Tuesday, May 25, 2010

तुम जा रही थी

तुम जा रही थी..
स्टेशन के प्लेटफोर्म नंबर वन के
एक कोने में खड़ा,
मैं बस तुम्हें देखे जा रहा था..
जिंदगी फिसली जा रही थी आँखों के सामने मेरे..
बेबस खड़ा मैं,
बस देखे जा रहा था..
उसी रुमाल से,
जिसे तुमने दिया था कभी
अपनी आँखों के आंसू पोछ रहा था..
दिल में एक अजीब सा दर्द उठा उस वक्त..
जब तुम्हारे चेहरे पर नज़र गयी थी मेरी
तुम्हारा वो खिला चेहरा,
उस दिन खिला खिला नहीं लग रहा था मुझे
उदासी साफ़ झलक रही थी चेहरे पर तुम्हारी..
और बेबस खड़ा मैं
बस तुम्हें देखे जा रहा था...


एक शाम पहले
जब तुमसे आखरी बार मिलकर,
घर वापस आया था..
एक अजीब सी बेचैनी थी..
एक अजीब सी उदासी थी...
तुमने उस शाम
जो ग्रीटिंग्स कार्ड दिया था,
उसे हाथों में लेकर घंटों बैठा रहा
उस ग्रीटिंग्स कार्ड में रखे वो दो फूल
जिनमें तुम्हारे हाथों का स्पर्श था
और जिसे मैं महसूस कर रहा था
रात भर उन्हें हाथों में लेकर
जागा रहा था मैं
शाम की तुम्हारी बातों को
तुम्हारी शरारतों को
तुम्हारी मुस्कुराहटों को
याद करते हुए
कब सुबह हुई पता ही नहीं चला था.

सच में,
वो शाम
जब हम आखिरी बार मिले थे,
कितनी छोटी थी,
कितनी जल्दी बीत गयी थी...
कितनी बातें थी मन में,
जो तुमसे कहना चाहता था,
लेकिन वक़्त कहाँ था हमारे पास,
वो सारी बातें
जो अनकही रह गईं,
अब तक कचोटती हैं मन को

उसी शाम चलते चलते,
तुमने अचानक मेरा हाथ थाम लिया था
और कहा था मुझसे,
तुम उदास न होना, मैं वापस जल्दी आऊंगी...
ग्रीटिंग्स कार्ड में भी तुमने,
यही लिखा था..
और साथ में लिखा था तुमनें,
तुम्हारी मुस्कराहट मेरी अमानत है,
सम्हाल कर रखना इसे,
और हमेशा मुस्कुराते रहना.

उस शाम जब तुम जाने लगी थी...
एक पल सोचा रोक लूँ तुम्हे,
जो वादा उस शाम किया था तुमसे
तोड़ दूँ उसे
तुम्हारा हाथ थाम,कहीं दूर चल दूँ,
इस ज़माने से बहुत दूर कहीं,
जहाँ सिर्फ तुम और मैं हों..
और दूर दूर तक कोई न हो
पर मैं कमज़ोर था..
ये कर न सका..