Monday, April 5, 2010

किताबो में भी तुम

अभी शाम में बैठे बैठे ऐसे ही लिखा..

किताब लिए बैठा हूँ शाम से मगर,
एक चेहरा मुझे पढने नहीं दे रहा ..
वो तुम ही हो..
तुम्हारा ही अक्स बना हुआ है हर पन्ने पे..

अभी एक पन्ना पलटते ही,
वो गुलाब मिला..
जो तुमने मुझे दिया था कभी...
इसके पंखुरियों पे ,
ना जाने कितने मेरे आंसू है गिरे हुए..
इन किताबों के हर पन्ने
क्यों तुम्हारी याद दिलाते हैं?