Sunday, January 18, 2009

कुछ बातें याद आती हैं...

कितनी बातें याद आती हैं...
तस्वीरों सी बन जाती हैं...

मैं कैसे इन्हें भूलूं..
दिल को क्या समझाओं

कितनी बातें कहने की हैं...
होठों पे जो सहमी सी हैं...

एक रोज़ इन्हें सुन लो..
क्यूँ ऐसे गम सुम हो...

क्यूँ पूरी हो न पायी दास्ताँ...
कैसे आई हई ऐसी दूरियां .. जावेद अख्तर 
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Thursday, January 8, 2009

मैं अकेला रहता हूँ


"मैं अकेला रहता हूँ.."

मैं अकेला रहता हूँ..
आते हैं लोग जाते हैं...
मैं
अकेला रहता हूँ..

साथ कोई चलने वाला नहीं...
जो
साथी है वो साथ नहीं...
.....है दूर कहीं
अकेला
ही इस भीड़ से झूझता हूँ
...मैं
अकेला रहता हूँ...


कहने को महफिल सजी रहती है आसपास...
सामिल
होके भी में उनमे सामिल नहीं...
मैं
अकेला रहता हूँ...
कहते है तन्हाई सिखाती है बहुत कुछ..
पर
रूलाती भी है अक्सर..
आंसू
देखो रोज़ लड़ते है मुझसे रूठ भी जाते हैं कभी...
.........पूछते हैं...
क्या
कोई भी नहीं यहाँ क्या?..
समझा
नहीं पाता उन्हें क्यूँ मैं अकेले रहता हूँ...


हँसते
चेहरे के पीछे भी...
लाखो
छुपे आंसू होते हैं..
यूँ
तो दीखते नहीं उजाले में..
अंधेरो
से प्यार करते हैं....
लोग
समझेंगे नहीं...
देख
नहीं पातें हैं की मैं अकेला रहता हूँ..


खुशी
दो पल मिल जाती है
..तो
अहसास होता है की साँस अभी बाकी है..
अपने
आप को आईने में देख नहीं पाता आजकल
डरता हूँ कहीं आईने को भी सिकायत हो मुझसे..
की
क्यूँ मैं अकेला रहता हूँ....


दर्द है पर खुशी मिलती है...
खुद
से जब दो बातें करता हूँ,..
..अच्छा लगता है...

समझाता हूँ दिल को कभी कभी..
ये
सोनेपन का आलम मुख्तसर..
बस
इंतज़ार है कोई ख़ास के वापस आने है फिर नहीं कहूँगा
....
की मैं अकेला रहता हूँ..
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