Thursday, February 18, 2010

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जब हम छोटे थे

 
कितनी मासूम थी जिंदगी, जब हम छोटे थे
ना दिल में मैल, न चेहरे पे मुखौटे थे...
कितनी मासूम थी जिंदगी जब हम छोटे थे

सुन ले कोई मेरे दिल की थोड़ी सी दास्तान...

वक़्त किसी के पास इतना भी कहाँ आज,
सीने पे लगा लेते थे दौड़ के लोग सभी,
पहले कभी जब हम छोटी सी बातों पे रोते थे...
कितनी मासूम थी जिंदगी, जब हम छोटे थे

सुन ले कोई मेरे दिल की थोड़ी सी दास्तान...

अब तो प्यार देके भी मोहब्बत नहीं मिलती,
वक़्त तो मिलता है मगर फुरसत नहीं मिलती,
एक रातें हैं ये जो नींदों से नाता ही तोड़ चुके,
एक दिन था वो जब हम बड़े सुकून से सोते थे...
कितनी मासूम थी जिंदगी, जब हम छोटे थे

सुन ले कोई मेरे दिल की थोड़ी सी दास्तान...

8 comments:

  1. ये तो सच है की हम जब छोटे थे तब बड़ा होना चाहते थे, और अब वापस बच्चा बनना चाहते हैं.. खैर ये सब तो और बात है.. फिलहाल तो बधाई देने चले आये, इतनी अच्छी कविता जो लिखी आपने.. :)

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  2. bahut achhi poem h..
    i was also lost in childhood :-)

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  3. very nice poem
    yaad aa gya bachpan ka zamana

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  4. I loved your poetry.excellent.keep it up
    Subhashini

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  5. This is so cool bro.. I ws jst lost :)

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