Saturday, March 27, 2010

// // 11 comments

सपना


कल रात फिर एक सपना देखा मैंने,
चांदनी  रात में तुम चुपके से आयीं मेरे पास,
हम दोनों के बीच न ज़माने कि दूरी थी,
न कोई मजबूरी..
खुश थें हम अपने उस सपनों कि दुनिया में,
जहाँ हर तरफ खुशियों के चिराग जगमगा रहे थे...
एक दुसरे को बस हम देखे जा रहे थे,
अलफ़ाज़ हमारे आखों से बयां हो रहे थे..
समंदर से तो मैं वाकिफ हूँ,
लेकिन वो आँखें कुछ ज्यादा गहरी हैं,
जिनमे मैं डूब जाया करता हूँ..
कल सपने में न जाने कितनी बार,
उन आँखों में डूब के वापस आया था मैं...
पर,
खुली जो आँख तो न तुम थी,
न वो ज़माना ,
और न वो सपना...
दहकती आग थी, तन्हाई थी और मैं था..
उस हसीं सपने कि शायद,
सच होने कि कोई गुंजाइश नहीं..

11 comments:

  1. bahut achha likhey ho yaar ...

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  2. very nice....!!
    gr8 work
    aapko publish krna chaheye aapna kaam

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  3. thanks sneha,
    but waisa bhi achha nahi likhta main ki book publish karwaun :)

    mere se achhe likhne walon ki kami nahi hai :)

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  4. waah kya baat hai.. PD ke shared link se yahan aaya hoon...

    bhaavpurn lekhan..

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  5. this one is fantastic yaar :)

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  6. बहुत अच्छी कविता है अभिषेक

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  7. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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  8. i simply love this one :) :)

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  9. क्या कमाल लिखा है अभि...इतनी सादगी और सहजता से कितना कुछ कह गए...दिल को छू गई...

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