Monday, April 5, 2010

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किताबो में भी तुम

अभी शाम में बैठे बैठे ऐसे ही लिखा..

किताब लिए बैठा हूँ शाम से मगर,
एक चेहरा मुझे पढने नहीं दे रहा ..
वो तुम ही हो..
तुम्हारा ही अक्स बना हुआ है हर पन्ने पे..

अभी एक पन्ना पलटते ही,
वो गुलाब मिला..
जो तुमने मुझे दिया था कभी...
इसके पंखुरियों पे ,
ना जाने कितने मेरे आंसू है गिरे हुए..
इन किताबों के हर पन्ने
क्यों तुम्हारी याद दिलाते हैं?

7 comments:

  1. bahut nice tha...!!
    lagta hai kissi special someone ke liye likha hai :)

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  2. so swtt..

    arey isne shikha k liy likha hai or kiske liy likhegaa :-)
    very nyc !!

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  3. लेटे हैं नयन खोले
    सोने ही कहाँ देते
    तेरी यद् के हरबोले

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  4. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  5. प्यार भी कितना इनोसेंस होता है..!
    बहुत अच्छा लिखा है..

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  6. बहुत अच्छा लिखा ............"

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