Saturday, December 20, 2008

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रंग बिरंग


कुछ लम्हे कुछ अहसास मिटाए नहीं जाते.. कुछ मीठे मीठे पल भुलाये नहीं जाते.. कुछ नज़रे खुद ही कह जाती हैं.. कुछ अल्फाज़ सुनाये नहीं जाते...


सागर किनारे लोग अकसर कुछ घरोदे बना जाते है अपने अरमानों की एक दुनिया सजा जाते है आती जाती लहरे उसकी गवाह बन जाती है जहा वो अपने सपनों का आशियाना बना जाते है कहते है उन घरोदे मैं किसी के सपने होते है जिन्दगी के साथ बनते है वो उनके अपने होते है ..

मोसम की पहली बारिश का आलम,वो रिमझिम करती बुदो की सरगम.
मीटी की सोधि सी खुशबु उस पर कागज की नावो पर खिलता बचपन
वो चंपा की डाली इठेलाथी सी मदमाती जेसे पहला सावन

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