Thursday, February 25, 2010

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बिगड़ा मेरा नसीब

बिगड़ा मेरा नसीब तो सब कुछ संवर गया
काँटों पे मैं गिरा और ज़माना गुज़र गया

तूफान से थक गया, मैंने पतवार छोर दी 
जब मैं डूब चुका, समंदर ठहर गया

टुकड़े तेरे वजूद के,फैले थे मेरे पास
उनको समटने में, मेरा वजूद बिखर गया 

मंजिल को ठुंठता रहा, मुसाफिर ये क्या हुआ
एक राहगुज़र पे उसका सफाराब ही बिछड़ गया

ढलने लगी है रात, चले जाओ दोस्तों
मुझे भी ठुंठना है मेरा घर किधर गया....

3 comments:

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