरा हो गया था उसका..मुरझाया सा...मैं सोचने लगा जिसका चेहरा हमेशा इतना खिला रहता है उसके चेहरे की ऐसी हालत? भगवान इसके जैसी इतनी प्यारी और नाज़ुक लड़कियों की तबियत आखिर खराब करते ही क्यों हैं...इन्हें तो हमेशा खुश रहना चाहिए, बहुत ज्यादा खुश.मैं उसके चेहरे के तरफ पता ज्यादा देर देख नहीं सका, मेरा मन अजीब सा हो गया था, मुझे कुछ समझ नहीं आया की मैं क्या करूँ..कुछ देर तक मैं वहीँ बैठा रहा, उसकी जब नींद खुली तो उसे अहसास हुआ की वो मेरे कंधे पर अपना सर रख सो गयी थी.उसे फिर बर्थ पर सोने कह कर मैं अपने बर्थ पर वापस चला गया.सुबह के ३ बज रहे थे उस वक्त और पटना पहुचने में अब भी ४ घंटे बाकी थे.

सुबह ५ बजे दिव्या की नींद खुली..वो शिखा के पास आकर बैठ गयी.

मैंने ऊपर बर्थ से कहा,सो रही है दिव्या वो, अभी दो-तीन बजे सुबह तो वो सोयी है...

दिव्या मेरी तरफ देख कर हँसते हुए,मुझे चिढ़ाते हुए कहती है

मिस्टर चौकीदार..तुम सोये नहीं थे क्या रात भर..हम्म..??

नहीं यार मैं भी सोया था अभी उठा हूँ...


चुप रहो...आराम से पता चल रहा है की तुम सोये नहीं थे...हा हा हा फिर हँसने लगी वो 


अरे  मैं सोया था लेकिन अचानक शिखा उठ गयी तो मेरी भी नींद खुल गयी...वैसे तुम और मैडम तो सो ही रहे थे...इतना भी नहीं हुआ की शिखा की तबियत खराब है तो पास बैठे थोड़ी देर...


हा  हा हा...मुझे पता था न की तुम हो इसलिए हम आराम से सो गए थे....और देखो तो, मैडम तो अभी भी सो रही हैं ...रुको मैं अभी उठाती हूँ मैडम को...

फिर दिव्या ने मैडम को उठाया...फिर कुछ देर में शिखा की भी नींद खुली, वो मेरे तरफ देखी ऊपर, फिर पूछती है 
कब उठे अभिषेक?


अरे  वो सोया ही कब था की उठेगा....दिव्या ने मजाकिया रूप में और मुझे चिढाने के लिए कहा शिखा से..


तुम  सोये नहीं थे???? :o :o  क्यूँ? अरे मैं ठीक थी यार...फीवर भी तो नहीं था, बस सर्दी थी...थोड़ी सी खांसी और क्या...

लता  मैडम अखबार पढ़ने में थोड़ी बीजी थी और मैं शिखा के इस सवाल का जवाब देने में कम्फर्टबल महसूस करने लगा, जाने क्यों.उस वक्त इसलिए कुछ कहा नहीं, बस ऐसे ही मुस्कुरा कर रह गया...
थोड़ी देर बाद हम पटना पहुँच गए थे...और वहां लेने शिखा के पापा आये थे..वो तो चली गयी अपने घर,
मैं  भी वापस अपने घर आ गया...

दिन  भर यही सोचता रहा की पता नहीं वो कैसी होगी...शाम को भी उससे बात नहीं हुई थी..हम दोस्त जहाँ अक्सर मिलते थे..वहां भी उस दिन वो नहीं आई थी..गाना और डांस उसका शौक रहा है..वो कोअचिंग क्लास हर रोज जाए या न जाए लेकिन डांस और सिंगिंग क्लास कभी मिस नहीं करती थी..उस दिन तो वो सिंगिंग डांस क्लास भी नहीं आई और नाही दूसरे दिन वो आई...उस वक्त तो मोबाइल भी नहीं था की हाल चाल आसानी से ले लिया जाए...दिव्या को बोला दूसरे दिन की पता करने क्या हुआ?तबियत तो ठीक है..फिर जब दिव्या ने बताया की वो ठीक है, कल से आने वाली है को़चिंग क्लास और कल हमसे भी मिलने वाली है..तब जाकर मुझे कुछ राहत मिली.

फिर जब हम मिले तो कुछ ऐसा नज़ारा था...

दिव्या- बाप रे..एक तो ये महाशय, सोये नहीं रात भर ट्रेन में, और ऊपर से ये मिस इंडिया...नखरे तो देखो इनके खाना खाने में नखरे...फीवर में सलमान खान याद आता है...पक्का भारी वाली ड्रामा क्वीन है ये लड़की ...और नहीं तो क्या 

तू  चुप रह..बड़ा दोस्त दोस्त कहती फिरती है...तू तो सो ही गयी थी...एक बार भी उठा नहीं गया तुझसे...रहने दे तू बस..फ़ालतू के एक्स्प्लनेशन मत दे...

हाँ  जी....हम तो कोई है ही नहीं...जो भी किया है आज तक हेल्प तुझे, बस एक इसने ही तो किया है...हमने तो कुछ किया ही नहीं न...

तू  न दिव्या पागल है पागल...क्या क्या बोलते रहती है तू...देख ही इज माई सच ए गुड फ्रेंड..ही केयर फॉर मी सो मच...लर्न समथिंग.. 


हाँ  हाँ सीखने को अब ये महाशय रह गए है न....और लोग तो लगता है अब है ही नहीं दुनिया में ..ही ही ही..


देख  अब तू मार खा जायेगी...सुधर जा...वरना सोच लेना तू... 

(उन दोनों की बहस ऐसे ही चलती रही उस दिन और मैं बस दोनों के झगड़ों के मजे ले रहा था...) 

continue reading एक ट्रेन का सफर..कुछ खास यादें...शिखा और दिव्या...

Thursday, June 3, 2010

खामोश रात

ये रात कितनी खामोश है
ये रात कितनी तनहा..
इस  सर्द रात में,
कुछ लम्हे आते,जाते हैं आँखों में...
दिल की धड़कने भी,
इस रात के सन्नाटे में..
एक अजीब आवाज़ कर रही हो जैसे...
तुम्हारा नाम ले रही हो जैसे...
तुम्हे पुकार रही हो जैसे...

नींद तो रूठी हुई है आज..
आज वो नहीं आएगी...
मैं कभी इस करवट, कभी उस करवट
नींद को मानाने की नाकाम कोशिशें करता रहता हूँ..

आज की ये रात बड़ी बेरहम रात है...
इस रात के सीने में दिल ही नहीं...
आँखों में लगातार चुभ रहे हैं,
वो  अधूरे जज़्बात, वो अधूरी कहानी..
सारी बातें आज इस तनहा रात में,
क्यूँ याद आ रही हैं मुझे..
वो  यादें ऐसे चुभ रही हैं आज,
जैसे टूटे शीशे चुभे हों दिल में कहीं..धंस गए हो..
और बूँद बूँद लहू गिर रही हो ...

इस बेरहम सर्द,तनहा रात में..
दर्द बढ़ने लगा है,गम सुलगने लगा है...
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Tuesday, June 1, 2010

I MISS YOU



I miss you..
I miss you more than my words can say
I miss you every now and then..
I miss you when there is rain..
I miss you whenever I watch that movie
which we saw together.

I miss your smile..
I miss your presence..
I miss your talks,
that were so divine..

I miss your caring attitude
I miss our long phone talks..
I miss playing with you..

You are the one who knows me..
You are the one upon whom I can trust..
You are my life then
Your are my life and will be my life forever..
You are straight into my heart..
You're with me always, whether I am with you or apart..
I miss being with you..
I miss you...I miss you....

- Priyanka Gupta


:-)

Love

Divu :)
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