एहसास प्यार का - प्यार की कहानियाँ और कवितायें

स्वागत है आपका मेरी इस छोटी सी दुनिया में जहाँ छोटे छोटे प्यार की कहानियाँ मैं लिखता हूँ. ये कहानियाँ शायद आपको भी आपके किसी पुराने समय में वापस ले जाएँ, शायद किसी साथी की याद दिलाएं या कोई बीता पल याद आ जाए आपको. पढ़ते रहिये एहसास प्यार का...


दिल-गिरफ़्ता ही सही बज़्म सजा ली जाए
याद-ए-जानाँ से कोई शाम न ख़ाली जाए

Monday, June 26, 2017

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झील में तैरती बत्तखें

कौन ऐसा खुशनुमा दिल न होगा जिसे बारिश की रुमानियत न पसंद हो, और बात जब उस दीवानी सी प्रिया की हो, तो बारिश में घूमने से कौन मना कर सकता है ? पिछली पोस्ट में आपने प्रिया के दिल्ली आने और मेरे भैया भाभी की शादी की सालगिरह में शामिल होने के किस्से पढ़े, और साथ ही मुझे रात के ढाई बजे जगा के दी गई उसकी धमकी की दास्तां भी...अब आगे पढ़िए उसके साथ बिताई गई सात ऑसमाशामों में से एक किस्सा और...(अब ये 'ऑसमाशामें ' क्या बला है, इसे जानने के लिए तो आपको यहाँ जाना पड़ेगा...)

सुबह अलार्म बजने के पहले ही मेरी नींtद खुल गयी थी. रात में प्रिया से बात करने के बाद मुझे सही से नींद ही नहीं आयी. नींद न आने की वजह प्रिया के बदमाशियों के प्रति इरिटेसन, गुस्सा या उसकी धमकियों का डर नहीं था, बल्कि मुझे गिल्ट हो रहा था कि रात नींद में मैंने बेवजह ही प्रिया को डांट दिया था. हालाँकि मैं जानता था कि उसे मेरी डांट का कभी बुरा नहीं लगता, और वो मेरी डांट का बदला अक्सर मुझे वापस डांट कर ले लिया करती है. लेकिन फिर भी मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था. इतने बेसब्री से मैं प्रिया का इंतजार कर रहा था, और जाने कितना कुछ सोच रखा था, कि दिल्ली में कहाँ कहाँ घुमना है, कैसे वक़्त बिताना है, और अब जब वो दिल्ली आ गयी थी, मैंने उससे एक दिन की मोहलत माँगी थी आराम करने के लिए? ये मेरी बेवकूफी की हद ही तो थी. वो तो अच्छा हुआ रात में अचानक बारिश हुई और प्रिया ने मुझे डांट लगाकर सुबह मिलने बुलाया, वरना एक पूरा दिन मैं बस सोने में बरबाद कर डालता.

सुबह मैं जब घर से निकला तो मौसम बड़ा सुहावना हो चुका था. रात भर मुसलाधार बारिश हुई थी और सुबह सुबह खूब ठंडी हवा चल रही थी. मैं समय से काफी पहले खान मार्केट पहुँच गया था. खान मार्केट के गेट नंबर एक के ठीक सामने कैफे “ब्लू नाम” का एक कैफ़े था. प्रिया ने वहीँ आने के लिए कहा था. पहले तो मैंने सोचा कि कैफे के बाहर ही उसका इंतजार करूँ लेकिन प्रिया के आने में आधे घंटे का वक़्त बाकी था. मैं कैफे के अन्दर चला आया. कैफे लगभग खाली ही था. कोने वाली मेरी पसंदीदा जगह भी खाली थी, मैं जल्दी से जाकर वहाँ बैठ गया. सुबह सुबह वैसे भी इस कैफ़े में ज्यादा भीड़ नहीं होती. यहाँ बस वही आते हैं जो सुबह लोदी गार्डन से टहल कर लौट रहे होते हैं या फिर साइकलिस्ट जो साइकलिंग के बाद कुछ देर यहाँ सुस्ताने के लिए बैठते हैं. मैंने एक सरसरी निगाह कैफे पर डाली. मेरे सामने तीन लड़कियां बैठी थीं जो तेज़ आवाज़ में बातें कर रही थीं. उनमें से एक लड़की ने शायद अपनी बाहों पर टैटू बनवाया था जिसके बारे में वो अपनी बाकी दोनों सहेलियों को बता रही थी. उनके ठीक बगल में दो बुजुर्ग दोस्त बैठे थे जो सतरंज की बाजी पर झुके थे. मेरे ठीक बगल में एक लड़का और एक लड़की बैठे थे. लड़की ने जाने किस बात पर लड़के को मजाक में एक थप्पड़ मार दिया था.  उन्हें देख मुझे थोड़ी हँसी आ गई. मैंने शुक्र मनाया कि प्रिया अभी नहीं आई है, वरना इस लड़की को देखकर वो भी ऐसा करने को इन्स्पाइर हो जाती. कैफे के काउंटर के दूसरी तरफ कुछ विदेशी टूरिस्ट का एक ग्रुप था जिनमें से शायद किसी का जन्मदिन था और वे खूब मस्ती मजाक कर रहे थे और तरह तरह के लहजे में बर्थडे जिंगल गा रहे थे. मेरा सारा ध्यान उनके सेलिब्रेशन पर ही था कि तभी मुझे पीठ पर हलकी थपथापाहट महसूस हुई. मैं चौंक गया. मुड़ा, तो देखा प्रिया खड़ी थी.

“क्या बात है मिस्टर..कब से यहाँ बैठे हो? बड़े फ्रेश दिख रहे हो? रात में खूब सोये क्या?” प्रिया ने शरारती अंदाज़ में मुझे छेड़ते हुए कहा.
“बस मैडम, मेहरबानी है आपकी. पूरे ढाई घंटे सोया हूँ मैं..पूरे ढाई घंटे! कैन यू बिलीव इट?” प्रिया को छेड़ने के लिए थोड़े शरारत से मैंने भी कहा.
“हुंह....सब समझती हूँ मैं. ताना देने की कोई जरूरत नहीं है. In fact, you should thank me, वरना इतने रोमांटिक मौसम में भी तुम बाकी लोगों की तरह अपने बिस्तर में दुबके पड़े होते..” 

प्रिया की इस बात का मैंने कोई विरोध नहीं किया. उसकी बात वैसे सही भी थी. सच में मौसम बहुत खूबसूरत हो गया था, और अगर उसनें जिद न की होती, तो मैं सही में घर में सोया होता.

“अच्छा चलो बताओ, आगे का प्लान क्या है?” मैंने प्रिया से पूछा. प्रिया ने पूरे दिन का प्लान सुना डाला - “देखो मिस्टर, यहाँ ब्रेकफास्ट करने के बाद  हम लोदी गार्डन में बैठने मोर्निंग वाक के लिए जायेंगे. वहाँ अपने अड्डे पर बैठेंगे और फिर हमारी सवारी निकलेगी डिलाइट, मैटिनी शो के लिए और......
“डिलाइट? दिल्ली गेट वाला डिलाइट? बेवकूफ लड़की !! इतने अच्छे मौसम में बाहर घूमना चाहिए और तुमनें डिलाइट में फिल्म देखने का प्लान बना डाला..” मैंने उसकी बातों को बीच में ही काटते हुए कहा.
“अरे यार, डांटो नहीं,  मुझे कहाँ पता था कि आज मौसम ऐसा ऑसम हो जाएग. मैंने तो कल दोपहर में ही राहुल से टिकट मँगवा ली थी. तुम्हें इसलिए नहीं बताया था कि तुम्हें सरप्राइज देना चाहती थी मैं..” 
"कल टिकेट मंगवा लिया था तुमने? और आज बारिश न होती और मैं न आता तो?" मैंने पूछा. 
“तो क्या..टिकट और पैसे बेकार हो जाते ”. उसनें बेचारी सी शक्ल बनाते हुए कहा, जिससे मुझे हँसी आ गयी.   
“अच्छा !! कैन सी फिल्म है? ये तो बताओ...”
“कुछ देर में पता चल जाएगा तुम्हें. ट्रस्ट मी, बहुत अच्छी फिल्म है..” उसनें कहा. 
“लेकिन यार नाम तो बताओ ?” मैंने दोबारा पूछा तो वो थोड़ा झल्ला सी गयी. 
“यार तुमने एक तो बीच में मुझे टोक दिया, फिर डांट दिया और अब इतने सावल कर रहे हो. देख लेना जो भी फिल्म होगी,  Now Shut Up and LISTEN -  डिलाइट से निकलने के के बाद हम कुछ देर के लिए लाल किला जायेंगे, वहाँ से चाँदनी चौक जहाँ मुझे कुछ शौपिंग करनी है और फिर आखिर में पराठे वाली गली. बस..इतना ही” कहकर वो चुप हो गयी, और मेरी तरफ ऐसे घूर कर देखने लगी कि जैसे अगर मैंने इसके प्लान में किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने की कोशिश की तो ये मुझे खा जाएगी. 

सच बताऊँ, तो प्रिया के इस तरह से घूरने से मैं हमेशा डर जाता हूँ. मैंने जल्दी जल्दी अपना ब्रेकफ़ास्ट खत्म किया, और प्रिया के साथ लोदी गार्डन की तरफ चल दिया. मौसम बड़ा खूबसूरत था, इसलिए हम पैदल ही चल दिए थे. आसमान में काले बादल छाने लगे थे, और किसी भी वक़्त बारिश शुरू हो सकती थी. मेरा लॉजिकल दिमाग बार बार ये कह रहा था कि ऐसे मौसम में लोदी गार्डन जाना बेवकूफी है, किसी कैफ़े में ही बैठकर गप्पे लड़ाओ, लेकिन दिल इस बात पर अड़ा था कि यार कभी कभी ऐसे मौसम में ऐसी बेवकूफी करनी चाहिए. 

हम दोनों सीधा लोदी गार्डन के झील के पास आ गए. प्रिया को लोदी गार्डन में कहीं और घुमने की कभी उत्सुकता नहीं रहती, लोदी गार्डन में दो तीन ही जगह होंगे जहाँ उसे समय बिताना पसंद था, लेकिन इस झील के किनारे बैठना उसे सबसे ज्यादा अच्छा लगता था. झील के किनारे हमारा अपना एक बेंच था. टेक्निकली वो हमारा बेंच नहीं था, लेकिन संजोग की बात थी कि हम जब भी यहाँ आये हैं, ये बेंच हमेशा खाली रही है.हमनें इसपर किसी को भी कभी बैठे नहीं देखा. प्रिया तो ये तक कहती थी कि इस बेंच पर सिर्फ हमारा अधिकार है, यहाँ किसी और ने बैठने की कोशिश की तो उसे मज़ा चखा दूँगी. उसका बस चलता तो वो बेंच के आगे एक तख्ता लगा कर मेरा और खुद का नाम उसपर लिख देती.



हम उसी बेंच पर बैठ गए. प्रिया एकदम मेरे करीब आ बैठी.  उसनें अपने बंधे बालों से क्लिप निकाल ली, और वो उसके कन्धों पर बिखर आये थे. सामने झील में बहुत सी बत्तखें तैर रही थी. प्रिया की आँखें झील में तैरती उन बत्तखों पर ठिठक गयीं. "देखो उधर - उसनें मेरे हाथ को झिंझोड़ते हुए कहा - कितनी सुन्दर लग रही हैं न ये  बत्तखें, एक कतार में चलते हुए. उजली और बेहद प्यारी. इन्हें हम अपने साथ ले चले? अपने घर ?” प्रिया ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा. उसकी उस मुस्कराहट में लेकिन कोई शरारत या हँसी नहीं थी. उसकी आँखें स्थिर थीं, चमकती हुईं. मैं उसका चेहरा देखकर समझ जाया करता हूँ, कि कब वो शरारत कर रही है और कब गंभीर है. 
“तुम कहो तो मैं इन्हें बैग में डाल के ले चलूँ”? मैंने प्रिया से कहा. वो हँसने लगी, “आई रियली विश यार”.  उसनें धीरे से कहा और फिर उन्हीं बत्तखों की तरफ देखने लगी, “जानते हो? दीदी को बत्तखें बहुत क्यूट लगती थी और मुझे बेहद स्टुपिड. अपने शहर की सचिवालय वाली सड़क याद है न तुम्हें? कैसे अक्सर गर्मियों की शामों में बत्तखें सड़कों से अपनी फ़ौज लेकर गुज़रती थीं. पता है एक बार दीदी ने गाड़ी रुकवा दी थी और कैमरे से बत्तखों की तस्वीर लेने लगी थी. मुझे इतना गुस्सा आया था न उस समय दीदी पर. मैं तो उनसे लड़ पड़ी थी, कैमरे की रील लगभग खत्म होने को थी, मुश्किल से चार पाँच फोटो और लिए जा सकते थे और दीदी ने वो रील बत्तखों पर खर्च कर दिए थे. रात में मैं खूब लड़ी थी उनसे, मेरा फोटो सेसन हो जाता बचे हुए रील में. जानते हो उन दिनों मुझे लगता था कि बत्तखें स्टुपिड हैं, लेकिन असल में स्टुपिड बत्तखें नहीं थी..मैं थी”.
“हम्म..सब जानता हूँ मैं.." मैंने फिर से शरारत भरे लहजे में कहा, 
"अच्छा..? क्या जानते हो तुम? बताओ ज़रा..  
"यही कि तुम उन दिनों सच में स्टुपिड थी. मतलब ऐसा नहीं है कि अब समझदार हो गयी हो, बस उन दिनों ज्यादा स्टुपिड थी तुम...” मैंने कहा. 
“हाँ, ये तो सच है यार, !! इस बात पर तो आई एम विद यू !!” उसनें कहा, और हम दोनों एक साथ हँसने लगे थे. 

कुछ देर तक हम दोनों झील में तैरती उन बत्तखों को देखते रहे थे. “अच्छा, एक बात बताओ, तुम्हें याद है इस झील के पास हम दोनों पहली बार कब आये थे?” प्रिया ने पूछा.
“हाँ बिलकुल याद है, बारहवीं के इम्तिहान के बाद. दीदी भी थीं हमारे साथ, वही हमें घुमाने लायीं थीं”.
प्रिया के चेहरे पर मुस्कान उभर आई, “हाँ...लेकिन उस वक़्त हमें नहीं पता था न कि वही आखिरी साल होगा जब दीदी साथ रहेंगी. जानते हो, उसके अगले साल मैं लोदी गार्डन अकेले आई थी, ऐसा ही बारिशों वाला दिन था वो भी, और इसी पत्थर पर बैठकर मैं खूब रोई थी. 

प्रिया के अचानक इस तरह संजीदा होने से मैं थोड़ा घबरा सा गया था. "प्रिया तुम ठीक तो हो?"
वो हँसने लगी.. “अरे डरो नहीं, मैं एकदम ठीक हूँ, बस यूहीं कुछ याद आ गया था". उसनें कहा और कुछ देर तक बेंच पर किसी अदृश्य दाग को कुरेदते हुए उसनें पूछा “तुम्हें मुकेश का वो गाना याद है न? तुम्हारा तो पसंदीदा है - जाने चले जाते हैं कहाँ दुनिया से जाने वाले?” 
“हाँ, तुम्हें मैंने ही तो सुनाया ये गाना पहली बार...”
“यस...! अपने उस मर्फी वाले टेपरिकॉर्डर पर. मुझे याद है.." कहकर वो चुप हो  गयी. कुछ देर चुप रहने के बाद उसनें मेरी ओर देखा, “जानते हो दीदी के जाने के एक साल बाद जब मैं यहाँ आई थी न, उस दिन यहाँ बैठे-बैठे मैं भी कुछ-कुछ उस गाने जैसा ही सोच रही थी, कि दीदी कहाँ गयीं होंगी? क्या सच में कोई ऐसी जगह है, जिसे हम स्वर्ग कहते हैं, और दीदी वहाँ चली गयीं हैं? कैसी जगह होगी यार वो? क्या ये नहीं हो सकता कि मैं बस एक बार, सिर्फ एक बार वहाँ जाऊं, और उन्हें देख कर वापस आ जाऊं. बस एक झलक. कैसी हैं वो ये पता कर के वापस यहाँ आ जाऊं..” कहते हुए उसकी आँखें मुझपर उठ आयीं थी.

मुझे समझ नहीं आया कि मैं प्रिया से क्या कहूँ. मुझे यूँ असमंजस में पड़ा देख उसनें कहा, एक मजेदार बात बताऊँ तुम्हें. हँसोगे तो नहीं न?
“नहीं बाबा..नहीं हसूँगा ..बोलो तो....” मैंने उसकी हथेली को अपने हाथों में ले लिया.

“तुमने कभी गौर किया है कि इस झील के किनारे इस बेंच पर या किसी भी और झील के किनारे, किसी भी और बेंच पर बैठने वक़्त मैं हमेशा अपने बगल में इतना 'स्पेस' क्यों छोड़ देती हूँ?”
“हाँ, ताकि तुम मेरे और करीब बैठ सको....”
“नो इडियट! तुम इतने भी स्पेशल नहीं हो. यू नो, ये जगह मैं हमेशा दीदी के लिए छोडती हूँ. ताकि वो मेरे बगल में बैठ सके. जानते हो वो रहती हैं हमेशा मेरे आसपास. हर जगह.”

“जानता हूँ मैं...” मैंने कहा.

“पता है, मैं जब पिछली बार यहाँ आई थी इसी बेंच पर बैठी थी, अकेली थी, और दीदी को याद कर के खूब रो रही थी. तब वो पहली बार मुझे दिखी थी. पूरे एक साल बाद, उन्हीं कपड़ों में जिसमें उन्हें मैंने आखिरी बार देखा था. तुम नहीं थे उस वक़्त दिल्ली में, उस दिन उन्होंने ही मुझे चुप करवाया था. हमनें खूब बातें की थी.." एक चमकीली सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गयी थी.. कुछ देर के पौज के बाद उसनें फिर कहा, यू नो, उस दिन एक और अजीब बात हुई थी. मैं इसी बेंच पर बैठी थी, और मुझे पता भी नहीं चला ये बत्तखें कब मेरे इतने करीब चली आई थी. बिलकुल मेरे पैरों के पास. और पता है, मुझे डर नहीं लगा. मुझे डर लगना चाहिए था न इन बत्तखों से? मुझे हमेशा इनके चोंच बड़े क्रीपी लगते थे, तो मुझे डरना चहिये था? राईट? लेकिन यू नो व्हाट? मुझे इन बत्तखों पर प्यार आने लगा था. और मुझे ये बत्तखें स्वीट लगने लगी. लेकिन सबसे बड़ा रेवलेशन मुझे उस दिन रात में नींद में हुआ, मुझे सपनें में एक आवाज़ सुनाई दी थी, वे बत्तखें तुम्हारे पास नहीं आई थी, बल्कि तुम्हारे बगल में जो पीले समीज सलवार में लड़की बैठी थी उसके पास आई थी. यू नो, पीले समीज सलवार में दीदी थी, जो मेरे बगल में बैठी थीं.." कहते हुए प्रिया चुप हो गयी. एकदम चुप.  मैंने प्रिया के हथेलियों को अपनी हथेलियों में जकड़ लिया.  

“पता है यार, कुछ दिनों पहले मैं अपनी पुरानी अल्बम देख रही थी, And I was really amazed, कि मेरी शक्ल कितनी बदल गयी है, लेकिन दीदी, वो अब भी वैसी ही हैं. डिट्टो.. सेम टू सेम! जानते हो मैं बूढी हो जाउंगी और बड़ी  वीयर्ड सी दिखने लगूंगी. तुम भी बूढ़े हो जाओगे, दांत झड़ जायेंगे तुम्हारे, हमारे आसपास के सभी लोगों पर उम्र का असर दिखेगा, लेकिन दीदी...वो वैसी ही दिखेंगी हमेशा. जैसे एल्बम की उस आखिरी तस्वीर में वो दिखती हैं, मस्त..हंसमुख..सुन्दर..स्वीट एंड ईटर्नली ब्यूटीफुल ! यू नो, उनकी एक बड़ी सी तस्वीर मेरे कमरे की दीवार पर लगी है, जिसे तुमने फ्रेम करवाया था, याद है न तुम्हें वो तस्वीर उनकी? पहले जब वो थीं, मुझे उनकी वो तस्वीर बेहद आम सी लगती थी लेकिन अब असाधारण तस्वीर लगती है. एक सम्मोहित कर देने वाली मुस्कराहट है उसमें दीदी की. मैं जब भी उदास होती हूँ उनकी उस तस्वीर के सामने जाकर खड़ी हो जाती हूँ, और फिर वो मुझे बहुत समझाती हैं, कभी कभी गुस्से में डांट भी देती हैं – ‘ये क्या बेवकूफी है प्रिया? क्या हुआ है तुम्हें? शक्ल क्यों लटकी हुई है तुम्हारी? बस इतने में ही घबरा गयी? देखो मैं इस दुनिया से बाहर आकर भी नहीं घबराई, अब भी वैसे ही हँस रही हूँ जैसे पहले हँसती थी और तुम? तुम्हारी वो हँसी कहाँ चली गयी? तुम्हारी हँसी तो मुझसे भी प्यारी है, वापस लाओ अपनी उस हँसी को एंड बी ब्रेव!' जानते हो फिर मैं सच में खूब हंसती हूँ. उनकी डांट के बाद I Feel So Relaxed. वो अब भी  रहती हैं मेरे आसपास..हर जगह..हर समय. जैसे कल रात, जब मैंने तुम्हें कॉल किया था. मेरे बगल में ही थीं वो. डांट रही थी मुझे, कि मैं क्यों तुम्हें इतनी रात गए परेशान कर रही हूँ. यू नो न, अन्फॉर्चनट्ली तुम्हारी बात जब भी आती है, वो मुझे छोड़ कर हमेशा तुम्हारी साइड ले लेती हैं, ऑल्वेज़ !! " कहते हुए प्रिया ने एक बार अपनी दायीं तरफ देखा और मुहँ बिचका दिया, जैसे सच में वो अपनी दीदी से इस बात की शिकायत कर रही हो.

मेरे चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गयी, मैंने कहा कुछ नहीं, बस प्रिया को अपने एकदम करीब खींच लिया. उसनें अपना सर मेरे कंधे पर टिका लिया और आँखें मूँद ली. मैंने झील में तैरती बत्तखों को देखा, और फिर गरजते बादलों की आवाज़ सुनी. बारिश किसी भी वक़्त हो सकती है, मैंने प्रिया से कहा. प्रिया ने लेकिन कोई जवाब नहीं दिया. उसकी साँसें मेरे गालों को सहला रही थीं. धीरे से मैने उसका माथा चूम लिया. उसनें आँखें खोल दी. “मैं यहाँ से जाना नहीं चाहती”, उसनें कहा.

“हम भींग गए तो?” मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों से उठा दिया.

“तो हम गल थोड़े ही जायेंगे...” उसनें कहा. एक बहुत हलकी सी शरारत वाली मुस्कान उसके चेहरे पर चली आई थी.
“और वो तुम्हारी फिल्म? जो तुम मुझे दिखाना चाहती हो? उसका वक़्त हो रहा है न..” मैंने कहा. वो कुछ देर तक मुझे अपलक देखती रही जैसे तय नहीं कर पा रही हो कि वो वाकई फिल्म देखने जाना चाहती है या यहीं बैठी रहना चाहती है. फिर अगले ही पल वो एकदम उठ खड़ी हुई, “हाँ हाँ चलो चलो, यहाँ बैठे-बैठे बारिश में भींग कर मैं बीमार होना नहीं चाहती, अभी पूरे सप्ताह तुम्हारे साथ घूमना जो है.


बातें बाकी...
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Saturday, June 17, 2017

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आँधी, बारिश और रिमझिम फुहारों सी यादें

baarish nazm gulzar
सुबह के तीन बज रहे हैं. बाहर ज़ोरदार बारिश शुरू हो गयी है. बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट से मेरी नींद एकदम से खुल गयी. “यार ये भी कोई वक़्त है आने का?” मैंने खिड़की खोल के बाहर बरसती बारिश की बूँदों से कहा.. “ज़रा देर से आते तो नींद भी पूरी हो जाती और तुम्हारे साथ खुल के मज़े भी ले पाता”. लेकिन इस कमबख्त बारिश को तो बे-वक्त ही आना है, ठीक वैसे ही जैसे उस स्टुपिड प्रिया की यादें आ जाती है, वक़्त बे-वक्त...कभी भी, कहीं भी.

मौसम अगर आशिकाना हो जैसे अभी सुबह-सुबह का मौसम है. बाहर अभी तक अँधेरा ही है, बारिश खूब तेज़ हो रही है और बेहद ठंडी हवा चल रही है. ऐसे सिचूएशन में प्रिया की यादें कुछ ज्यादा ही बदतमीज़ और अन-प्रिडिक्टबल हो जाती हैं. अक्सर मुझे वे बातें याद दिला जाती हैं जिनके बारे में एक अरसे से मैंने सोचा नहीं था. आज भी सुबह प्रिया की ये स्टुपिड यादों ने जाने कहाँ से वर्षों पहले की गर्मियों में दिल्ली में बिताये उन सात खूबसूरत शामों के किस्से याद दिला गयीं, जिन्हें प्रिया "दिल्ली की सात ऑसमाशामें’ कह कर बुलाती थी.

"ऑसमाशामें" शब्द आपको थोड़ा अजीब लग रहा होगा. कंफ्यूज भी हो रहे होंगे आप कि ये “ऑसमाशामें” क्या बला है? इससे पहले कि आप दुनिया के सारे डिक्शनरी खंगाल डाले, आपको बता दूँ कि ऐसे किसी शब्द का अस्तित्व ही नहीं है. ये तो प्रिया के ईजाद किये हजारों शब्दों में से एक शब्द है. बस फर्क इतना है कि जहाँ उसके ईजाद किये बाकी के शब्द बेमतलब और अजीब लॉजिक के होते हैं, इस शब्द के पीछे वाकई में एक लॉजिक था. प्रिया ने “ऑसम” और “शामें” शब्द का फ्यूजन कर “ऑसमाशामें” को ईजाद किया था. मैं वैसे तो प्रिया के ईजाद किये शब्दों की कोई खास इज्जत नहीं करता था और उसके उन शब्दों की धज्जियाँ उड़ाने में कभी पीछे नहीं रहा लेकिन प्रिया का ये “ऑसमाशामें” शब्द मुझे भी बड़ा प्यारा सा लगता था. ख़ास कर जब प्रिया इस शब्द का उच्चारण करती, तब बड़ा खूबसूरत साउंड करता था ये शब्द.

प्रिया के साथ बीते ये सात "ऑसमाशामें" आज से करीब सात-आठ साल पहले की बात है. प्रिया उन दिनों लन्दन में एमबीए की पढ़ाई कर रही थी और छुट्टियों में वो दिल्ली आई थी. जून का ही महिना था वो और तारीख भी आज की ही थी, यानी की १७ जून. मुझे ये तारीख इसलिए याद है कि १७ जून को मेरे भैया की शादी की सालगिरह होती है. उस साल भैया के सालगिरह के दिन मैं और प्रिया दोनों दिल्ली पहुँचने वाले थे. प्रिया सत्रह जून की सुबह लन्दन से दिल्ली आने वाली थी और मैं चंडीगढ़ से एक जरूरी काम निपटा कर दिल्ली वापस लौट रहा था.

शाम में भैया ने घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी थी. मैं उस पार्टी में प्रिया को बुलाना चाहता था. वैसे तो भैया और भाभी पहले जब हैदराबाद में रहते थे, तब एक बार वे प्रिया से मिल चुके थे, इसलिए प्रिया को पार्टी में बुलाने में मुझे कोई झिझक होनी नहीं चाहिए थी लेकिन फिर भी मैं असमंजस में था कि भैया भाभी से प्रिया को इन्वाइट करने की बात करूँ या न करूँ? पता नहीं क्यों मुझे शक था कि भैया कहीं मना न कर दे, लेकिन मेरा ये डर बेवजह ही था. भैया ने तो तुरंत हामी भर दी, भाभी तो इक्साइटड भी हो गयी ये सुनते ही कि प्रिया दिल्ली आ रही है और पार्टी में वो प्रिया से मिल पाएंगी. मुझे थोड़ा आश्चर्य तो हुआ, कि ये दोनों प्रिया की बात सुन कर इतने खुश क्यों हो गए? फिर याद आया, कि पिछली बार जब प्रिया भैया-भाभी से मिली थी, तो उसनें जी भर कर दोनों की बटरिंग की थी. शायद उसी का परिणाम था कि प्रिया के बारे में सुनते ही भैया भाभी उससे मिलने को बेसब्र हो गए थे. भैया ने तो यहाँ तक कह दिया था कि फोन कर के प्रिया से पूछो, अगर बिजी नहीं है, तो उसे अभी ही बुला लो.

शाम को प्रिया अपनी आदत के विपरीत समय से काफी पहले हमारे घर आ गयी. प्रिया को देखते ही भैया और भाभी के चेहरे खिल उठे. दोनों ने एक सुर में कहा “प्रिया, तुमनें तो आज आकर इस पार्टी की रौनक बढ़ा दी”. मैंने प्रिया को पहले से ही हिदायत दे रखी थी कि भैया-भाभी तुम्हें चने की झाड़ पर चढ़ाने की भरपूर कोशिश कर सकते हैं, इसलिए उनकी बातों पर ज्यादा ध्यान न देना. लेकिन मेरी कोई भी बात प्रिया सुनती कब है? भैया-भाभी के इस डायलॉग को उसनें काफी सिरिअसली ले लिया और जिसका नतीजा ये हुआ कि पूरी शाम वो पार्टी में ऐसे टहल रही थी जैसे वो सच में कोई ‘गेस्ट ऑफ़ ऑनर’ हो. मुझे तो एकदम नज़र अंदाज़ कर दिया था इसनें.

अपने घर की पार्टी में ही मेरी कोई अहमियत नहीं रह गयी थी, भाभी ने सारे कमांड प्रिया को सौंप दिए थे. वो मुझपर लगातार हुक्म चला रही थी. जहाँ मैं उसे टोकता या उसके मर्ज़ी के विपरीत कोई भी काम करने की कोशिश करता, सीधे धमकी दे देती मुझे, "मेरे सब-ओर्डिनिट हो तुम, जैसा कह रही हूँ वैसा करो वरना रात में खाना भी नसीब नहीं होगा". मतलब मेरे ही घर में आकर वो मुझपर ऐसे हुक्म चला रही थी, और इतनी हिम्मत उसमें सिर्फ इस वजह से आई थी कि भाभी ने उसे “कुछ भी करने” की परमिशन दे रखी थी.

प्रिया अक्सर ऐसे मौकों के तलाश में रहती है कि वो मेरे ऊपर धौंस जमा सके, लेकिन उसे ऐसे मौके कम ही नसीब होते हैं. इस पार्टी में भाभी की वजह से ही सही उसे ये मौका मिल गया था और वो इस मौके को किसी कीमत पर गंवाना नहीं चाहती थी. भरपूर फायदा उठा रही थी वो अपनी 'गेस्ट ऑफ़ ऑनर' के टैग का. पूरी पार्टी के दौरान प्रिया ने हर तरह की अपनी मनमानी की, मुझे हर एक पॉसिबल तरीके से परेशान और इरिटेट किया, तरह तरह के हथकंडे अपना रही थी वो जिससे मैं तंग आकर उसे डांट दूँ और वो मेरे ही घर में मेरा दाना-पानी बंद करवा दे और फिर जब भूख से मेरी हालात ख़राब हो जाए, वो मुझपर तरस खा कर मुझे खाना खिलाये और फिर लम्बे समय तक मुझे ये किस्सा सुना सुना कर पकाती रहे कि कैसे उसनें खाना खिलाकर मुझपर अहसान किया था.

लेकिन पार्टी खत्म होने के थोड़ी देर पहले, जब हम डिनर के लिए बैठे, अचानक से प्रिया के सुर बदल गए थे. पूरी पार्टी में जहाँ वो हर छोटी छोटी बातों में मुझपर हुक्म चला रही थी, वहीं डिनर के समय वो मुझसे बड़े प्यार से पेश आ रही थी. पहले तो मैंने समझा कि शायद उसे मेरे ऊपर दया आ गयी हो इसलिए वो इतने प्यार से पेश आ रही है, लेकिन ये मेरी गलतफहमी थी. उसे तो बाकी के सात दिनों की अपनी प्लानिंग सेट करवानी थी.

बड़े प्यार से डिनर के बाद उसनें मेरे हाथों में एक लिस्ट थमा दी और कहा - "ये देखो, अगले सात दिनों तक हम दिल्ली में यहाँ-यहाँ घूमेंगे..मैंने लिस्ट बना ली है..और कल सुबह हम जाएंगे गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट्स"

मैंने चौंक कर उसकी तरफ देखा – “कल सुबह?”
“हाँ..एनी प्रॉब्लम?” आइसक्रीम खाते हुए, एक टफ लुक उसनें मुझे दिया.
“यार, एक सप्ताह जयपुर और चंडीगढ़ के चक्कर लगा कर थक गया हूँ. कल बक्श दो, परसों से दिल्ली में जहाँ बोलोगी, तुम्हारे साथ भटकता फिरूँगा.”
“नो..नोट पॉसिबल..” उसनें कहा और वापस अपना ध्यान अपने आइसक्रीम पर कंसन्ट्रेट कर दिया.

गुस्सा तो बड़ा आया इस स्टुपिड लड़की पर. आखिर समझती क्या है खुद को? दिल किया कि डांट कर बोल दूँ कि कल कहीं नहीं घूमना है, चुपचाप घर में बैठो और आराम करो. लेकिन प्रिया को ऐसे पार्टी में डाँटना, जहाँ वो ‘गेस्ट ऑफ़ ऑनर’ थी, काफी खतरनाक हो सकता था इसलिए मैंने बड़े प्यार से प्रिया को अपने पास बिठाया, थोड़ी बटरिंग की और फिर धीरे से प्रिया के सामने एक दिन का लीव ऍप्लिकेशन री-कन्सिडर करने को डाल दिया और उससे हाथ जोड़ कर(लिटरली) विनती की - “यार बस कल बक्श दो...”

प्रिया के सामने ऐसे बटरिंग करना और हाथ जोड़ कर विनती करने वाली ट्रिक दस में से आठ दफे तो एकदम काम कर जाती है, उस दिन भी ये ट्रिक अपना काम कर गयी होती अगर रात में बिना नोटिस दिए भयानक आँधी तूफान और बारिश न आ धमकती.

पार्टी के बाद प्रिया तो वापस घर चली गयी, भैया, भाभी और मुझे सारे काम समेट कर सोने जाते हुए रात के करीब एक बज गए थे. थकान इस कदर मुझपर हावी थी कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद ने अपनी आगोश में ले लिया मुझे. ठीक ढाई बजे मेरी नींद अचानक एक फोन-कॉल से टूटी. मैं थोड़ा चौंक गया था. प्रिया का कॉल था.

“क्या हुआ? सब ठीक तो है?” मैंने थोड़ा चिंतित होकर पूछा...
“अरे बाहर देखो...बाहर...”
“बाहर? क्यों? क्या हुआ?”
“अरे बहुत तेज़ आँधी उठी है..”
“आँधी??”
“हाँ..”
“तो खिड़की बंद करो और सो जाओ...”
"बेवकूफ!!! तुम्हारी तरह कंजूस नहीं हूँ, कमरे में एसी है. खिड़की बंद ही रहती है.."
"गुड! तो फिर सो जाओ.."
"नहीं...पहले तुम अपनी आँखें खोलो...और बाहर देखो.."
"यार नींद आ रही है, क्यों परेशान कर रही हो?"
“अरे देखो तो सही...बहुत तेज़ आँधी है, और जबरदस्त बिजली कड़क रही है. बारिश होने वाली है..”
“होने दो बारिश..हु केयर्स !चुपचाप सो जाओ, और मुझे भी सोने दो...ढाई बज रहे हैं..” मैंने थोड़ा इरिटेट होकर कहा.
“पर सुनो तो..”
“अब क्या हुआ? जल्दी बोलो..”
“यार देखो न, झमाझम बारिश शुरू हो गयी है. कल की सुबह डेफनिट्ली रोमांटिक होगी. सुबह मोर्निग वाक पर लोदी गार्डन चलें?”
“लोदी गार्डन? कल सुबह?? तुम पागल हो? रात के ढाई बजे तुम्हें लोदी गार्डन जाने की सूझती है? चुपचाप सो जाओ” कह कर मैंने थोड़ा झिड़क दिया प्रिया को.

ये झिड़कना मुझे महंगा पड़ गया. अगर प्यार से समझाया होता तो शायद मामला हाथों से नहीं निकलता, लेकिन प्रिया को ऐसे झिड़कने पर तो आपको नतीज़े झेलने पड़ेंगे.

“दैट्स इट!! कल मोर्निंग! शार्प एट सेवन! खान मार्किट!!” उसनें अपनी आवाज़ को बेहद स्टर्न बनाकर कहा.
“अरे यार, प्लीज ऐसा करो. ये तो ज़्यादती है...” मैं एकदम डिफेंसिव मोड में आ गया था.
“ज्यादती नहीं एकदम सही है! बॉर्डर पर जब जंग छिड़ जाए तो सैनिकों की छुट्टी कैंसल हो जाती है न? ठीक वैसे ही जब बारिश होगी तो तुम्हारी छुट्टियाँ भी ऐसे ही कैंसल हो जायेंगी..” उसनें कहा.
"प्रिया..दिस इज नॉट फेयर. बेहद थका हुआ हूँ, सुबह नहीं उठ पाऊंगा..” मैंने उससे विनती की.
"तुम्हारे जैसों के साथ ऐसा ही होना चाहिए. चार घंटे हैं तुम्हारे पास, इन चार घंटों में जितना सोना है सो लो. मैं ठीक सुबह छः बजे तुम्हें कॉल कर के जगा दूँगी.” इतना कह कर उसनें फोन कट कर दिया.

इधर मेरी नींद उड़ चुकी थी.

उसनें हुक्म जारी कर के फोन तो रख दिया लेकिन मुझे नींद कहाँ से आती? एक तो वो नाराज़ हो गयी थी, और उसपर से उसका गणित हमेशा से कमज़ोर रहा है. मुझे सोने के लिए चार घंटे नहीं बल्कि सिर्फ तीन घंटे का वक़्त मिला था. मैंने कमरे के दोनों अलार्म क्लॉक, और मोबाइल में सुबह छः बजे का अलार्म लगा दिया ताकि सुबह समय पे उठ जाऊं..और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा कि उसके मूड को ज्यादा न बिगाड़े, वरना वो मेरी शक्ल बिगाड़ देगी. सब कुछ ऊपरवाले के भरोसे छोड़कर मैं वापस नींद की आगोश में चला गया.


बातें बाकी...
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Sunday, February 12, 2017

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मैजिशियन


दोपहर बीत चली थी लेकिन बारिश थी कि रुकने का नाम नहीं ले रही थी. लड़का अपने कमरे में बैठे बारिश के रुकने की प्रतीक्षा कर रहा था. दो दिन से तेज़ ज़ुकाम और हलके बुखार की वजह से वो घर में कैद था और इन दो दिनों से लगातार बारिश हो रही थी. अपने बालकनी में बैठे बारिश की बूँदों को देख वो सोच रहा था कि कभी जनवरी की बारिश कितनी ख़ास होती थी लेकिन अब तो जैसे जनवरी की बारिश भी कोई मायने नहीं रखती. पिछले कुछ सालों में बहुत कुछ बदल गया था. कई यकीन, कई सपनें टूट गए थे. एक के बाद एक उसे अपनी हर नाकामी याद आ रही थी. दिन में कई बार उसने सोचा कि घर पर बात कर ले, लेकिन वो जानता था कि घर पर उसकी हलकी बिमारी की खबर भी सबको बेचैन कर देती है. अपने घरवालों को वो अब और कोई तकलीफ नहीं देना चाहता था. वो उस लड़की से भी बात करना चाहता था जो उसके सुख दुःख की साथी थी. लड़के के माँ-बाप, छोटे भाई और बहन के अलावा पूरे दुनिया में एक वही तो थी जो उसकी हर बात समझती थी. लेकिन जाने किस हिचक से या अनजाने डर से वो उसे फोन नहीं कर पाया था.

दो दिन पहले उसकी लड़की से बात हुई थी और तब लड़की का मन बेहद अशांत था. लड़की  के परिवार में उन दोनों को लेकर खूब हंगामा हुआ था. लड़की उस रात फोन पर बहुत देर तक रोती रही थी और बस यही दोहराते रही थी – “आई विल डाई विदआउट यू....एंड आई मीन इट!” पूरे दिन लड़के के मन में भी बस यही पाँच शब्द घूमते रहे थे जो लड़की ने दो रात पहले कहे थे और जिन्हें वो तोड़ मरोड़ के पूरे दिन दोहराता रहा था...आई विल डाई.....विदआउट यू.....विदआउट यू...आई विल डाई.

शाम होते होते लड़के को उसका अकेलापन, उसकी नाकामी और लड़की के कहे शब्द इस कदर बेचैन करने लगे कि घर में और रुकना संभव न हो सका. वो बारिश में ही घर से बाहर निकल आया था. बारिश में भीगता हुआ वो सड़कें पार करने लगा. एक जगह से दुसरे जगह वो घूमता रहा. घर से बाहर, सड़कों पर उसे ये तसल्ली थी कि वो अकेला नहीं है. बहुत से लोगों के बीच में वो भी एक है. देर रात तक वो उन भीड़ भरी सड़कों पर इधर उधर निरुद्देश्य घूमता रहा और जब घर लौटा तो ठण्ड से उसका शरीर काँप रहा था. कमजोरी और थकान इस कदर हावी हो गयी थी उसपर कि वो बिना कुछ खाए सो गया. 

सुबह जब आँख खुली उसकी, तो उसका पूरा शरीर बुखार से तप रहा था. उसमें इतनी ताकत भी नहीं बची थी कि बिस्तर से उठ कर वो पानी तक पी सके. शाम के अपने पागलपन के लिए वो खुद को कोसने लगा था. रात सड़कों पर घुमने से कुछ देर के लिए जिस अकेलेपन से उसे छुटकारा मिला था उस अकेलेपन ने उसे फिर से जकड़ लिया था. दिन भर के बुरे ख्याल फिर से आने लगे थे. वो ये सोचते ही काँप गया कि इस शहर में वो अकेला है..बिलकुल अकेला. उसे अगर कुछ हो भी जाए तो भी उसकी मदद करने कोई नहीं आने वाला.

उसे अपने एक चाचा की याद आने लगी, जो काफी साल पहले इस दुनिया से जा चुके थे. तब वो काफी छोटा था. उसे बहुत दिनों तक ये लगता रहा था कि चाचा की मौत बुखार से नहीं बल्कि अकेले रहने से हुई थी. वो भी लड़के की तरह अकेले रहते थे. उसी की तरह वो भी समाज के बनाये गए सफलता के पैमाने पर खड़े नहीं उतरे थे और घरवालों के तानों से बचने के लिए कलकत्ता चले गए थे जहाँ वो कोई छोटी मोटी नौकरी करते थे. उसे बहुत पहले की चाचा की लिखी चिट्ठी याद आई थी जिसमें उन्होंने लिखा था कि इस तरह जीने से तो कहीं बेहतर है मर जाना. उसकी माँ वो चिट्ठी पढ़ के बहुत देर तक रोई थी.

लड़के को याद आया कि चाचा भी एक शाम बारिश में भीगे थे और उसी रात उन्हें तेज़ बुखार ने जकड़ लिया था. पूरे दिन तक वो घर में अकेले पड़े रहे थे और कमजोरी की वजह से उन्हें दो बार चक्कर आये थे और वो बेहोश हो गए थे, कोई आसपास था भी नहीं जो उन्हें संभाल पाता...खुद ही होश में आये. अगले दिन किसी तरह पड़ोस के एक लड़के ने उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती करवाया था लेकिन तबियत ठीक होने की बजाये और बिगडती चली गयी थी, और एक हफ्ते बाद उनकी मौत हो गयी थी. चाचा की याद आते ही वो घबरा सा गया. बारिश...बुखार और मौत...ये तीनो शब्द उसके मन में घुमने लगे थे. पिछली शाम पढ़ा एक शेर भी ना चाहते हुए उसे याद आ गया 
"रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो / हम सुख़न कोई न हो और हमज़बाँ कोई न हो 
 पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार / और अगर मर जाईये तो नौहाख़्वाँ कोई न हो"

अचानक आये इस ख्याल से वो घबरा गया. चाचा के आखिरी दिनों को वो अनचाहे ही खुद से जोड़ने लगा था. कमरे में उसे घुटन सी महसूस होने लगी. घर से बाहर निकलने के लिए वो बेचैन हो उठा था. उसने सोचा अगर कुछ होना भी हो तो सड़कों पर हो तो ज्याद बेहतर है. यहाँ अकेले कमरे में कुछ हो भी जाए तो किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा. उसके घरवाले, वो लड़की उसे फोन करते रहेंगे और उन्हें कुछ जवाब नहीं मिलेगा. वो जोड़ने लगा कि अगर उसे कुछ हो गया तो उसके घरवालों को भी उसके पास पहुचने में कम से कम अट्ठारह घंटे लगेंगे. इन अट्ठारह घंटों में वो ऐसे ही पड़ा रहेगा...अपने कमरे के बिस्तर पर बेजान. उसने सोचा जो लोग अकेले कमरे में मरते हैं वो कितने बदनसीब होते हैं कि आखिरी वक़्त कोई भी उनके पास नहीं होता. ये सोचते ही वो एकदम आतंकित सा हो गया. अकेलेपन के बारे में तो लड़के ने पहले भी कई बार सोचा था लेकिन मौत के बारे में उस दिन उसने पहली बार सोचा था.

सामने टेबल पर रखी लड़की की तस्वीर पर उसकी नज़र गयी तो उसे याद आया पहले जब कभी ऐसी बातें वो मजाक में भी लड़की को कह देता तो वो उससे रूठ जाया करती थी. वो तो शायरी और कविताओं में भी मौत जैसे शब्दों को झेल नहीं पाती थी और चिढ़ कर कहती कि ऐसे नेगटिव शब्दों का इस्तेमाल करने वाले कवि और शायरों को जेल में बंद कर देना चाहिए. पॉजिटिव थिंकिंग की वो खुद को एक मिसाल समझती थी. ऐसा था भी. फुल ऑफ़ लाइफ लड़की थी वो. लेकिन वही फुल ऑफ़ लाइफ लड़की ने उससे कहा था “आई विल डाई विदआउट यू”.

लड़के को बहुत पहले का एक दिन भी याद आया जब वो बहुत बीमार था और लड़की उसकी बीमारी की खबर सुन कर उससे मिलने आई थी. लड़के ने मजाक में कहा था “ये बुखार तो मेरी जान ले लेगी”. ये सुनते ही लड़की ने उसे दो तीन मुक्के जड़ दिए थे और गुस्से में कहा था, ‘बीमार हो और तब भी मार खाने की तुम्हारी तलब शांत नहीं होती’. उस एक छोटे से मजाक से लड़की पूरे दिन रूठी रही थी.

लड़के को अक्सर लगता था कि लड़की के पास कोई जादू का पिटारा है. उस दिन जब वो अपने घर में बीमार पड़ा था तब लड़की ने इरिटेट होकर कहा था, "कितने प्लान बनाये थे हमनें आज के लिए और तुम बिस्तर पर पड़े हो...रुको मैं तुम्हें ठीक करने का कुछ उपाय करती हूँ". लड़के को इस बात पर हँसी आ गयी थी.. “तुम क्या करोगी? तुम कोई डॉक्टर थोड़े हो?” लड़के ने कहा. लड़की फिर बेपरवाह ढंग से हँसते हुए कहने लगी.. “मैं डॉक्टर नहीं...मैजिशियन हूँ....मैजिशियन. मैं वो भी कर सकती हूँ जो डॉक्टर्स नहीं कर सकते...” 
ये कहते हुए उसने लड़के के माथे और गालों को ऐसे सहलाया जैसे वो कोई फ़रिश्ता हो और उसके बस छू लेने से कोई चमत्कार होगा और लड़के की बीमारी गायब हो जायेगी. उस वक्त लेकिन लड़के को सही में ऐसा महसूस हुआ कि जैसे लड़की की हाथों की मसीहाई धीरे धीरे उसके समूचे शरीर में उतर रही है और वो अब ठीक है. उसे उस दिन ये यकीन था कि उसका बुखार दवा खाने की वजह से नहीं बल्कि उस लड़की की वजह से उतरा था. 

शायद टेलीपैथी जैसी कोई चीज़ होती जरूर है. लड़का अपनी उस मैजिशियन को याद कर ही रहा था कि तभी फोन की घंटी सुनाई दी. लड़के ने हड़बड़ा के अपना मोबाइल देखा. लेकिन मोबाइल खामोश था, उसपर कोई कॉल नहीं था.. लड़के की नज़र सामने खुले लैपटॉप पर गयी तो वो चौंक गया. लैपटॉप पर लड़की का विडियो कॉल आ रहा था.

लड़के को याद आया कि हमेशा की तरह रात में वो लैपटॉप बंद करना भूल गया था और विडियो चैट का एप्लीकेसन लॉग इन था. लड़की दुसरे टाइम जोन के शहर में रहती थी. जब लड़के के शहर में सुबह होती तो लड़की के शहर में रात. लड़की अक्सर इस वक़्त लड़के को विडियो कॉल करती थी. विडियो कॉल से दोनों को तसल्ली रहती कि वो दोनों दूर नहीं हैं. लड़की कहती लड़के से कि तुम्हें देखकर सोती हूँ तो मुझे बड़ी अच्छी नींद आती है और लड़का कहता, कि तुम्हें सुबह देख लेता हूँ तो मेरा दिन बहुत अच्छा हो जाता है.

लैपटॉप पर लड़की का कॉल देखकर लड़का असमंजस में पड़ गया कि वो क्या करे? वो ये नहीं चाहता था कि लड़की उसे इस हालत में देखे. उसने सोचा कि वो कॉल रिसीव न करे और बाद में बहाना बना दे कि वो सो रहा था. लेकिन लड़की लगातार कॉल कर रही थी. वो जानता था कि उसने बहाना बनाया तो लड़की उसका झूठ ताड़ जायेगी. खुद को थोड़ा संभाल कर, हिम्मत जुटा कर उसने कॉल रिसीव किया.

लड़के ने पूरी कोशिश की थी कि वो अपना हाल छुपा ले, लेकिन उसकी एक झलक से ही लड़की ने सब समझ लिया था. दो दिनों से लड़की वैसे ही परेशान थी और अब लड़के की ऐसी हालात देख कर वो एकदम टूट गयी. लड़की को ये समझते देर न लगी कि दो दिन पहले उसने जो डिप्रेसिंग बातें की थी, उस वजह से लड़के की ऐसी हालत हुई है. हालाँकि लड़के ने उसे खूब समझाने की कोशिश की कि वो गलत सोच रही है और बारिश में भीग जाने की वजह से उसे बुखार चढ़ आया था. लड़की लेकिन जानती थी कि बुखार में जहाँ अधिकतर लोग बिस्तर पर पड़े रहते हैं वहीँ लड़का आराम से घूमते रहता था.

लड़की कहती नहीं थी लेकिन लड़के के अकेलेपन को वो अच्छे से समझती थी..तभी तो वो दो दिन से इस गिल्ट में रही कि उसे लड़के से ऐसा नहीं कहना चाहिए था. वो जानती थी कि ऐसी बातों को लड़का काफी गंभीरता से ले लेता है और फिर अक्सर उसकी तबियत बिगड़ जाती है. लड़की ने धीमी आवाज़ में लड़के से कहा "सुनो, मुझे वो सब नहीं कहना चाहिए था". लड़के ने लड़की को फिर तसल्ली देनी चाही कि वो गलत सोच रही है और उसकी बातों का उसपर कोई असर नहीं हुआ था.

लड़की लेकिन इस बार थोड़ी उखड़ सी गयी "तुम क्या सोचते हो कि मैं कुछ नहीं जानती..सब जानती हूँ मैं कि कौन सी बातें तुमपर कैसे असर करती हैं. तुम कैसे रहते हो...वो भी जानती हूँ मैं. लेकिन सुनो...ऐसे जिया नहीं जाता..इतनी तकलीफ किस लिए? मैं नहीं जानती कि तुम अक्सर पूरी पूरी शाम सड़कों पर बस इसलिए बिता देते हो ताकि घर के अकेलेपन और सूनेपन से बचे रहो. तुम ये सब क्यों सहते हो? सुनो..तुम वापस अपने घर क्यों नहीं चले जाते..कम से कम मुझे तसल्ली रहेगी. वरना जब तक ऐसे रहोगे मैं भी चैन से नहीं रह पाऊँगी.." कहते हुए लड़की का गला रुंध आया था.

लड़के की आँखें भी भींग आई थी. वो जानता था कि लड़की उसकी फ़िक्र करती है. वो नहीं चाहता था कि लड़की उसकी तकलीफों से परेशान हो इसलिए वो जानबूझकर लड़की से कुछ भी नहीं कहता था. लड़की लेकिन फिर भी समझ समझ जाती थी. ऐसे समय में लड़का हमेशा चुप हो जाया करता था और लड़की असहाय सा महसूस करती कि वो लड़के के पास नहीं है. लड़की को लड़के की बीमारी कि उतनी चिंता नहीं होती थी, वो जानती थी कि लड़का खुद का ख्याल रख सकता है. लेकिन लड़के को जब भी यूँ अकेलेपन का एहसास होता, बुरे ख्याल जब भी लड़के को परेशान करते तो लड़की को हमेशा लगता कि काश वो उसके पास, उसके साथी होती.

लड़की बार बार अपनी उँगलियों को वेबकाम तक ले जा रही थी. वो लड़के को छूना चाहती थी. पागल थी वो. बहुत पहले कभी किसी दिन पार्क में बैठे हुए उसनें लड़के की हथेलियों को खुद की हथेलियों से लॉक कर लिया था और अपना दुपट्टा लपेट दिया था इस उम्मीद के साथ कि दोनों के हाथ हमेशा के लिए जुड़ जायेंगे और जब उसने दुपट्टा हटाया और हथेलियाँ अलग हो गयी तो वो उदास हो गयी थी..और आज वो चाह रही थी कि किसी तरह कोई चमत्कार हो जाए और वो इस वेबकैम से हाथ निकाल ककर लड़के को छू सके.

हर बार जब वो अपने इस पागलपन में असफल हो रही थी, इरिटेट होकर लड़के से कहने लगी “सुना है किसी सॉफ्टवेर इंजिनियर ने अपनी गर्लफ्रेंड को ढूँढने के लिए एक सोशल नेटवर्किंग साईट ही बना दी थी.तुम भी मेरे लिए कोई ऐसी तकनीक का अविष्कार क्यों नहीं कर देते कि मैं जब चाहूँ तुम्हारे पास पहुँच सकूँ.?

वो ऐसी सिचुएशन तो नहीं थी कि लड़के को हँसी आये लेकिन लड़की की इस प्यारी नादानी पर उसकी हँसी छुट गयी.."मैं उतना क्वालफाइड नहीं हूँ. तुम कोशिश करो. इंजीनियरिंग की डिग्री तो तुम्हारे पास भी है.."

लड़के के ऐसे हलके फुल्के मजाक से लड़की अन्दर ही अन्दर खुश हुई, लेकिन चेहरे पर नकली गुस्सा दिखाते हुए उसनें लड़के को डांटा.. "तुम्हें तो अच्छा लगता है न मुझे यूँ परेशान होता देखकर? तभी तो हँस रहे हो. खुद अकेले रहकर बेवजह की बातें सोचते हो और मुझे उदास कर देते हो. पता है तुम्हें आज माँ के बर्थडे की पार्टी थी और सजने-सँवरने में मुझे पूरे दो घंटे लगे थे. सबने कितना कॉम्प्लीमेंट भी दिया कि बहुत सुन्दर दिख रही हूँ और तुमनें रुलाकर देखो सब बर्बाद कर दिया. सोचा था तुम्हें आकर अपनी ये नयी साड़ी दिखंगी. तुमसे परसों रात के लिए माफ़ी भी तो मांगनी थी...लेकिन तुम..तुम तो खुद की ऐसी हालत बनाये हुए हो कि क्या कहूँ मैं?और अब हँस रहे हो? बेशर्म कहीं के..

बीमार हालत में भी लड़का हड़बड़ा गया. वो तुरंत माफी माँगने के मोड में आ गया. “अच्छा चलो माफ़ कर दो और ये गुस्सा छोड़ो.अब नहीं सोचूँगा ऐसा वैसा कुछ भी. अब बस तुम्हारे बारे में सोचूँगा...ठीक? देखो तुम आज कितनी प्यारी लग रही हो..ये नाराज़गी तुम्हारे इस प्यारे चेहरे पर बिलकुल सूट नहीं करती.” लड़के ने लड़की को मनाने की पूरी कोशिश की. लड़की लेकिन उसे इतनी आसानी से माफ़ करने के मूड में नहीं थी. अपनी बड़ी बड़ी आँखों को और बड़ा कर के वेबकैम के एकदम नज़दीक अपने चेहरे को लाकर उसने गुस्से में कहा "ना..मत सोचो मेरे बारे में.. तुम्हें तो मुझसे नहीं, अकेलेपन से प्यार है न...और नहीं चाहिए मुझे तुम्हारी तारीफ़. .तुमने तो कसम खा रखी है न कि बिना मुझसे डांट सुने मेरी तारीफ़ नहीं करोगे...अभी भी और डांट सुनने का इरादा है या चुपचाप दवा खाओगे मेरे सामने? जानती हूँ मैं कि तुमनें दवा नहीं खायी होगी अब तक".

लड़का मुस्कुराने लगा. थोड़ा फ़िल्मी होते हुए उसने कहा “मुझे वैसे दवा खाने की अब क्या जरूरत? तुम जो हो मेरे सामने...देखना मेरी मैजिशियन सब ठीक कर देगी. ये बुखार कहाँ टिक पायेगा मेरी मैजिशियन के सामने? है न? देखना डर के भाग जाएगा बुखार”. लड़की के गुस्से वाले चेहरे पर अब हलकी मुस्कान उभर आई थी..अपने बारे में ऐसी बातें सुनकर वैसे भी उसका चेहरा एकदम खिल जाता था. फिर भी ऐटिटूड दिखाते हुए उसने कहा “मस्का लगा रहे हो मुझे?”
“हाँ बिलकुल...तुम्हें तो मस्का बहुत पसंद है न?” लड़के ने उसे छेड़ते हुए कहा.
“हुहं...व्हाटेवर......” लड़की ने कन्धों को उचकाकर, लड़के के सवाल को गोल कर दिया.

लड़के को लगा जैसे उसके सामने फिर से उसकी वही पुरानी दोस्त खड़ी है जो बात बे बात पर गुस्सा हो जाया करती थी और लड़के को उसे मनाने के लिए फिर कितने जतन करने पड़ते थे. लड़के को लगा जैसे दो दिन का सारा बोझिलपन, अकेलापन और उसके अंदर का भारीपन धीरे पिघलने लगा है. उदासी के बादल उसके चेहरे से तो लड़की को देखते ही छटने शुरू हो गए थे, लेकिन अब उसे लगा जैसे उसकी तबियत भी ठीक है और वो हल्का महसूस कर रहा है. उसे लगा कि ये लड़की सच में उसकी मैजिशियन है जो सब कुछ ठीक कर देती है. 

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Sunday, January 22, 2017

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चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है



इतवार का दिन शायद यादों का दिन होता है..वरना सुबह से तुम्हारी बातें एक के बाद एक यूँ याद न आती. तुमसे बातें करने को बड़ा दिल चाहा आज, लेकिन वो अब तो मुमकिन नहीं, तो तुम्हें खत लिखने ही बैठ गया. शेखर का गर्दनीबाग का वो घर भी याद आ रहा है आज जहाँ दिसंबर और जनवरी के दिनों में अक्सर हम लोग अड्डा जमाया करते थे. उसका वो इम्पोर्टेड स्टीरियो भी याद आ रहा है जो उसके भैया लन्दन से उसके लिए लेकर आये थे और जिसपर हम सब का बराबर का अधिकार था.

याद है तुम्हें कैसे हर इतवार हम शेखर के घर पर पूरा पूरा दिन बीता देते थे. हर इतवार हम सब कुछ भूल कर, इंजीनियरिंग एंट्रेंस की किताबों को एक कोने में रखकर सिर्फ मस्ती करते थे. इतवार एक पिकनिक जैसा ही तो होता था हमारा. हम फिल्मों के गाने बजाते, नाचते, गाते, अन्ताक्षरी खेलते, दोपहर को आंटी हमें बढ़िया बढ़िया पकवान बना कर खिलाती और शाम में तुम और पिया अपनी नयी नयी शरारतों से हमारा मनोरंजन करती. कुल मिलकर वो एक ऐसा दिन होता था जब शाम में हमें घर लौटने का दिल नहीं करता था.

तुम्हें उन दिनों गज़ल की बिलकुल भी समझ नहीं थी..शेखर को छोड़कर बाकी हमारे किसी दोस्त को ग़ज़ल समझ आती कहाँ थी. तुम्हारी तो जाने क्या दुश्मनी थी गजलों से...हमेशा एक ही लॉजिक होता था तुम्हारा, ‘कोई भी गाने को सुपरस्लो स्पीड में रोंदू से आवाज़ में गाओ तो हो गयी वो ग़ज़ल’. तुम्हें कितना डांटता था मैं लेकिन तुम मानती कहाँ थी. जब भी कहीं ग़ज़ल तुम सुनती बस गजलों का मजाक उडाना शुरू कर देती थी.

वो दिन तो तुम्हें याद ही होगा जब मैंने कितने प्यार से गुलाम अली की वो ग़ज़ल शेखर के स्टीरियो में बजाई थी ‘चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है’?

गुलाम अली की गाई मेरी फेवरेट ग़ज़ल धीमी धीमी आवाज़ में बज रही थी. पूरा माहौल, वो ग़ज़ल के बोल...उसका दर्द...सब कुछ अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा था मुझे, पर ऐसे में तुम्हें जाने क्या हो गया था. तुम पर जैसे कोई भूत हावी हो गया था. बुरा सा, अजीब सा, कुछ-कुछ बिसूरता सा मुँह बना कर तुमनें गज़ल के बोलों के साथ अपने हाथों और चेहरे से अजीब-अजीब एक्शन करने शुरू कर दिए थे...पल भर तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया...हो क्या गया इस लड़की को...?

पर फिर जब तुम्हारे हाव भाव और गज़ल के बोलों को मिलाया तब जाकर सारी तस्वीर बिल्कुल साफ़ हो गई...अजीब सी रोनी सूरत पर अदृश्य आँसू पोंछ कर उन्हें मेरी ओर फेंकती हुई तुम अपना दिमाग़ी सन्तुलन नहीं खोई थी बल्कि मेरे इतने पसन्दीदा गज़ल की ऐसी की तैसी करने के मूड में थी...जितना मैंने तुम्हें पहले डांटा था ग़ज़लों का मजाक उड़ाने पर, तुम उन सब का बदला ले रही थी मुझसे. सच कहूँ तो तुम्हारी वो बदमाशी देख कर एक बार तो मन किया था कि तुम्हें वहीं दौड़ा-दौड़ा कर मारूँ, पर हमेशा की तरह मेरे गुस्से पर तुम्हारे लिए मेरा प्यार ही भारी पड़ गया था.

हद तो तब हो गयी थी जब तुम्हारी हरकतों को देखकर पिया और श्रुति ने भी ये अजीबोगरीब हरकतें शुरू कर दी थी. तुम्हारी दुश्मनी इस कैसेट के बाकी गजलों से नहीं थी, तुम तो बेचारे इसी एक खूबसूरत ग़ज़ल के पीछे पड़ गयी थी. ये ग़ज़ल खत्म हो भी जाती तो तुम इसे फिर से रिवाइंड करती और तुम तीनों मिलकर फिर से अजीबोगरीब मुद्राएँ बनाकर ग़ज़ल की ऐसी तैसी कर डालती.

लेकिन बात सिर्फ अजीबोगरीब एक्सन और मुद्राओं तक ही सिमित कहाँ थी. ग़ज़ल के हर शेर पर तुम्हारे एक्सपर्ट कमेन्ट भी तो मुझे सुनने को मिल रहे थे. याद है तुम्हें वो कमेंट्स?

“दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये / वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है”, को तुमनें कुछ ऐसे समझाया था मुझे, “हो सकता है कि तुम्हारे शायर साहब ने बेचारी उस लड़की का कुछ कीमती समान अपने पास रख लिया हो, वरना वो शायर कोई सलमान खान थोड़े हैं जो उनके बुलाने के लिए लड़की नंगे पाँव दौड़े दौड़े आ जायेगी”. और फिर तुम मुझे धमका के कहती “भूल जाओ साहब कि कभी मैं ऐसे कोठे पर नंगे पाँव आऊँगी..मुझसे ये सब ‘ग़ज़ली’ नौटंकियों की उम्मीद बिलकुल न करना तुम”.

‘गजली’ असल में तुम्हारा इन्वेंट किया हुआ शब्द था. चलो मान लिया कि ये शब्द तुमनें ‘फ़िल्मी’ शब्द के तर्ज पर इन्वेंट किया था.. लेकिन इस ग़ज़ल के बाकी लफ़्ज़ों का क्या कसूर था कि तुमनें उन तमाम उर्दू के शब्दों को जाने कैसे बकवास और बेतुके मानी दे दिए थे.. जैसे “देखना मुझको जो बर्गश्ता तो सौ सौ नाज़ से” को तुमनें बना दिया था, “देखना मुझको जो बर्गर का नास्ता करते हुए तो सौ सौ नाज़ से”. सच पूछो तो तुम्हारे इन्वेंट किये उन शब्दों के मानी इतने बकवास थे कि बहुत तो मुझे याद भी नहीं, और तुम बाकायदा उन अजीब मानी को अपने डायरी में नोट कर के रखती थी. मुझे आज तक समझ में ये बात नहीं आई कि तुम्हें इस बेचारी एक ग़ज़ल से इतनी नफरत आखिर हुई क्यों थी.

तुम मुझे सालों तक बस एक इसी ग़ज़ल को लेकर चिढ़ाती रही. सच बोलूं तो मैंने एक वक्त के बाद तुम्हारे सामने इस ग़ज़ल का जिक्र तक करना छोड़ दिया था..कभी तुम मुझे इरिटेट करने के लिए इस ग़ज़ल का जिक्र करती तो मैं बात किसी दुसरे टॉपिक पर मोड़ दिया करता था. नहीं, किसी चिढ़ या गुस्से से नहीं...बस यूहीं...

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फिर बहुत सालों बाद जनवरी का वो दिन आया. जब तुम्हारे और मेरे सबसे बुरे दिन चल रहे थे. जब ये बात लगभग पक्की थी कि तुम अब कभी वापस नहीं आओगी और जब मैं खुद को ये समझा रहा था कि बाकी की ज़िन्दगी मुझे तुम्हारे बगैर ही काटनी है.

इतवार का ही दिन था वो भी जब मैं शहर के उसी कैफे में बैठा हुआ था जो तुम्हारा और मेरा पसंदीदा कैफे था. ये जानते हुए भी कि हमारा और तुम्हारा साथ अपने अंतिम पड़ाव पर था, और कुछ ही दिनों में तुम एक अलग सफ़र पर निकल जाओगी, मैं बहुत पीछे छुट जाऊँगा... ये जानते हुए भी कि सभी दरवाज़े बंद हो गए हैं. फिर भी उस दिन कैफे में बैठे जाने मैं कौन से रास्ते तलाश कर रहा था, कि कहीं से तो कोई उम्मीद दिखे, कहीं से तो कोई राह निकले जिसपर चलकर तुम्हें मैं वापस अपनी ज़िन्दगी में ला सकूँ. लेकिन ये मैं भी जानता था और तुम भी कि सभी रास्ते, सभी दरवाज़े बंद थे.

ऐसे में तुम्हारा उस दिन फोन करना मुझे चौंका गया था. सच कहूँ तो तुम्हारे उस फोन की मुझे उम्मीद बिलकुल नहीं थी. बेहद कांपती आवाज़ में तुमनें कहा था, “मै सोना चाहती हूँ...लेकिन सो नहीं पा रही हूँ..बहुत बेचैनी सी, बहुत अकेलापन सा लग रहा है...”

पहले का कोई दिन होता तो मैं तुम्हें मजाक में कह देता “सोना तो है नहीं मेरे पास, चाँदी से काम चला लो” और तुम खिलखिलाकर हँस देती. लेकिन उस दिन मैं एकदम खामोश रहा. मैं तो ये सवाल भी नहीं पूछ सकता था कि तुम्हें नींद क्यों नहीं आ रही, बेचैनी और अकेलापन सा क्यों लग रहा है.

“तुम सुन रहे हो?” मेरी चुप्पी को सुनकर तुमने मुझसे पूछा था.
“हाँ, बोलो न..मैं सुन रहा हूँ..” मैंने कहा था.
“सुनों, अब मैं सब समझती हूँ..मुझे पता है वो क्या कहती है? मैं सब जानती हूँ अब..” तुमनें कांपती हुई आवाज़ में कहा था.
“क्या बोल रही हो तुम? क्या समझती हो? क्या जानती हो?” मैंने तुमसे पूछा था. मुझे एक पल लगा था कि तुम फिर नींद में मुझसे बात कर रही हो. लेकिन ऐसा नहीं था.
“वो ग़ज़ल..याद है तुम्हें? वो ग़ज़ल? चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना? मैं अब समझ गयी हूँ. बहुत पहले समझ गयी थी. तुम्हें बस बताया नहीं था.” तुमनें सिसकती आवाज़ में कहा था.

इधर मैं एकदम चुप था. तुमसे क्या कहूँ ये समझ नहीं पा रहा था.

कुछ देर तुम एकदम चुप रही. फिर तुम्हारी वही सिसकती की आवाज़ मुझे सुनाई दी..इस बार लेकिन सिसकते हुए तुम उस ग़ज़ल को धीरे धीरे गुनगुना रही थी..पूरी की पूरी ग़ज़ल तुम्हें याद थी, ये मैं नहीं जानता था. हर बार तुम बस एक लाइन पर आकर रुक जा रही थी “वो तेरा रो रो के मुझको भी रुलाना याद है...हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है...”

इधर शहर के इस कॉफ़ी हाउस में जहाँ इतनी भीड़ थी, मैं बेचैन हो उठा था. तुम्हारी सिसकने की आवाज़ और इस ग़ज़ल के बोल मेरे सीने के जैसे आर पार हो रही थी. सिसकने की आवाज़ ऐसे भी बहुत भयानक होती है. तब और भी ज्यादा जब वो आपके किसी अपने की आवाज़ हो...और बेचैनी अपने चरम पर तब पहुँच जाती है जब आप सिर्फ आवाज़ सुन रहे हैं और उसे देख नहीं पा रहे हों. मैं जानता था कि उस समय मैं ऐसा कुछ भी नहीं कह सकता था या कर सकता था जिससे तुम चुप हो सको. उस समय सारे शब्दों ने मुझे दगा दे दिया था. कहता भी क्या मैं तुमसे? बस तुम्हारे साथ अन्दर ही अन्दर मैं भी सिसकता रहा..बेचैन होता रहा. भगवान ही जानता है कितनी शिद्दत से मैंने उस वक़्त चाहा था कि काश तुम मेरे पास होती तो तुम्हें अपनी बाहों में भर लेता और कहता कि तुम उदास मत हो, मैं सब ठीक कर दूंगा. लेकिन ना तो उस वक़्त मैं तुम्हें बाहों में भर सकता था और ना तो चाह कर भी तुम्हें ये कह सकता था कि मैं सब ठीक कर दूंगा. कितना हारा हुआ कितना बेबस महसूस कर रहा था मैं उस वक़्त. खुद से बेइन्तेहां नफरत भी होने लगी थी मुझे.

तुम जानती हो, तुमसे कभी कहा नहीं मैंने. लेकिन बहुत दिन तक तुम्हारी वो बातें, तुम्हारी वो सिसकियाँ मुझे हांट करती रही हैं...आज भी तुम्हारी वो सिसकियाँ मुझे हांट करती हैं. आज भी जाने क्यों आधी रात को मैं चौंक कर जाग जाता हूँ.. लगता है तुम मेरे बिलकुल पास बैठी हो, और ये ग़ज़ल गुनगुना रही हो. उस समय मैं जाने क्यों बेहद डर जाता हूँ..तुम्हें बेहद याद करता हूँ उस समय..मैं जानता हूँ कि अब ये ग़ज़ल मुझे सारी ज़िन्दगी हांट करेगी, ऐसे ही मुझे डराएगी और तुम्हारी याद दिलाएगी..



चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है,
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है,

तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा,
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है,

खींच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़्फ़ातन,
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छिपाना याद है,

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़,
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है,

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये,
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है,

देखना मुझको जो बर्गश्ता तो सौ सौ नाज़ से,
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है,

चोरी चोरी हम से तुम आकर मिले थे जिस जगह,
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है,

बेरुख़ी के साथ सुनाना दर्द-ए-दिल की दास्तां,
और तेरा हाथों में वो कंगन घुमाना याद है,

वक़्त-ए-रुख़सत अलविदा का लफ़्ज़ कहने के लिये,
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है,

बावजूद-ए-इद्दा-ए-इत्तक़ा ‘हसरत’ मुझे,
आज तक अहद-ए-हवस का ये फ़साना याद है,
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Saturday, December 31, 2016

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वर्ड्स - दिज वर्ड्स आर आल आई हैव टू टेक योर हार्ट अवे

दिल्ली के ग्रीन पार्क इलाके में वो एक छोटा सा कैफे था जो तुम्हें काफी पसंद था. शायद दिल्ली का सबसे पसंदीदा कैफे था तुम्हारा. उस कैफे से तुम्हारी दोस्ती कॉलेज के वक़्त से ही हो गयी थी और तब से ही वो कैफे दिल्ली में तुम्हारा अड्डा बन गया था. जाने कितनी शैतानियाँ की हैं तुमनें इस कैफे में और जाने कितने तुम्हारे खुफिया मिसन की प्लानिंग और एक्सक्यूशन भी इसी कैफे में हुए थे. कई खतरनाक आइडियाज भी तुम्हें इसी कैफे में आये थे, जिनकी वजह से हर बार मैं मुसीबत में फँस जाया करता था. मुझे याद है कॉलेज के बाद के दिनों में भी जब कभी तुम दिल्ली में रहती, तो पूरा पूरा दिन तुम इस कैफे में बिता देती थी. घर में तुम्हारे पैर टिकते कहाँ थे? इस कैफे को ही एक तरह से तुमने अपना घर बना लिया था. कैफे की तीन चीज़ें तुम्हें काफी पसंद थी - यहाँ कोने में मैगजींस और कुछ किताबें रखे होते थे कि अगर आप अकेले हैं तो कुछ देर के लिए इन्हें पढ़ सकते हैं, कुछ ख़ास कस्टमर्स के लिए काउंटर पर लूडो और चेस भी उपलब्ध मिल जाते थे और कैफे में बजता संगीत जो तुम्हें सबसे ज्यादा पसंद था. कैफे के काउंटर के ठीक पीछे सिर्फ दो कुर्सी और एक टेबल लगी रहती थी, और तुम्हें वहाँ बैठना पसंद था.. इस कैफे की एक और बात थी जो तुम्हें बड़ी अच्छी लगती थी...हालाँकि वो बात मुझे उतनी अच्छी नहीं लगती थी. इस कैफे में जितनी बार भी तुम्हारे साथ मैंने चेस और लूडो खेला है उतनी बार तुमसे हारा हूँ मैं...मुझे तो अब तक याद है कैसे तुम पूरे टसन में राजकुमार स्टाइल डाइअलॉग मारती थी.... “जानी...ये मेरा इलाका है...यहाँ मुझे हराना मुमकिन ही नहीं...नामुमकिन है.”

कैफे का मालिक जिसका नाम रणवीर था, वो भी तुम्हें बड़े अच्छे से पहचान गया था. तुम्हें उसके म्यूजिक का टेस्ट काफी पसंद था. कैफे में बजता म्यूजिक तुम्हें बड़ा ‘सोल्फुल’ लगता था. रणवीर को तुमने एक निकनेम दे दिया था ‘डेविड’, जो किसी मशहूर डीजे का नाम था. तुम अक्सर कहती थी कि रणवीर भी डेविड जैसे मैजिकल गाने सुनाता है हमें. रणवीर से तो तुम्हारी खूब गहरी दोस्ती भी हो गयी थी, और तुम्हारे ही जरिये मेरी भी उससे दोस्ती हो गयी थी. रणवीर से तुम्हारी दोस्ती का किस्सा भी अजीब है. एक दिन जाने तुम्हें क्या सूझी, तुम मुझसे कहने लगी, चलो हम और तुम मिलकर एक ऐसा ही कैफे शुरू करते हैं और जब तक मैं तुम्हारे इस बात का कुछ जवाब दे पाता या तुम्हें कुछ समझा पाता, तुम काउंटर पर चली गयी थी और रणवीर से बातें करने लगी थी कि कैसे हम एक कैफे शुरू कर सकते हैं. तुम्हारी हरकतों और बदमाशियों से अनजान वो तुम्हें एक क्युरीअस आन्ट्रप्रनर समझ कर तुम्हें सब जानकारियां भी दे रहा था...और तुम..तुम तो ऐसे उसकी बातों पर सिर हिला रही थी जैसे तुम्हें उसकी सभी बातें समझ में आ रही हों. मैं जब काउंटर पर आया था तो मेरे प्रति तुम्हारा बर्ताव भी ऐसा था कि रणवीर को जरूर ये लगा होगा कि मैं तुम्हारा कोई असिस्टेंट हूँ. उस दिन के बाद तो तुम महीनों तक जिद पर अड़ गयी थी कि हम दोनों को एक कैफे शुरू करना ही चाहिए. बड़ी मुश्किल से तुम्हारी ये जिद छुट पायी थी.

इस कैफे में कभी कभी तुम अजीबोगरीब हरकतें भी करने लगती थी. तुम्हें याद है कैसे तुम यहाँ बैठे बैठे ही अक्सर किसी ‘नोस्टालजिक जर्नी’ पर चली जाया करती थी? वो दिन तो याद है न तुम्हें जब मेरी पढ़ाई खत्म हुई थी और मैं दिल्ली तुमसे मिलने आया था. तुम बहुत खुश थी उस दिन, हम करीब छः महीने बाद जो मिल रहे थे. ग्रीन पार्क के मेट्रो स्टेशन पहुँच कर जब मैंने तुम्हें फोन किया और ये जानना चाहा कि तुम कैफे पहुँची हो या नहीं, तो तुमने फोन पर मुझे बड़ा अजीब जवाब दिया था जो मुझे उस समय तो बिलकुल समझ में नहीं आया था..तुमने कहा था “मैं कैफे में ही बैठी हूँ और अब लौट रही हूँ..तुम आओ तब तक मैं भी लौट आऊँगी..”

मैं तो कुछ देर तक यही सोचता रहा कि तुम्हारा जवाब कितना कान्ट्रडिक्टरी है.. तुम्हारे बोलने का क्या अर्थ समझूँ मैं? तुम कैफे में बैठी हो और लौट भी रही हो? ये कैसे मुमकिन है? मेरी इस क्युरीआसटी को शांत भी तुमने ही किया था. तुमने उलाहना भरे स्वर में कहा था “तुम तो थे नहीं दिल्ली में और मैं यहाँ अकेली थी...क्या करती मैं? किसे परेशान करती? किसके साथ घुमती? अकेले तो कॉफ़ी पीने में भी मज़ा नहीं आता है..तो एक दिन यहाँ बैठे बैठे मैंने अपनी एक स्पेशल पावर्स का इस्तेमाल किया और आँखें बंद कर के उन दिनों में जाने लगी जब हम और तुम साथ घूमते थे, जब तुम थोड़े कम नालायक थे.”

स्पेशल पावर्स? तुम्हारे पास स्पेशल पावर्स भी है? मैंने तुमसे पूछा था, और फिर तुमने कुछ ऐसे मुझे घूर के देखा था कि आगे कोई बात पूछने की मुझमें हिम्मत ही बाकी नहीं रही.

तुमने इस कैफे को एक तरह से अपना घर ही बना लिया था. जहाँ पर हम तुम अक्सर बैठते थे, उस टेबल के चारों तरफ तुम्हारी सभी चीज़ें ऐसे बिखरी रहती थी जैसे वो कैफे का कोना नहीं बल्कि तुम्हारे ड्राइंग रूम का कोई कोना है.. तुम्हारा जैकेट, तुम्हारे सनग्लास, हेयरक्लिप्स, दस्ताने, तुम्हारी किताबें, डायरी, कैमरा, मोबाइल और तुम्हारे चॉकलेट्स..टेबल के चारों तरफ तुम्हारी चीज़ें बिखरी रहती और अक्सर टेबल पर सर रख कर तुम यहीं सो भी जाया करती थी. उस दिन भी मैं जब तुमसे मिलने आया तुम शायद अपने नोस्टालजिक जर्नी से थक गयी थी और वहीँ टेबल पर सर रख कर सो रही थी.

मेरे आते ही तुम झटके से उठी गयी थी. मैं तो बड़े एहतियात से कुर्सी पर बैठा था कि जरा सा भी आवाज़ न हो और तुम्हारी नींद में कोई खलल न पड़े लेकिन फिर भी हलकी आवाज़ हुई और तुम एकदम हड़बड़ा के उठ गयी थी. कुछ पल तो तुम ऐसे घूरते रही थी कि जैसे मुझे तुमने पहचाना ही न हो..और फिर अगले ही पल टेबल पर रखे अपने पर्स को उठा के तुमने मेरे चेहरे पे दे मारा था और गुस्से में कहा था ”तमीज नहीं है नालायक.. ऐसे कोई डराता है क्या आकर?”. मैंने फ़ौरन तुमसे माफ़ी माँग ली थी और भगवान का शुक्र अदा किया कि तुम्हारे हाथ में टेबल पर रखा वो कॉफ़ी का मग नहीं आया वरना मेरे शक्ल की जाने क्या हालत होती.

तुम उस दिन बड़े अच्छे मूड में थी और मुझे तुरंत माफ़ भी कर दिया था. लेकिन उस दिन मेरी किस्मत में तुमसे और डांट खाना लिखा था. उस नालायक रणवीर ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी. जाने कहाँ से कैफे में उसने बॉयजोन का मशहूर एल्बम ‘अ डिफरेंट बीट’ कैफे में प्ले कर दिया था. वैसे तो इसके सभी गाने तुम्हारे फेवरिट थे लेकिन एक गाना ख़ास कर के तुम्हें पसंद था..’ वर्ड्स...दिज वर्ड्स आर आल आई हैव टू टेक योर हार्ट अवे...’.

उधर इस गाने की धुन तुम्हारे कानों में पड़ी नहीं कि तुम एकदम इक्साइटेड सी हो गयी और एकदम मेरे पास आकर बैठ गयी..”कितना खूबसूरत गाना है न...याद है तुम्हें ये गाना..मैं अक्सर गाया करती थी पहले न?” तुमने मुझसे पूछा था.

मेरी हालत थोड़ी ख़राब हो गयी. वो गाना उस समय मुझे सच में याद नहीं था. बड़े दिनों बाद भी तो सुन रहा था. मुझे ये भी नहीं याद था कि मैंने ये गाना तुम्हें कभी गाते हुए सुना भी है. मैं जानता था कि ‘ना’ में जवाब देना मेरे लिए बहुत हानिकारक साबित होगा लेकिन ‘हाँ’ में जवाब दे देना और बाद में इस गाने पर पूछे किसी सवाल को न बता पाना उससे भी ज्यादा हानिकारक होता. तो मैंने हिम्मत कर के बात थोड़ा घुमा कर तुम्हें कहा था...”ऐक्चूअली पूरा गाना तो याद नहीं है..काफी पहले सुना था न...”

तुम तो लेकिन मेरे बहाने और मेरे झूठ को भी एक सेकण्ड में पकड़ लिया करती थी. “तुम्हें बिलकुल याद नहीं है ये गाना न?” तुमने गुस्से में मुझसे पूछा था. मैंने सिर हिला के ना में जवाब दिया था.

बस फिर क्या था. तुम कुछ देर तक तो गुस्से और हैरत में मेरी तरफ देखती रह गयी. दोनों हाथ हवा में खड़े कर दिए थे तुमने जिससे मुझे और डर लगने लगा था कि कहीं इस कैफे में मेरी पिटाई न हो जाए. लेकिन तुमनें बस गुस्से और डांट से ही काम चला लिया था “मैंने तुम्हें इसका कैसेट भी दिया था.. सुने भी थे क्या उस कैसेट को कभी या उसका आचार बना के खा गए थे?”

मैं एकदम सकते में आ गया था. समझ गया था मेरे उस “ना” ने अपना कमाल कर दिया है और मैं तैयार था कि आज तो अच्छी सजा झेलनी पड़ेगी.

“और कितने गुनाह करोगे दोस्त? कैसे करोगे प्रायश्चित इन सब गुनाहों का?” तुमने मुझसे ऐसे पूछा था जैसे एक गाने को भूल जाना दुनिया का सबसे बड़ा अपराध हो. मैं चुप ही रहा. ऐसे मौकों पर तुम्हारे सामने मैं सफाई देने से बचता हूँ. अक्सर ऐसा हुआ है कि सफाई देने में मेरे मुहँ से कुछ और उलटी बात ही निकल गयी है और मुझे और डांट पड़ जाती थी. फिर भी मैंने सफाई देने की कोशिश की...धीरे से तुमसे कहा “अरे यार मुझे अंग्रेजी गाने वैसे भी ज्यादा समझ में नहीं आते न..इसलिए शायद याद नहीं आ रहा हो...”

तुम कुछ देर वैसे ही गुस्से में मुझे देखती रही. फिर पीछे मुड़ कर रणवीर से कहा, “भैया इस एल्म्बम को फिर से प्ले कर देंगे? रिपीट मोड में...मुझे इस इडियट को कुछ समझाना है........प्लीज़”. रणवीर तुम्हारी ऐसी हरकतों को अब जान गया था इसलिए उसने भी मुस्कुरा के हाँ कहा दिया.

एक मास्टरनी की तरह मेरी तरफ देखकर तुमने कहा था, बहुत पढ़ लिए इंजीनियरिंग तुम, "अब चलो मैं तुम्हें ज़िन्दगी की पढाई कराती हूँ, लव नोट्स देती हूँ तुम्हें. जेब से अपनी कलम निकालो और नोट करते जाओ जो भी मैं समझा रही हूँ तुम्हें..”.

मैंने मुहँ बना कर थोड़ी असहमति जताने की कोशिश की थी लेकिन तुम फिर गुस्सा हो गयी... “मेरे यही लव नोट्स ज़िन्दगी में काम आने वाले हैं..तुम्हारी वो इंजीनियरिंग की डिग्री नहीं...समझे?? तो पे अटेन्सन....” पूरे डेढ़ घंटे तक मेरी क्लास चली थी उस दिन और करीब तीन बार वो एल्बम रिपीट मोड में प्ले हुआ था उस दिन.

मुझे तो बस ये लग रहा था कि चलो मेरा कसूर तो जो था सो था, लेकिन बाकी कैफे में बैठने वालों का क्या कसूर था कि उन्हें एक ही एल्बम डेढ़-दो घंटे तक तक सुनना पड़ा था. खैर, ये सब पूछने की तुमसे हिम्मत न तो तब थी और ना अब है.

शाम काफी हो गयी थी, और तुम्हारे घर से दीदी ने कॉल कर दिया था. वो तुम्हें जल्दी घर लौटने के लिए कह रही थी. दीदी का कॉल उस दिन मेरे लिए लाइफ-सेव्यर था..वरना मेरी क्लास कैफे बंद होने तक चलती रहती.

कैफे से निकलते वक़्त भी तुमने कमाल कर दिया था. चलते चलते तुमने रणवीर से पूछा था..”आपको बुरा तो नहीं लगा न भैया? मैंने एक एल्बम इतनी देर तक प्ले करवाया..?” रणवीर भी कम बदमाश नहीं था. वो मेरी ऐसी हालत पे जरूर हँसता होगा. उसने मुस्कुराते हुए कहा “अरे बिलकुल नहीं..”.

तुम तो लेकिन तुम ठहरी.. एकदम अन्प्रिडिक्टबल. कब क्या कर दो? कब किसे क्या कह दो ये तो तुम कभी सोचती भी नहीं थी. तुमने रणवीर से कहा “असल में यू नो बात क्या है.. इसकी इंजीनियरिंग पूरी हो गयी और पढ़ाई का असर तो देखिये इसपर कैसा हुआ है? अव्वल दर्जे का नालायक हो गया है ये लड़का. जवानी में देखो बोरिंग सा हुआ जा रहा है..रोमांटिक गाने नहीं सुनता...और देखो तो इसे ये गाना भी याद नहीं था. तो मैं चाहती थी इसे सुनाऊं ये गाना.. कुछ तो सीखे ये लड़का इस गाने से और....और, और......इसी कैफे में उस साइड टेबल पर रोमांटिक गाने सुनते हुए मुझे प्रपोज कर सके...ताकि आपका ये कैफे इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाए. तो यू सी, बहुत जरूरी था ये एल्बम लगातार प्ले करवाना. कल भी आउंगी, आपके पास तो इतने रोमांटिक अल्बम है, उसमे से ही कोई प्ले कर दीजियेगा और मैं कल फिर से कोशिश करुँगी कि ये थोड़ा तो इंटरेस्टिंग और रोमांटिक बने...और....”

“और तुम्हें प्रपोज कर सके? है न?” रणवीर ने तुम्हारी बात पूरी कर दी थी...और तुम्हारे जगह शर्म से मेरे गाल लाल हो गए थे.

"हाँ..हाँ...हाँ..बिलकूल. तुमने एकदम इक्साइटेड होकर कहा था." रणवीर भी तुम्हारी इस बदमाशी में पार्टनर बन गया था. उसने भी आगे बढ़ के तुम्हारा हौसला और बढ़ा दिया था और कहा था “कल आओ तुम और इसको भी लेकर आओ इस कैफे में...और जब तक तुम्हें कल ये प्रपोज न कर दे तब तक इसे इस कैफे में ही हम दोनों बंदी बना कर रखेंगे.”

तुम खुश थी...एकदम एकदम विजयी मुस्कान देते हुए, अपने कॉलर को पूरे टसन में ऊपर उठाते हुए मुझे चिढ़ा रही थी.. “देख लिया न मेरी ताकत को? मेरी पहुँच को? ये मेरा शहर है...और ये मेरा इलाका है जानी, यहाँ तुम्हें मुझसे कोई नहीं बचा सकता...”


उस दिन के बाद से देखो वो गाना अब मुझे जबानी याद है. 

Smile an ever lasting smile
A smile can bring you near to me
Don't ever let me find you gone
'Cause that would bring a tear to me
This world has lost its glory
Let's start a brand new story
Now my love
You think that I don't even mean
A single word I say

It's only words
And words are all I have
To take your heart away

Talk in ever lasting words
And dedicate them all to me
And I will give you all my life
I'm here if you should call to me
You think that I don't even mean
A single word I say

It's only words
And words are all I have
To take your heart away

This world has lost its glory
Let's start a brand new story
Now my love
You think that I don't even mean
A single word I say

It's only words
And words are all I have
To take your heart away

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Saturday, December 24, 2016

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दिसम्बर, कोहरा और उसके खेल

काफी सालों बाद इस बार दिसंबर में शहर में इस कदर कोहरा मेहरबान हुआ है, वरना कोहरे ने तो जैसे ये ठान लिया था कि जनवरी के पहले अपनी शक्ल दिखानी नहीं है. तुम्हे याद है ऐसे कोहरे के मौसम में तुम कैसे फरमान जारी कर दिया करती थी? एक दिन सुबह ठीक पाँच बजे तुमने कॉल किया था और एकदम हड़बड़ी में कहा था, "सुनो.. दिसंबर जाने वाला है..बस पाँच दिन बचे हैं, और तुम सो रहे हो...? उठो, फ़ौरन उठो और जल्दी से तैयार होकर पार्क आ जाओ". कसम से , मेरा तो दिल किया था फोन में घुस जाऊं और तुम्हारी चोटी काट लूँ. जाड़े की सुबह सुबह जब कोई  गहरी नींद में रजाई के अन्दर दुबके हुए इत्मिनान से सो रहा हो तो कोई जगाता है क्या ऐसे किसी को? तुम्हें लेकिन इन सब बातों की परवाह ही कहाँ थी..तुम्हें तो बस ये मालूम था कि तुम्हें सुबह कोहरे में घूमना है और घुमाने वाला एकमात्र मैं ही था. तुम्हारी ऐसी बदमाशियों पर अक्सर मुझे गुस्से के बजाये प्यार आ जाता था. लेकिन उस दिन तुम्हारा कॉल पर ऐसे हड़बड़ाना बदमाशी या बेवकूफी नहीं थी. ये मुझे बहुत बाद में तुम्हीं से पता चला था. तुम सच में बहुत उदास हो जाया करती थी साल के आखिरी दिनों में ये सोचकर कि अब कुछ ही दिनों में दिसंबर जाने वाला है और फिर ग्यारह महीने का लम्बा इंतजार करना पड़ेगा. . दिसंबर से तुम्हें बेंतेहा प्यार था, तुम्हारा बस चलता तब तो दिसंबर को तुम ग्यारह महीने का और एक्सटेंसन दे देती. तुम्हारे मुताबिक तो साल भर बस दिसंबर का ही महिना होना चाहिए.

उन दिनों मेरे लिए सुबह के कोहरे में तुम्हारे साथ घुमने से ज्यादा मैजिकल कुछ भी नहीं था. हाँ तुम्हारे कई सारे नखरे झेलने पड़ते थे मुझे और अक्सर घर में बहाने भी बनाने पड़ते थे लेकिन इन सब के बावजूद सुबह कोहरे में तुम्हारे हाथ में हाथ डाले घुमने का वो एहसास ही बिलकुल अलग सा था. तुम्हे तो कोई दिक्कत नहीं थी, घर में उन दिनों सिर्फ तुम्हारी माँ और दीदी ही थी और तुम उन्हें जाने क्या क्या कहानियाँ बता कर सुबह हर रोज़ निकल आया करती थी.. लेकिन मैं फँस जाता था, हर दिन कोई नया बहाना सोचना पड़ता था मुझे. दिसंबर और कोहरे के कॉम्बिनेशन वाले मौसम में तुमपर अक्सर कोई न कोई सनक चढ़ जाया करती थी. याद है एक दिन तुमने फरमान जारी कर दिया कि कल से अपना बैडमिन्टन किट लेते आना. ये सोचने की तुमने जहमत भी नहीं उठाई थी कि मैं इतनी सुबह घर में क्या बोल कर बैडमिन्टन किट हर दिन लाया करूँगा? पूरे एक डेढ़ महीने मेरे घरवालों को लगता रहा था कि मैं कॉलेज के बैडमिन्टन चैम्पैन्शिप में भाग ले रहा हूँ और उसी की तैयारी के लिए सुबह इतने कोहरे में भी निकल जाता हूँ. उन्हें क्या पता था कि मैं तुम्हारे आदेशों का पालन कर रहा था.

बैडमिन्टन खेलने का तुम्हें कभी शौक नहीं रहा था. लेकिन एक सुबह तुमने पार्क के एक कोने में किसी लड़के-लड़की को देख लिया था बैडमिन्टन खेलते हुए, तब से ही तुम्हारे मन में ये सनक बैठ गयी थी. तुम भी हर सुबह खेलती थी बैडमिन्टन. लेकिन तुम्हारे साथ बैडमिन्टन खेलना भी आसन कहाँ था? बैडमिन्टन के तुम्हारे अपने नियम थे. तुम्हारे ही जैसे यूनिक नियम जैसे, बैडमिन्टन खेलने समय मैं तुम्हें जोर से कोई शॉट नहीं  मार सकता था, वरना मेरे पॉइंट कट जाते. ना ही तुम्हें कोई शॉट मैं ज्यादा ऊपर या नीचे खेलवा सकता था. मतलब ये कि तुम्हारे बैडमिन्टन रैकेट के आसपास ही कॉर्क आना चाहिए जिससे तुम आराम से शॉट मार सको, और इतने पर भी तुम्हारा कोई शॉट मिस हुआ तो भी पॉइंट मेरे ही कटते थे. कभी गलती से मैंने शॉट मारने में थोड़ी हीरोगिरी दिखा दी तो पॉइंट तो कटते ही कटते, जाड़े के मौसम में, ऐसे कोहरे में, बैडमिन्टन रैकेट से मार अलग से पड़ती थी तुमसे.

ऐसे ही सनक तुम्हें चढ़ी थी एक दफा क्रिकेट खेलने की भी. एक दो तीन तो हमारे दोस्तों की गैंग भी आई थी क्रिकेट खेलने. लेकिन तुम्हारे नियम...वो तो इस खेल में भी अजीबोगरीब थे. बस एक दिन में ही सब दोस्त तुमसे तंग आकर भाग गए थे. तुम्हें हर ओवर का पहला बॉल ट्राई बॉल चाहिए था. हर बॉल तुम्हारे बैट पर ही आना चाहिए था. अगर गलती से शॉट मिस हो जाता तो वो बॉल 'इनवैलिड' हो जाता था. तुम्हें बोलिंग करना आसान कहाँ था? बोलिंग करते समय रन अप लेने की तो सोचना भी अपराध था. तीन चार क़दमों की चहलकदमी कर के भी तुम्हें गेंद फेंकने आता तो तुम एकदम झल्ला जाती थी और बैट फेंक देती थी. तुम्हें बस इतना चाहिए था कि खड़े होकर सीधा सपाट बॉल तुम्हें फेंका जाए जिसे तुम आराम से बाउंड्री पार भेज सको. तुम्हें आउट करना भी तो टेढ़ी खीर थी. दुनिया का महानतम गेंदबाज तुम्हें आउट नहीं कर सकता था. उन दिनों हम इंटों का विकेट बनाते थे. कुछ आठ-दस इंटें लगते थे विकेट बनाने में, और तुम जब बैटिंग करती तो सभी इंटों को नीचे गिरा देती थी. बस दो इंटें एज अ विकेट लगे रहते थे और यदि उन इंटों पर तुम्हारे नियमों के मुताबिक बॉल लगे तो ही तुम आउट होगी.

जहाँ तक तुम्हारे बोलिंग करने का सवाल था, उसका मुझे ज्यादा इक्स्पिरीअन्स नहीं है. तीन चार बार ही हुआ होगा ऐसा जब तुमने मुझे बैटिंग करने का मौका दिया था. इतना बस मुझे याद है कि मैं बैटिंग और फील्डिंग एक साथ किया करता था. इधर मैंने शॉट मारा नहीं कि तुम चिल्लाती थी, "अरे जल्दी पकड़ो बॉल को, वरना चार रन हो जायेंगे और तुम जीत जाओगे" और मुझे भाग कर गेंद पकड़ना पड़ता था. गलती से अगर मेरे बैट से लगी बॉल बाउंड्री पार चली जाती तो तुम्हारे ताने अलग सुनने पड़ते थे मुझे, "ठीक से फील्डिंग भी नहीं कर सकते तूम...कुछ काम के लायक नहीं हो".  ऐसी तो थी तुम. कौन तुम्हारे ऐसे नियमों के साथ क्रिकेट खेलता. तुम्हारे इन नखरों को सिर्फ मैं ही झेलता था, और किसी में इतनी हिम्मत कहाँ थी? लेकिन तुम्हारे इन सब नखरों के बावजूद तुम्हारे साथ सुबह के ये दो ढाई घंटे मेरे लिए दिन के बेहतरीन पल होते थे.

तुम्हें याद है मेरे पास उन दिनों एक छोटा टू-इन-वन था जो एक क्विज कम्पटीशन में मुझे इनाम में मिला था. जैसे तुमने बैडमिन्टन और क्रिकेट किट लाने का फरमान जारी किया था, ठीक ऐसे ही तुमने एक दिन टू-इन-वन लाने का फरमान जारी कर दिया था. क्रिकेट और बैडमिन्टन तक तो ठीक था, लेकिन ये टू-इन-वन लाने का मैं घर में क्या बहाना बनता? कि मैं किसी म्यूजिक कम्पटीशन में भाग ले रहा हूँ? दो दिन तो किसी को पता नहीं चला था कि मैं हर सुबह अपने उस छोटे से टू-इन-वन को बैग में रख कर ले जाता हूँ. लेकिन एक दिन माँ ने देख लिया तो पूछा, तुम तो सुबह खेलने जाते हो? ये टू-इन-वन किसलिए? अब मैं क्या कहता? हमेशा एक ही बहाना बनाता था, कि दोस्तों के साथ सुबह क्रिकेट की कमेंटरी सुनता हूँ. सोचो ज़रा, इतने पापड़ बेलने पड़ते थे मुझे तुम्हारे हर आदेश का पालन करने में.

तुम्हारी एक ख्वाहिश थी, कि हम और तुम इस पार्क में टहलते रहे, या कुछ खेलते रहे या बस कहीं किसी बेंच पर बैठे रहे और बैकग्राउंड में संगीत बजते रहना चाहिए. याद है एक दिन तुमने कहा था मुझसे "पता करो इस पार्क का रख-रखाव कौन करता है और उसे मेरे पसंद की गानों की एक सीडी बना कर दे दो और कहो कि पार्क में हर जगह लाउडस्पीकर लगवा दे और वो सारे गाने एक एक कर के बजाये". खैर ये तो मुमकिन नहीं था शायद इसलिए तुमने पार्क में गाने सुनने का एक दुसरा रास्ता निकाल लिया था. मुझे तुमने टू-इन-वन लाने का फरमान सूना दिया था और मेरे उसी छोटे से टू-इन-वैन पर ही तुम अपनी हसरत पूरी कर लिया करती थी. तुम अपने मन पसंद गाने बजा लेती थी और टू-इन-वन को वहीँ किसी बेंच पर रख कर हम दोनों बैडमिन्टन खेलते थे और खेलने के बाद बहुत देर तक वहाँ बैठ कर गाने सुनते थे. उन दिनों ऐसा लगता था अक्सर कि ये टू-इन-वन हमारा कोई दोस्त हो जो हम दोनों के बीच बेंच पर चुपचाप बैठे हुए हमारी बातें सुन रहा है और हमें गाना सुना रहा है.

एक छोटा सा खेल भी तुमने इजाद किया था उन दिनो. मेरे पास कुछ इन्स्ट्रमेन्टल गानों की कैसेट थी. तुम उन कैसेट्स को टेप पर चलाती और कहीं भी बीच में रेंडमली फॉरवर्ड या रिवाइंड कर के बस तीन या पाँच सेकण्ड के लिए प्ले करती और मुझे पहचानना होता था कि वो गाने की कौन सी लाइन थी. मैं अक्सर हार जाया करता था लेकिन तुम हमेशा ही जीतती थी. इस एक खेल में ना तो तुम्हारे कोई वीयर्ड नियम थे और नाही तुम्हारे कोई नखरे. मुझे हैरानी भी होती थी उस वक़्त कि ऐसे कैसे तुम्हें हर गाने इतने अच्छे से पता हैं. मेरे लिए इस  खेल में एक फायदा ये था, कि तुम हर गाने को पहचान लेती थी और फिर उसे मेरे सामने गुनगुनाती थी. तुम्हारे साथ दिसंबर के कोहरे वाली सुबह की शायद ये मेरी सबसे मीठी याद है.

आज तुम्हारी उन बातों को याद कर के चेहरे पर एक मुस्कराहट तैर जाती है. सच कहूँ तो तुम्हारी जितनी भी अजीबोगरीब फरमाइशें थीं, जितने भी आदेश थे उनसे मुझे कभी इरिटेशन महसूस नहीं हुई. मैं तुम्हारी उन हरकतों पर उन दिनों कभी कभी हँसने की गुस्ताखी जरूर कर देता था लेकिन मुझे सच में बहुत अच्छा लगता था जब तुम ऐसे मुझपर हुक्म चलाती थी. इस बार दिसंबर के मौसम में शहर के उस पार्क में जहाँ हम और तुम जाया करते थे हर सुबह, एक बड़ा प्यारा सा बदलाव हुआ है जिसे देखकर मैं कुछ देर के लिए दंग रह गया था. पार्क के हर कोने पर लाउडस्पीकर लगा दिए गए थे और सुबह सुबह रोमांटिक इंस्ट्रुमेंटल और कभी कभी रफ़ी के रोमांटिक गाने बजते हैं. मुझे ये सोच कर हँसी भी आ गयी कि चलो तुम्हारी फरमाइश को पार्क के मैनेजमेंट ने इतने सालों के बाद ही सही, माना तो आखिर. मुझे उस समय तुम्हारी कमी बहुत शिद्दत से महसूस हुई थी और मुझे लगा काश तुम यहाँ होती और ये प्यारा सा बदलाव तुम देखती. तुम्हारे चेहरे की ख़ुशी ऐसे में देखने लायक होती. पार्क के ही एक कोने पर मेरी मेरी नज़र गयी दो लड़के लड़कियों पर जो सुबह के कोहरे और ठण्ड में बैडमिन्टन खेल रहे थे. मुझे तुम्हारी और ज्यादा याद आने लगी, और मैं पार्क की बेंच पर बैठा आँखें बंद कर लेता हूँ और बहुत पीछे उस साल में पहुँच जाता हूँ जब तुम और मैं यहाँ बैडमिन्टन खेलते थे. बीच बीच में पार्क में बजता हुआ एक रोमांटिक गाने के बोल सुनाई दे रहे हैं.

निगाहों में छुपकर दिखाओ तो जानें
ख़यालों में भी तुम न आओ तो जानें
अजी लाख परदे में छुप जाइयेगा
नज़र आइयेगा नज़र आइयेगा

अजी हमसे बचकर कहाँ जाइयेगा
जहाँ जाइयेगा हमें पाइयेगा




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Sunday, December 11, 2016

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कोहरे पर लिखा एक नाम

वह दिसंबर की एक सर्द सुबह थी. ठण्ड इतने कि रजाई से निकलने का मन न करे, पर जल्दी उठना लड़के की मजबूरी थी. क्या करता वह? लड़की ने उसे हुक्म दिया था.. सुबह ठीक साढ़े छः बजे मेरे घर पहुँच जाना, मुझे ड्राइव पर चलना है.

लड़के ने अधखुली आंखों से ही अपने मोबाइल पर एक नजर डाली, सुबह के 6:00 बजे थे. हारकर उसने रजाई अपने ऊपर से हटा दी और उठ कर एक अंगडाई लेता हुआ खिड़की के पास तक आ गया. खिड़की से बाहर देखा तो कुछ भी नजर नहीं आ रहा था. धुंध इतनी गहरी थी कि उसे तो सामने वाले घर की बालकनी भी नजर नहीं आ रही थी. लड़के का मन हुआ कि वह फोन करके लड़की को मना कर दे कि वह आज नहीं आ पाएगा पर उसकी इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि वह इस तरह का कोई कॉल करने की सोच भी सकता. हुक्म आखिर हुक्म था और उसकी तामील करना उसका फर्ज़... और हुक्म भी कोई ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि गाड़ी लेकर लड़की के घर सुबह ठीक 6:30 बजे आकर उसे मोर्निंग ड्राइव पर ले जाने का हुक्म था.

यूँ तो लड़के को लड़की की हर अदा, हर ज़िद और हर नखरे पर बेइंतिहा प्यार आता था...पर जाने क्यों आज उसे थोड़ी सी इरिटेशन महसूस हो रही थी. ऐसे कोहरे में लड़की का उसके जैकेट में हाथ डाल कर टहलना एक बात थी और कोहरे में ड्राइव पर निकलना दूसरी बात थी. एक तो कोहरे में वैसे भी सड़क दिखाई नहीं देती. गाड़ी के शीशों पर भी धुंध आ जाती है और ऐसे में ड्राइव पर जाना खतरनाक आईडिया था. लड़के को कोहरे में गाड़ी चलाना कभी भाता नहीं था लेकिन लड़की को कोहरे में ड्राइव पर जाना बड़ा रोमांटिक लगता था.

लड़के ने मन ही मन तय किया कि आज कुछ भी हो जाए, वो लड़की को गाड़ी की चाभी तो नहीं देने वाला है. एक तो आम दिनों में लड़की गाड़ी सही से चलाती नहीं थी, हॉर्न देने के बजाये कार के अन्दर से ही चिल्लाती थी “हटो हटो...सामने से हटो..” और ऐसे मौसम में जब पूरा शहर कोहरे की गिरफ्त में है, उसे गाड़ी चलाने की सूझी है. लड़के ने ये तय कर लिया कि लड़की को तो वो गाड़ी चलाने नहीं देगा. लड़की को मोर्निंग ड्राइव पर जाना है तो वो ड्राइव कर के ले जाएगा. लड़का जानता था ये काम इतना आसान नहीं है.. लड़की को बहुत प्यार से मनाना पड़ेगा ताकि वो गाड़ी चलाने की जिद न करे. अपने इन्हीं ख्यालों में खोए लड़के की निगाह जब घड़ी पर गई तो वह चौंक गया...उफ़! छः पच्चीस तो यहीं बज गए...यानि अब उसको पक्का देर होनी थी और देर होने का मतलब, लड़की की तय की गई कोई अजीबोगरीब सजा झेलना . ऐसा नहीं था कि लड़की कभी देर से नहीं आती थी, वो अक्सर ही देर से आती थी और खुद की लेटलतीफी के लिए उसके पास हमेशा बेहद अजीब अजीब से लॉजिक मौजूद होते थे. मसलन...लड़कों का लेट होना बहुत बोरिंग होता है, जब कि लड़कियों का लेट होना बेहद रोमांटिक एक और तर्क तो इससे भी ज़्यादा अजीब था...लड़के जब देर से आते हैं तो वो बिलकुल जोकर लगते हैं और लड़कियाँ जितनी देर से आती हैं वो उतनी ही अधिक सुन्दर हो जाती हैं.

कभी कभी लड़की की ऐसी इललॉजिकल बातों पर लड़के का बहुत मन करता कि वह पेट पकड़ कर लोट लोट के हँसे, पर हँसना तो दूर अगर ऐसे में भूल से भी उसके चेहरे पर एक मुस्कान भी आ जाती तो उसकी शामत आना तय था. लड़की ऐसे में मुँह फुला के बैठ जाती...मेरी बात तुमको जोक्स लगती है न...और मैं कोई जोकर...लड़के का दिल करता, वह ज़ोर से अपनी गर्दन 'हाँ' में हिला दे, पर 'आ बैल मुझे मार' का ख़तरा कौन मोल लेता.

ये सब बातें याद करते हुए लड़के के चेहरे पर फिर एक मुस्कान खिल उठी. लड़की की यही सब बातें तो उसे उसकी उम्र की बाकी लड़कियों से अलग करती थी. सबसे ख़ास और अनोखी बात तो उसे यह लगती थी कि लड़की सिर्फ़ उसके सामने ही इस तरह ट्रांसफॉर्म होती थी...बाकी दुनिया के सामने उसका ये रूप नहीं आता था. एक बेहद हँसमुख पर संजीदा सी समझदार लड़की कैसे उसके सामने इतनी बचकानी हो जाती थी वह कभी जान नहीं पाया था. बहुत दिन पहले उसके अचानक हुए गंभीर रूप से रूबरू हो उसने धीरे से पूछा भी था...तुम जब इतनी समझदार हो तो मेरे ही सामने इतनी बच्ची क्यों बन जाती हो ? जवाब में वो फिर तुनक गई थी...तुमको तुम्हारी असली गुड़िया” ज्यादा पसंद है या “नकली”? बस बता दो, फिर तुम देखना... कहते-कहते उसकी आँख डबडबा आई थी तो वह एकदम से घबरा गया था। उसका यह मकसद बिलकुल नहीं था, न ही उसे अंदाज़ा था कि बेहद हल्के-फुलके रूप में पूछी गई उसकी यह बात उसे इस कदर हर्ट कर देगी. वह हड़बड़ा के उसको एक बच्चे की तरह मनाने लगा था...और उस दिन हमेशा की तरह देर तक नखरा दिखाने की जगह वह झट से मान भी गई थी.

लड़की के घर पहुँचते पहुँचते उसे सात बज गए थे. आधे घंटे देर से पहुँचने से लड़का वैसे ही डरा हुआ था. मन ही मन सोच रहा था, आज तो शामत आई अपनी. लड़के ने उसके अपार्टमेंट के गेट के पास इधर उधर निगाह दौड़ाई, पर लडकी का कोई अता-पता नहीं था. लड़के ने राहत की साँस ली. वो अपार्टमेंट के सामने वाली चाय दूकान में बैठ गया और लड़की का इंतजार करने लगा. दस प्रन्द्रह मिनट उसका इंतज़ार करके उसे चिंता होने लगी थी. फोन पर नजर दौड़ाई तो ना लड़की का कोई एसएमएस आया था ना ही उसने कॉल किया था. ऐसे कोहरे वाला मौसम तो उसका सबसे ज़्यादा पसंदीदा मौसम है, फिर इसको वह कैसे मिस कर सकती है भला...? कहीं उसकी तबियत फिर से ख़राब तो नहीं हो गयी? उसने मोबाइल पर लडकी का नम्बर डायल किया. उधर घंटी बस बंद ही होने वाली थी कि तभी लडकी की उनींदी आवाज़ में उससे भी ज़्यादा निन्दियाया हुआ एक बेचारा सा `हैल्लो' लड़के के कानों में पड़ा...

"तुम अभी तक सो रही हो...? भूल गई क्या तुमने आज मुझे यहाँ बुलाया था...?" लड़के की आवाज़ में न चाहते हुए भी थोड़ी नाराजगी झलक गई, "मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ और तुम वहाँ रजाई ओढ़ के आराम से सो रही..."

लड़के के कॉल से लड़की भी हडबडा के उठ गयी. उसकी आवाज़ की तल्खी लडकी भांप गई थी पर हमेशा की तरह डरने की बजाय वह भी गुस्सा गई,"तुमको किसने कहा था तुम इत्ती सुबह तुमको पहुँचने? अब भुगतो... एक तो मूवी देख कर वैसे ही मैं दो बजे सोई, ऊपर से तुमने भी जगा दिया... मुझे अभी आधा घंटा और लगेगा आने में...

लडकी को यूँ गुस्सा होते देख मानो लड़के के होश उड़ गए थे. ये लो..अब अगर ये गुस्सा हो गई तो इसको मनाना और भी टेढ़ी खीर होगी. सो वह झट से समझौते के मूड में आ गया,"अच्छा-अच्छा, ठीक है...मुझे क्या पता था ये सब...तुम आओ अब, मैं यहीं गेट के पास तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ.."

लडकी जब वहाँ आई तो बेहद खुशनुमा मूड में थी. हलके नीले रंग की डेनिम की जींस पर ब्लैक लेदर जैकेट और गले में बेहद नफासत से लिपटे स्कार्फ के साथ वह बेहद खूबसूरत लग रही थी. इतने कोहरे में भी उसे धूप का काला चश्मा लगाए देख कर लड़के की हँसी छूट गई, जिस पर उसने बड़ी मुश्किल से काबू पा लिया. चेहरे पर नकली गंभीरता ओढ़े उसने उसे फटाफट गाडी में बैठ जाने को बोला, पर लडकी तो लडकी थी...इतनी आसानी से कहाँ मानने वाली थी. इसलिए फिर तुनक गई...पहले कायदे से मेरी तारीफ करो...तब गाडी में बैठूंगी. लड़का तो कब से उसकी तारीफ करने का मौक़ा ढूँढ ही रहा था, तभी तो अपनी सारी शायराना जानकारी का इस्तेमाल करते हुए उसने लडकी की भरपूर तारीफ कर डाली...पर आखिर में उससे रहा नहीं गया तो इस समय भी धूप का चश्मा पहनने की वजह पूछ ही डाली. लडकी ने उसे कुछ ऐसे घूर के देखा मानो इस बेवकूफाना सवाल की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं थी. फिर बड़ी लापरवाही से कंधे उचका के बोली...तुम ही तो कहते हो मुझे सनशाइन...अपनी ही रोशनी से मेरी आँखें चौंधिया जाती तो...? तुमको इतना भी समझ नहीं आता...ओह गॉड!! कितने बुद्धू हो तुम...!! लड़का हमेशा की तरह बिलकुल क्लू-लेस था . ऐसे तर्क उसे हमेशा निरुत्तर कर देते थे.

लड़का ड्राइविंग सीट पर बैठने ही वाला था कि लड़की ने टोका.. “ऐ मिस्टर, उधर कहाँ? इधर आइये आप. आपकी सीट ये है. वो ड्राइविंग सीट अगले दो घंटे तक मेरे नाम पर बुक्ड है...”. लड़का इसके लिए तैयार था. उसने पहले तो सख्ती से साफ़ मना कर दिया और फिर बड़े प्यार से लड़की को समझाने लगा कि ऐसे कोहरे में अच्छे ड्राइवर्स को भी गाड़ी चलाने में दिक्कत होती है..कोहरे में गाड़ी चलाना कितना मुश्किल है वो एक एक कर के लड़की को समझाने लगा था. लड़की लेकिन कहाँ मानने वाली थी. इस बार वो गुस्सा होने के बजाये लड़के को इमोशनली ब्लैकमेल करने लगी. अंत में थक हार के लड़के ने न चाहते हुए भी गाड़ी की चाबी लड़की को थमा दी.

लडकी ने बड़ी प्रोफेशनली ड्राइविंग सीट सम्हाल ली थी | इग्नीशन ऑन करने से पहले लड़की ने लड़के से बड़े लापरवाही से पूछा...अच्छा ये क्लच है न और ये ब्रेक और ये एक्सलेटर...? लड़का हैरत से उसे देखने लगा.. तुम भूल गयी? लडकी ने इग्नीशन ऑन करते हुए बड़ी लापरवाही से कंधे उचका दिए...याद है याद है..थोड़ा कन्फ्यूज्ड थी..अभी चलाऊँगी तो सब फिर से याद आ जाएगा ...नहीं याद आया तो तुम तो बता ही दोगे न...

लड़के का दिल किया अपना माथा पीट ले...हद है यार, ये गाडी चलने बैठी है और इसको यही याद नहीं कि गाडी का ब्रेक, क्लच या एक्सीलेटर कहाँ है...एक बार फिर उसको सब बता कर सीट बेल्ट बाँध कर और उसको भी बंधवा कर लड़के ने भगवान् का नाम लिया और स्टेयरिंग उसके हवाले कर दिया.

कुछ दूर तक उसे ठीक-ठाक चलाते देख कर उसने राहत की साँस ली. पर अभी यह साँस वह ठीक से ले भी न पाया था कि लडकी के “रुक-रुक” और “हट-हट” की आवाज़ से एकदम हडबडा गया और जब तक वह कुछ समझ पाता, उसकी गाडी का एक कोना सड़क किनारे खड़े ऑटो से टकरा चुका था.

जब तक लड़का बाहर निकल कर गाडी को हुआ नुकसान आँक पाता, लडकी ने एक झटके से गाडी का दरवाज़ा खोला और अपने ऊपर इस अचानक हुए हमले से धक्का खा कर बौखलाए ऑटो-ड्राईवर पर बरस पडी," दिखाई नहीं देता, इतनी बड़ी गाडी आ रही? बेवकूफों की तरह चुपचाप गाड़ी बीच सड़क पर लगाये बैठे हुए थे...? ऑटो ड्राईवर भी थोड़ा तैश में आ गया और बहस करने लगा. लेकिन लड़की पूरे तरह से ऑटो ड्राईवर के ऊपर बरस पड़ी थी. आसपास के कुछ लोग भी वहाँ जमा हो गए थे. भीड़ इकट्ठी होते देख लड़के ने किसी तरह दोनों को शांत कराया और ऑटो वाले से माफ़ी माँग कर लड़की को बेहद मुश्किल से किसी तरह घसीट-घसाट के गाडी की पैसेंजर सीट पर बैठा दिया.

गाड़ी में दोनों कुछ देर तक चुप रहे. लड़का ये नहीं समझ पा रहा था वो लड़की की इस बेवकूफी पर हँसे या गुस्सा दिखाए. वो ये जानता था कि गलती पूरी लड़की की ही थी. वो बेचारा ऑटो तो बड़े आराम से सड़क के किनारे खड़ा था लेकिन उसके समझ में ये नहीं आ रहा था कि बीच सड़क पर चलती उसकी गाड़ी डाइवर्ट होकर किनारे लगे ऑटो में कैसे जा टकराई. उससे रहा नहीं गया तो उसने आख़िरकार पूछ ही दिया लड़की से.. “तुम्हारी उस ऑटो वाले से कोई पुरानी दुश्मनी तो नहीं थी?” लड़की उसके तरफ आँखें तरेर कर देखने लगी.. “क्या मतलब है तुम्हारा..? कहना क्या चाहते हो तुम...”

लड़के ने बड़े मासूमियत से कहा, “अरे दुश्मनी नहीं थी तो गाड़ी तो सड़क के बीचोबीच चल रही थी..सड़क के किनारे खड़े ऑटो को एकदम फॉर्टी फाइव डिग्री के एंगल से जाकर कैसे ठोक दिया तुमने?

लड़की ने गुस्से में जवाब दिया...”अरे वो तो मैं अपनी जुल्फें समेटने लगी थी तो गाड़ी उधर भाग गयी...मैं तुम्हारे इस खटारा सी गाड़ी को भी कितना रोक रही थी लेकिन रुकी ही नहीं...और वो ऑटो ड्राईवर..एकदम बहरा था. मैं कितना चिल्ला रही थी. वो सुन ही नहीं रहा था. पता नहीं कौन ऐसे-ऐसे लोगों को ऑटो चलाने का लाइसेंस दे देता है, बेचारी सवारियां तो ऐसे ऑटो में बैठ कर फ़ालतू में मर जाती होंगी". मुझे तुमने रोक लिया नहीं तो मैं उस पागल की ईंट से ईंट बजा देती...लाइसेंस ज़ब्त न करवा देती तो मेरा नाम बदल देते.

गाडी को हुए नुकसान को देख कर माँ-पापा क्या कहेंगे, लड़के को जाने क्यों इस समय उस बात की चिंता के बजाये लडकी के इस गुस्से पर बेहद प्यार आ रहा था..अच्छा, तो नाम बदल कर कौन सा नाम रखूँगा मैं तुम्हारा...?


'परी...’ लडकी ने दो मिनट बड़ी गंभीरता से उसकी बात पर गौर करने के बाद कहा और खिड़की पर छाई धुंध पर अपना नाम लिख दिया...|
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Monday, October 10, 2016

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बारिशी मोमेंट्स


हम दोनों की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी. वो अक्सर कहती थी मुझसे, देखना हम दोनों के प्यार पर फ़िल्में बनेंगी और किताबें लिखी जायेंगी. वैसे तो हर किसी को लगता है कि उसकी प्रेम कहानी इस दुनिया की सबसे ख़ास कहानी है. लेकिन हमारे मामले में ये थोड़ा सच भी था कि हमारी कहानी किसी रुपहले परदे पर चल रही फिल्म जैसी थी. चाहे वो पहली मुलाकात हो या हम दोनों के ज़िन्दगी में आने वाले उतार-चढ़ाव, ट्विस्ट एंड टर्न. सब कुछ किसी फिल्म के स्क्रिप्ट सा लगता था. पहली मुलाकात हमारी तो सच में एकदम फ़िल्मी थी.

दो जुलाई का दिन था वो. उस साल हमारे शहर में बारिश ही नहीं हो रही थी. जून पूरा सुखा ही रह गया था. मौसम विशेषज्ञ बस अनुमान ही लगाते रहे थे कि बारिश अब हुई कि तब लेकिन बारिश थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी. मैं कॉलेज की सीढ़ियों पर बैठा जाने क्या सोच रहा था और लगातार आसमान की तरफ ताके जा रहा था. तभी वो आई मेरे पास और मेरे बगल में बैठ गयी. कॉलेज की सबसे सुन्दर लड़की जिससे मैं बात करने के मौका ढूँढ रहा था एकदम से पास में आकर बैठ जाए तो कैसा हाल हो जाता है? ठीक वैसा ही मेरा भी हुआ. अचानक से मैं एकदम सकपका सा गया. मेरे उड़े हुए चेहरे को देखकर उसने हलके से मुस्कुरा दिया. फिर आसमान की तरफ देखकर मुझसे जॉन एलिया के स्टाइल में पूछती है -"आसमान में क्या देख रहे हो? कोई रहता है आसमान में क्या? या ये सोच रहे हो कि बारिश कब होगी?" उसके ऐसे अजीब प्रश्न से मैं थोड़ा कन्फ्यूज़्ड हो गया और हड़बड़ी में एक बेमतलब सा जवाब दे दिया "हाँ, बारिश नहीं हो रही यही सोच रहा था". वो फिर हँसने लगी. मेरे कंधे पर थपकी देते हुए कहा उसने "घबराओ मत, मैं आ गयी हूँ...बारिश भी आ जायेगी..."

मैं समझने की कोशिश करता कि क्या कहा उसने इससे पहले ही जैसा फिल्मों में होता है न, ठीक वैसा ही हुआ. इधर उसके बोलने की देर थी कि उधर ज़ोरों से बरसात शुरू हो गयी. एकदम मुसलाधार. मैं तो एकदम चकित सा होकर उसे बस देखते ही रहा था.वो अपने चेहरे पर एक विजयी मुस्कान लिए कह रही थी मुझसे - "टोल्ड यू"!

फिर जाने कैसा संयोग रहा उसके बाद, कि अगले कुछ सालों तक ये इत्तेफाक बना रहा कि शहर में बारिश के मौसम की पहली बरसात दो जुलाई को ही हुई. मेरे लिए तो ये बस एक इत्तेफाक मात्र था लेकिन उसके लिए ये इत्तेफाक से कहीं ज्यादा था. मुझे याद है एक साल बाद जब हम दोनों अपने मिलने की पहली ऐनवर्सरी शहर के एक गार्डन रेस्टुरेंट में सेलिब्रेट कर रहे थे, ठीक उसी समय बारिश शुरू हुई. उसने बारिश को देखते ही कहा था - "लो आ गयी बारिश, हमारी और तुम्हारी ऐनवर्सरी सेलिब्रेट करने". उसके छोटे से, प्यारे से दिमाग में ये बात घुस कर बैठ गयी थी कि हमारे शहर में पहली बरसात दो जुलाई को ही होगी. ना उससे एक दिन पहले ना उससे एक दिन बाद. उसका बस चलता तो वो अखबार में इश्तेहार छपवा देती कि शहर की पहली बारिश का दिन दो जुलाई है.


बारिश के साथ उसके अब्सेशन की वैसे तो बहुत सी वजहें थी, लेकिन ये सबसे बड़ी वजह थी. इसके अलावा हमारे अनगिनत खूबसूरत पल जो बारिश के रहे हैं और जिसे वो "बारिशी मोमेंट्स" का नाम देकर बुलाती है वो भी एक बड़ी वजह थी कि उसे बारिश के महीने से प्यार था. वैसे तो उसके इस "बारिशी मोमेमेंट्स" में कई सारे  बेशकीमती पन्ने जुड़े हैं लेकिन एक पन्ना बड़ा ख़ास है.

हम दोनों उस  समय अलग अलग शहर में रहते थे और अपने बेहद अजीज दोस्त नितिन की शादी में अपने शहर वापस आये थे. इत्तेफाक भी इतना खूबसूरत था कि नितिन की शादी दो जुलाई को तय हुई थी. वो हमारे मिलने की पाँचवीं ऐनवर्सरी थी. शहर का हाल और  बारिश का सिचूएशन एक्जैक्ट वैसा ही था, जैसा जिस साल जब हम पहली बार मिले थे तब था.

दो दिन पहले हमनें प्लान बनाया था मिलने का, लेकिन मैं कुछ जरूरी काम में फँस कर रहा गया था और उसे मैंने कहा था कि शादी वाले दिन मैं पहुँच पाउँगा. वो मुझसे बेहद खफा हो गयी थी. जाने क्या क्या उसने प्लान किया था, शौपिंग का भी प्लान उसने मेरे साथ ही बनाया था और मेरे देर से आने की वजह से उसके सारे प्लानिंग पर पानी फिर गया था. वो मुझसे लड़ बैठी थी. मैंने उससे पहले से ही कह रखा था कि मेरे साथ चलना शादी में, लेकिन वो नाराज़ थी और उसने ये सजा मेरे लिए मुकर्र की थी कि वो मेरे साथ नहीं जायेगी और शादी में मुझसे मिलेगी भी नहीं. कभी कभी ऐसे ज़ुल्म वो मेरे पर बड़ी बेरहमी से कर दिया करती थी.

मुझे लगा था उसका गुस्सा शादी वाले दिन गायब हो जाएगा. गुस्सा तो गायब हो भी चूका था लेकिन नौटंकियाँ करने में और मुझे सताने में वो उस्ताद थी. शादी वाले दिन उसने मुझे पहले से ही फ़ोन कर दिया था कि वो नितिन के घर के बाहर गेट पर मेरा इंतजार करेगी. मैं वहां ठीक समय पर पहुँच गया था लेकिन वो वहाँ नहीं थी. फिर अगले ही पल उसका फोन आया, "अन्दर आ जाओ ऊपर छत पर दोस्तों की महफ़िल जमी है, वहीं पर हूँ मैं". छत तीसरी मंजिल पर थी. वहाँ पंहुचा तो वहाँ स्टीरियो-डेक वाले के सिवाए वहाँ कोई नहीं था. वहाँ से उसे मैंने कॉल किया तो उसने मुझे फिर दोबारा गेट के पास बुला लिया. भागते दौड़ते हुए मैं गेट तक पहुँचा तो वहाँ भी वो नहीं थी. अब तक मैं समझ गया था कि वो मुझे बस सता रही है. उसने आख़िरकार मुझे फोन किया और बस इतना बोल कर फोन काट दिया, "बैड लक...आज तो तुम मेरे दीदार को तरसो बस".
हालाँकि मुझे उसकी इस बदमाशी से इरिटेट होना चाहिए था लेकिन मैं मन ही मन उसकी इस  बदमाशी पर मुस्कुरा रहा था.

गेट पर ही मुझे एक दो दोस्त और मिल गए और उनके साथ मैं घर के अन्दर चला आया. नितिन का घर मेरे लिए कोई नया नहीं था, पहले भी बहुत बार नितिन के घर मैं आ चूका था. अन्दर एक बड़ा सा आँगन था और वहीँ बीच में मंडप लगा था. मैं वहीँ मंडप के एक तरफ बैठ गया.

आखिरार वो सामने से आते दिखी मुझे. चेहरे पर अपनी ट्रेडमार्क शरारती मुस्कान लिए, सारे नखरे और अदा समेटे सामने की तरफ के सीढ़ियों से बाकी औरतों के साथ वो आ रही थी.

वो मंडप के दुसरे तरफ कोने में औरतों के ग्रुप में बैठ गयी. ये उसका एक और जुल्म था मेरे पर. मुझे तड़पाने का वो कोई मौका नहीं छोड़ रही थी. मैंने उसे इशारे से पास आने को कहा. पहले तो उसने मुहँ बिचका के बड़ी बेरुखी से हँस कर मेरी बात को इगनोर कर दिया, फिर उसने मुझे इशारा किया अपने पास आने का. वो जानती थी कि मैं वहां नहीं आऊंगा. मैंने इनकार किया. वो फिर से हँस दी. उसे बस दूर से देखने के अलावा मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था. अपने सभी लड़की दोस्तों को मैं जी भर कोस रहा था, अभी कुछ देर पहले सब यहीं पर महफ़िल जमाये बैठी थीं लेकिन अब कोई दिख क्यों नहीं रही है. वो होती अगर तो कम से कम उनके जरिये मैं उस तक सन्देश तो पहुँचा सकता.

औरतें सब गीत गा रही थी और मेरे और उसके बीच बड़े विएर्ड से एक्स्प्रेसन का आदान प्रदान हो रहा था. उसने मुझे फोन पर मेसेज किया, "आज यूहीं बस इशारों इशारों में बातें करो". 

मैंने मौका देखकर नितिन की छोटी बहन प्रिया को अपने पास बुलाया और कहा कि उसे मेरे पास लेकर आओ. प्रिया ने जाने क्या बात की उससे, कि वो मुस्कुराने लगी. थोड़ी देर बाद खुद उठ कर वो मेरे पास आ बैठी. बातें मुझसे वो फिर भी नहीं कर रही थी. तब तक वो मुझसे रूठी रही जब तक मैंने 'कान पकड़' के उससे माफ़ी नहीं मांग ली थी. 

कुछ देर तक हम मंडप के पास ही बैठे रहे. लगभग सब रस्म जब खत्म हो गये, हम दोनों टहलते हुए छत पर आ गए थे. नितिन के घर की इस छत से भी काफी यादें जुड़ी थी. हम सब दोस्तों में से सिर्फ नितिन ही एक ऐसा दोस्त था जिसके यहाँ हम सभी इकट्ठे होते थे और छत पर हमारी महफ़िल जमती थी. छत के एक कोने पर डेक(स्टीरियो) रखा था. डेक ऑपरेटर शायद अपना डेक वहीँ छोड़ कर सोने जा चूका था. हम वहीँ कोने पर लगी कुर्सियों पर बैठ गए. 

उसने गाने सुनने की फार्माइश की. मैंने एकदम धीमे आवाज़ में गाने चला दिए. अच्छी सुहानी सी हवा चल रही थी और ऐसे में उसके साथ बैठ कर रोमांटिक गाने सुनते हुए छत पर तारों को देखना, ये मेरे लिए सबसे हसीन पल में से एक था. गाने के बीच में वो कई बार उठ कर नाचने लगती...और मैं उसे देखते रहता. 

मैं बार बार सीढ़ियों की तरफ भी देख रहा था, कि कहीं कोई आ ना जाए. उसने मेरे इस डर को भांप लिया था. मुझे तसल्ली देते हुए उसने मुझसे कहा, "घबराओ नहीं..हमें यहाँ कोई गलत नज़रों से नहीं देखेगा..यहाँ वैसे भी सब हमें प्यार करते हैं.." कुछ पल वो चुप रही, फिर आगे कहा उसने "तुम जानते हो तुमनें जब प्रिया के जरिये मुझे संदेसा पहुँचाया था न, तब उसने आकर मुझे जबरदस्ती बाहें पकड़ के उठा लिया था और हँस के कहा था, 'चलिए मेरी होने वाली भाभी, आपको मेरे भैया बुला रहे हैं'. वो समझती है तुम्हारी और मेरी शादी तय हो गयी है. उसके ऐसे जिद करने पर मैं तो एकदम शरमा सी गयी थी".  कुछ रुक कर उसने आगे कहा, "जानते हो सिर्फ प्रिया ही नहीं, जो भी हमें यहाँ पहचानते हैं सब यही समझते हैं कि तुम्हारी और मेरी शादी तय हो गयी है."

"हाँ, कुछ लोग हैं जो हर हाल में हमें साथ देखना चाहते हैं.उन्हें ये यकीन करना मुश्किल लगता होगा कि हमारी अब तक शादी नहीं हुई ही. ऐसे लोगों को और उनकी उम्मीदों को और तरसाना अच्छा नहीं है न? मैंने उसकी तरफ देखा. वो अब भी शरमा रही थी. 

छत पर लगी सीरिज बल्ब की रौशनी में उसकी हलकी डबडबाई आँखें चमक रही थी. उसकी लटें माथे पे उभर आई थीं...रौशनी में चमकती हुई. उसके माँग का टिका और उसके झुमके सीरिज बल्ब की रौशनी में चमक रहे थे. वो किसी दुल्हन से कम नहीं दिख रही थी. मेरी निगाहें उसके चेहरे पर ही ठिठकी रहीं.  

"क्या देख रहे हो?" उसने धीरे से मुझसे पूछा.  
"तुम आज बहुत सुन्दर दिख रही हो..जैसे कोई दुल्हन हो.." मैंने कहा.  
अपने आँखों में आई हलकी नमी को पोछते हुए उसने कहा - 
"ये तो कुछ भी नहीं है, शादी वाले दिन देखना तुम, तुम्हारे होश नहीं उड़ा दूंगी तो कहना. मैं दुल्हन के जोड़े में और तुम सूट-बूट में होगे. हम दोनों दुनिया के सबसे खूबसूरत जोड़े होंगे, देखना हमारी शादी यादगार होगी..." 

कुछ पल की चुप्पी के बाद, ऊपर आसमान की तरफ देखते हुए उसने कहा, "देखना ये चाँद ये सितारे हमारे मिलन के गवाह होंगे.."

जब भी हम दोनों ऐसे खुले आकाश के नीचे बैठे होते थे, उसे हमेशा लगता था कि आसमान से सारे देवता और सारी परियां हमें देखती हैं. वो अक्सर कहती थी, जानते हो ऊपर आसमान में जितने भी देवता और परियां मौजूद हैं, वे सब खुद को खुशनसीब समझते होंगे कि वे दुनिया के सबसे खूबसूरत जोड़े के इस प्यार भरे पल में शरीक हैं.. देखो उधर उस तरफ, वहाँ पर सभी मौजूद हैं और हमें देख रहे हैं. उसने आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहा. 

उसे अपने इस लॉजिक पर पूर्ण विश्वास था. वो अक्सर कहती, मैं आसमान में चमकते इस चाँद में विश्वास करती हूँ, इन तारों पर विश्वास करती हूँ, आसमान से हमें हर पल कोई देख रहा है इस बात पर मैं विश्वास करती हूँ. मुझे ऐसा लगता है जैसे "वी आर पार्ट ऑफ़ समथिंग बिगर...", कुछ ऐसा जो ना तो तुम समझ सकते हो और नाही मैं. इस दुनिया में और सबसे ज्यादा ऊपर उस आसमान में कितना कुछ रहस्मयी है न? "

वो मेरे तरफ देखने लगी. मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और उसने मेरे कंधे पर अपना सर टिका दिया. आसमान की तरफ फिर से देखकर मुझसे कहने लगी "मेरे बहुत से अपने मुझे छोड़ कर जा चुके  हैं, तुम कहीं मत जाना कभी. मैंने हलके से उसके माथे को चूम लिया." 

बारिश की हलकी बूँद बरसने लगी थी. वो जैसे अचानक ही खुश हो गयी. "ये तो होना ही था, दो जुलाई का दिन हो और मौसम की पहली बरसात न हो..नामुमकिन. 

इस बार शायद उसकी इस बात पर मुझे भी यकीन था, कि शहर की पहली बारिश का दिन दो जुलाई है. मैंने पूछा उससे, हम लोग नीचे चले? वो लेकिन नीचे जाने के मूड में नहीं थी. 
"थोड़ा भीग लोगे तो गल नहीं जाओगे", ये कहते हुए उसने अपने सर को वापस मेरे कंधे पर टिका दिया और आँखें बंद कर ली.  

एक प्यारा सा रोमांटिक गाना डेक में बजने लगा -

है तेरी चूड़ियों का खनकना मेरा 
और तेरे गेसूओं का महकना मेरा 
मेरी आँखों को बस तेरा दीदार हो 
कुछ मुझे और पाने की परवाह नहीं 

तू सुबह का उजाला मेरे वास्ते 
तू मेरे वास्ते दिलनशीं शाम है 
तेरे दिल में ठिकाना रहे उम्र भर
फिर किसी आशियाने की परवाह नहीं 

ऐ मेरी ज़िन्दगी, तू मेरे साथ है 
अब मुझे इस ज़माने की परवाह नहीं..

वो मेरे कंधे पर सर टिकाये, बातें करते हुए सो गयी लेकिन मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी. उसके मासूम से चेहरे को निहारते हुए मैं पूरी रात जागा रहा. मैं भी उसके साथ साथ उसकी ऐसी बातों को मानने लगा था कि सच में आसमान से कोई हमें हर पल देख रहा है. बरबस ही मेरी आँखें ऊपर आसमान की तारफ उठ गयीं और मन ही मन बस यही दुआ करता रहा कि इस लड़की की हँसी, इसका विश्वास यूहीं बना रहे हमेशा और ये बेवकूफ, पागल और मासूम सी लड़की  हमेशा मेरे साथ रहे, मुझे यूहीं हमेशा सताती रहे.. 

सुबह चार बजे के आसपास उसकी आँख खुली.. वो मुझे देखकर मुस्कुराने लगी. उसने कहा "मैं चाहती हूँ कि मेरी हर सुबह ऐसी ही हो, मैं आँखें खोलूँ तो तुम्हें अपने सामने देखूँ". मैंने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में समेट कर "आमीन" कहा. वो फिर से आँखें बंद कर के सो गयी. 


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