Saturday, December 15, 2018

द रिकॉर्ड इज वन ट्वेंटी सेकंड - लव इन दिसम्बर - १५

सुनो, दिसम्बर की पहली तारीख है आज! याद है कुछ? याद है पहले जब हम साथ थे, हम दोनों मिल कर कैसे इस तारीख को सेलिब्रेट करते थे. देखो, ठीक वैसे ही आज पहली दिसम्बर सेलिब्रेट करने मैं सुबह सवेरे ही घर से निकल गया हूँ.

पता है, आज सड़कों पर खूब कोहरा भी था, और मुझे ये आश्चर्य वाली बात लगी. जानता हूँ, तुम कहोगी कि कोहरा सर्दियों में नहीं आएगा तो क्या जून की गर्मी में आएगा. लेकिन यहाँ कल तक कोहरे का नाम-ओ-निशाँ नहीं था और आज देखो सुबह से ही कैसा सड़कें कोहरे से ढँकी पड़ी हैं. दिसम्बर इफ़ेक्ट है ये...है न?

अच्छा एक बात बताना ज़रा, तुम्हें हमारे शहर की सर्दियाँ तो याद है न? याद है तुम्हें, पहले जब दिसंबर के किसी सुबह तुम्हें शहर में कोहरा नहीं दिखता था, तो तुम कैसे मेरी बैंड बजा दिया करती थी, जैसे कोहरा मेरे कहने पर आता था और मेरे कहने पर गायब हो जाता था. जानती हो, मैं तो हर रात सोने से पहले प्रार्थना करता था भगवान से, कि कुछ भी हो जाए, हर सुबह बस कोहरे के दर्शन करा दिया करो, वरना ये पागल लड़की मेरी बैंड बजाते रहेगी.

देखो, मैं अभी कनॉट प्लेस के उसी कैफ़े में आकर बैठा हूँ जहाँ हम दोनों ने जाने कितने कप कॉफी पी हैं. सच कहूँ तो मेरा यहाँ आने का आज कोई इरादा नहीं था, लेकिन जैसे ही मेट्रो के चार नंबर गेट से निकला तो इस कैफ़े पर नज़र गयी और कदम खुद ब खुद इधर की तरफ बढ़ते चले गए. अब मुझसे लड़ना मत तुम कि मैं अकेले इस कैफ़े में क्यों गया. करार कर रखा था न तुमने कि तुम्हारे बगैर मैं कभी इस कैफ़े में नहीं जाऊंगा. लेकिन यार, सच मानो, क़रार तोड़ने का मेरा ज़रा भी इरादा नहीं था. वो तो मजबूरी ये थी कि सुबह के इस वक़्त कोई और कैफ़े खुला भी तो नहीं रहता न.

इतवार का दिन है, सुबह के सात बज रहे हैं और कैफे पूरा खाली पड़ा है. वैसे भी इतवार को कोहरे वाली सुबह सिर्फ कॉफ़ी पीने इतनी दूर कोई क्यों आएगा भला? सब अपने घरों में कम्बल में पड़े होंगे, और मैं देखो बेवकूफों की तरह यहाँ चला आया.

तुम्हारी ही पसंदीदा जगह पर मैं बैठा हूँ. कैफे के दरवाज़े के बायीं तरफ के स्पॉट में, जहाँ बड़े शीशे वाली खिड़की है और यहाँ से कनॉट प्लेस का अच्छा ख़ासा नज़ारा दिखता है. यहाँ इन्हीं कुर्सियों पर हम सर्दियों की हर सुबह बैठा करते थे और कॉफ़ी पीते हुए अपने पुराने शहर की सर्दियों को और अहमद चचा के चाय को बड़ी शिद्दत से याद करते थे.

आज इस कैफ़े में मुझे कोई पहचान का चेहरा नहीं दिख रहा है. वैसे भी दो साल बाद यहाँ आ रहा हूँ मैं. शायद पुराने स्टाफ छोड़ कर चले गए, सिर्फ कैफे का दरबान वही है, लेकिन जब मैं आया तब उसने मुझे पहचाना भी नहीं.

वैसे भी यहाँ का पूरा स्टाफ तुम्हें पहचानता था और शायद जानने भी लगा था. मुझे तो कोई पहचानता भी नहीं था. तुम इस बात से शायद एग्री नहीं करोगी, लेकिन कई दफे इसके सबूत मिले हैं मुझे. याद है कैसे एक दफे जब वाईफाई का पासवर्ड पूछने तुमने मुझे काउंटर पर भेजा था? काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने मुझे पासवर्ड देने से मना कर दिया था, लेकिन फिर अगले ही पल तुम गई काउंटर पर और पासवर्ड लेकर आ भी गई थी. मैं आश्चर्यचकित था. दरबान भी हर बार तुम्हें सलाम ठोंकता, ‘वेलकम मैडम’, और मुझे तो बड़े आराम से वो इग्नोर कर देता था. मुझे हमेशा लगता रहा कि वो मुझे शायद तुम्हारा बॉडीगार्ड समझता होगा.

वैसे खैरियत है कि इस कैफ़े में कुछ भी नहीं बदला. टेबल कुर्सियां तक वही है जो पहले थीं. वरना इस कैफ़े से रिलेट करना थोड़ा मुश्किल हो जाता. यहाँ इस टेबल पर जहाँ अभी मैं बैठा तुम्हें खत लिख रहा हूँ और जहाँ हम दोनों अक्सर बैठते थे, यहाँ से कनॉट प्लेस का पार्किंग दिखता है. लेकिन जाने क्यों मुझे पहले जैसी हलचल यहाँ दिखाई नहीं दे रही है आज.

याद है पहले जब हम यहाँ आते थे तब यहाँ कॉलेज के लड़के लड़कियां टीम बना कर इसी पार्किंग में बैडमिंटन खेलते थे. कुछ लड़के तो यहाँ क्रिकेट भी खेलते थे. सुबह-सुबह यहाँ की पार्किंग पूरी खाली रहती थी और लोग इस खाली पार्किंग का भरपूर फायदा उठाते थे.


इस पार्किंग के एक तरफ कबूतर आए हुए थे. ठीक वैसे ही जैसे पहले आते थे. मुझे लगता है कि दिल्ली में सब कुछ बदल भी जाए लेकिन कबूतरों का कनॉट प्लेस में आना नहीं बदलेगा कभी. तुम्हें यहाँ सुबह कबूतरों को दाना खिलाना पसंद था न? मुझे याद है, कैफ़े में आने से पहले हर रोज़ तुम दस रुपये का दाना खरीदती और कबूतरों को खिलाती.

वैसे तो आधे से ज्यादा लोगों को कबूतरों को दाने खिलाने का शौक/बीमारी डी.डी.एल.जे से लगा था, लेकिन तुम्हारी इस आदत की वजह ये फिल्म नहीं, बल्कि एक कहानी थी.

एक दफे मैंने तुम्हें एक कहानी सुनाई थी. एक लड़का और लड़की की कहानी. दोनों हर सुबह कनॉट प्लेस आते थे और कबूतरों को दाना खिलाते थे. शुरू में वे दोनों एक दूसरे से अनजान थे और बस इत्तेफाकन हर दिन एक ही समय पर पहुँच जाते थे. धीरे धीरे लड़का और लड़की में बातें शुरू हुई और धीरे धीरे दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया था. जाने क्यों ये दो लाइन की कहानी एक दिन तुम्हें मैंने तफसील से एक घंटे में सुनाई थी.

अक्सर तुम कहानियों से बोर हो जाया करती थी लेकिन उस दिन पता नहीं कैसे तुम्हें ये कहानी बड़ी पसंद आई थी. हाउ रोमांटिक! तुम्हें कहा था, और तय किया था कि तुम भी अब से कबूतरों को दाना खिलाओगी.

ये सब छोटी छोटी बातें शायद मुझे याद नहीं रहती, लेकिन इसके लिए भी तुम्हें ही शुक्रिया कहना चाहूँगा मैं, कि तुमने मुझे जो डायरी दी थी उसमें ये सब बातें भी तुम दर्ज करते जाती थी. तुम अक्सर कहती थी, कभी तुम भूल भी जाओ मुझे तो ये डायरी तुम्हें मेरी याद दिलाएगी.

तुम्हारी वो डायरी भी लेकिन कमाल की थी. दिसम्बर की पहली तारीख ही थी जब तुमने मुझे ये कस्टमाइज्ड डायरी गिफ्ट की थी. इसे आज भी मैं हर समय अपने साथ रखता हूँ.

देखो, अभी भी टेबल पर ये डायरी मेरे सामने रखी हुई है. बड़े खूबसूरती से तुमने इसपर सुनहरे रंग से एन्ग्रेव करवाया था - टेंडर दिसम्बर. तुमने दिसम्बर को यही नाम दिया था न. और इसके नीचे लिखा था तुमने...स्टोरीज ऑफ़ यू, मी एंड दिसंबर...और इसके बिलकुल साथ में तुमनें मार्कर पेन से लिख दिया था, “ये हमारे दिन हैं...”

तुम्हारे हाथों से लिखे हुए ये चार शब्द कितने खूबसूरत लग रहे हैं अभी. कैफ़े के शीशे से हलकी धूप आना शुरू हुई है और इन्ही शब्दों पर उसकी चमकीली-सुनहरी किरणें गिर रही है, और ये सारे शब्द उनकी जगमगाहट में ठीक वैसे ही चमक रहे हैं, जैसे तुम्हारा चेहरा चमकता था सर्दियों की धूप में, जब तुम यहाँ मेरे सामने बैठे कॉफ़ी पी रही होती थी...उसी कुर्सी पर जो अब खाली है.

वो एक मोमेंट मुझे हमेशा बड़ा प्यारा लगता था, जब तुम यहाँ बैठे हुए कॉफ़ी पीती थी और खिड़की से झाँकते सूरज की किरणें तुम्हारे चेहरे को छूती थी. तुम्हारा गोरा चेहरा और खिल सा जाता था, और मुझे उस पल ये यकीन होता कि तुमसे ज्यादा प्यारा, खूबसूरत और खिला हुआ चेहरा मैंने पहले कभी नहीं देखा है.

तुम्हारे चेहरे की तरफ मैं कभी ज्यादा देर एक टक से देख नही पाता था. वजह मुझे तो आज तक समझ नहीं आई, लेकिन भगवान जानें तुम्हें क्या समझ आ गया था जो तुम अक्सर इस बात पर मेरा मजाक भी उड़ा दिया करती थी.

देखो तो, इसी बात पर मुझे एक और किस्सा अभी याद आ रहा है. याद है उस सुबह हम दोनों यहाँ बैठे थे, और बातें कर रहे थे. तुम बार बार मुझे अपनी तरफ देखने के लिए कह रही थी लेकिन मेरी नज़रें तुम्हारे चेहरे पर ज्यादा देर टिक नहीं रही थी और मैं खिड़की की ओर देखने लगता था.

तुम मेरी इस बात से इरिटेट हो गयी थी और तुमने पूछ दिया था मुझसे, “कोई भूत छिप कर बैठा है क्या मेरी आँखों में?”

मैं तो एकदम हड़बड़ा सा गया था. “नहीं तो...”, लगभग लड़खड़ाते हुए मैंने कहा.

“तो फिर अपनी नज़रें तुम हमेशा दूसरी तरफ क्यों मोड़ लेते हो”, तुमने मुहँ बिचकाते हुए मुझसे सवाल किया था और फिर कॉफ़ी का सिप लेते हुए तुमने कहा, “वैसे आज पूरे एक सौ बीस सेकण्ड तक तुमने मेरी आँखों में देखा है...इट्स अ रिकॉर्ड यू नो...”

मैं हँसने लगा था तुम्हारी इस बात पर, "तुम क्या सेकेंड्स गिन रही थी?"

तुमने लेकिन फिर से रूठते हुए कहा था, "कम ऑन, यू कैन डू बेटर देन दिस..."

सच बताऊँ तो मैं थोड़ा ब्लश करने लगा था. कॉफ़ी का सिप लेते हुए और अपने ब्लश को छिपाते हुए मैंने फिर तुमसे कहा, "देखना, जिस दिन हमारी शादी होगी, ये जो आज का रिकॉर्ड है न, वो कुछ इस तरह टूटेगा कि उस वक़्त तुम शर्म से आँखें अपनी मोड़ लोगी और कहोगी मुझसे, अब बस भी करो मुझे यूँ देखना..."

मुझे लगा था तुम इस बात खुश हो जाओगी या जैसे दूसरी लड़कियां करती हैं, तुम शरमा जाओगी...लेकिन बस एक ठंडी उबासी लेकर तुमने कहा था...”विल सी...”

एक रूखी सी मुस्कराहट तुम्हारे आँखों से झाँकने लगी थी और मुझे अचानक गिल्ट सा होने लगा कि बेवजह मैंने शादी वाली बात तुमसे कर दी. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. मैं उस दिन तुमसे कुछ और भी कहना चाहता था, पर पता नहीं क्यों चुप रह गया.

जानती हो, अभी भी वही पन्ना मेरे सामने खुला है, जिसपर तुमने एक स्केच पेन से लिख दिया था-एंड द रिकॉर्ड इज वन ट्वेंटी सेकंड. और मजेदार बात देखो, कि वो रिकॉर्ड सच में उस दिन के बाद कभी टूट नहीं पाया.

इस पन्ने के नीचे तुमने कर्सिव राइटिंग में लिख दिया था, दिसम्बर जो प्यार का महीना है.. और नीचे मीना कुमारी की एक कविता जो तुम्हारी पसंदीदा थी..

यादें अचानक
मुकम्मल दर्द बन कर
हस्ती पर यूँ छा जाती हैं
जैसे
शदीद सर्द मौसम में
अचानक किसी पर
बर्फ़ीला पानी फेंका जाए...


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Edit and Inspiration - Priyanka Gupta 
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Saturday, March 10, 2018

गुनगुनाने दो..धड़कनों को...

वे उन दोनों की शुरुआती मुलाकातों वाले दिन थे. लड़की खामोश सी रहती थी, वैसे तो वो बातें खूब करती थी, लेकिन लड़के के सामने हमेशा चुप सी रहती थी. लड़का बेहद बातूनी था. फिल्मों और किताबों का दीवाना था लड़का. लड़की को लेकिन किताबों और फिल्मों में कोई खास दिलचस्पी नही थी. उसे तो कुकिंग का शौक था. एक से बढ़कर एक पकवान बनाया करती थी वो. स्वीट डिस बनाने में लड़की ने महारथ हासिल की हुई थी. वो बढ़िया से बढ़िया स्वीट डिश लड़के के लिए बना कर लाती थी. लड़का उसके हाथों के बने स्वीट डिशज़ का दीवाना था, लेकिन लड़के को हमेशा लगता कि लड़की की बनाई स्वीट डिश से भी ज्यादा मिठास खुद उस लड़की में है. लड़का जब भी ये बात लड़की से कहता, वो हमेशा ब्लश करने लगती और टॉपिक बदल कर कोइ दूसरी बात करने की कोशिश करने लगती.

ऐसा नही था कि लड़का सिर्फ किताबी या फिल्मी कीड़ा था, लड़की की तरह वो भी कुकिंग का शौक रखता था, लेकिन बात अगर स्वीट डिश की हो तो सिवाए गुलाब जामुन और गाजर हलवा के वो कुछ भी बनाना नही जानता था. वहीं लड़की ऐसी ऐसी डिश बना देती थी जिसका लड़के ने नाम तक नही सुना था. लड़की हमेशा लड़के से नए और यूनिक स्वीट डिश का जिक्र करती. लड़का हैरान सा होकर बस लड़की को देखते रहता, सोचते रहता कि इस लड़की को इतना सब कहाँ से पता है?

लड़का अक्सर लड़की से कहता, कि तुम्हारे आने से मेरी ज़िंदगी मे बहार तो आयी है, लेकिन साथ ही साथ मिठास भी भरपूर आई है. तुम इतनी मीठी जो हो. अपने स्वीट डिश से भी ज्यादा मीठी.

लड़का फिर एक सवाल पूछता लड़की से, बताओ ज़रा, इतनी स्वीटनेस कहाँ से लायी तुम? किसी चाशनी वाले कुँए में कूद गयी थी क्या?

लड़के की इस सवाल से लड़की शरमा सी जाती. उसके गाल एकदम सुर्ख लाल हो जाते थे. लड़की को अपने लाल हुए गाल पसंद नहीं थे. वो अक्सर कहती लड़के से अपने लाल गालों की शिकायत करती. वो कहती, “जानते हो, रंगों का पर्व होली मैं इसलिए नहीं खेलना चाहती कि रंग और गुलाल के चक्कर में मेरे गाल और लाल हो जाते हैं.”

लड़की की इस बात पर लड़का कहता, तुम्हारे यही सुर्ख लाल गाल तो तुम्हारी ख़ूबसूरती को बढ़ा देते हैं, सिर्फ इन्हीं की वजह से तुम बाकी लड़कियों से अलग हो.

इस बात पर लड़की की आँखें थोड़ी झुक सी जाती. वो समझ नहीं पाती कि लड़के की ऐसी तारीफों का क्या जवाब दे वो . हमेशा एक “थैंक यू” कह कर चुप हो जाती.

लड़का उसे “मैंने प्यार किया” फिल्म के डाइअलॉग को थोड़ा मॉडिफाई कर के उसे छेड़ता - “प्यार में मैडम, नो सॉरी और नो थैंक यू...”

लड़की इस डाइअलॉग पर खिलखिला उठती.

वे दोनों हर शाम मिलते थे, देर तक बैठ कर वो खूब बातें करते थे. आदत से मजबूर, लड़का अक्सर फिल्मों या किताबों का जिक्र छेड़ देता. लड़की इस बात पर लड़के को टोकती नहीं, कि वो हमेशा फिल्मों की बात क्यों करने लगता है, बल्कि वो लड़के की बातों में दिलचस्पी लेने लगती. कभी कभी लड़का गानों का जिक्र छेड़ देता. लड़का गानों का जिक्र जानबूझ कर छेड़ता. वो जानता था कि गानों के जिक्र से लड़की गुनगुनायेगी, और लड़के को लड़की का यूँ गुनगुनाना बहुत पसंद था. लड़के और लड़की का ये गाना-गुनगुनाना कुछ कुछ अन्ताक्षरी जैसा ही होता, बस इसमें कोई नियम और हार-जीत नहीं थे.

एक ऐसी ही खूबसूरत शाम थी. दोनों एक दुसरे का हाथ थामे शहर के सनसेट पॉइंट पर खड़े थे. खूब ठंडी हवा चल रही थी और मौसम बेहद रोमांटिक था. लड़के के मन में कुछ शरारत सूझी और उसनें लड़की को झटके से अपने बेहद करीब खींच लिया, और एक गाने के बोल गुनगुनाने लगा -

ये रतजगे, लम्बी रातों के दिल ना लागे क्या करूं?
ये सिलसिले, दिल की बातों के जादू चले क्या करूं

बिखरा ज़ुल्फ़ें सो जाऊं, दिल चाहे कहीं खो जाऊं
मदहोश दिल की धड़कन ...चुप सी ये तन्हाई

लड़के के इस ‘मूव’ से लड़की एकदम चौंक सी गयी, लेकिन हैरत की जगह, एक मुस्कान उसके चेहरे पर सिमट आई थी. लड़के के गाने के जवाब में, उसका हाथ थामे वो भी गुनगुनाने लगी –

ख्वाब आँखों में अब नहीं आते / अब तो पलकों में तुम समाये हो
हर घड़ी साथ-साथ रहते हो / दिल की दुनिया में घर बसाये हो
दिल की दुनिया में घर बसाये हो...
तेरी हर बात पे हम ऐतबार करते हैं
ऐ सनम हम तो सिर्फ तुमसे प्यार करते हैं..

लड़की के इस संगीतमय जवाब से लड़के का चेहरा खिल उठा. अब उसकी बारी थी. ऐसे सिचुएशन में लड़के को लड़की के लिए गाने सेलेक्ट करने में कभी सोचना नहीं पड़ता था. ख़ास लड़की के लिए डेडिकेटेड गानों की तो लड़के के पास ना खत्म होने वाली लिस्ट थी. लड़के ने इस बार लड़की का हाथ अपने हाथों में लेकर गुनगुनाना शुरू किया -

मिले होंगे राधा कृष्ण, यहीं किसी वन में,
प्रेम माधुरी उनकी बसी है पवन में
और भी पास आ गए हम इस दिव्य वातावरण में...
एक मन दिया है, कितने सौगातें अभी हैं बाकी,
बौछार एक पड़ी है, बरसातें अभी हैं बाकी...

इस बार लड़की भी शायद अगला गाना लेकर पहले से तैयार थी. हवा में उड़ते अपनी जुल्फों को लड़की ने दोनों हाथों से समेटा, ढलते सूरज की तरफ देखते हुए गुनगुनाने लगी -

शमा को पिघलने का अरमान क्यूँ है
पतंगे को जलने का अरमान क्यूँ है
इसी शौक का इम्तिहान जिंदगी है...
मोहब्बत जिसे बक्श दे जिंदगानी
नहीं मौत पर ख़त्म उसकी कहानी

कैसे जिया जाए..इश्क़ बिन
नहीं कोई इंसान मोहब्बत से खाली
हर एक रूह प्यासी हर एक दिल सावनी

मोहब्बत जहाँ है वहाँ जिंदगी है..
मोहब्बत ना हो तो कहाँ जिंदगी है...
तोसे नैना लागे मिली रौशनी...

लड़की ने लड़के की आँखों में ऐसे देखा, जैसे उससे कुछ पूछ रही हो. जैसे इस गाने का मतलब लड़के के आँखों में वो तलाश रही हो. लड़का, जिसके पास हमेशा लड़की के सवाल का जवाब मौजूद रहता था, इस बार वो भी खामोश था.

लड़की ने कुछ ऐसे लहजे में ये गाना गया था कि लड़का थोड़ा ‘स्पीचलेस’ जैसा हो गया था. कुछ देर तक दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा. बस सामने खुले आकाश को देखते रहे.

कुछ सोच कर लड़का अचानक मुस्कुराया, और फिर उसनें लड़की को अपने और पास खींचा. इस बार अपने बिलकुल करीब.. ऐसे कि लड़की उसके बाहोँ में आ गिरी. लड़की का चेहरा लड़के के चेहरे के एकदम पास आ गया. लड़के ने लड़की के काँपते होटों को देखा, और फिर उसकी आँखों में आखेँ डाल गुनगुनाने लगा –

Would you tremble if I touched your lips?
Or would you laugh? Oh, please tell me this
Now would you die for the one you love?
Oh hold me in your arms tonight

I can be your hero baby
I can kiss away the pain
I will stand by you forever
You can take my breath away

इस बार लड़के ने सिर्फ चंद लाइन नहीं, बल्कि इस पूरे गाने को गुनगुनाया था. लड़की जो स्वीट डिश के साथ साथ शरमाने में भी महारथ हासिल किये थी, इस बार उसकी पलकें ऐसे झुकी कि उठने का नाम नहीं ली रही थी. उसके होठ अब भी काँप रहे थे, लड़के ने अपने दोनों हाथों से उसके चेहरे को ऊपर उठाया, और फिर बहुत धीमे से उसके माथे को चूम लिया.


शाम ढल चुकी थी, और लड़की को वापस घर जाना था. लेकिन ना लड़की को, ना ही लड़के को वापस जाने की कोई जल्दी थी. लड़की ने अपना सर लड़के के कंधे पर टिका दिया, और अपनी उँगलियों में सगाई की अंगूठी को देख देख बहुत हलके आवाज़ में गुनगुनाने लगी -

एक दिन आप यूँ हमको मिल जाएंगे
फूल ही फूल राहों में खिल जाएंगे
मैंने सोचा न था...

एक दिन ज़िंदगी इतनी होगी हसीं
झूमेगा आसमां, गाएगी ये ज़मीं
मैंने सोचा न था ..

दिल की डाली पे कलियाँ सी खिलने लगी
जब निगाहें निगाहों से मिलने लगी
एक दिन इस तरह होश खो जाएंगे
पास आए तो मदहोश हो जाएंगे
मैंने सोचा न था ....
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Saturday, March 3, 2018

मोहब्बतें वाली एक सुबह

दिसंबर का महीना था, और शहर से कोहरा और ठंड एकदम गायब थे. ऐसा लगता था जैसे वसंत का मौसम दिसंबर के महीने में शिफ्ट हो गया हो. तुम्हें बड़ा गुस्सा आ रहा इस बात से कि ठंड शहर से ऐसे दुम दबाकर भागी है कि वापस लौटने का नाम ही नहीं ले रही है. इसी गुस्से में तुमने अपने उस भारी बैग को घुमा कर मेरे कंधे पर दे मारा था. मौसम का सारा गुस्सा तुमने मेरे ‘बेचारे कन्धों’ पर निकाल लिया था. 

तुम्हारे गुस्से के सामने मेरी क्या, ठंड की भी नहीं चलती थी. वो भी शायद तुम्हारे गुस्से से घबरा कर अगले सुबह ही शहर में वापस दाखिल हो गई थी. तुम्हारा मूड अच्छा करने के उद्देश्य से मैंने सुबह के कोहरे में घूमने का प्लान बना लिया था. सुबह सवेरे ही हम दोनों बड़े स्टाइल में बाइक पर सवार होकर शहर घूमने निकले थे. पहला स्टॉप था अहमद चचा की चाय दुकान, जहाँ हमने सुबह चाय के साथ ब्रेड-बटर का नाश्ता किया था. तुम वहाँ खुद को चाय दुकान की मालकिन समझने लगी थी, और मुझे चाय दुकान में काम करने वाला मामूली सा छोटू. मुझसे उस छोटे से चाय दुकान की बेंचें इधर से उधर करवाने लगी थी तुम. एक पल तो मैं इस बात से भी डर गया कि कहीं तुम मुझसे वहाँ कप-प्लेट साफ़ करवाने न लग जाओ. लेकिन शुक्र था कि उस दिन तुमने ऐसी कोई हरकत नहीं की.

जब हम अहमद चचा की चाय दुकान से आगे बढे, कोहरा तब तक हल्का छंट चुका था, और तुम्हारा दिमाग भी थोड़ा ठंडा हो चुका था. तुम प्यारी प्यारी बातें करने लगी थी. लेकिन हवा अब भी जमा देने वाली चल रही थी. दस्ताने मैं घर पर भूल आया था, और ठण्ड से ऐसा लग रहा था जैसे कलाई हाथ से कट कर गिर जायेगी. लेकिन मेरे इस हालत से बेखबर तुम बड़े आराम से अपने दस्ताने पहन कर मेरे पीछे बैठी थी.

मुझसे एकदम सटकर बाइक पर बैठी थी तुम. अपने दोनों हाथों को मेरे पीछे से घुमा कर मेरे जैकेट के जेब में तुमने डाल दिया था. अपने चेहरे को मेरे कंधे पर ला रखा था तुमने. सोचता हूँ तो लगता है कि कैसा खूबसूरत और रोमांटिक सा मोमेंट बन गया था वो, लेकिन यार उस वक़्त मुझे वो पल रोमांटिक या खूबसूरत मोमेंट तो बिल्कुल नहीं लग रहा था. उस वक़्त तो मेरा पूरा ध्यान मेरे हाथों पर था, जो मुझे लग रहा था कि किसी भी समय कट कर गिर सकता है.

बाइक पार्क करने के समय मेरी कलाइयों की हालत ऐसी हो गयी थी, कि वो मुड़ ही नहीं रही थीं. जैसे-तैसे मैंने बाइक पार्क की. तुम्हें लेकिन मेरी ऐसी हालत पर ज़रा भी दया नहीं आ रही थी. बड़े प्यार से तुमने मेरे हाथों को अपने हाथ में लिया जरूर था. मुझे लगा शायद तुम्हें इस बात का अफ़सोस हो रहा है कि तुम्हारे पास दस्ताने थे और तुमने अपने दस्ताने मुझे नहीं दिए थे. लेकिन तुमने कुछ दूसरी बात ही पूछ ली थी मुझसे, और वो भी कितने इन्सेन्सटिव तरीके से. याद है तुम्हें क्या पूछा था तुमने मुझसे?

"यार तुम्हारे हाथ बर्फ से कैसे हो गए...? कुछ देर पहले तो ठीक-ठाक थे..."

तुम्हारे इस इन्सेन्सटिव सवाल को ‘पूछने’ में तुम्हारी गहरी बदमाशी छिपी हुई थी. मैंने भी मौके पर चौका मारते हुए तुम पर कमेन्ट मारा, "अरे, तुम्हें नहीं पता? मेरे हाथ अभी आधे घंटे के अंटार्टिका के शोर्ट टूर पर गए थे न, इसलिए ठंडे हैं.. "

अमूमन मेरे ऐसे तानों को तुम अनसुना कर देती थी या समझ नहीं पाती थी, लेकिन उस दिन तुम्हें पता चल गया था कि मैंने तुम पर एक ज़ोरदार कमेन्ट मारा है. तुमने भी एक ज़ोरदार धौल जमा दी थी मेरी पीठ पर, “सार्कैस्टिक होने की जरूरत नहीं, मैंने कहा था तुमसे क्या कि दस्ताने घर पर भूल आओ?”
मैंने तुमसे उस वक़्त कहा तो कुछ भी नहीं था, बस मन ही मन बुदबुदाने लगा था. “इतना तो हो न सका लड़की से कि खुद के दस्ताने मुझे दे दे पहनने के लिए और अब रौब दिखा रही है..” जानती हो उस वक़्त, ‘खुद को क्या समझती है/ कितना अकड़ती है’ वाला गाना भी मन के प्लेलिस्ट पर एकदम फुल वॉल्यूम में बजने लगा था.

उस सुबह तुम्हें कहाँ जाना था, कहाँ घूमने का प्लान बनाया था तुमने इस बात से मैं एकदम बेखबर था. तुम्हारे किसी प्लान में मैं कुछ भी अंदाज़ा लगाना नहीं चाहता था क्यूंकि हर बार मेरा अंदाज़ा गलत हो जाता था. अपने प्लान को लेकर तुम अव्वल नंबर की अन्प्रिडिक्टबल लड़की थी.

तुम पूरे स्टाइल में, दोनों हाथों को अपने जैकेट में डाल कर मस्ती से चल रही थी, और तुम्हारे ठीक पीछे मैं तुम्हारा बैग थामे चल रहा था.

पूरे गाँधी मैदान का हमने लगभग एक चक्कर लगा लिया था और एक्सबिशन रोड की तरफ पैदल चलते हुए आ गए थे. लेकिन आगे कहाँ जाना है, ये तुमने अब तक तय नहीं किया था. उस इलाके में वैसे तो कुछ रेस्टोरेन्ट और कैफ़े भी थे, लेकिन सुबह के वक़्त सभी बंद रहते थे. बारह बजे के पहले कोई भी रेस्टोरेन्ट खुलता नहीं था.

प्रकाश बिल्डिंग के पास आकर तुम रुक गयी थी. पहले तो मुझे लगा था कि तुम फिल्म देखना चाहती हो. प्रकाश बिल्डिंग के ठीक बगल में अप्सरा सिनेमा हॉल था. मुझे लगा था कि तुम वहाँ जाना चाहती हो. हालाँकि मैं जानता था कि उस सिनेमा हॉल में तुम्हें फिल्म देखना एकदम पसंद नहीं था.

तुमने लेकिन फिल्म देखने की बात को ख़ारिज कर दिया था. तुम्हारे मन में तो कुछ और ही बात मेरी-गो-राउंड खेल रहे थे.

"यार प्रकाश बिल्डिंग की छत पर चलोगे? " तुमने मुझसे पूछा था.

तुम्हारे इस सवाल पर मैं चौंक गया था. प्रकाश बिल्डिंग में पहले हम दोनों कोचिंग क्लास के लिए आते थे, और उन दिनों यहाँ का छत ही हमारा हैंगआउट पॉइंट हुआ करता था, जहाँ हम पूरी पूरी शाम बिता देते थे. इस बिल्डिंग में करीब आठ-दस कोचिंग क्लास चलते थे और लभग हर बच्चे शाम के वक़्त इस बिल्डिंग के छत पर बैठकर बातें या डिस्कशन करते थे. लेकिन कोचिंग खत्म होने के बाद कभी हम इस बिल्डिंग में आये ही नहीं थे.

मैंने थोड़ा शक भी जताया कि पता नहीं, छत खुली होगी भी या नही..छत की कंडीशन कैसी होगी?

तुमने लेकिन ठान लिया था कि छत पर जाना ही है, "चलो न, चल कर देख आते हैं..छत बंद होगी तो लौट आयेंगे" तुमने कहा और बिना मेरी प्रतीक्षा किये, बिल्डिंग की सीढियां चढ़ने लगी थी.

मैं भी तुम्हारे पीछे पीछे छत पर आ गया. छत खुली हुई थी, लेकिन छत की हालत बड़ी ख़राब थी. पहले ये छत कितना साफ़ हुआ करती थी, हम छत के फर्श पर ही कितनी बार बैठ कर गप्पें करते थे. लेकिन उस दिन की छत की हालत देख मुझे बड़ी दया आ गयी थी. याद है तुम्हें? गंदगी, धूल और बेकार सामानों से भरी हुई थी वो छत.

बहुत देर तक हम यूँ ही एक दूसरे का हाथ थामे वहाँ टहलते रहे थे. हवा काफी सर्द चल रही थी, लेकिन वो हमें परेशान नहीं कर रही थी. बल्कि हम दोनों एन्जॉय कर रहे थे हलके कोहरे और ठंड में टहलना.

मैंने एक बात हमेशा नोटिस की थी, कि इस छत पर आने के बाद तुम्हारे अन्दर कुछ तो बदल सा जाता था. ना तुम गुस्सा दिखाती, ना ही कोई हुक्म जारी करती, बस एकदम चुपचाप सी, अपने में ही खोयी रहती थी तुम. ऐसे में मुझे बड़ा प्यार आ जाता था तुम पर. उस छत में जरूर कुछ मैजिकल पॉवर रहे होंगे कि तुम एकदम बदल सी जाया करती थी. सिर्फ वही छत नहीं, हमारे बहुत से ऐसे स्पेशल अड्डे थे, जहाँ जाते ही तुम ट्रांसफॉर्म हो जाया करती थी. किन्ही ख्यालों में खो जाती थी तुम.

सीढ़ी के पास के कोने पर कुछ बेंच डेस्क और लकड़ी की टूटी कुर्सियां लगी थी और उनके ऊपर बहुत से सामान, टिन के खाली डब्बे, पेंट के खाली डब्बे, अल्युमुनियम के चद्दर, कुछ हार्ड प्लास्टिक के शीट्स वगैरह रखे हुए थे. छत का एकमात्र कोना था ये जो साफ़ सुथरा सा लग रहा था.

तुमने बेंच पर बैठने की अपनी इच्छा जाहिर की थी. बेंचों के ऊपर काफी सामान रखे थे और इन्हें देख ऐसा लग रहा था जैसे ये कुछ दिन पहले ही छत पर रखे गए होंगे, क्यूंकि इनपर धूल ज़रा भी नहीं जमी हुई थी.

तुमने एक बेंच खींचना चाहा तो उसके ऊपर रखे डब्बे एक साथ गिर पड़े. मैंने तुमसे कहा, कि तुम रहने दो मैं बेंच को बाहर निकाल लाता हूँ, लेकिन तुम्हारे अन्दर तो सब्र कभी रहा ही नहीं. खुद ही सभी डब्बों को इधर उधर करने लगी थी तुम. अल्युमुनियम के एक बड़े शीट को तुम उठा कर दूसरी तरफ रखना चाह रही थी. इतना बड़ा शीट, और इतनी छोटी तुम... संभल तो रहा नहीं था वो शीट तुमसे, और फिर भी लगी पड़ी थी तुम उसे वहाँ से हटाने में. इसी चक्कर में और तुमने उसे ऐसे घुमाया कि वो शीट सीधा मेरे बाँहों पर जाकर लगा था.

बड़ा तेज़ लगा था वो शीट बाँहों पर. दर्द भी हुआ था. वैसे तो जैकेट पहना हुआ था मैंने, लेकिन मुझे आभास हो गया था कि उसके नुकीले भाग से बाँहों पर खरोंच लग गयी है. मैंने लेकिन इस दर्द के तरफ ध्यान ही नहीं दिया, ना जाहिर किया इस दर्द को. मैं नहीं चाहता था कि उस सुबह तुम बेवजह किसी गिल्ट में आ जाओ.

डेस्क और बेंच पर बैठते ही तुमने अपना खज़ाना यानी अपना लैपटॉप-बैग खोला. डेस्क पर अपना लैपटॉप निकाल कर रख दिया था तुमने. कुछ चॉकलेट्स थे तुम्हारे बैग में पड़े हुए, वो भी निकाल कर तुमने डेस्क पर रख दिया. छत पर आते वक़्त हमने कुछ कचौड़ियाँ पैक करवा ली थी, उन्हें भी तुमने डेस्क पर रख दिया था.

मुझे यकीन तो था कि तुम इतनी तैयारी कर रही हो, जरूर कुछ अजीब आइडिया ही तुम्हारे मन में चल रहा होगा. लेकिन एक्ज़ैक्ट्ली क्या तुमने प्लानिग की है, ये मैं समझ नहीं पा रहा था.

अपने बैग से तुमने एक डीवीडी निकाला, और मुझसे पूछा, “मोहब्बतें देखें?” हालाँकि तुम ये बात मुझसे पूछ नहीं रही थी, मुझे बस इन्फॉर्म कर रही थी कि तुम मोहब्बतें देखोगी. मेरे मन में दस तरह के सवाल उठने लगे.. फिल्म? इस समय? छत पर इस तरह इस ठंड में? लेकिन तुमने मेरे इन सवालों की परवाह नहीं की और लैपटॉप में फिल्म की डीवीडी इन्सर्ट कर प्ले कर दिया.

हाँ, तुमने मुझे इतनी तसल्ली जरूर दी थी, “डोंट वरी, तुम्हें तीन घंटे नहीं बैठाऊंगी इधर.. एक-डेढ़ घंटे का ही बैकअप है लैपटॉप का, बस सिलेक्टेड सीन्स देखेंगे हम..”

दिसंबर की सुबह हलके कोहरे में छत पर यूँ फिल्म देखना पागलपन वाली बात थी. लेकिन इस फिल्म का गज़ब का क्रेज था तुम्हें. फिल्म मुझे भी पसंद आई थी, लेकिन इस फिल्म को लेकर तुम्हारा क्रेजिनेस एक अलग ही लेवल पर था. फिल्म को रिलीज़ हुए चार साल हो गए थे, तब हम इंटर के दूसरे वर्ष में थे और अब कॉलेज के तीसरे साल में, लेकिन अब तक ये फिल्म तुम्हारे दिल के बेहद करीब थी.

याद है तुम्हें, तुम मुझसे कैसे हमेशा कहती थी कि “जाओ, वो शहर ढूँढ आओ जहाँ इस फिल्म की शूटिंग हुई थी, उस कैफ़े का पता लगाओ जो उस फिल्म में दिखाया गया है. मुझे वो शहर घूमना है..” तुम्हें कितनी बार मैंने समझाया था, और कई दफे डांटा भी था ये कहते हुए कि वो कोई शहर नहीं है. फिल्म का सेट था वो. लेकिन तुम मेरी ये बात समझने के लिए कभी तैयार ही नहीं थी. तुम तो उलटे मुझे डांट कर चुप करवा दिया करती थी, “बात तो ऐसे कर रहे हो जैसे पूरा इंडिया घूम लिए हो, मैं जानती हूँ ऐसे शहर के बारे में.. मैंने पढ़ा है, बस नाम याद नहीं रहता मुझे...”

मुझे तुम्हारी इस बात पर हँसी आ जाया करती थी, मैंने तो तुम्हें कितनी बार ये कह कर छेड़ा भी था कि वो शहर सिर्फ तुम्हारे सपनों में इग्ज़िस्ट करता है, असल में नहीं. तुम बड़ी भयंकर इरिटेट होती थी मेरी इस बात से.

उस सुबह भी जब फिल्म के शुरूआती सीन में वो कैफे दिखा मुझे, दिल किया कि तुम्हें फिर से छेड़ूँ, लेकिन तुम एकदम डूबी हुई थी फिल्म में. तुमने कहा तो था कि सिलेक्टेड सीन्स देखोगी, लेकिन ‘राज आर्यन जब लड़कों से पहली बार मिलता है’, हर बार की तरह वहीं से तुमने फिल्म देखना शुरू किया था और वहाँ से तुम वो फिल्म लगातार देख रही थी, बिना फॉरवर्ड किये. डेस्क पर चॉकलेट और कचौड़ियाँ रखी हुई थी, लेकिन फिल्म का कुछ ऐसा असर था तुम पर, कि तुमने इनकी तरफ देखा ही नहीं.

इंटरवल से ठीक पहले वाले सीन में जब गुस्से में राज आर्यन प्रिंसिपल नारायण शंकर के ऑफिस में डायलॉगबाजी कर बाहर निकल आता है, और मेघा उसका हाथ थामे चलने लगती है, और बैकग्राउंड में “जिंदा रहती है मोहब्बतें..” गाना बजने लगता है.. ठीक उसी वक़्त लैपटॉप की बैटरी ने दम तोड़ दिया था. मूवी वहीं रुक गयी और लैपटॉप का स्क्रीन ब्लैंक हो गया था.

तुम कुछ देर तक लैपटॉप के ब्लैंक स्क्रीन की तरफ ही ताकती रही थी और फिर मेरी तरफ देखते हुए तुमने कहा था, “यार कितने दर्द के साथ राज कहता है न कि आपके वजह से मेरी मोहब्बत अधूरी रह गयी”

तुम्हारी इस बात पर मैंने हाँ में सर हिला दिया था. 

जब तुम किसी फिल्म में इस तरह डूब जाती थी, तो मैं कभी तुम्हारे इन बातों का मजाक नहीं उड़ाता था, हालाँकि तुम्हारे कुछ दोस्त और तुम्हारी बहनें जरूर तुम्हें चिढ़ाती थी ये कह कर कि तुम अव्वल नंबर की फ़िल्मी इमोशन गर्ल हो. लेकिन मुझे कभी भी तुम्हारी ये बातें बचकानी या फ़िल्मी नहीं लगती थी, बल्कि मुझे तो अक्सर हैरानी होती थी, कि तुम वो बातें इतनी आसानी से कैसे सोच लेती हो जिनकी तरफ आमतौर पर लोगों का ध्यान जाता ही नहीं कभी.

याद है तुम्हें, पहली बार जब हम ये फिल्म देख रहे थे अशोक सिनेमा हॉल में, तुमने कितना मजाक उड़ाया था इस फिल्म का? तुम्हें ये फिल्म पहली बार देखने में एकदम पसंद नहीं आई थी. तुमने तो यहाँ तक कह दिया था, कि पता नहीं ऐसी बकवास फ़िल्में बनती क्यों हैं? हीरो एक भूतनी से प्यार करता है. वो भूतनी बिना बताये कहीं भी हीरो के आसपास नाचने लगती है, और हीरो को डर भी नहीं लगता इस भूतनी से.

लेकिन बाद में जाने कब हुआ कि तुम्हें इस फिल्म से प्यार हो गया. याद करने की कोशिश करूँ तो मुझे कॉलेज में दाखिला लेने के ठीक पहले का दिन याद आता है. तुम्हारे लिए एक बुरा दिन था वो. तुम इमोशनली ड्रैन्ड थी उस दिन. कुछ दिन पहले ही तुम्हें मैंने मोहब्बतें फिल्म की डीवीडी गिफ्ट की थी, और उस रात उसी डिप्रेस्ड मूड में तुमने ये फिल्म देखी थी. उस रात के बाद से इस फिल्म के प्रति तुम्हारा परसेप्शन पूरी तरह बदल गया था.

रात के एक बजे तुमने मुझे कॉल कर के जगाया था, “सुनो, मैं समझ गयी हूँ अब. वो भूतनी नहीं थी जिससे राज प्यार करता था...वो मेघा थी. एकदम ऐश्वर्य राय जैसी दिखती है मेघा. कुछ कुछ मेरी जैसी भी..” और फिर तुमनें अगले दिन मुझसे पूछा था, “तुम्हें क्या लगता है? राज आर्यन कहाँ होगा इस वक्त? क्या उसी शहर में? अब भी मेघा आती होगी उससे मिलने?”

तुमने ये सब ऐसे कहा था उस दिन, कि एक पल तो मैं डर गया था कि तुम्हें ये क्या हो गया है. क्यों ऐसी बहकी बहकी बातें कर रही हो तुम. उस दिन के बाद से इस फिल्म के प्रति तुम्हारा क्रेजीनेस बढ़ते ही गया.

छत पर भी तुम उस सुबह इस फिल्म के पूरे असर में थी. लैपटॉप की बैटरी गुल हो चुकी थी लेकिन तुम पर फिल्म का नशा कुछ ज्यादा ही चढ़ गया था. छत पर तुम गुनगुनाते हुए इधर उधर एकदम वैसे ही डोल रही थी जैसे शराब के नशे में शराबी डोलते हैं. फिल्म के गाने को एक के बाद एक गा रही थी और बेहद खुश थी तुम.

मोहब्बतें के नशे में ही तुमने अपनी एक थ्योरी की याद मुझे दिलाई. तुम्हारी उस थ्योरी के मुताबिक कोई भी टॉप क्लास रोमांटिक मूवी तब तक पूरी नहीं होती जब तक उस फिल्म के साथ एक उतना ही टॉप क्लास रोमांटिक डिनर या लंच न हो. जब भी हम थिएटर से फिल्म देखकर निकलते थे, ये थ्योरी तुम हर बार दोहराती थी, ताकि फिल्म देखने के बाद तुम्हें मैं एक बढ़ियां लंच करवाऊं.

उस दिन भी तुमनें अपनी ये थ्योरी मुझे इसी वजह से सुनाई थी. वैसे सच तो ये है कि अगर तुमने अपनी इस थ्योरी की याद न भी दिलाई होती, तो भी मैंने तय कर रखा था कि लंच किसी बेहद अच्छे रेस्टुरेंट में ही करेंगे. पापा ने सुबह दो सौ रुपये थमाए थे, उनके शहीद होने का वक़्त आ गया था.

उस दिन जब हम प्रकाश बिल्डिंग से निकल आये थे, तो मैंने तुमसे पूछा था कि ये छत पर तुम रैंडमली आई थी या तुम्हारी पहले से प्री-प्लानिंग थी. तुमने लेकिन कहा कि छत पर जाना और फिल्म देखना पूरे तरह से रैंडम था. हालाँकि अभी तक मुझे ये शक होता है कि ये सब तुम्हारी प्री-प्लानिंग थी.

अगर तुमने पहले से तय भी कर लिया था तो मैं तो ये कहूँगा कि तुमने गज़ब की प्लानिंग की थी उस दिन. चाहे अहमद चचा के चाय दुकान पर तुम्हारा वो मुझे तंग करना हो या फिर एक बिल्डिंग के छत पर तुम्हारे मेरे पास मेरे कंधे पर सर टिका कर मोहब्बतें देखना या फिर एक खूबसूरत रेस्टुरेंट में लंच करना.. सब कुछ मेरे लिए मैजिकल था उस दिन.

शाम में जब मैं घर लौटा तब घर का माहौल नार्मल था. मुझे यकीन था कि पापा माँ जरूर मुझे डांटने के ताक में बैठे होंगे, और मेरी बदमाश बहन आग में घी डालने का अपना काम बखूबी कर रही होगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. पापा और माँ का मूड उस शाम बहुत अच्छा था. हालाँकि मेरी छोटी बहन ने जरूर शिकायत करनी चाही, ये कह कर कि जरूर भैया अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने गया होगा, लेकिन इस बात का माँ पर कोई असर नहीं हुआ. वो फिर भी तरह तरह से मुझे फंसाने और डांट सुनवाने की पूरी कोशिश कर रही थी.

बहन की इस बदमाशी पर मैंने उसे डांटा तो उसने मेरी बाँहें मरोड़ दी थी. उसकी इस शरारत से अचानक बाँहों में बहुत तेज़ दर्द उठा. मुझे याद आया कि छत पर मुझे तुम्हारी हरकत से चोट लग गयी थी, जिसके बारे में मैं एकदम भूल सा गया था. मुझे लगा था कि वो मामूली खरोंच होगी. लेकिन जब मैंने जैकेट और शर्ट उतरा तो देखा घाव बहुत गहरा हो गया था, और शर्ट उस घाव से चिपक गए थे.

घाव गहरा तो था, लेकिन जाने क्यों मुझे दर्द नहीं हो रहा था. बल्कि आईने में उस घाव को देखकर मैं मुस्कुराने लगा था. मैं सोचने लगा आज की सुबह के बारे में, जो एकदम मैजिकल थी. तुम्हारी भाषा में कहूँ तो "आउट ऑफ़ दिस वर्ल्ड..."

मैं सोचने लगा क्या कोई विश्वास करेगा कि हमने एक ऐसी रोमांटिक सुबह एक मार्केट काम्प्लेक्स की छत पर बिताई थी, एक ऐसी सुबह जिसके बारे में जाने कितने लोग बस सपने में ही सोचते हैं. एक ऐसी सुबह, एक ऐसा दिन जो सिर्फ तुम्हारे साथ ही मुमकिन था...


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Wednesday, February 28, 2018

दिसंबर की एक सुबह - कोहरा, चाय और उसके नखरे

सुह जैसे ही मेरी आँखें खुली और मैंने खिड़की से बाहर देखा तो खूब घना कोहरा छाया हुआ था. मैं एकदम खुश हो गया. यही तो चाहती थी न तुम कि शहर में कोहरा वापस लौट आये? दिसम्बर के महीने में शहर से ठंड और कोहरा गायब थे, और तुम इस बात से इतने गुस्से में थी कि पिछली शाम मेरे कंधे पर अपना बैग दे मारा था. तुम तो रात भर रजाई में आराम से सोती रही होगी, लेकिन पूरे रात उस कंधे में मुझे दर्द होता रहा था. रात भर ठंड और कोहरे को बहुत कोसा था मैंने.

शायद मेरे कोसने का असर था या तुम्हारी डांट का, कोहरा अचानक से शहर में वापस लौट आया था. वैसे तो अमूमन जब भी इस ठंड और कोहरे का डेडली कॉम्बिनेशन सामने आता है, कोहरे में घूमने का प्लान तुम बनाया करती थी, लेकिन उस सुबह जाने क्या सनक सवार हो गई थी मुझपर, मैंने जोश में आकर तुम्हें फोन कर दिया था और घूमने का प्लान भी बना लिया था.


याद है न तुम्हें, घूमने की बात सुनकर तुम कैसे चहकने लगी थी? तुम्हें उम्मीद नहीं थी न कि मैं सुबह घूमने का प्लान बना सकता हूँ? लेकिन जानती हो, तुम्हें कॉल करने के बाद जब मैं अपनी बालकनी में गया तो एकदम ठिठुर गया था. मेरे अंदाज़े से कहीं ज्यादा ठंड थी. एक पल तो मैंने सोचा भी कि आज घूमना कैंसिल कर देता हूँ. तुम्हें समझा लूँगा, थोड़ा तुमसे डांट सुन लूँगा. लेकिन फिर अगले ही पल जाने क्या हुआ, मैं वापस कमरे में आया और जल्दी जल्दी तैयार होने लगा.

मुझे यूँ तैयार होता देख, पापा ने टोका, "इतनी सुबह इस ठंड में कहाँ जाने की तयारी कर रहे हो?"

मैं क्या कहता पापा से? कि तुमसे मिलने जाना है? मेरी वहीं पर इन्स्टन्ट्ली कुटाई हो जाती. मैंने पापा से सिर्फ इतना कहा "कुछ जरूरी काम है...निकालना पड़ेगा."

पापा ने हलकी डांट लगा कर मुझे रोकना चाहा, "अरे ऐसा क्या अर्जेंट काम है? कोहरा छँटने दो, तब चले जाना.." मैंने लेकिन पापा के इस बात का कोई जवाब नहीं दिया और बस ये बोल कर कि मैं शाम तक लौटूंगा, घर से निकल आया.

मैं तो एकदम कॉंफिडेंट था कि शाम तक लौटने की बात सुन कर पापा और माँ दोनों से डांट सुनना तो तय है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दोनों में से किसी ने नहीं डांटा मुझे. पापा ने तो डांटने के बजाय मुझे सौ रुपये के दो नोट थमा दिए, ये कहते हुए कि रख लो..दिन भर बाहर रहोगे, कुछ काम आ जाएगा.

सुबह सुबह मुझे दो सौ रूपए पापा के तरफ से मिल गए थे. मैं तो एकदम सातवें आसमान पर पहुँच गया था. उन दिनों दो सौ रुपये में तो मैं तुम्हें दो-तीन दिन आराम से 'ऐश' करवा सकता था.

घर से जब कुछ दूर मैं निकल आया, तब अचानक ख्याल आया कि मैंने अपने दस्ताने ही नहीं लिए हैं, और सुबह की इस ठण्ड में बाइक चलाने से मेरे हाथ अकड़ रहे थे. एक बार सोचा कि वापस घर जाकर दस्ताने ले लूँ, लेकिन वापस घर जाकर पापा से फिर डांट कौन सुनता? इसलिए घर जाने का प्लान मैंने ड्राप कर दिया.

तुम्हारे घर की गली में जैसे ही मुड़ा मैं, मैंने तुम्हें दूर से ही देख लिया था. अपने घर के गेट के बाहर खड़ी थी तुम. एकदम तैश में. फुल ऐटिट्यूड में. लेदर जैकेट, जीन्स, बूट्स, हैट, गले में मफलर और सुबह सात बजे के कोहरे में जब सूरज चाचू का दूर दूर तक कोई नामो निशाँ नहीं था, 'सनग्लासेज' लगा कर तुम एकदम कमाल लग रही थी.

पता है, उन दिनों मैं बहुत दूर से, या खूब भीड़ में भी तुम्हें आसानी से पहचान लिया करता था.
ना...ये ना समझना कि "तू धरती पर चाहे जहाँ भी रहेगी, तुझे तेरी खुशबु से पहचान लूँगा" वाले कांसेप्ट से तुम्हें पहचानता था, बल्कि तुम्हारी वो स्टाइलिश हैट जिसमें तुम किसी जादूगरनी सी लगती थी, लेदर जैकेट, बूट्स और एनीटाइम गौगाल्ज से तुम एकदम अलग दिखती थी. शहर में बहुत कम लड़कियां थीं जो उन दिनों बूट्स, सनग्लासेस और हैट पहनती थी. सनग्लासेज और बूट्स पहनने वाली तो फिर भी दिखती थी, लेकिन मेरे ख्याल से पूरे शहर तुम अकेली थी जो हैट पहनती थी और वो भी पूरे कांफिडेंस के साथ. तुमने एक बार तो मुझे भी हैट खरीद कर गिफ्ट किया था, लेकिन मैं वैसा हैट पहनने से हमेशा हिचकता था. मुझे बड़ा अजीब लगता था हैट पहन कर सड़कों पर निकलना. लेकिन तुम्हें कुछ अजीब नहीं लगता था. हैट हो या कोई भी और फैशन ऐक्सेसरीज़, तुम उसे इतने कॉंफिडेंटली कैरी करती थी, कि मैं अक्सर हैरान रह जाता था.

तुम हमेशा से मुझसे ज्यादा कॉंफिडेंट रही हो. सिर्फ फैशन में ही, बल्कि हर मामले में. कभी कभी तो जरूरत से जायदा कॉंफिडेंट, और जिसके वजह से हमेशा मैं फँस जाया करता था. अपने इसी कांफिडेंस के चक्कर में आकर याद है तुमने कैसे उस सुबह मुझे डांट लगाई थी? मैं तो समय से पहले ही तुम्हारे घर पहुँच गया था. मुझे क्या पता था कि तुम आधे घंटे से तैयार होकर अपने घर के गार्डन में टहल रही हो और मेरा इंतजार कर रही हो. इतनी जल्दी तुम तैयार हो सकती हो, मुझे इसका यकीन नहीं था. मेरे आते ही तुमने अच्छी खासी डांट सुना दी थी ये कहते हुए कि मैं लेट से आया हूँ. तुम्हारा मूड बिगड़ न जाए इसलिए घबरा कर जल्दी से मैंने तुमसे माफ़ी मांग ली थी.

बाइक पर बैठने से ठीक पहले तुमने अचानक हवा में हाथ लहरा कर कुछ इस तरह से उसे मुट्ठी बना कर मेरे चेहरे के आगे नचाया था कि पहले तो मैं कुछ समझ नहीं सका था. वो तो जब तुम्हारी ऊँगली मेरे आँखों के सामने नाची तब समझ आया कि तुम फिर से मुझे धमका रही हो.. “सुनो, आज मौसम और मैं, दोनो मूड में हैं, पैसे तो है न पॉकेट में?" कह कर तुमनें मेरी पैंट की जेब थपथपाई थी.

मैंने तुम्हें मुस्कुराते हुए जवाब तो दे दिया कि "हाँ है, डोंट वरी.. " लेकिन अगले ही पल सोचने लगा कि कहीं तुम किसी महंगे रेस्टोरेंट में जाने के लिए न कह दो. मन ही मन मैं जोड़ने लगा कि मेरे पर्स में कितने पैसे हैं - पापा ने दो सौ दिए..पहले के बचे भी अस्सी-नब्बे हैं पर्स में, बैग में भी चालीस-पचास तो होने चाहिए, बशर्ते बहन ने बैग पर रेड न मार दी हो. दिन भर तो आराम से निकल जाएगा, मैंने सोचा और बाइक बढ़ा दी.

हमारा पहला स्टॉप था अहमद चचा की चाय दूकान, जहाँ हम अक्सर सुबह जाया करते थे. चाय दुकान पहुँचते ही अहमद चचा ने मुस्कुराते हुए पूछा.. “बड़े दिन बाद आये हो बबुआ...? कहाँ थे इतने दिन?”

मैं कुछ कहता इससे पहले तुमने अपने ट्रेडमार्क अंदाज़ में चचा को जवाब दिया, "क्या करती चचा, कोहरा बड़ा बेईमान हो गया है इस साल. वो आ ही नहीं रहा था. आज आया है वो, तो मैं भी आ गयी उसके साथ साथ..."

अहमद चचा तुम्हारी इस बात पर बस मुस्कुरा कर रह गए. मुझे तो पक्का यकीन है उनके सिर के ऊपर से तुम्हारी बात किसी बाउंसर की तरह निकल गयी होगी.उन्होंने बस इतना ही पूछा आगे कि "तुम दोनों एकदम सुबह सुबह आ जाते हो यहाँ, इतने सवेरे तो कोई नहीं आता."

तुमनें स्टाइलिश सा जवाब दिया था. "अरे चचा, सुबह चाय पीना तो कंपल्सरी है, और वैसे भी जाड़े में, इट्स ऑलवेज अ चाय टाइम. "

इस बार तो तुम्हारी ये बात चचा को बिलकुल भी समझ नहीं आई, और वो अपने काम में लग गए. 

तुमने उस छोटे से चाय स्टाल पर भी अपना एक कोना खोज निकाला था. दीवार के पास लगी बेंच पर बैठना तुम्हें पसंद था. वजह थी कि वहाँ पर शाहरुख़ खान का बड़ा सा पोस्टर लगा था. और वहाँ बैठकर चाय पीने पर तुम्हें ये तसल्ली रहती कि सुबह की चाय तुमने शाहरुख़ के साथ पी है.

दीवार के पास जो बेंच लगी थी, वो थोड़ी टूटी हुई थी. तुम्हारे बैठते ही बेंच हिलने लगी थी. तुमने मुझे आदेश दिया - "देखो, इस बेंच को यहाँ से उठा कर वहाँ रख दो और वहाँ लगी उस बेंच को यहाँ ले आओ.."

तुमने मुझे ऐसे आदेश दिया था कि जैसे तुम चाय दुकान की मालकिन हो और मैं तुम्हारे चाय दुकान में काम करने वाला एक मामूली सा छोटू हूँ.

एक पल सोचा कि तुम्हें कहूँ, कि मैं क्यों बेंच हटाऊं? ये तो दुकानवाले का काम है. लेकिन तुम्हारे चेहरे पर टफ लुक को देखते हुए ये बात कहने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई.

मैं बेंच को खींच कर वहाँ से हटाने लगा .... चर्रर्रररररर की तेज़ आवाज़ आई..

तुम उस चर्रर- चर्रर की आवाज़ से एकदम इरिटेट हो गयी. कानों पर हाथ रखकर तुम उछलने लगी थी - "यार, इतनी आवाज़ क्यों कर रहे हो? खींच क्यों रहे हो? उठाई नहीं जाती क्या बेंच? कुछ खा कर नहीं आये हो घर से?”

"यार इतनी सुबह खा कर कौन आता है?” मैंने तुमसे कहा था, लेकिन तुमने फिर से एक टफ लुक दिया मुझे. मैंने आगे कुछ नहीं कहा, और बेंच को संभाल कर उसके जगह से उठा कर दूसरी जगह रख दिया.

“अब वहाँ रखी बेंच को यहाँ ले आओ...” तुमने दोबारा आदेश दिया.

इस बार पीछे से अहमद चचा ने तुम्हें टोका, "अरे रहने दो न बेटी, काहे परेशान कर रही हो इसे, हम बेंच लगा दे रहे अभी..."

"अरे नहीं चचा... वेल्ला है ये, इसे लगाने दीजिये न.." कहते हुए तुमने मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया था.

यार कसम से, बड़ा गुस्सा आया था मुझे तुम पर उस समय. थोड़ा इरिटेट भी हो गया था मैं, लेकिन मेरे पास और क्या चारा था? तुम्हारे ऊपर गुस्सा दिखाना मुझे अलाउड ही नहीं था. बेमन से बेंच को संभाल कर उठाया मैंने ताकि चरर्र की आवाज़ फिर न आये और तुम्हारी बताई जगह पर उसे रख दिया.

अहमद चचा की चाय भी तब तक तैयार हो चुकी थी. उन्होंने उधर से आवाज़ लगाई, "चाय के साथ क्या लोगे तुम लोग?"

तुम कुछ कहती, इससे पहले मैंने ही तुम्हें छेड़ने के इरादे से कहा, “चचा मेरे लिए तो एक ब्रेड-बटर और इसके लिए कुछ ऐसा जो इसके दिमाग को ठंडा रख सके”.

"शट अप... चचा आप इसकी बात मत सुनिए...ये तो कुछ भी कहता रहता है, मेरे लिए भी ब्रेड बटर..” तुमने चचा से कहा और मुड़ कर मेरी तरफ देखा.. “ज़रा तमीज से रहो तो तुम..वरना थप्पड़ लगेगा तुम्हें...” कहकर तुमने मुझे फिर धमकाया था.

सच कहूँ तो तुम्हारे ऐसे धमकाने पर मुझे थोड़ी हँसी और बहुत ज्यादा प्यार आ रहा था. तुमने मेरी तरफ से मुँह फेर लिया था, और अपने शाहरुख के साथ तुम चाय पीने लगी थी. मैंने पीछे से तुम्हें थोड़ा छेड़ा भी, "अरे...अकेले अकेले चाय पी रही हो, शाहरुख़ से चाय के लिए नहीं पूछोगी?"

"तुम ज़रा शांत रहो वरना टाँगे तोड़ दूंगी तुम्हारी", कहकर तुमने मुझे फिर से एक तगड़ी डांट लगाई थी और फिर से अपना बैग मेरे कंधे पर घुमा कर दे मारा था.

शुक्र था कि इस बार तुमनें ज्यादा जोर से नहीं मारा था, चाय और ब्रेड-बटर ने बचा लिया था मुझे. हाँ, फिर भी दोबारा उस कंधे पर बैग लगने से हल्का दर्द तो उठा था, लेकिन मुझे दर्द की फ़िक्र नहीं थी. तुम्हें देख देख मुस्कुरा रहा था मैं.
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Thursday, January 25, 2018

वापस आओ ओ कोहरे, तुम्हारा इंतजार है

वो दिसंबर के आखिरी दिन थे और ठंड अचानक से शहर से गायब हो गयी थी. दिसंबर की धूप में मार्च की धूप का असर साफ़ दिख रहा था. दिसंबर में महीने में मौसम की ऐसी बदतमीजी पर तुम्हें बड़ा गुस्सा आ रहा था. याद है कैसे तुमनें एक शाम अपने इसी गुस्से में आकर अपने बैग से मुझे इतनी जोर से मार दिया था कि पूरे हफ्ते तक मेरे कंधे में दर्द होता रहा था. याद भी है तुम्हें कि तुमने मुझे अपनी बैग से कब कहाँ, कैसे और किसलिए मारा था?

मेरे ख्याल से वो क्रिसमस के एक दो दिन पहले की बात रही होगी. तुम और मैं अपने शहर के एक कॉफ़ी हाउस में बैठे थे. उन दिनों ऐसे कैफ़े शहर में बहुत कम थे जहाँ लोग कुछ देर इत्मिनान से बैठ सकते थे. ये कैफ़े उन्हीं चुनिन्दा कैफ़े में से एक था जहाँ कॉलेज के लड़के लडकियाँ अक्सर हैंगआउट किया करते थे. दिसंबर के मौसम में भले ही ठंड नदारद थी, लेकिन मौसम खूब सुहाना हो गया था. क्रिसमस और नए साल का वक़्त था तो कैफ़े भी खूब सजा हुआ था. मुझे पूरा सेटिंग बड़ा रोमांटिक सा लग रहा था, लेकिन तुम एकदम गुस्से में थी. “बताओ, सर्दी का मौसम है और ऐसे मौसम में गर्मी महसूस हो रही है. कोट उतारने का दिल कर रहा है मेरा..” कॉफ़ी पीते हुए अचानक एकदम झल्ला कर तुमने कहा था. मौसम का सारा गुस्सा तुमने मेरे ऊपर निकालते हुए मुझे जोर से डांटा था, “इधर मौसम दिसंबर की धज्जियाँ उड़ा रहा है और तुम चुपचाप कॉफ़ी पी रहे हो?”

तुम्हारी ऐसी डांट पर मैं हर बार कंफ्यूज हो जाता था, “यार अब इसमें मैं क्या करूँ? मौसम की ऐसी बदतमीजी है तो इसमें मेरी क्या गलती?” मैंने बड़े मासूमियत से तुमसे ये वैलिड और लॉजिकल सवाल पूछा था, और तुमनें मुझे एक टफ लुक देते हुए फिर से डांट दिया था “तुम कुछ मत करो...बस तमाशा देखते रहो..नालायक कहीं के..”

उस वक़्त तुम भरपूर गुस्से में थी, तुम्हारे हाथ में कॉफ़ी का मग भी था, और एक पल के लिए मुझे डर भी लगा कि कहीं गुस्से में तुम मेरे ऊपर वो कॉफ़ी का मग ही न फेंक दो, जैसे एक दफे तुमनें कोल्डड्रिंक फेंक दिया था मेरे शर्ट के ऊपर. लेकिन तुमनें इस बार वैसी कोई बदमाशी नहीं की. बल्कि बड़े प्यार से तुमने कॉफ़ी के कप को टेबल पर रखा, और एक अच्छी सी मुस्कराहट चेहरे पर लाते हुए पास में रखे अपने बैग को तुमने उठाया और उसे घुमाकर तेज़ी से मेरे कंधे पर दे मारा था.. ”स्टॉप स्माइलिंग, इडियट” तुमने कहा था.

तुम्हारे रूल्स एंड रेगुलेशन के अंतर्गत मुझे तुम्हारे मारने पर/गुस्सा होने पर/अत्याचार करने पर विरोध जताने का या तुम पर गुस्सा दिखाने का हक़ नहीं था. नियम के मुताबिक मुझे तुम्हारे हर मार को/गुस्से को/अत्याचार को हँसते हुए सहना था. मैंने उस रूल्स एंड रेगुलेशन की लाज रखने में उस दिन भी कमी नहीं की थी. मैं बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए बस इतना कह पाया था.. “अरे...” इसके आगे कुछ भी कहना मेरे लिए और खतरनाक हो सकता था, और शायद नियम के बाहर भी. इसलिए वहीं रुक गया मैं और बस अपना कन्धा सहलाने लगा.

तुम अचानक से शायद बड़े गिल्ट में आ गयी. मुझे बैग से मारने के बाद एकदम घबरा गयी थी तुम. तुम्हें शायद अपनी गलती का एहसास हुआ था, और तुमने तेज़ी से अपने बैग को खोलते हुए कहा था, “शिट यार! लैपटॉप, कैमरा, पानी का बोतल सब था इसमें, देखूँ लैपटॉप सही तो है न मेरा?”, और तुम जल्दी से लैपटॉप ऑन कर के देखने लगी थी,. जब लैपटॉप के स्क्रीन पर विंडोज एक्सपी का लोगो लहराया, तब जाकर कहीं तुम्हारी जान में जान आई थी. हाँ, फोर्मलिटी निभाते हुए तुमने मुझसे पूछा भी था, “यार लगी तो नहीं तुम्हें...?”

जानती हो, बड़ा तेज़ गुस्सा आया था उस वक़्त तुम पर, लेकिन अपने इमोशन को अपने काबू में रखकर मैंने हँसते हुए फ़िल्मी टाइप जवाब दिया था, “डोंट बी सिली, तुम्हारी मार कभी लग सकती है भला?”

लेकिन मैडम, गुस्सा उस वक़्त तो मेरे अन्दर पूरा भरा हुआ था. माना कि तुम्हारा लैपटॉप काफी महंगा था,और उस वक़्त कम लोग लैपटॉप लेकर घूमते थे, लेकिन वो लैपटॉप, तुम्हारा वो नया डिजिटल कैमरा और यहाँ तक कि पानी की बोतल भी मेरे कंधे से ज्यादा इम्पोर्टेन्ट हो गया था तुम्हारे लिए.. ? मेरे कंधे पर जाने कितने बार सिर रख कर रोई थी तुम, लैपटॉप पर कितनी बार सिर रख कर रोई थी? और उतने भारी लैपटॉप से मेरे कंधे पर दे मारा था तुमने और तुम्हे मेरे कंधे की नहीं, बल्कि अपने लैपटॉप की पड़ी थी...'स्टुपिड कहीं की...'

कैफे से बाहर निकलते समय तुमने मुझे चेतावनी दी थी, “मौसम का कुछ करो, वरना तुम्हारी शामत आ जायेगी..” सच कहूँ तो मुझे उस वक्त भी गुस्सा आया था, और “खुद को क्या समझती है, इतना अकड़ती है” गाना भी मेरे मन में ऑटोमेटिकली प्ले होने लगा था.

कैफ़े से निकलने के बाद तुम्हें घर छोड़ते हुए और एक दो काम निपटाते हुए मुझे देर हो गई थी. वापस घर लौटते वक़्त मुझे हलकी सिहरन महसूस हुई थी, लगा कि जैसे मौसम में थोड़ी ठंडक वापस आ गयी है, लेकिन इस बारे में मैं ज्यादा श्योर नहीं था, क्योंकि स्कूटर चलाते वक़्त ऐसे भी थोड़ी ठंड महसूस होती है.

घर लौटते हुए पूरे रास्ते तुम्हारी मार की वजह से मुझे कंधे में दर्द महसूस होता रहा. स्कूटर चलाने में, गियर बदलने में बड़ी तकलीफ हो रही थी. रास्ते में मन ही मन भगवान जी से मैंने दुआ तक मांग ली थी, कि कुछ भी कर के दिसंबर की इज्ज़त वापस दिला दो, वरना ये लड़की मेरी शामत लेते आयेगी.

घर पहुंचा तो सभी लोग सो चुके थे. अपने कमरे में आकर टीवी पर न्यूज़ देखा, तो पता चला कि शिमला में सुबह से भयंकर बर्फ़बारी हो रही है. वो खबर देखते हुए मुझे तुम्हारी याद आ गयी थी. ये सोच कर मुझे हँसी आने लगी कि तुम अगर अभी ये खबर देख रही होगी तो तुम्हारे दिल पर क्या बीत रही होगी? कितना कमाल का रिएक्शन हो रहा होगा न तुम्हारा और कितना भला-बुरा कह रही होगी तुम मुझे और इस मौसम को..
”शिमला में बर्फ़बारी, और यहाँ कोहरे की झलक तक नहीं..बड़ी नाइंसाफी है..” यही सोचा होगा न तुमने? एक पल सोचा कि तुम्हें कॉल कर लूँ, और थोड़ा तुम्हें चिढ़ा दूँ, तुमसे डांट फिर से सुन लूँ, लेकिन तुम शायद सो गयी थी. कुछ देर पहले मेरे गुड नाईट के एसएमएस का भी तुमने जवाब नहीं दिया था. मैंने सोचा, कि चलो कोई बात नहीं, आज रात में ना सही, कल दोपहर में तुम्हें ये खबर सुना कर खूब चिढाऊंगा. फिर भले तुम मेरा एक और कन्धा तोड़ दो, परवाह नहीं. लेकिन तुम्हें चिढ़ा पाने का एक भी मौका मैं छोड़ना नहीं चाहता था.

सुबह अचानक कुछ आहट हुई और मेरी नींद टूट गयी थी. तुम्हें तो पता ही है कि पापा हमेशा सुबह चार बजे ही जाग जाते हैं, और उन्हीं के जागने से मेरी नींद खुल गयी थी. खिड़की से बाहर नज़र डाला तो हल्का कोहरा दिखा. मुझे लगा मेरा भ्रम है. मैंने आँखें मल के दोबारा देखा, तो भी बाहर वही नज़ारा था. कन्फर्म करने के लिए कि बाहर कोहरा ही है, मेरा भ्रम नहीं, मैंने पापा से पूछा, “आज बाहर कोहरा है क्या पापा?”
“हाँ, खूब घना कोहरा है, शिमला में हुई बर्फ़बारी का नतीजा है..” पापा ने कहा.

मैं एकदम से खुश हो गया, सोचा चलो मेरी रात की दुआ कुबूल हुई और मैं तुम्हारे ‘मार’ से बच गया. बाहर बालकनी में गया मैं कि मौसम का थोड़ा जायजा लूँ, तो एकदम ठिठुर सा गया. मेरे उम्मीद से ज्यादा भयंकर ठंड हो गयी थी, और कोहरा भी एकदम घना सा छाया हुआ था. गज़ब की करवट ली है मौसम ने, मैंने सोचा.

सबसे पहले मुझे तुम्हारा ही ख्याल आया. मैं जल्दी से वापस कमरे में आया, बिस्तर पर पड़ा मोबाइल उठाया. सोचा तुम्हें कॉल करूँ. लेकिन सुबह के साढ़े चार बज रहे थे और तुम सोयी हुई होगी. रात भी तुम्हारे एसएमएस का कोई जवाब नहीं आया था मुझे. मैं सोचने लगा तुम्हें कॉल लगाऊं या नहीं?

तुम्हें इतनी सुबह जगाने में भी तो बहुत बड़ा रिस्क था. तुम्हारी नींद में खलल डालना मतलब सीधे डेंजर जोन में फुल स्पीड के साथ दाखिल होना होता है. लेकिन ‘जो होगा देखा जाएगा’ की थ्योरी अपनाते हुए मैंने तुम्हारा नंबर मिला दिया.

पहली घंटी पूरी बजी, लेकिन तुमने रिसीव नहीं किया.
दूसरी बार मैंने फिर से तुम्हारा नंबर मिलाया. इस बार भी पूरी घंटी बजी लेकिन तुमने रिसीव नहीं किया. मेरा दिल थोड़ा सा बैठ गया. थोड़ा डर भी आ गया था मन में. 
तीसरी बार डरते हुए मैंने फिर से तुम्हारा नंबर मिलाया. इस बार तुमने रिसीव किया, और.. “स्टुपिड..सोने दो मुझे” कह कर फोन काट भी दिया.
भगवान का नाम लेकर मैंने फिर से चौथी बार तुम्हारा नंबर मिलाया, और इस बार तुम मुझे डांट पाओ, इसका मैंने तुम्हें मौका ही नहीं दिया और तुम्हारे कुछ बोलने के पहले ही मैंने “हैप्पी फ़ॉगी  मोर्निंग कहा” और कहते ही मैंने फोन काट दिया और मुस्कुराने लगा.

एज एक्सपेक्टेड, अगले ही पल तुम्हारा कॉल बैक आया, “सिरिअसली... फ़ॉगी मोर्निंग?“ तुमने पूछा
“बाहर निकल के देखो ज़रा, ठिठुर न जाओ तो मेरा नाम बदल देना तुम..” मैंने एकदम कांफीडेंटली और फुल एटीट्यूड के साथ कहा.

तुमने फिर अपनी खिड़की खोली होगी शायद और बाहर कोहरा देखते ही तुम चिल्ला बैठी थी, “यार, आई जस्ट कांट बिलीव इट. इतना गहरा कोहरा, दिल खुश कर दिया तुमने ये खबर सुना कर, लव यू नालायक” तुम एकदम खुश हो गयी थी. 

“जानती हो, कल दिन भर शिमला में बर्फ़बारी हुई है, ये उसी का नतीजा है..”, सुबह पापा से मिला ज्ञान मैंने तुम्हें चेपने की कोशिश की.
तुमनें फिर से डांट दिया था मुझे, लेकिन इस बार प्यार से  “शिमला में हुई बर्फ़बारी का नहीं, मेरी डांट का नतीजा है ये बेवकूफ..” तुमने कहा था.

मैं जानता था कि मौसम अगर अचानक ऐसे करवट ले ले, तो तुम्हारा नेक्स्ट 'प्लान ऑफ़ एक्शन' क्या होगा. असल में सर्दियों में तुम बिलकुल प्रेडिक्टेबल हो जाया करती थी. मैं एकदम से जान लेता था कि तुम कब क्या करने वाली हो. तो इस बार तुम मुझे कोई भी आदेश देती, उससे पहले ही मैंने पूरे दिन का आइटिनरेरी बना लिया था. .

"एक घंटे में तैयार होकर अपने घर के बाहर मिलो मुझे, वी आर हिटिंग द रोड..." कहते हुए मैंने फोन पर एकदम तुम्हारे अंदाज़ में तुम्हें फरमान सुना दिया था.

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Monday, December 25, 2017

पुराने किले में बिता अक्टूबर का एक दिन

"मैं पुराने किताबों के अलमारी के पास चला आया..जैसे वहां कोई छिपा खज़ाना हो. हर कमरे में कितने भेद भरे कोने होते हैं, वही किताबें होती हैं जो हर घर में होती हैं, कहीं से चाक़ू बहार निकल आता है, कहीं हाथ छुआते ही एक दूसरा घर खुल जाता है, एक तस्वीर, एक किताब, एक तोहफा – घर के भीतर एक दूसरा घर... एक रौशनी, एक दरवाज़ा, दिल्ली के पुराने किले में बिता अक्टूबर का वो दिन, एक अधूरी कहानी और प्रिया. ..जाने इस बार की दिवाली में घर की सफाई ने क्या क्या याद दिला दिया. "

वह प्रिया के दिल्ली आने के दिन थे. वो अपनी छुट्टियों में दिल्ली आई थी. मेरे घर वो पहली बार भैया और भाभी की एनिवर्सरी के दिन आई थी. उस रात ज़ोरदार बारिश हुई थी. रात के ढाई बजे प्रिया ने मुझे फ़ोन कर के धमकाया था और अगले दिन सुबह उसनें लोदी गार्डन घुमने के लिए बुला लिया था. खान मार्केट के एक कैफे में हमनें सुबह की कॉफ़ी पी थी और लोदी गार्डन के झील के पास चले आये थे. बहुत देर तक हम दोनों झील के किनारे लगी सीमेंट की एक बेंच पर एक दुसरे का हाथ थामे बैठे रहे थे. झील में तैरती बत्तखों को देखकर प्रिया को अपनी दीदी की याद आ गयी थी, और उसनें मेरे कंधे पर अपना सर टिका कर अपनी आखें बंद कर ली थी. हलकी बारिश होने लगी थी और उसकी आँखें भींग आई थी. हम बहुत देर तक उस बेंच पर बैठे रहे, भींगते हुए.

भींगते हुए ही हम दिल्ली गेट के पास डिलाइट सिनेमा हॉल पहुचे, जहाँ एक फिल्म की टिकट प्रिया ने पहले से ले रखी थी. प्रिया के फिल्म देखने के प्लान से मैं थोड़ा चिढ़ सा गया था, इतने रूमानी मौसम में हॉल में बैठकर फिल्म देखने से ज्यादा डिप्रेसिंग चीज़ दूसरी कोई नहीं हो सकती. लेकिन प्रिया पर तो फिल्म देखने का भूत सवार था. डिलाइट सिनेमा हॉल कुछ ख़ास वजह से प्रिया के सबसे पसंदीदा थिएटर में से एक था. हम दोनों डिलाइट पहुँच तो गए थे, लेकिन प्रिया ने मुझे अब तक नहीं बताया था कि उसनें कौन सी फिल्म की टिकट ले रखी है. डिलाइट में दो सिनेमा के स्क्रीन हैं, दोनों पर दो अलग अलग फ़िल्में लगी थी. एक मेरी देखी हुई थी, और दूसरी मैंने नहीं देखी थी. मुझे लगा तो था कि जिस फिल्म को मैंने नहीं देखी है, प्रिय ने उसी फिल्म की टिकट ली होगी. लेकिन प्रिया ने मेरी देखी हुई फिल्म की ही टिकट ले रखी थी. थोडा सा मैं इरिटेट भी हो गया, “तुम्हें तो मालूम था मैंने ये फिल्म देख ली और फिर भी तुमनें उसी फिल्म की टिकट दोबारा से ले ली..” मैंने प्रिया से कहा. लेकिन प्रिया ने मेरी इस इरिटेसन पर ज्यादा ध्यान ही नहीं दिया. बड़े बेपरवाही से उसनें कहा, “दूसरी बार देख लेने में जेल नहीं हो जाएगी तुम्हें...”

प्रिया मुझे ये फिल्म दोबारा क्यों दिखाने को उत्सुक थी, ये बात मुझे फिल्म के दौरान मालूम चल गयी. फिल्म का टाइटल उस शहर के नाम पर था, जहाँ प्रिया उन दिनों पढ़ रही थी. प्रिया चाहती थी फिल्म के जरिये वो मुझे अपना शहर लन्दन दिखाए. उसके इस पागलपन पर मुझे ऐक्चूअली हँसी आ गयी थी. “क्या मतलब है यार? तुम बस एक शहर दिखाने के लिए मुझे तीन घंटे इस सिनेमा हॉल में बिठाए रहोगी? इससे तो बेहतर होता कि घर पर आराम से बैठकर तुम मुझे लन्दन की डाक्यूमेन्टरी दिखा देती..” प्रिया ने मेरी इस बात का कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि मुझे ऐसे आँखें तरेर कर देखा कि मैंने आगे कुछ भी बोलना उचित नहीं समझा और चुपचाप उसके पीछे पीछे हॉल के अन्दर चला आया. पूरे फिल्म के दौरान उसनें अपने उस शहर के बारे में बहुत कुछ बताया. कुछ तो मेरी समझ में आया भी, बाकी बाउंसर की तरह मेरे सर के ऊपर से निकल गया.

जब हम डिलाइट से निकले तो बारिश लगभग थम चुकी थी. फिल्म देखने के बाद का प्लान बड़ा सिंपल और सीधा सा था. फिल्म के बाद हमें चांदनी चौक जाना था, जहाँ प्रिया को पराठे वाली गली के ‘ओवररेटेड’ पराठे खाने थे, उसके बाद हमें लाल किला जाना था, और फिर पुराने किले में शाम बितानी थी.

सुनने में बड़ा सिंपल प्लान लग रहा है न? बिना किसी पेंच के? लेकिन जब बात प्रिया की हो रही हो तो कोई भी प्लान उतना सिंपल नहीं होता जितना आप एक्स्पेक्ट कर रहे होते हैं. एक्चुअली प्रिया के साथ तो आप कुछ भी पहले से एक्स्पेट कर ही नहीं सकते, वो कहते हैं न, ‘Expect The Unexpected’, वही होता है प्रिया के साथ हमेशा.

दिल्ली गेट से चांदनी चौक ज्यादा दूर नहीं थी. दरयागंज वाली सीधी सड़क थी जो चांदनी चौक जाती थी. रिक्शा या ऑटो से जाए तो दिल्ली गेट से चांदनी चौक पहुँचने में मुश्किल से दस मिनट का वक़्त लगता है. लेकिन प्रिया और मुझे ये दस मिनट की दूरी तय करने में करीब दो घंटे का वक़्त लग गया था. हम दरयागंज की गलियों में भटक गए थे. हमारा वैसे तो भटकने का कोई इरादा नहीं था, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी मैं प्रिया के ओवर कांफिडेंस कॉन्फिडेंस के झांसे में आ गया था.

डिलाइट से निकलते ही मैंने प्रिया से कहा कि बस या फिर ऑटो से हम चांदनी चौक जा सकते हैं. बस का आप्शन तो प्रिया ने सिरे से ही खारिज कर दिया था. उलटे उसनें मुझे डांट दिया था. दिल्ली के बसों में चढ़ना उसे बिलकुल पसंद नही था और ऑटो की बात पर प्रिया ने ये कह कर मुझे चुप करा दिया कि ”जो पैसे ऑटो में खर्च करोगे, उतनी की मुझे कॉफ़ी पिला देना...कितना रोमांटिक मौसम है, चलो न पैदल चलते हैं..”

“पैदल”? मैं थोड़ा चौंक सा गया.
“हाँ, पास में ही तो है..”, प्रिया ने पूरे विश्वास के साथ कहा.

हालाँकि मैं जानता तो था कि दरयागंज वाली सीधी सड़क से पैदल भी जायेंगे तो घूमते टहलते बीस पच्चीस मिनट में चांदनी चौक आराम से पहुँच जायेंगे.. लेकिन प्रिया को सीधे रास्ते पर चलना आता ही नहीं था. डिलाइट के पीछे से जो गली निकल रही थी, उसकी और इशारा करते हुए उसनें कहा, “चलो न, उस गली से चलते हैं. जल्दी पहुँच जायेंगे चांदनी चौक..”

मुझे थोड़ा शक हुआ... “तुम ये रास्ता जानती हो?”, मैंने पूछा.

“अरे बड़ा सीधा सा रास्ता है. बस सीधे चलना है हमें, दो-तीन गलियों को पार करो और सामने चाँदनी चौक का सिसगंज गुरुद्वारा दिख जाएगा तुम्हें..” उसने कुछ ऐसे कॉंफिडेंट होकर रास्ते के बारे में बताया कि जैसे दरयागंज की गलियों से बहुत वाकिफ है. मुझे उस समय दिल्ली आये हुए कुछ ही महीने हुए थे, तो मैं रास्तों से ज्यादा वाकिफ नहीं था. प्रिया के ऐसे कॉन्फिडेंस को देखकर मुझे लगा, दिल्ली में बचपन से रही है, तो शायद रास्तों का आईडिया हो.

प्रिया को लेकिन दरयागंज या पुरानी दिल्ली की गलियों के बारे में कुछ भी अंदाज़ा नहीं था. पराठे वाली गली के अलावा तो प्रिया को पुरानी दिल्ली की किसी गली का नाम तक नहीं पता था. ये बात मुझे तब पता चली जब लगभग एक घंटे तक दरयागंज की गलियों में भटकने के बाद हम वापस दरयागंज के मुख्य सड़क पर गोलचा के पास निकल आये थे. मैं उसी वक़्त समझ गया था, ये बस ऐसे ही मुझे टहला रही है, रास्ते वास्ते का इसे कोई आईडिया नहीं है.

थोडा डांटते हुए उसे मैंने रिक्शे पर बिठाया और वहां से पराठे वाले गली के तरफ हम चल दिए. रिक्शा पर बैठते ही प्रिया बड़ी रुखाई से मुझसे कहा, “तुम्हारी वजह से मैं गलियों में भटक गयी थी. तुमनें मुझे बातों में उलझा लिया था... वरना मैं तो जाने कितनी बार इस रास्ते से आई हूँ”. उसकी इस बात पर मुझे बड़ी तेज़ हँसी आई, जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से रोका.

तीन घंटे की फिल्म, और दो घंटे रास्ते में भटकने के बाद हमारे पास इतना वक्त नहीं था कि लाल किला और पुराना किला दोनों घूम लें, दोनों में से किसी एक जगह ही हम जा सकते थे. हालाँकि प्रिया ने तो खूब जिद की, कि वो दोनों जगह घूमेगी, लेकिन मैं अड़ा रहा, कि कोई एक जगह जाना है.

बहुत सोच विचार कर प्रिया ने पुराने किले को चुना. लाल किले से प्रिया को कोई ख़ास लगाव नहीं था. हाँ, पुराना किला प्रिया के दिल के ज्यादा करीब था. हमारी न जाने कितनी यादें पुराने किले से जुड़ी थी. ऐसी बात भी नहीं थी कि सिर्फ मेरे साथ बिताये दिनों की वजह से प्रिया को पुराना किला से लगाव था. शुरुआत से ही पुराना किला उसके दिल के बेहद करीब रहा है. अब इसकी क्या वजह है, ये तो खुद प्रिया को भी नहीं मालूम थी.

वैसे तो प्रिया को दिल्ली के हर ऐतिहासिक ईमारत से प्यार था. हुमायूँ का मकबरा, क़ुतुब मीनार, अग्रसेन की बाउली, लाल किला, हौज़ खास फोर्ट, तुगलकाबाद फोर्ट या फिर पुराना किला.. ये दिल्ली में प्रिया के हैंगआउट प्लेस थे और उसे इन सब जगह जाना और समय बिताना खूब पसंद था. इन सब में लेकिन पुराना किला एक ऐसी जगह थी जहाँ आकर प्रिया को हमेशा ख़ुशी मिलती थी. वो अक्सर कहा करती थी, कि जब भी मैं उदास होती हूँ, यहाँ वक़्त बिताने आ जाती हूँ. यहाँ मेरी उदासियाँ भाग जाया करती हैं.

अब कभी सोचता हूँ तो बड़ा अजीब लगता है, स्कूल के दिनों में प्रिया को इतिहास बिलकुल पसंद नहीं था. अक्सर वो हिस्ट्री के क्लास में सो जाया करती थी. इस वजह से मैडम से खूब डांट भी सुनती थी, लेकिन फिर भी ऐसे हिस्टॉरिकल जगहों से उसे खूब लगाव था. राजा रानियों की ऐतिहासिक कहानियाँ या पुराने हिस्ट्री के नोट्स से वो फैसनेट हो जाया करती थी. वो अक्सर इतिहास की कहानियों से खुद को रिलेट भी कर लेती थी. किसी भी राजा या रानी की कहानी उसनें कहीं पढ़ी या सुनी.. वो उस कहानी में खुद को भी घुसा लेती थी, और फिर अपनी मॉडिफाइड कहानी मुझे सुनाती.


जितने भी ऐसे ऐतिहासिक इमारतें दिल्ली में थीं, वहाँ प्रिया ने अपनी स्टोरी-टेलिंग सेशन के लिए एक ख़ास जगह चुन रखी थी, जहाँ मैं और वो अक्सर बैठते थे, और वो मुझे अपनी मॉडिफाइड कहानियाँ सुनाती थी. पुराने किले में प्रिया की सबसे पसंदीदा जगह थी किला ए कुहना मस्जिद के ठीक सामने लगे पत्थर के रेलिंग, जिनपर बैठना उसे खूब पसंद था. वहाँ से शहर दिखाई देता था. सामने भैरव मंदिर और आईटीओ जाने वाली सड़क साफ़ दिखाई देती थी. उन पत्थरों के नीचे सीढ़ियाँ बनी थी जहाँ किले के पुराने खंडहर थे, प्रिया को उन खंडहरों में घूमना भी खूब पसंद था. खंडहरों में घूमते हुए न जाने कितनी कहानियाँ वो तलाश लिया करती थी, और फिर ऊपर आकर जब हम उन पत्थरों पर बैठते, वो मुझे अपनी तलाश की हुई मनगढ़त कहानियाँ सुनाया करती थी. मुझे ये उसका पागलपन लगता था. कभी कभी उसकी कहानियां एकदम इललॉजिकल होती, तो कभी कभी उसकी कहानियों पर प्यार भी आता था.

“जानते हो? मैं सोचती हूँ काश हमें एक टाइममशीन मिल जाए और हम दोनों फिर से उन्हीं दिनों में चले जाए तो?” उन्हीं पत्थरों के रेलिंग पर बैठे हुए प्रिया ने मेरी तरफ देखा.
“ह्म्म्म...”, मैंने कुछ जवाब नहीं दिया, बस एक उबाऊ सी हामी भर दी.
उसनें बिना मेरी परवाह किये अपनी बात आगे बढ़ाई.. “सोचो, मैं अगर दिल्ली की रानी होती, और तुम....तुम होते मेरे दुश्मन.....”
“दुश्मन.....?? यार तुम हमेशा अपनी कहानियों में मुझे विलन क्यों बना देती हो...” मैंने उसकी बातों को बीच में ही काटते हुए कहा.
“चुप करो, और आगे सुनो.. “ उसनें कहा, “तुम यहाँ दिल्ली पर आक्रमण करने आते हो लेकिन तुम्हें ठीक से लड़ना भी नहीं आता. मेरी पूरी सेना पीछे खड़ी रहती है और मैं अकेले ही तुम्हें और तुम्हारी सेना को हरा देती हूँ. उसके बाद मैं तुम्हें बंदी बना लेती हूँ और हर रोज़ लोहे के बेड़ियों से तुम्हारी खूब कुटाई करती हूँ, और साथ ही साथ तुमसे अपने अपने महल के बर्तन भी धुलवाती हूँ....I mean Just Imagine, अगर ये कहानी सच में हो जाए तो? और क्या पता ऐसा कुछ हुआ भी हो पहले कभी...लोगों ने थोड़े न पूरा इतिहास पढ़ रखा है..” उसनें शरारत भरी नज़रों से मेरी और देखा.

“हम्म...”, मैंने एक लम्बी साँस ली.. “लेकिन ये तो बताया नहीं कि मुझे दुश्मन क्यों बनाया तुमनें? तुम हमेशा अपनी कहानियों में मुझे ऐसे ही रोल क्यों देती हो? कभी जल्लाद बना देती हो, कभी घोड़ा, तो कभी ऐसा गधा जो महल के बहार जंजीरों में जकड़ा रहता है और हर आने जाने वाला व्यक्ति उसे चप्पलों से मारते जाता है. यार कभी ऐसी कहानी भी तो सुनाओ जिसमें तुम रानी बनो और मैं तुम्हारा राजा, महल के बागों में हम रोमांटिक डुएट गायेंगे...सोचो कितनी स्वीट सी होगी हमारी वो कहानी..”

उसनें झाल्लाई सी दृष्टि से मेरी ओर देखा, “अरे यार तुम भी न...Out of the Box सोचो..वही घिसी-घिसाई कहानी अब नहीं अच्छी लगती, और वैसे भी, कहानी में भी तुमसे प्यार करूँ, और ज़िन्दगी में भी? अभी तो तुमसे प्यार कर ही रही हूँ न. एक में ही खुश रहो.. इतने भी अच्छे नहीं हो तुम कि तुम्हें दो बार झेल सकूँ..” ये कहते ही वो सहसा चुप हो गयी. शायद खुद के ही कहे कुछ शब्दों से वो चौंक गयी थी.

चौंक तो मैं भी गया था.

बातों बातों में ही सही, उसनें आज पहली बार ‘प्यार’ शब्द का प्रयोग किया था. मुझसे लड़ने और चिढ़ाने के फ्लो में ही आज उसनें पहली बार इन्डरेक्ट्ली मुझसे कहा था कि वो मुझसे प्यार करती है. वो भी ये बात समझ रही थी. हम दोनों अचानक चुप से हो गए.

उसकी लम्बी ख़ामोशी को मैंने ही तोड़ा.. “चलो मजाक में ही सही, तुमने आज पहली बार इकरार तो किया. मैं भी कह दूँ अब?”
“शट अप..”, उसनें कहा और मेरे होटों पर अपनी उँगलियाँ रख दी. “प्लीज आगे कुछ मत कहना..” वो एकदम चुप हो गयी. उसकी आँखें भींग आई थी. उसका मानना था कि प्यार का ऐसे इज़हार करने से प्यार टूट जाता है. अधुरा रह जाता है. हलाकि उसके इस विश्वास को अक्सर मैं ‘व्हाट रबिश’ कह कर मजाक में उड़ा दिया करता था.

मैंने उसे कई उदाहरण देकर समझाने की कोशिश की थी, कि ये सिर्फ तुम्हारा वहम है..और कुछ नहीं. लेकिन अपने इस विश्वास पर वो अडिग थी. उसनें अपनी ज़िन्दगी में ये देखा था, उसके अन्दर इस बात का भय था कि अगर वो किसी से भी ये कहे कि वो उसे प्यार करती है तो वो उससे दूर चला जाता है. पहले साल उसकी नानी, फिर उसके दुसरे साल दीदी और तीसरे साल छोटा भाई.. तीन साल में ये तीनों अचानक से प्रिया की ज़िन्दगी से बहुत दूर चले गए थे, और इत्तेफाक इतना भयानक था कि तीनों के जाने के एक दो दिन पहले, किसी न किसी तरह से प्रिया ने सबसे कहा था कि वो उनसे कितना प्यार करती है, और तीनों इस दुनिया से चले गए थे. इस बात ने प्रिया को बुरी तरह से झकझोर दिया था.

मैंने बहुत समझाया प्रिया को, कि जो पहले हुआ वो महज एक इत्तेफाक था. लेकिन वो ऐसा नहीं मानती थी. उसके दिल में तो एक डर बैठ गया था. मुझसे दुनिया भर की बातें करती थी वो, हज़ार तरह के रूमानी किस्से सुनाती थी, फिल्मों में हीरो को प्यार का इज़हार करने समय डरते देख थिएटर में ही चिल्ला कर कहती थी, कितना डरपोक आदमी है, आई लव यू भी नहीं कह सकता हीरोइन से? लेकिन खुद उसनें मुझसे कभी प्यार के ये ढाई शब्द कभी नहीं कहे थे, और आज मजाक के फ्लो में ही सही, उसनें मुझसे पहली बार ये बात कही थी. उसका डर अपनी जगह था, लेकिन मैं सिर्फ इस बात से बहुत खुश था कि जो मैं सुनना चाहता था, उसनें आख़िरकार मुझसे कह डाला.

प्रिया बिलकुल खामोश हो गयी थी. उसके चेहरे पर हल्का संकोच और भय घिर आया था. वो मेरी तरफ न देखकर सड़क की तरफ देखने लगी थी.

अक्टूबर की शाम थी, और बारिश की वजह से हवा में हलकी ठंडक आ गयी थी. हम दोनों पत्थरों की रेलिंग पर ही बैठे थे कि अचानक से तेज़ हवा का एक रेला आया, लगा जैसे आँधी चली हो और प्रिया मेरे एकदम करीब आ गयी. उसनें कस कर मेरा कन्धा पकड़ लिया, और अपनी आँखें बंद कर ली. जब हवा थमी, उसने आँखें खोली..वो कुछ देर तक अपलक मुझे देखते रही. “हमारे साथ कुछ गलत तो नहीं होगा...”, उसनें मुझसे पूछा.. “तुम रहोगे न मेरे पास हमेशा...”

उसकी आँखें डबडबा सी गयी थी. मैंने उसका हाथ अपने हाथों में लिया, “हमारे साथ कुछ भी नहीं होगा.. जैसे मैं अभी तुम्हारे पास, तुम्हारे साथ हूँ..वैसे ही हम दोनों उम्र भर एक दुसरे के साथ रहेंगे.”

एक रुखी सी मुस्कराहट उसकी आँखों से झाँकने लगी थी. हम दोनों बहुत देर तक ऐसे ही बैठे रहे, एक दुसरे का हाथ थामे.

शाम घिर आई थी, और किले के चारों तरफ बत्तियां जलने लगी थीं. किले के बंद होने का समय हो चला था. चौकीदार सभी लोगों को अब निकलने के लिए कह रहे थे.

“चलो, हमें अब चलना चाहिए..”, मैंने प्रिया से कहा. वो उठी लेकिन मेरे हाथों को अब तक उसनें अपने हाथों में जकड़े रखा था. कुछ देर तक हम वहीँ खड़े रहे, पत्थरों से सटे हुए.. सामने भैरव मंदिर था और आईटीओ की सड़क..मैंने बहुत धीरे से उसका माथा चूम लिया. उसनें आँखें ऊपर उठाई, हलकी मुस्कराहट उसके आँखों में सिमट आई थी. एक दुसरे का हाथ थामे हम दोनों किले के दरवाज़े के बाहर आ खड़े हुए.

कुछ देर तक मैं और प्रिया किले के उस बड़े से दरवाज़े के पास ही खड़े रहे.. कुछ देर तक प्रिया उस दरवाज़े को देखती रही और फिर जोर से, लगभग चिल्लाते हुए कहा उसनें, “मैं फिर आऊंगी, बहुत जल्दी...”, मेरी बाहों को प्रिया ने कस कर अपनी बाहों में जकड़ लिया, “इसे भी लेते आउंगी. हम दोनों एक साथ आयेंगे, बहुत जल्दी...” कह कर वो चुप हो गयी और कुछ देर तक किले को बस देखती रही, और फिर एक बड़ी सी मुस्कराहट के साथ उसनें किले को हाथ हिलाते हुए विदा कहा और हम दोनों एक खूबसूरत दिन बिता कर वापस लौट आये.


[ Opening Paragraph : A Nirmal Verma Inspiration ]
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Monday, October 30, 2017

तुम्हारे नाम पर एक कविता - प्रियंका गुप्ता की तीन कवितायें

आज बेहद ख़ास दिन है मेरे लिए. आज जन्मदिन है मेरी दीदी, प्रियंका गुप्ता का. इस ब्लॉग से वो मेरे से ज्यादा जुड़ी हुई हैं. वो नहीं होती तो शायद ये ब्लॉग बहुत पहले बंद हो चुका होता. आज उनके जन्मदिन पर उन्हीं की तीन अप्रकाशित कविताएँ यहाँ साझा कर रहा हूँ.. 

1.  चलो कुछ देर खामोश बैठते हैं 

चलो,
कुछ देर खामोश बैठते हैं
और सुनते हैं
हमारे दिलों के
धड़कनों  को;
या फिर
दूर से आती किसी ट्रेन की
सीटी की गूँज
और उसके साथ
अपने पाँव के नीचे
हल्के से थरथराती
ज़मीन का कम्पन;
सुनना हो तो सुनो
घर के पिछवाड़े बने
उस छोटे से बगीचे में
एक अनदेखे कोने में छिपे
झींगुरों का संगीत;
और अगर कुछ देर फुरसत हो
तो सुन सकते हो
नदियों को गुनगुनाते हुए;
तुम जब चाहो तब
सुन सकते हो इनमें से कुछ भी
अपनी पसंद के हिसाब से
पर कभी कोशिश करना
अपनी पूरी ताकत लगा के सुनने की
मेरे अबोली अनगिनत आवाज़ें...।

2. चलो लौट चलते हैं फिर 

चलो,
लौट चलते हैं फिर
उसी दोराहे पर
जहाँ से अलग हुए थे
हमारे रास्ते
बदल गईं थीं
हमारी मंजिलें
चलो,
थोड़ा और पीछे चला जाए
कुछ दूर साथ चलते हुए
मिल जाएँ फिर से कहीं
किसी दोस्त से अजनबी की तरह
जिनके बीच खामोशियाँ हों
पर अबोला नहीं
चलो,
एक बार फिर
विदा लेते हुए
वादा करें कोई
और
एक बार फिर
भूल जाएँ
उन्हें निभाना...।

3. तुम्हारे नाम पर एक कविता 

मैं रचूँगा
तुम्हारे नाम पर एक कविता
उकेरूँगा अपने मन के भाव
कह दूँगा सब अनकहा
और फिर
बिना नाम की उस कविता को
कर दूँगा
तुम्हारे नाम
क्योंकि
मैं रहूँ न रहूँ
कविता हमेशा रहेगी
तुम्हारे नाम के साथ...|



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Monday, June 26, 2017

झील में तैरती बत्तखें

कौन ऐसा खुशनुमा दिल न होगा जिसे बारिश की रुमानियत न पसंद हो, और बात जब उस दीवानी सी प्रिया की हो, तो बारिश में घूमने से कौन मना कर सकता है ? पिछली पोस्ट में आपने प्रिया के दिल्ली आने और मेरे भैया भाभी की शादी की सालगिरह में शामिल होने के किस्से पढ़े, और साथ ही मुझे रात के ढाई बजे जगा के दी गई उसकी धमकी की दास्तां भी...अब आगे पढ़िए उसके साथ बिताई गई अक्टूबर की सात ऑसमाशामों में से एक किस्सा और...(अब ये 'ऑसमाशामें ' क्या बला है, इसे जानने के लिए तो आपको यहाँ जाना पड़ेगा...)

सुबह अलार्म बजने के पहले ही मेरी नींद खुल गयी थी. रात में प्रिया से बात करने के बाद मुझे सही से नींद ही नहीं आयी. नींद न आने की वजह प्रिया के बदमाशियों के प्रति इरिटेसन, गुस्सा या उसकी धमकियों का डर नहीं था, बल्कि मुझे गिल्ट हो रहा था कि रात नींद में मैंने बेवजह ही प्रिया को डांट दिया था. हालाँकि मैं जानता था कि उसे मेरी डांट का कभी बुरा नहीं लगता, और वो मेरी डांट का बदला अक्सर मुझे वापस डांट कर ले लिया करती है. लेकिन फिर भी मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था. इतने बेसब्री से मैं प्रिया का इंतजार कर रहा था, और जाने कितना कुछ सोच रखा था, कि दिल्ली में कहाँ कहाँ घुमना है, कैसे वक़्त बिताना है, और अब जब वो दिल्ली आ गयी थी, मैंने उससे एक दिन की मोहलत माँगी थी आराम करने के लिए? ये मेरी बेवकूफी की हद ही तो थी. वो तो अच्छा हुआ रात में अचानक बारिश हुई और प्रिया ने मुझे डांट लगाकर सुबह मिलने बुलाया, वरना एक पूरा दिन मैं बस सोने में बरबाद कर डालता.

सुबह मैं जब घर से निकला तो मौसम बड़ा सुहावना हो चुका था. रात भर मुसलाधार बारिश हुई थी और सुबह सुबह खूब ठंडी हवा चल रही थी. मैं समय से काफी पहले खान मार्केट पहुँच गया था. खान मार्केट के गेट नंबर एक के ठीक सामने कैफे “ब्लू नाम” का एक कैफ़े था. प्रिया ने वहीँ आने के लिए कहा था. पहले तो मैंने सोचा कि कैफे के बाहर ही उसका इंतजार करूँ लेकिन प्रिया के आने में आधे घंटे का वक़्त बाकी था. मैं कैफे के अन्दर चला आया. कैफे लगभग खाली ही था. कोने वाली मेरी पसंदीदा जगह भी खाली थी, मैं जल्दी से जाकर वहाँ बैठ गया. सुबह सुबह वैसे भी इस कैफ़े में ज्यादा भीड़ नहीं होती. यहाँ बस वही आते हैं जो सुबह लोदी गार्डन से टहल कर लौट रहे होते हैं या फिर साइकलिस्ट जो साइकलिंग के बाद कुछ देर यहाँ सुस्ताने के लिए बैठते हैं. मैंने एक सरसरी निगाह कैफे पर डाली. मेरे सामने तीन लड़कियां बैठी थीं जो तेज़ आवाज़ में बातें कर रही थीं. उनमें से एक लड़की ने शायद अपनी बाहों पर टैटू बनवाया था जिसके बारे में वो अपनी बाकी दोनों सहेलियों को बता रही थी. उनके ठीक बगल में दो बुजुर्ग दोस्त बैठे थे जो सतरंज की बाजी पर झुके थे. मेरे ठीक बगल में एक लड़का और एक लड़की बैठे थे. लड़की ने जाने किस बात पर लड़के को मजाक में एक थप्पड़ मार दिया था.  उन्हें देख मुझे थोड़ी हँसी आ गई. मैंने शुक्र मनाया कि प्रिया अभी नहीं आई है, वरना इस लड़की को देखकर वो भी ऐसा करने को इन्स्पाइर हो जाती. कैफे के काउंटर के दूसरी तरफ कुछ विदेशी टूरिस्ट का एक ग्रुप था जिनमें से शायद किसी का जन्मदिन था और वे खूब मस्ती मजाक कर रहे थे और तरह तरह के लहजे में बर्थडे जिंगल गा रहे थे. मेरा सारा ध्यान उनके सेलिब्रेशन पर ही था कि तभी मुझे पीठ पर हलकी थपथापाहट महसूस हुई. मैं चौंक गया. मुड़ा, तो देखा प्रिया खड़ी थी.

“क्या बात है मिस्टर..कब से यहाँ बैठे हो? बड़े फ्रेश दिख रहे हो? रात में खूब सोये क्या?” प्रिया ने शरारती अंदाज़ में मुझे छेड़ते हुए कहा.
“बस मैडम, मेहरबानी है आपकी. पूरे ढाई घंटे सोया हूँ मैं..पूरे ढाई घंटे! कैन यू बिलीव इट?” प्रिया को छेड़ने के लिए थोड़े शरारत से मैंने भी कहा.
“हुंह....सब समझती हूँ मैं. ताना देने की कोई जरूरत नहीं है. In fact, you should thank me, वरना इतने रोमांटिक मौसम में भी तुम बाकी लोगों की तरह अपने बिस्तर में दुबके पड़े होते..” 

प्रिया की इस बात का मैंने कोई विरोध नहीं किया. उसकी बात वैसे सही भी थी. सच में मौसम बहुत खूबसूरत हो गया था, और अगर उसनें जिद न की होती, तो मैं सही में घर में सोया होता.

“अच्छा चलो बताओ, आगे का प्लान क्या है?” मैंने प्रिया से पूछा. प्रिया ने पूरे दिन का प्लान सुना डाला - “देखो मिस्टर, यहाँ ब्रेकफास्ट करने के बाद  हम लोदी गार्डन में बैठने मोर्निंग वाक के लिए जायेंगे. वहाँ अपने अड्डे पर बैठेंगे और फिर हमारी सवारी निकलेगी डिलाइट, मैटिनी शो के लिए और......
“डिलाइट? दिल्ली गेट वाला डिलाइट? बेवकूफ लड़की !! इतने अच्छे मौसम में बाहर घूमना चाहिए और तुमनें डिलाइट में फिल्म देखने का प्लान बना डाला..” मैंने उसकी बातों को बीच में ही काटते हुए कहा.
“अरे यार, डांटो नहीं,  मुझे कहाँ पता था कि आज मौसम ऐसा ऑसम हो जाएग. मैंने तो कल दोपहर में ही राहुल से टिकट मँगवा ली थी. तुम्हें इसलिए नहीं बताया था कि तुम्हें सरप्राइज देना चाहती थी मैं..” 
"कल टिकेट मंगवा लिया था तुमने? और आज बारिश न होती और मैं न आता तो?" मैंने पूछा. 
“तो क्या..टिकट और पैसे बेकार हो जाते ”. उसनें बेचारी सी शक्ल बनाते हुए कहा, जिससे मुझे हँसी आ गयी.   
“अच्छा !! कैन सी फिल्म है? ये तो बताओ...”
“कुछ देर में पता चल जाएगा तुम्हें. ट्रस्ट मी, बहुत अच्छी फिल्म है..” उसनें कहा. 
“लेकिन यार नाम तो बताओ ?” मैंने दोबारा पूछा तो वो थोड़ा झल्ला सी गयी. 
“यार तुमने एक तो बीच में मुझे टोक दिया, फिर डांट दिया और अब इतने सावल कर रहे हो. देख लेना जो भी फिल्म होगी,  Now Shut Up and LISTEN -  डिलाइट से निकलने के के बाद हम कुछ देर के लिए लाल किला जायेंगे, वहाँ से चाँदनी चौक जहाँ मुझे कुछ शौपिंग करनी है और फिर आखिर में पराठे वाली गली. बस..इतना ही” कहकर वो चुप हो गयी, और मेरी तरफ ऐसे घूर कर देखने लगी कि जैसे अगर मैंने इसके प्लान में किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने की कोशिश की तो ये मुझे खा जाएगी. 

सच बताऊँ, तो प्रिया के इस तरह से घूरने से मैं हमेशा डर जाता हूँ. मैंने जल्दी जल्दी अपना ब्रेकफ़ास्ट खत्म किया, और प्रिया के साथ लोदी गार्डन की तरफ चल दिया. मौसम बड़ा खूबसूरत था, इसलिए हम पैदल ही चल दिए थे. आसमान में काले बादल छाने लगे थे, और किसी भी वक़्त बारिश शुरू हो सकती थी. मेरा लॉजिकल दिमाग बार बार ये कह रहा था कि ऐसे मौसम में लोदी गार्डन जाना बेवकूफी है, किसी कैफ़े में ही बैठकर गप्पे लड़ाओ, लेकिन दिल इस बात पर अड़ा था कि यार कभी कभी ऐसे मौसम में ऐसी बेवकूफी करनी चाहिए. 

हम दोनों सीधा लोदी गार्डन के झील के पास आ गए. प्रिया को लोदी गार्डन में कहीं और घुमने की कभी उत्सुकता नहीं रहती, लोदी गार्डन में दो तीन ही जगह होंगे जहाँ उसे समय बिताना पसंद था, लेकिन इस झील के किनारे बैठना उसे सबसे ज्यादा अच्छा लगता था. झील के किनारे हमारा अपना एक बेंच था. टेक्निकली वो हमारा बेंच नहीं था, लेकिन संजोग की बात थी कि हम जब भी यहाँ आये हैं, ये बेंच हमेशा खाली रही है.हमनें इसपर किसी को भी कभी बैठे नहीं देखा. प्रिया तो ये तक कहती थी कि इस बेंच पर सिर्फ हमारा अधिकार है, यहाँ किसी और ने बैठने की कोशिश की तो उसे मज़ा चखा दूँगी. उसका बस चलता तो वो बेंच के आगे एक तख्ता लगा कर मेरा और खुद का नाम उसपर लिख देती.



हम उसी बेंच पर बैठ गए. प्रिया एकदम मेरे करीब आ बैठी.  उसनें अपने बंधे बालों से क्लिप निकाल ली, और वो उसके कन्धों पर बिखर आये थे. सामने झील में बहुत सी बत्तखें तैर रही थी. प्रिया की आँखें झील में तैरती उन बत्तखों पर ठिठक गयीं. "देखो उधर - उसनें मेरे हाथ को झिंझोड़ते हुए कहा - कितनी सुन्दर लग रही हैं न ये  बत्तखें, एक कतार में चलते हुए. उजली और बेहद प्यारी. इन्हें हम अपने साथ ले चले? अपने घर ?” प्रिया ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा. उसकी उस मुस्कराहट में लेकिन कोई शरारत या हँसी नहीं थी. उसकी आँखें स्थिर थीं, चमकती हुईं. मैं उसका चेहरा देखकर समझ जाया करता हूँ, कि कब वो शरारत कर रही है और कब गंभीर है. 
“तुम कहो तो मैं इन्हें बैग में डाल के ले चलूँ”? मैंने प्रिया से कहा. वो हँसने लगी, “आई रियली विश यार”.  उसनें धीरे से कहा और फिर उन्हीं बत्तखों की तरफ देखने लगी, “जानते हो? दीदी को बत्तखें बहुत क्यूट लगती थी और मुझे बेहद स्टुपिड. अपने शहर की सचिवालय वाली सड़क याद है न तुम्हें? कैसे अक्सर गर्मियों की शामों में बत्तखें सड़कों से अपनी फ़ौज लेकर गुज़रती थीं. पता है एक बार दीदी ने गाड़ी रुकवा दी थी और कैमरे से बत्तखों की तस्वीर लेने लगी थी. मुझे इतना गुस्सा आया था न उस समय दीदी पर. मैं तो उनसे लड़ पड़ी थी, कैमरे की रील लगभग खत्म होने को थी, मुश्किल से चार पाँच फोटो और लिए जा सकते थे और दीदी ने वो रील बत्तखों पर खर्च कर दिए थे. रात में मैं खूब लड़ी थी उनसे, मेरा फोटो सेसन हो जाता बचे हुए रील में. जानते हो उन दिनों मुझे लगता था कि बत्तखें स्टुपिड हैं, लेकिन असल में स्टुपिड बत्तखें नहीं थी..मैं थी”.
“हम्म..सब जानता हूँ मैं.." मैंने फिर से शरारत भरे लहजे में कहा, 
"अच्छा..? क्या जानते हो तुम? बताओ ज़रा..  
"यही कि तुम उन दिनों सच में स्टुपिड थी. मतलब ऐसा नहीं है कि अब समझदार हो गयी हो, बस उन दिनों ज्यादा स्टुपिड थी तुम...” मैंने कहा. 
“हाँ, ये तो सच है यार, !! इस बात पर तो आई एम विद यू !!” उसनें कहा, और हम दोनों एक साथ हँसने लगे थे. 

कुछ देर तक हम दोनों झील में तैरती उन बत्तखों को देखते रहे थे. “अच्छा, एक बात बताओ, तुम्हें याद है इस झील के पास हम दोनों पहली बार कब आये थे?” प्रिया ने पूछा.
“हाँ बिलकुल याद है, बारहवीं के इम्तिहान के बाद. दीदी भी थीं हमारे साथ, वही हमें घुमाने लायीं थीं”.
प्रिया के चेहरे पर मुस्कान उभर आई, “हाँ...लेकिन उस वक़्त हमें नहीं पता था न कि वही आखिरी साल होगा जब दीदी साथ रहेंगी. जानते हो, उसके अगले साल मैं लोदी गार्डन अकेले आई थी, ऐसा ही बारिशों वाला दिन था वो भी, और इसी पत्थर पर बैठकर मैं खूब रोई थी. 

प्रिया के अचानक इस तरह संजीदा होने से मैं थोड़ा घबरा सा गया था. "प्रिया तुम ठीक तो हो?"
वो हँसने लगी.. “अरे डरो नहीं, मैं एकदम ठीक हूँ, बस यूहीं कुछ याद आ गया था". उसनें कहा और कुछ देर तक बेंच पर किसी अदृश्य दाग को कुरेदते हुए उसनें पूछा “तुम्हें मुकेश का वो गाना याद है न? तुम्हारा तो पसंदीदा है - जाने चले जाते हैं कहाँ दुनिया से जाने वाले?” 
“हाँ, तुम्हें मैंने ही तो सुनाया ये गाना पहली बार...”
“यस...! अपने उस मर्फी वाले टेपरिकॉर्डर पर. मुझे याद है.." कहकर वो चुप हो  गयी. कुछ देर चुप रहने के बाद उसनें मेरी ओर देखा, “जानते हो दीदी के जाने के एक साल बाद जब मैं यहाँ आई थी न, उस दिन यहाँ बैठे-बैठे मैं भी कुछ-कुछ उस गाने जैसा ही सोच रही थी, कि दीदी कहाँ गयीं होंगी? क्या सच में कोई ऐसी जगह है, जिसे हम स्वर्ग कहते हैं, और दीदी वहाँ चली गयीं हैं? कैसी जगह होगी यार वो? क्या ये नहीं हो सकता कि मैं बस एक बार, सिर्फ एक बार वहाँ जाऊं, और उन्हें देख कर वापस आ जाऊं. बस एक झलक. कैसी हैं वो ये पता कर के वापस यहाँ आ जाऊं..” कहते हुए उसकी आँखें मुझपर उठ आयीं थी.

मुझे समझ नहीं आया कि मैं प्रिया से क्या कहूँ. मुझे यूँ असमंजस में पड़ा देख उसनें कहा, एक मजेदार बात बताऊँ तुम्हें. हँसोगे तो नहीं न?
“नहीं बाबा..नहीं हसूँगा ..बोलो तो....” मैंने उसकी हथेली को अपने हाथों में ले लिया.

“तुमने कभी गौर किया है कि इस झील के किनारे इस बेंच पर या किसी भी और झील के किनारे, किसी भी और बेंच पर बैठने वक़्त मैं हमेशा अपने बगल में इतना 'स्पेस' क्यों छोड़ देती हूँ?”
“हाँ, ताकि तुम मेरे और करीब बैठ सको....”
“नो इडियट! तुम इतने भी स्पेशल नहीं हो. यू नो, ये जगह मैं हमेशा दीदी के लिए छोडती हूँ. ताकि वो मेरे बगल में बैठ सके. जानते हो वो रहती हैं हमेशा मेरे आसपास. हर जगह.”

“जानता हूँ मैं...” मैंने कहा.

“पता है, मैं जब पिछली बार यहाँ आई थी इसी बेंच पर बैठी थी, अकेली थी, और दीदी को याद कर के खूब रो रही थी. तब वो पहली बार मुझे दिखी थी. पूरे एक साल बाद, उन्हीं कपड़ों में जिसमें उन्हें मैंने आखिरी बार देखा था. तुम नहीं थे उस वक़्त दिल्ली में, उस दिन उन्होंने ही मुझे चुप करवाया था. हमनें खूब बातें की थी.." एक चमकीली सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गयी थी.. कुछ देर के पौज के बाद उसनें फिर कहा, यू नो, उस दिन एक और अजीब बात हुई थी. मैं इसी बेंच पर बैठी थी, और मुझे पता भी नहीं चला ये बत्तखें कब मेरे इतने करीब चली आई थी. बिलकुल मेरे पैरों के पास. और पता है, मुझे डर नहीं लगा. मुझे डर लगना चाहिए था न इन बत्तखों से? मुझे हमेशा इनके चोंच बड़े क्रीपी लगते थे, तो मुझे डरना चहिये था? राईट? लेकिन यू नो व्हाट? मुझे इन बत्तखों पर प्यार आने लगा था. और मुझे ये बत्तखें स्वीट लगने लगी. लेकिन सबसे बड़ा रेवलेशन मुझे उस दिन रात में नींद में हुआ, मुझे सपनें में एक आवाज़ सुनाई दी थी, वे बत्तखें तुम्हारे पास नहीं आई थी, बल्कि तुम्हारे बगल में जो पीले समीज सलवार में लड़की बैठी थी उसके पास आई थी. यू नो, पीले समीज सलवार में दीदी थी, जो मेरे बगल में बैठी थीं.." कहते हुए प्रिया चुप हो गयी. एकदम चुप.  मैंने प्रिया के हथेलियों को अपनी हथेलियों में जकड़ लिया.  

“पता है यार, कुछ दिनों पहले मैं अपनी पुरानी अल्बम देख रही थी, And I was really amazed, कि मेरी शक्ल कितनी बदल गयी है, लेकिन दीदी, वो अब भी वैसी ही हैं. डिट्टो.. सेम टू सेम! जानते हो मैं बूढी हो जाउंगी और बड़ी  वीयर्ड सी दिखने लगूंगी. तुम भी बूढ़े हो जाओगे, दांत झड़ जायेंगे तुम्हारे, हमारे आसपास के सभी लोगों पर उम्र का असर दिखेगा, लेकिन दीदी...वो वैसी ही दिखेंगी हमेशा. जैसे एल्बम की उस आखिरी तस्वीर में वो दिखती हैं, मस्त..हंसमुख..सुन्दर..स्वीट एंड ईटर्नली ब्यूटीफुल ! यू नो, उनकी एक बड़ी सी तस्वीर मेरे कमरे की दीवार पर लगी है, जिसे तुमने फ्रेम करवाया था, याद है न तुम्हें वो तस्वीर उनकी? पहले जब वो थीं, मुझे उनकी वो तस्वीर बेहद आम सी लगती थी लेकिन अब असाधारण तस्वीर लगती है. एक सम्मोहित कर देने वाली मुस्कराहट है उसमें दीदी की. मैं जब भी उदास होती हूँ उनकी उस तस्वीर के सामने जाकर खड़ी हो जाती हूँ, और फिर वो मुझे बहुत समझाती हैं, कभी कभी गुस्से में डांट भी देती हैं – ‘ये क्या बेवकूफी है प्रिया? क्या हुआ है तुम्हें? शक्ल क्यों लटकी हुई है तुम्हारी? बस इतने में ही घबरा गयी? देखो मैं इस दुनिया से बाहर आकर भी नहीं घबराई, अब भी वैसे ही हँस रही हूँ जैसे पहले हँसती थी और तुम? तुम्हारी वो हँसी कहाँ चली गयी? तुम्हारी हँसी तो मुझसे भी प्यारी है, वापस लाओ अपनी उस हँसी को एंड बी ब्रेव!' जानते हो फिर मैं सच में खूब हंसती हूँ. उनकी डांट के बाद I Feel So Relaxed. वो अब भी  रहती हैं मेरे आसपास..हर जगह..हर समय. जैसे कल रात, जब मैंने तुम्हें कॉल किया था. मेरे बगल में ही थीं वो. डांट रही थी मुझे, कि मैं क्यों तुम्हें इतनी रात गए परेशान कर रही हूँ. यू नो न, अन्फॉर्चनट्ली तुम्हारी बात जब भी आती है, वो मुझे छोड़ कर हमेशा तुम्हारी साइड ले लेती हैं, ऑल्वेज़ !! " कहते हुए प्रिया ने एक बार अपनी दायीं तरफ देखा और मुहँ बिचका दिया, जैसे सच में वो अपनी दीदी से इस बात की शिकायत कर रही हो.

मेरे चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गयी, मैंने कहा कुछ नहीं, बस प्रिया को अपने एकदम करीब खींच लिया. उसनें अपना सर मेरे कंधे पर टिका लिया और आँखें मूँद ली. मैंने झील में तैरती बत्तखों को देखा, और फिर गरजते बादलों की आवाज़ सुनी. बारिश किसी भी वक़्त हो सकती है, मैंने प्रिया से कहा. प्रिया ने लेकिन कोई जवाब नहीं दिया. उसकी साँसें मेरे गालों को सहला रही थीं. धीरे से मैने उसका माथा चूम लिया. उसनें आँखें खोल दी. “मैं यहाँ से जाना नहीं चाहती”, उसनें कहा.

“हम भींग गए तो?” मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों से उठा दिया.

“तो हम गल थोड़े ही जायेंगे...” उसनें कहा. एक बहुत हलकी सी शरारत वाली मुस्कान उसके चेहरे पर चली आई थी.
“और वो तुम्हारी फिल्म? जो तुम मुझे दिखाना चाहती हो? उसका वक़्त हो रहा है न..” मैंने कहा. वो कुछ देर तक मुझे अपलक देखती रही जैसे तय नहीं कर पा रही हो कि वो वाकई फिल्म देखने जाना चाहती है या यहीं बैठी रहना चाहती है. फिर अगले ही पल वो एकदम उठ खड़ी हुई, “हाँ हाँ चलो चलो, यहाँ बैठे-बैठे बारिश में भींग कर मैं बीमार होना नहीं चाहती, अभी पूरे सप्ताह तुम्हारे साथ घूमना जो है.


बातें बाकी...
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