Friday, December 26, 2008

हंसी खोयी ख़ुशी खोयी













कुछ बातें मेरी...

नमस्ते दोस्तों..
साल 2008 मेरे लिए बड़ा ही दुखद रहा....इसलिए अपने दिल की कुछ बातें कविता के जरिये कहने की कोशिश कर रहा हूँ... आशा करता हूँ आप लोगों को पसंद आएगी....


हंसी खोयी...ख़ुशी खोयी..
जाने कहाँ जिंदगी खोयी...

इस वर्ष में पूछो न कैसे ,

मेरे सारे अरमान बिखरे

मेरे सारे सपने टूटे 

जो कुछ सोचा हुआ न वो...

जो कुछ चाहा मिला न वो 

अजीब सी कशमकश में
ख़ुशी की तलाश में 
कुछ अच्छा होने के इंतजार में
बीत गए साल के सारे दिन मेरे 


हुआ था कुछ ऐसा, इस साल 

आंसूं ही आंसूं थे आँखों में 
ग़मों का अजब जमघट सा लगा था 
कहीं दूर से कभी 
ख़ुशी की झलक दिखती तो 
कदम बढाते ही मेरे
वो जाने कहाँ फिर खो जाती,
वो जाने कहाँ फिर छुप जाती 
और ज़िन्दगी, 
फिर वहीँ रह जाती...

तन्हाइयों में कभी कभी वैसे,

यादों का साथ अच्छा लगता है 
तन्हाई भी पहली बार महसूस हुई 
पहली बार ऐसा लगा है,
जैसे मैं बहुत अकेला हूँ...
बड़े शिद्दत से लोगों की कमी महसूस हुई है ...

नए रिश्ते कुछ जुड़े हैं अगर, 
तो बहुत से रिश्ते टूटे भी हैं,
क्या उन टूटे रिश्तों को, 
इस साल का उपहार समझूँ?
या समय की कोई चाल?
समझ नहीं पा रहा हूँ...

रिश्ते, सपने, इरादे, बातें 
कुछ ऐसे टूटी हैं 
और टूट के कुछ ऐसे बिखरी हैं 
की जैसे शाखों से पत्ते टूट के 
बिखर जाते हैं...

कुछ बड़े हसीन पल थे 
मेरी वो सुनहरी यादें,
यारों की वो टोली, मस्ती की फुहार 
लड़ना झगड़ना...और फिर एक साथ गाना...
अनमोल थे वो दोस्त,
जो अब नहीं हैं मेरे साथ...
इस साल के पहले, 
सारे थे साथ में, 
अचानक चलते चलते कहाँ खो गए वो सारे....
यूँ अचानक क्यों इस साल मैं 
ऐसे तनहा हो गया हूँ?
बहुत सी यादों में डूबा हुआ ये दिल 
उन्ही बातों को सोचता है, 
उन्ही रास्तों की तरफ देखता है 
जाने कहाँ वो राहे खोयी मेरी...

ना कोई दोस्त ना कोई साथी,
उमंग भी न थी...कोई तरंग न थी...

इस वर्ष तो मानो जैसे,
 

जिंदगी में कोई चमक न थी...
तनाव था, परेशानियाँ थी...मुसीबतें थीं...

एक अजीब सा डर घेरे हुआ था...
जो कहने से भी जी घबराता है,
वैसे एक कहानी हुई थी...
पता नहीं कैसे इस साल मैंने,

इन्ही डरों में, इन्ही मुसीबतों में 
अपने चेहरे की वो रौनक खोयी...

पर दिल अब थोड़ा खुश है,

जाहिर सी बात है,
ये बुरा साल बीतने वाला है अब...
नव वर्ष है खडा द्वार पे..

शायद कुछ अच्छा हो,

कोई करिश्मा सा.....
जो लौटा लाये मेरी सारी खोयी खुशियाँ...
मेरी वो भूली हुई सी हंसी,
मेरे चेहरे की वही रौनक...
लौटा लाये ये आने वाला नूतन साल 
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Tuesday, December 23, 2008


यह न थी हमारी क़िस्‌मत कि विसाल-ए यार होता
अगर और जीते रह्‌ते यिही इन्‌तिज़ार होता

तिरे व`दे पर जिये हम तो यह जान झूट जाना
कि ख़्‌वुशी से मर न जाते अगर इ`तिबार होता

तिरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था `अह्‌द बोदा
कभी तू न तोड़ सक्‌ता अगर उस्‌तुवार होता

कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए नीम-कश को
यह ख़लिश कहां से होती जो जिगर के पार होता

यह कहां की दोस्‌ती है कि बने हैं दोस्‌त नासिह
कोई चारह-साज़ होता कोई ग़म्‌गुसार होता

रग-ए सन्‌ग से टपक्‌ता वह लहू कि फिर न थम्‌ता
जिसे ग़म समझ रहे हो यह अगर शरार होता

ग़म अगर्‌चिह जां-गुसिल है पह कहां बचें कि दिल है
ग़म-ए `इश्‌क़ अगर न होता ग़म-ए रोज़्‌गार होता

कहूं किस से मैं कि क्‌या है शब-ए ग़म बुरी बला है
मुझे क्‌या बुरा था मर्‌ना अगर एक बार होता

हुए मर के हम जो रुस्‌वा हुए क्‌यूं न ग़र्‌क़-ए दर्‌या
न कभी जनाज़ह उठ्‌ता न कहीं मज़ार होता

उसे कौन देख सक्‌ता कि यगानह है वह यक्‌ता
जो दूई की बू भी होती तो कहीं दो चार होता

यह मसाइल-ए तसव्‌वुफ़ यह तिरा बयान ग़ालिब
तुझे हम वली समझ्‌ते जो न बादह-ख़्‌वार होता
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Saturday, December 20, 2008



Meri Tasveer..

तेरी हर एक बेचैनी
मुझे रातों जगाती है......

मेरी यादों की महफिल में
बस एक तू ही तो आती है......

तेरी ऑंखें जो कहती है
वोह मेरा दिल समझता है.......

मेरे आसूयों की सरगर्मी......
को तू क्यूँ ना समझ पाई...



पल भर में तमाम उम्र की सोचें बदल जाती हैं..
जिन राहों पे चलते हैं वो राहें बदल जाती हैं..
करने को क्या नहीं करते लोग मोहब्बत में..
बस हमारे लिए ही रश्में बदल जाती हैं...

रेजा रेजा बिखरी है जिन्दगी,ना जाने कब से एक मोड पे रुकी है जिन्दगी..
दर्द दिल से उतर कर रूह मे समाने लगा है क्यों रेत की तरह बिखरी है जिन्दगी..
हर तरफ दुआओं का सिलसिला है ना जाने किस कोने मे ये रब छिपा है..
दुंड कर कोई कह्दो उसे इन हवाओ मे भी खुशबु बन कर बिखरी है जिन्दगी
..


साँस लेना भी कैसी आदत है
जीये जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से, कितनी सदियों से
जिये जाते हैं, जिये जाते हैं
आदतें भी अजीब होती हैं


रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाये हुये खत खोलें
अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने पलकों पे नामी सूख गयी थी, सो गिरा दी|

रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के दाल दिया जलाते अलावों मसं उसे
रात भर फून्कों से हर लोऊ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने |
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रिश्ते- गुलज़ार

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं
कुछ इक पल के
कुछ दो पल के

कुछ परों से हल्के होते हैं
बरसों के तले चलते-चलते
भारी-भरकम हो जाते हैं

कुछ भारी-भरकम बर्फ़ के-से
बरसों के तले गलते-गलते
हलके-फुलके हो जाते हैं

नाम होते हैं रिश्तों के
कुछ रिश्ते नाम के होते हैं
रिश्ता वह अगर मर जाये भी
बस नाम से जीना होता है

बस नाम से जीना होता है
रिश्ते बस रिश्ते होते हैं


कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का
दबा के पैन्सिल को उंगलियों में
मुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख के
लिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो..
ख़याल होता है, गोर्की है!
पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी है
जो म्यूनिसपैल्टी के पार्क में बैठ कर पढ़ा करते हैं किताबें
डिकेन्स के और हार्डी के नॉवेल से गिर पड़े हैं...
या प्रेमचन्द की कहानियों का वर्क है कोई, चिपक गया है
समय पलटता नहीं वहां से
कहानी आगे बढ़ती नहीं है... और कहानी रुकी हुई है।

ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती हैं - बेस्वादी।
हथेली पे लेके दिन की फक्की
मैं फाँक लेता हूं...और निगलता हूं रात के ठन्डे घूंट पीकर
ये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता

ये खुश्क़ दिन एक गर्मियों का
जस भरी रात गर्मियों की
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रंग बिरंग


कुछ लम्हे कुछ अहसास मिटाए नहीं जाते.. कुछ मीठे मीठे पल भुलाये नहीं जाते.. कुछ नज़रे खुद ही कह जाती हैं.. कुछ अल्फाज़ सुनाये नहीं जाते...


सागर किनारे लोग अकसर कुछ घरोदे बना जाते है अपने अरमानों की एक दुनिया सजा जाते है आती जाती लहरे उसकी गवाह बन जाती है जहा वो अपने सपनों का आशियाना बना जाते है कहते है उन घरोदे मैं किसी के सपने होते है जिन्दगी के साथ बनते है वो उनके अपने होते है ..

मोसम की पहली बारिश का आलम,वो रिमझिम करती बुदो की सरगम.
मीटी की सोधि सी खुशबु उस पर कागज की नावो पर खिलता बचपन
वो चंपा की डाली इठेलाथी सी मदमाती जेसे पहला सावन
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