Wednesday, March 31, 2010

शुक्रिया

नमस्ते ,
    मैं प्रीती हूँ,  लन्दन में रह रही एक भारतीय हूँ.मुझे ये पता नहीं की अभिषेक ने क्या सोच के मुझे इस ब्लॉग का एक सदस्य बनाया.मेरी रूचि हमेशा पढने के तरफ रही, लिखने की कोशिश नहीं की मैंने कभी.वैसे मैं अभिषेक के कुछ कविताओं को बहुत अच्छा लिखा हुआ मानती हूँ.अब जब अभिषेक ने अपने दो ब्लॉग की सदस्यता मुझे दे दी है, तो कोशिश करुँगी कुछ तो अच्छा लिखूं.

ये नीचे लिखी हुई कविता मेरी नहीं है लेकिन कुछ कारणों से मुझे ये पसंद है.
   
जब कोई दूर रहे और बहुत पास रहे..
नींद सुखी रहे और बहुत प्यास रहे..
तुम वही ख्वाब जगाने चले आ जाया करो..
मेरी रातों को चरागों से सजा जाया करो...

अश्क गीले से मोती अभी कच्चे हैं...
ये ख्वाबों को समझ लेते हैं सच्चे हैं....
तुम वही रस्म निभाने चले आ जाया करो....
मेरी पलकों पे लैब अपने सजा जाया करो......